अखिलेश तव की छः कवितायें

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(अखिलेश तव HBTI कानपुर से इन्जिनीरिंग की पढाई पूरी कर वर्ष 2004 से निजी क्षेत्र में कार्यरत हैं. इनकी कवितायें आज के समय पर सीधा कटाक्ष हैं.  इनकी कवितायें इसके पूर्व नवोत्पल तथा समालोचना पर प्रकाशित हो चुकी हैं. इनसे इनके मोबाईल 9687694020 पर संपर्क किया जा सकता है.)

 

बहन :

बहन-1

जिस भोर बहन
जन्मी घर में
दादा ने मां के
पुरखो को गालियां दी
दादी ने मां के
खानदान को
पिता ने मां को
औऱ बिलखती मां
ने खुद को
सांझ होते होते
लपेट लिये गये ईश्वर भी।

फिर भी बहन ने
संस्कार सीखे
औऱ मैंने
गालियां !

बहन-2

मैंने पहली बार
सातवीं मे प्रेम किया
दूसरी बार
नौवीं मे
तीसरी बार
गयारहवी मे
फिर काफी का कप
बन गया प्रेम ।
बहन ने सिर्फ एक
बार किया प्रेम
सिर्फ एक बार
लिया अपने ईश्वर का नाम
गला रेता गया
रात के तीन बजे
तक जाकर सबेरे
तक बच पायी
इज्जत !

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कोहरा

मैं शाम होते
होते
तुम्हें चाँद
कह ही देता हूँ
नहीं तो रात तक
तुम मेरे लिए
नक्षत्र हो जाओगी ।

यह नयी
युक्ति,नया विचार रच
फिसल कर गिरने
का समय है

देवता गिर कर
बदल रहे है मानव
में
मानव असुरो में
असुर श्वानो
में

स्त्री, देव तक
तुमको सिर्फ
देखना नहीं
स्पर्श करना
चाहते है

कोहरा,एक बहाना
है
रातो का
विस्तार है
इसमें देवताओं
की लार मिली हुई है ।

——————

जंगल

जब हम बच्चें थे
तो फूल मान लिये गये थे
रोज सबेरे
क्याँरी सींची जाती थी
अरगनी पर चादर
तान
दों टूक जवाब दे
दिया जाता था सूरज को
बचा लियें जाते
थे हर ताप से
पौधों के नींचे
रख दिये जाते थे
दों धारीदार
पत्थर
हमारे बहाने ही
पूजें जाते थे शिव

दुपहरियां में
निराई गुड़ाई करते पिता
खुरपी जैसे
कठोर हो जाते
और सांझ होते
होते इतने नर्म
जैसे ओंस के
फोहे हो
कई दिनों में
जाना मैंने
कि पिता नारियल
जैसे हैं
इतना सुख भरा था
फूल के हर पंखुड़ी में
कि कभी ख्याल ही
नहीं आया कि
मां किसके जैसी
हैं ।

बहुत दिन बाद
जब फूल से फल
बने
और फल से बीज़
तब तलाशनी शुरू
कि वो जमीन
जहाँ मुझे उगना
था
देनी थी छाया ।

क्याँरी में
उगना
और किसी अनजान
जमीन पर
अपनी जड़े जमा
लेने का अंतर
या तो अमलतास की
बेंलो को पता है
या मुझे ।

पिता के अलावा
दुनिया के सारे
रिश्ते
चीड़ के जंगलों
जैसे हैं और फैले हैं
दूर दूर तक
जीवन का सारा जल
खींच लिया हैं आस पास से

कई योजन तक पठार
ही पठार हैं
उनकी पत्तियां
नुकीली और शंकुल हैं
बगल से गुज़र
जांऊ तो
पूरे शरीर पर
खरोंच के निशान दिखते
हैं
जैसे कई बाघो ने
एक साथ मारा हो पंजा

मां उस जंगल में
कनेर जैसी है
जब भी कोई फांस
लगी पांव में
उस पठार भरे चीड़
के जंगल से गुजरते हुये
उसने अपनी पूरी
शक्ति
जड़ो से खींचकर
फुनगिंयो तक पहुंचाई
अपने को कूटा
मसला
और ज़ख्मो पर छाप
दिया

मां मुर्झा गई
एक दिन
अपनी ही
फुनगिंया तोड़ते तोड़ते
मैं आज भी चीड़
के जंगलो में
कनेर ढूंढता
हूँ ।

——————–

दायें-बायें

संसद दायें तरफ
है
7 RCR दायें तरफ है
नीति आयोग
दायें तरफ है
यहाँ तक कि
साहित्य
अकादमी दायें तरफ है
और सर्वोच्च
न्यायालय भी !

वो खींच लेना
चाहते है
सारी जमीन
सारी नदियां
सारा जंगल
दाहिनी तरफ ही !

हमसे कहा जा रहा
है
आप सभ्य नागरिक
है
नियमो का पालन
मुस्तैदी से करे
हमेशा बायें
तरफ चलें !

मै इस स्वतंत्र,
संप्रभु गणराज्य में
कुत्ता बनना
चाहता हूं
जो यूँ ही चलते
चलते
बेधड़क घुसता है
कही भी
बिना खदेड़े
जाने के खौफ लिए !

 

——————-

मैंने दुखों का
समन्दर
पैरों से
लांघकर नहीं
सर के बल चलकर
पार किया है
हरियल धरती पर
लोटने का मन था
पर रेत फैली है
दूर तक
हँसता भी हूँ तो
बालू चबाता हूँ !

समन्दर के सफर
में
जल दैत्यों से
लड़ा
कुछ मछलियों से
दोस्ती की
सिर को तराश कर
नुकीला बनाया
जिस हिस्से में
मेरे सपने रहते थे
उन्हें छील कर
जल प्रवाहित कर दिया !
जिन पैरों को
पंख बनना था
मैंने उन्हें
पूंछ बना लिया !

इस नुकीले सर को
लिए लिए
जब सुनता हूँ
कि
ऊंट की तरह
लम्बी गर्दन चाहिये
रेगिस्तान को
पार करने के लिये
तो बचे खुचे
सपने फिर उठाता हूँ
उसी की बनाता
हूँ रस्सी !

एक सपने की
रस्सी के फंदे पर
दूसरे सपने की
गर्दन लुढ़क जाती है
तीसरे सपने की
जीभ बाहर निकल आई है !

हर सपने के
मौत के बाद
मेरी आंखे अब इक
रेत का टीला हैं
चढ़कर देखो तो
दूर रेगिस्तान में
एक झरना दिखाई
पड़ता है !

आ से आंख
आंख माने सपना !

1 COMMENT

  1. अखिलेश जी की कविताएं भावपूर्ण और कलात्मक हैं ।
    बधाइयाँ।

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