अब भी औरतें….. और कुछ अन्य कविताएँ

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प्रोफेसर चन्द्रकला त्रिपाठी

प्रोफेसर चंद्रकला त्रिपाठी सुप्रसिद्ध कवयित्री हैं। उनके दो कविता संग्रह क्रमशः ‘वसंत के चुपचाप गुजर जाने पर’ तथा ‘शायद किसी दिन’ बेहतरीन संग्रहों में से हैं। इससे इतर गद्य की उनकी पुस्तक ‘इस उस मोड़ पर’ पिछले वर्षों में काफी चर्चित रही।

भाषा-प्रवण उनकी कविताएँ सामाजिक गुत्थियाँ सुलझाने का क्रम हैं। कहा जाता है कि कुछ युवकों को जिंदा जलाए जाने की घटना से विक्टर ह्यूगो इस कदर व्यथित हुए थे कि उन्होंने अपने आप को कैद कर लिया था और तब जो रचना लिखनी शुरु की उसे पूरा कर ही उस कमरे से बाहर निकले। चंद्रकला त्रिपाठी की अनेक रचनाएँ ऐसी ही व्यथा(ओं) को दर्ज करती हैं। प्रस्तुत है उनकी नई कविताएँ।

 

देवताओं की पलक नहीं झपकती

संभल कर जीने के लिए कुछ पाठ जरूरी होते हैं
चुप रहें
फुसफुसायें भी नहीं
धीरे साँस लें
कलेजा धंसा कर रखें
पलकें गिरा कर रखें
यह पूरा अभ्यास दिन में कम से कम तीन बार
दुहरायें

वो क्या है कि दिमाग जल्दी किसी के काबू में नहीं आता
दिल तो और मन बढ़ कहा जाता है
हम आप देवता बनने की राह पर हैं
हम पर सतयुग की निगरानियाँ जारी हैं
देवताओं की पलकें नहीं झपकती
इसलिए
देवता कभी खून के आंसू नहीं रोते

हम आप
सीने के बल सरकते
ज़ख्मी बारहा होने
सहने और ज्यादा सहने के हौंसला बनाये रखें
देवता खुश होते हैं

देवताओं का ऐलान यह भी है कि
अब किसी को तोप के मुंह पर बांधकर नहीं मारा जाएगा
खामखा बदनामी होती है
जो काम पड़ोसी कर सकते हैं परछाइयों पर पैर रखकर
उसके लिए फौजें क्या उतारना

आपने गपशप की
ज़माने को भला – बुरा कहा
ज्यादा बोलने वाले दोस्तों को खबर कर दी
कि इतने में
कई हत्यारे सरपट भाग लिए और
अपराध की जगह पर
गमछे से पसीना पोंछता वह आदमी पकड़ा गया
जो दुनिया में कहीं भाग कर जाता
पकड़ा जाता

आपको ठंढ़ी हवा चाहिए थी
थोड़ा तर गला चाहिए था
थोड़ी सी छूट चाहिए थी
थोड़ा मनोरंजन
थोड़ी क्रूरता चाहिए थी
इस थोड़े – थोड़े की जुटानों से
किसी को क्या गुरेज
कि बंदिशें तोड़ने का यह रंग
इश्क – मुश्क थोड़ा – थोड़ा
इसके लिए किसी से कैसी भी इजाजत भला क्यों
तो वो जरा – जरा सी मस्ती थी
मनोरंजन था जुमले थे कि
कई – कई लडकियाँ मरी हुई पाई गई
सबके गले रेते गये थे
जो बची वे अपने दुपट्टों से लटक गईं
दारोगा ने कहा कि सब की सब छिनाल थीं
थोड़ी खुसुर – पुसुर बढ़ चली और
सबकी सहमति हुई कि
छिनाल थीं सब की सब
दारोगा को छिनाल का कोई सुन्दर अर्थ बताने की जरूरत नहीं थी
तुम्हें थी और तुमने बताया भी
तुमने भाषा में
सौंदर्यशास्त्र दर्शन और परम्परा में
दिखा दिया कि छिनाल का
दरअसल एक भव्य अर्थ भी है
कि जब भी घिरने की नौबत आई
तुमने भाषा को घुटने टेकने पर मजबूर किया

छिनालों की ओर से बोलने वाली
सब की सब छिनालें होंगी
फुसफुसाहटों में बस इतनी चलन बनीं रही

आधी ही नहीं
पूरी – पूरी आबादी को अपनी कोख में
सम्भालने वाली वे
यहाँ बचेंगी तो वहाँ मार दी जायेंगी
युद्ध में बचेंगी तो
प्रेम में मार दी जायेंगी

यह यूँ ही नहीं है कि अपने गर्भ में वे
अपनी प्रजाति का शिशु नहीं चाहतीं
हत्यारों के हाथ में अपना शिशु सौंपना
भला कौन माँ चाहती है

तो थोड़ी शगल
थोड़ी गपशप
थोड़ा इनका थोड़ा उनका भी
इस थोड़े – थोड़े की परतों में
फुफकारतें हैं कितने युद्ध
कितने विनाश

