अनघ शर्मा की नई कहानी: रोशनदानों पर अँधेरे!!

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हिंदी के प्रतिभाशाली युवा कथाकार. साहित्य के गंभीर अध्येता. व्यापक विषयवस्तु समेटे और भाषा के धनी अनघ शर्मा की कहानियाँ हंस सहित कई स्थापित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं . हाल ही में इनका पहला कहानी संग्रह ‘धूप की मुंडेर’ राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है. आप उनसे उनके नंबर +968-94534056 (वाट्सएप) पर संपर्क कर सकते हैं….

अनघ शर्मा/

खिड़की से आती पीली रौशनी कमरे को उदासी में ढालती सुधा के पैरों पर पड़ रही थी। बाहर आकाश में टिमटिमाते तारे ज़रूर थे पर इतने नहीं की ज़रा सा उजाला ही दे सकें। वो सोच रही थी कि रोशनियाँ कब आपके जीवन से गायब हो जाएँ आप जान ही नहीं पाते। सालों साल आदमी एक ऐसे दिये का खोल ओढ़े रहता है जो बुझने के बाद भी जलने-जगमगाने का भ्रम देता है। उसका मन बार-बार आज वापस घर की तरफ़ लौट रहा था। आँखों के सामने अम्मा का चेहरा था। बैंगनी और मैरून छापे की धोती में लिपटा चौड़ा शरीर। टखनों पर बारहोंमासी सूजन का प्रकोप था। हर तीसरे दिन पैर इतने सूज जाते कि चलना लगभग नामुमकिन हो जाता था। ऐसे में कभी उसने अम्मा से उनकी जगह काम पर जाने की बात कही तो हमेशा एक ही जवाब पाया।

-हम क्या कम पड़ रहे दुनिया भर का गू-मूत ढोने को, जो तुम भी चली सर पर टोकरी धरने। हाई स्कूल है इस साल नैक दीदे लगाओ तो पास हो जाओगी। अनूप की मम्मी से हम ने वादा ले लिया है की तुम पास हो गयीं तो ग्यारहवी की लिए डेढ़-हज़ार अनूप के पापा से दिला देंगी। इत्ते पैसे में तो लाली ड्रेस, किताबें और तुम्हारा छ: महीने का खर्चा निकल जाएगा।

अम्मा जब-जब उससे ऐसी बड़ी बड़ी-बातें करती थी तो उसकी नज़र कोने में पड़े छबडे पर टिक जाती थी। बड़ी सी गोल टोकरी जिसमें प्लास्टिक की बोरियों की गुदड़ी सफ़ाई से सिली हुई थी। इस छबडे में एक सींक की घिसी झाड़ू, लोहे का मैला उठाने वाला खपरा रखे रहते थे। इसी छबडे के बगल में ही ज़रा छोटा दूसरा छाबड़ा रखा रहता था जिसमें अम्मा अक्सर मिलने वाला बचा खाना, त्योहारी, भूसी, पंजीरी, मिली हुई सड़ी-गली सब्ज़ियां ले आया करती थीं।

उसने हाथ बढ़ा कर साइड लैंप जलाया तो कमरे का एक हिस्सा रौशनी में चमकने लगा। सामने पलंग के ऊपर सफ़ेद और नीली चादर बिछी थी। पलंग को देख उसे घर वापस याद आ गया। कैसे दिन थे, घर में एक खाट, एक गद्दा, दो कथरी, दो रजाई के अलवा कुछ नहीं था। एक दिन वो खाट पर सोती थी तो एक दिन अम्मा। सर्दियों में ज़मीन पर सोने वाले को गद्दे के ऊपर बिछाने के लिए एक कथरी और मिला करती थी। अपने बिस्तर पर चादर बिछी हुई पहली बार उसने होस्टल आने पर ही देखी थी वरना, घर में तो अम्मा की धुलने वाली धोती को तिहल्लर, चौह्ल्लर किया और बिछा लिया। बचपन में हमेशा खाने के लाले पड़े रहे कभी एक से दूसरी चीज़ थाली में नहीं देखी। छठे- छमाहे कहीं से पूड़ियाँ मिलती तो अम्मा दो उसे देती, दो खुद अपनी थाली में रख लेती बाकि सब छत पर सूखने डाल दी जातीं। सुखाने के बाद उन्हें कूट कर कपड़छन कर के रख लिया जाता था। तीज त्यौहार ये पूड़ियों का आटा ही मावे- खोये का काम करता था। इसी से बर्फी,लपसी बनती थी वो भी कतीरा भर। होस्टल आने तक खाने-पीने को ले कर उसमें संयम अपने आप जन्म ले चुका था। जिन चीज़ों के कभी नाम भी नहीं सुने थे उन्हें मेस में कभी-कभार सामने देख कर झिझक के मारे छूने की हिम्मत ही नहीं हुई,थाली में रखना तो बहुत दूर।

