ज्योति शोभा की चार कविताएं

0

सजग पाठिका एवम सदैव साहित्य सृजन में उन्मुख ज्योति शोभा अंग्रेजी साहित्य में स्नातक हैं। “बिखरे किस्से ” संग्रह के अतिरिक्त इनकी कई कविताएं राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय संकलनों में प्रकाशित हो चुकी हैं। 

ज्योति शोभा

फिर तो नदियाँ भी बाज़ारू होती होंगी

फिर तो नदियाँ भी बाज़ारू होती होंगी
जो रास्ता मांगती हैं
पहाड़ों के नीरव पथरीलेपन से, मैदानों की बंज़र प्रतीक्षा से
कि सो नहीं पाती हैं वो
अकेले पाताल के निर्जन हृदय में
बह निकालने की चाह में.. एक अंतहीन राह में ..

और तुम्हारी प्यास भी ती होती होगी बाज़ारू
जो हर करवट देखती है ख्वाब
एक नदी को पकड़कर अपना अक्स देखने की
कि मछलियों के बदन की धारियाँ गिन कर भरते हो तुम
अपना उथला कंठ ..

फिर तुम ..सभी बूँदों को छिटका कर खाली होती बारिश को भी
सोचते होगे बाज़ारू
माटी और हल की तहों में सोई पसीने की महक को भी
और धान से सनी हवा की गमक भी ..
क्या अपनी आँखों को भी
जो बार बार गड़ती हैं कम देखे गये मौसम की कच्ची उम्र पर ..

तुम्हारी देहरी लाँघ कर आती मन्नतों को
मत कहना बाज़ारू
उन्हें फिरने देना ..अलमस्त..बेफिक़्र
वो ही पिघलती हैं ना नदियों की तरह तुम्हारी हथेली से उड़कर
ज़्यादा फ़र्क़ नहीं है
नदी और प्रेयसी में शायद …

क्या इतना कर सकते हो

अगर मैं अपनी ही कामना में तर आयी तो
क्या भीतर न आने दोगे मुझे
क्या स्वीकार न करोगे
उस पोशाक को
जिसे सिर्फ एक बार पहनने की
ख्वाहिश की थी तुमने

क्या सोच सकते हो
इस बारे में मेरी भी कोई तमन्ना हो सकती है

जैसे इस बार
तुम मुझे अधबुझी अंगीठी की तरफ रख दो
न पूरी ठण्ड लगे
न पूरी सूख जाए मेरी ओढ़नी

इस बार तुम कवच की तरह पहन लो मुझे
देवदूतों से बचने को
अपने अपराधों से छुपने को

क्या इतना कर सकते हो!
येसु को बाहर रख मुझे अंदर लो
पत्थर लौट जाएँ अपने घर
रात पूरी तरह गिर ले ओस
एक घोंसला सा तैयार हो जाए सुबह तक !

जगह बदल ली है शहर में नदी ने

जगह बदल ली है शहर में नदी ने

ताम्बई दामिनी
हमारे अस्पृश्य कन्धों के बीच पसरे धूंध के
दो हिस्से करती चलती थी पहले
जैसे मोम के तन्तुओं के बीच अडोल देह अग्नि की
अब जगह बदल
पाट बढ़ा रही है जांघों के पास
कहते है सब
यहाँ से करीब पड़ती है
बंगाल की खाड़ी

रजत तने झुण्ड से
जहाँ दाग थे वनस्पतियों के
वहां गिर रहे हैं पगलाए पाखी
क्या याद नहीं तुम्हें
अंतिम बार की मुलाक़ात में
मेरी पीठ से गिर रहे थे हल्के हल्के फाहे
तुम्हारे होंठों से उभरे हुए

देखो सेज ने बदल दी है किताब
शरत की देह को
कचोटते हैं वो विवश दर्पण
और मैं कितना सोचती हूँ
मेरे केश कब बढ़े
क्या तब, जब बदल गयी तुम्हारी कामना
नदी किनारे बैठने की

हर समय की आवाजाही ने
कठोर कर दी है जिह्वा
क्या तुम नहीं देखते
मछली और फूलों की मंडी में कोई भेद नहीं

कम मिलते हैं कई बार से
जो खरीदते थे हँसी, हथेली चूम के

कितना , कितना तो टीसता है शहर को दुःख
कि जगह बदल ली पीड़ा ने


कब आओगे तुम

बीच मांग तक दिशाएं काढ़
भर भर अंजुरी सिन्दूर डालती है
छितरा डालती है जो
कृष्णकमल पर अपना महावर
खिंचे खींचे ग्रीवा तक आ जाती है रक्तिम आभा
ज्यों अभी गया हो सूर्य
लाल, पकता
वशीभूत, खोपर की मीठी गंध से

गिर गिर पड़ती
अपार जलराशि संग लिए
जो अपने भीगे उत्तरीय में उलझ कर

लाख डपट दो
फिर भी, फिर भी
फूंकती है शंख, कहती है –
निश्चय ही निद्रा में होंगे मेरे ठाकुर
अस्त होने से पूर्व शुद्ध करती हूँ मलयज

ऐसी सांझ में
ऐसी मधुमास की सांझ में न आओगे तो फिर
कब आओगे तुम !

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here