जरा – जरा सी सहूलियतों ने
आसान कर दिया देवताओं का काम
सतयुग है अगर यह तो
कयामत का वैलइक्युपट है कि
कोई किसी गुमनाम के पीछे नहीं छुप सकता
तमाम महान पिछली आत्माएं भी
सतयुग के पक्ष में बोलने के लिए लौट आई हैं
सारे ईश्वर
अपनी भव्यता चमका रहे हैं
सारी जुबानें
पुरानी हरकतें उलट – पलट रही हैं
बेहद शानदार भूमिकाएं अब
सिर्फ हत्यारों की बची हैं
शायद कोई
अपने जज्बे की थोड़ी हरारत बचा ले
शायद कोई अपने जज्ब़े की थोड़ी हरारत बचा ले
शायद कोई
ज़िन्दगी को ज़रा – ज़रा तानों
नफरतों और प्रेम में बचा ले
शायद कोई ज़रा – ज़रा
सही मौत मरने की आज़ादी बचा ले
कि
आज़ादी जीने की हो या मरने की
यह आज़ादी ही तो है जो
देवताओं के पास नहीं है
अब यह क्या कम सजा है कि
देवताओं की पलक नहीं झपकती

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 चलो कि पृथ्वी ही बदल लेते हैं

चलो कि बहुत ज्यादा गहरे जज्ब हुए हैं खून के धब्बे तमाम
आंसुओ से धोना मुमकिन होता अगर
आंसू बचे होते

पृथ्वी पर अब केवल हत्यारों के अपराध नहीं
हमारे भी खूब फले-फूले

कोई चारा बचा होता तो हम कहते कि वहां से शुरू करते हैं दूसरी तीसरी तैयारियों का इंतजार
तो क्या करें
चलो पृथ्वी ही बदल लेते हैं
तय करते हैं कि
इसे भगवान भरोसे नहीं छोड़ेंगे
ठीक है न विहाग

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महसूस करो उसे कि उसका जीना बचा हुआ है

बकरियां चराने जंगल में निकल जाती थी
नन्हें नन्हें पैरों से थिरकती चलती होगी वह आसिफा
पत्तों से खेलती इतराती जंगल से नहीं डरती थी वह
छलांगें लगा कर ऊची शाखों  से लटक झूलती थी वह
आठ साल की वह उम्र
जो मासूम निर्भय और विश्वासी होती है
वे दोनों बेरहम जब उसकी घोड़ी ढूंढने के छल से उसे घेर रहे थे
तब सचमुच डर गई थी वह बच्ची
स्तब्ध था जंगल जहां से उसे दरिंदगी के लिए उठा लिया गया था
मुंह में उड़ेल दी गई थी बेहोशी की दवा
हैवानों की जांघ के नीचे उसकी छटपटाहट को महसूस करो
महसूस करो इस तरह जैसे वहां तुम्हारी बच्ची थी
महसूस नहीं करोगे तो सब भूल जाओगे
भूल जाओगे कि दरिंदों को कोई डर नहीं था क्यो कि सुशासन
भगवान और वकील
सब उनके साथ थे
कुछ लेखक लेखिकाएं भी

उसे मृत्यु तक रौंदा गया
पत्थर पर पटका गया
कितना जबर था उसका जीना कि
बार बार कुचलने पर उसका खत्म होना
बर्बरों को महसूस नहीं हुआ
खूनसनी उसकी चिथी फटी देह
ओह मैंने आजतक इतना भयानक कभी नहीं लिखा
यह लिख रही हूं कि आसिफा
तुम्हारी यातनाएं
पुरानी खबर में ओझल न हों
हम सब सुरक्षित  ठीहों में बसे मां बाप
उस चीख को अपने कलेजे में धंसा लें

हमें चाहिए उन दरिंदों की उससे बहुत ज्यादा भयानक मौत
उससे कम कुछ नहीं

बहुत निहत्थे हुए हैं वे
जिन्हें विश्वास था कि भगवान सब देख रहा है

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अब भी औरतें…..

औरतें
पतियों पिताओं भाइयों के हिस्सों में बटी औरतें
प्रतिहिंसा का रास्ता नहीं चुनती
ढ़ेर सारी नफरत और हत्या का भी

अपने बल की नुमाइश नहीं करतीं कि
औरताना होने का बुरा भी नहीं मानती
अपने बोलने का इंतजार करती हैं
चुप कराए जाने का बुरा नहीं मानती

पहाड़ उठा लेती हैं
बोझ फटकती हैं
दाने पकाती हैं
कोख संभालती हैं
कितने बियाबान बसा चुकी हैं अहसान जताए बिना

अपनी जात को सिखाने में कोताही नहीं करती कि
ये पिता हैं वो बाबा नाना
वो पड़ोस के चाचाजी
वो मामा ऐसा कि सांप को भी मामा कह दो तो सारा विष उतार कर रख दे

वो सगा बेसगा भाई
भाई का दोस्त भी भाई
इतना सारा सगापन जुटाती संभालती हैं औरतें कि
रात बिरात ऊंचे खाले सगे ही मिलें
बेदाग पार लगा दें जीवन

सारे रिश्तों में खुद को देहभर समझी जाने वाली नृशंसता
वे समझ कर भी नहीं समझना चाहतीं

पाप अपनी देह का हश्र समझती आईं वे और
यही चेताती आईं बेटियों बहनों को
दो कौड़ी की नहीं रहोगी तुम और उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा क्योंकि
जमाना उनका है
कोने कतरे में लुकाई
जीने में कोई आवाज़ नहीं करती ये औरतें
पृथ्वी पर छोड़ चुकी हैं बर्बरता के लिए पूरी जगह

ख़त्म हुई पृथ्वी पर स्त्री के लिए पारिवारिकता ?
अब तो ईश्वर का घर भी
हत्या और बलात्कार की जगह हुआ

क्या तय करना है स्त्री
बांझ हो जाना
दूध की जगह ज़हर की घुट्टी पिला देना

पता नहीं क्या करने से इस जघन्यता का जवाब बनेगा मगर जब भी बनेगा सिर्फ
तुम्हारे बल पर बनेगा
समझी
तुम जो रोज़
धरती भर चलती हो
आसमान भर आजादी भी जोड़ लो
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