उसने कुर्सी के हत्ते पर सर टिकाया और आँखें बंद कर ली। बंद आंखें बार-बार उसी अतीत की ओर लौटती हैं जिसे अब छूना आसान नहीं। उसने बंद आँखों से जाने क्या देखना चाहा पर आस-पास अँधेरे के अलावा कुछ और था ही नहीं। इस अँधेरे में जाने किन-किन की कितनी आँखें चमक उठती हैं। इन आँखों को अपने सामने वो कभी देख नहीं पाएगी पर ये पूरी रात चिंगारी सी जलती रहेगी। आज उसे उसकी बेतरह याद आ रही है। बार-बार ध्यान करने पर बस उसकी आख़िरी दिनों की आँखें ही नज़र आती हैं। उसकी आँखें उन दिनों ऐसी हो गयी थीं जैसे किसी ने बुझती हुई राख में आग वापस रख दी हो। पनियल आँखों के कोनों में मानो ज्वालामुखी भाप समेटे बैठे हों।वो आँखें केवल देह का हिस्सा थोड़े थीं, वो उन सारे न देखे जाने वाले सपनों का, न पूरी की जाने वाली आशाओं का और लगातार पानी से नम हुई किसी उजाड़ दीवार का नक्शा थीं।

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गेस्ट हाउस के बरामदे में आँखें बंद किये वो बरसते पानी को सुनने की कोशिश कर रही थी। पहाड़ की बारिश हरसिंगार के फूल सी होती है ज़रा हवा आई और झर के बरसना शुरू। मन प्रशांत का फ़ोन आने के बाद से ही परेशान है।

-सुधा! परसों उसे सफ़दरजंग में एडमिट करा दिया है। प्रशांत ने उससे कहा।

-क्यूँ? क्या हुआ? तुम मुझे अब बता रहे हो।

-पिछले चार-पांच महीने में एक दम ही बहुत ज़्यादा पीना शुरू कर दिया उसने। मतलब एकदम एब्यूज़ की हद तक। जाने किन-किन लोगों को बैंक से निकाल अपना सारा पैसा दे आया। वो तो जब धुत्त नशे में अपने किसी पडोसी से उधार माँगा तब पता चला। उस बन्दे ने जाने कहाँ से ढूंढ-ढांढ के मुझे फ़ोन किया। मैं गया तो बड़ी मुश्किल से दरवाज़ा ही खोला उसने। बाय गॉड क्या गंद मचा रखा था घर में तुम देखती तो विश्वास ही नहीं करती अपनी आँखों पर। कैसा चमकता हुआ घर हुआ करता था और कैसा हो गया था। तुम्हारे आने का क्या सीन है?

-अभी तो यहाँ महीने सवा महीने का काम और बचा है। कुछ दिनों से बारिश हो रही है और देहरादून जाने वाला रास्ता भी ब्लॉक है। दो-तीन दिन तो उसे ही क्लियर होने में लगेंगे। जल्दी से जल्दी आने की कोशिश करूँ तो भी आठ-दस दिन लग ही जायेंगे मुझे। तुम कुछ दिन देखभाल कर लो उसकी, मेरे आने तक। कितने दिन बोल रहे हैं हॉस्पिटल वाले।

-अभी तो पांच-सात दिन कहते हैं। प्रशांत ने कहा।

बूँदें उसकी तरफ बरसने लगी तो वो उठ कर अन्दर चली गयी और सोफे पर पसर गयी।

-तुम बहुत लम्बा जा रही हो यार। इतने दिन अकेले मन नहीं लगेगा।

-तो तुम हर दूसरे-तीसरे दिन मुझे फ़ोन कर लिया करना अप्पू।

-यहाँ आदमी के कल का भरोसा नहीं तुम दो दिन, तीन दिन कर रही हो। तुम्हारे होने से हिम्मत रहती है।

ये बात, गीली-कच्ची नींद सी बात, नंगे पैर बिना कोई आवाज़ किये चुपचाप मन से निकल गई।  ये बात यूँ उसके ध्यान से निकल गई जैसे किसी बीहड़ जगह किसी छिछली नदी में दूर चमकती रोशनियाँ ख़ामोशी से लहक-लहक के गर्क़ हो गयी हों। गर्क़ होने का ये फ़न बड़ा विशेष है कि ज़रा सी गहराई में कुछ यूँ डूबा जाए की फिर ऊपर उठने की सब संभावनाएं तुरंत ही खारिज़ हो जायें। जो बहुत गहरा है हर बार आपका साथ दे ज़रूरी नहीं। डूबने के लिए अपना मन ही काफी है। ये मन अपने तईं बहुत ख़ाली, साफ़ और कम गहरा है। उसने भी, डूबने के लिए अपना मन ही चुना।

हड़बड़ा के सुधा ने सिरहाने रखा मोबाइल उठा लिया।

-उदय कहाँ हो तुम?

-क्लिनिक के लिए निकल रहा हूँ। क्या हुआ?

-अप्पू को सफदरजंग में एडमिट किया है परसों।

-पता है मुझे।

-चिंता की बात कोई ?

-फ़ौरन डरने जैसा कुछ नहीं है। लेट् हिम बी देयर फॉर समटाइम। तुम आओ फिर बात करते हैं।

-तुम हो आना, वहाँ जाने कैसे ट्रीटमेंट मिल रहा हो उसे।

-मेरे जाने से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। बड़ा हॉस्पिटल है डॉक्टर्स जानते हैं उन्हें क्या कैसे करना है।

उसने सुन तो लिया कि डरने जैसा कुछ नहीं है पर मन इस बात को मानने को राज़ी नहीं हुआ।

……………………………

-फ़र्ज़ करो इस लम्बे उमस और घुटन भरे बरामदे की बेंत की कुर्सी पर बैठे-बैठे मेरे मन में अंदर जो हंगामे उठ, घट रहे हैं। उन दृश्यों की कोई तरतीब मेरे ज़हन में हो और मुझे हाथ पकड़ कर पीछे-पीछे खींच लिए जाती हो।

डॉक्टर ने उठ कर उसके कंधे पर हाथ रख दिया ।

-कैसे दृश्य?

-जैसे चलते-चलते दो खम्बे मेरे रास्ते में आ कर रास्ता रोक देते हैं।

-फिर?

-फिर कोई हाथ आ कर उन्हें सरका कर ज़रा रास्ता बना देता है और मैं उस पार।

-और अगर वो हाथ न आये तो?

-तो मुझे वहीं रुक कर इंतज़ार करना होगा उसका।

-तुम उस खम्बे की थोड़ी आड़ ले कर, कुछ घूम कर भी तो पार कर सकते हो।

-आह…. इतनी मेहनत कौन करे?

-कुछ मेहनत तो करनी ही चाहिए इंसान को अपूर्व! अच्छा मेरे इस क्लिनिक में तुम्हें बरामदा नज़र आता है?

-कभी कभी।

-ध्वनि से कब से बात नहीं हुई तुम्हारी?

-याद नहीं।

-अच्छा फ़र्ज़ करो की ये एक लम्बा बरामदा है। सूखा,हवादार, जिसके अंत में एक खिड़की है और उस पर बारीक जाली का एक पर्दा है।

-वो तो अक्सर हर खिड़की पर पड़ा ही होता है डॉक्टर।

-हाँ, पर हर खिड़की के बाहर तुम्हारे दोस्त खड़े हो कर तुम्हारा इंतज़ार तो नहीं करते।

-आपकी खिड़की के बाहर कौन खड़ा है?

-तुम्हारे दोस्त, तुम किस का नाम सुनना चाहते हो?

-मुझे अब चलना चाहिये। अगली बार कब आना है। उसने कुर्सी से उठते हुए कहा।

-अगर फर्ज़ करना कम कर दो तो जल्दी नहीं आना पड़ेगा वरना अगले महीने की इक्कीस तारीख़।

-डॉक्टर?

-ह्म्म्म।

-क्या आप कभी कुछ फ़र्ज़ नहीं करते। इंसान की जिंदगी क्या कभी सीधी चली है। ज़िंदगी कई बार बीच नींद में ख़लल ले कर आ जाती है और फिर उस उचटी हुई नींद के लिए लोगों को आप के पास आना-जाना पड़ता है।

-मैं आज के सेशन का ऑडियो बना कर भेज दूंगा तुम्हें, अगली सिटिंग तक हफ़्ते में कम से कम तीन बार सुनना। अगला सेशन इस पर डिपेंड रहेगा। डॉक्टर ने कहा।

उसके बाहर आने तक शाम ढल चुकी थी और हल्की-हल्की फुहार पड़ रही थी। सड़क को रौशन करने के लिए तरह-तरह की बत्तियां जल चुकी थीं। उसने देखा, सामने बच्चों का एक झुण्ड इस बेशऊर सी बरसात में भीगने की कोशिश कर रहा है। उसने अपने अंदर की तपती जमीन पर कुछ बूंदों को गिरते महसूस किया, एक उदास भाप उठी और उसके अंदर फैल गयी। उसने जा कर मारवाड़ी होटल से दो लोगों का खाना लिया और गाड़ी सुधा के घर की तरफ़ मोड़ दी। उसे सुधा के घर पहुँचने की जल्दी थी। वो इलाका थोड़ी ही बारिश में डूब जाता है। उसके वहां पहुँचने तक बारिश थम चुकी थी और सुधा की सोसायटी बारिश के बाद हमेशा की तरह जलमग्न थी। उसने अंदाज़ से पानी में डूबी पार्किंग में गाड़ी खड़ी की, जूते उतार कर एक तरफ रखे, जींस टखनों के ऊपर ज़रा मोड़ी और खाने का पैकेट ले गाड़ी से बाहर निकल आया। लिफ्ट हमेशा की तरह आज भी ख़राब पड़ी थी। कितनी बार कहा सुधा को कि किराये का ही तो है फ्लैट बदल ले या उसके साथ शिफ्ट हो जाये, हर दूसरे दिन सीढ़ियों से सात मंजिल जाने के झमेले से तो बचेगी। पर वो हर बार काम के नज़दीक होने का हवाला दे कर इस बात को खत्म कर देती है। पिछले चार साल में यूँ तो उसकी सुधा से अनगिनत, लगभग हर दूसरे दिन ही मुलाक़ात हुई है पर वह तीन महीने इस दोस्ती में ख़ास थे जब वो एक ही जगह काम करते थे। वहीं पहली बार सुधा ने उससे कहा था।

-मेरी समझ से तुमको किसी काउंसलर से मिल लेना चाहिए।

-क्यूँ?

-मुझे तुम में डिप्रेशन का प्राइमरी सिमटम दिख रहा है। अभी ही दिखालो डॉक्टर को वरना आगे बहुत ट्रबल होगा। मैं तुमको एक डॉक्टर का नंबर दे रही हूं जा कर मिल लेना।

घर के बाहर पानी से भीगा छाता और चप्पलें रखी थीं। वो सोच ही रहा था दरवाज़ा खोले या घंटी बजाये कि सुधा की आवाज़ आ गयी।।

-आ जाओ अंदर कब तक दरवाज़ा देखते रहोगे।

-तुम्हें कैसे पता मैं बाहर हूँ।

-आते वक़्त देख लिया था तुम्हें।

-कहाँ से आयीं?

-पीछे क्यारियों की तरफ़ गयी थी। कुछ फूल लगवाए थे, पानी भर जाता है तो निकलवाने गयी थी। जूते कहाँ गए तुम्हारे?

-गाड़ी में ही छोड़ आया, कौन नए जूते खराब करे तुम्हारी तलैया में। अब तो बदल लो यार घर, आज फिर सीढ़ियाँ चढ़ कर आना पड़ा मुझे।

-मुझे पता था तुम घूम फिर कर इसी बात पर आओगे। मैं रोज़ ही इनसे आती-जाती हूँ, लिफ्ट तो परमानेंट खराब ही रहती है।

-ये माथे पर क्या हुआ? सुधा ने पूछा।

-कहाँ?

-इतने दाने निकल आये हैं।

– पता नहीं, ध्यान नहीं दिया।

-कोई नयी दवा शुरू की क्या डॉक्टर ने?

-नहीं तो,पर आजकल बहुत बैचैनी रहती है मुझे। दुबारा से हरदम वही सब पुराना सा माहौल रहता है।

-डॉक्टर से मिले?

-वहीं से तो आ रहा हूँ।

-क्या कहता है?

-कहता है ध्वनि से बात करो।

-तो कर लो।

-यह तो हो ही नहीं सकता।

-अगर कुछ था तो डॉक्टर को तो बताना चाहिए था, छुपाना नहीं था। अगला अपॉइंटमेंट कब है।

-आज ही तो आया हूँ,अभी वक़्त है जाने में। अगली इक्कीस का अपॉइंटमेंट है।

-मैं चलूंगी साथ।

-सुधा।

-दो मिनट रुको ज़रा चाय चढ़ा आऊं।

चाय की गर्म भाप इस बरसात के नम मौसम में उसे सबसे भली चीज़ मालूम पड़ रही थी।

-इनदिनों भीतर एक अजीब सा कम्पन रहता।जैसे कोई भंवर का घेरा गोल-गोल घुमते हुए मन में उतर जाए। अनजान सी एक हूक तान ले कर उठे है और हवा में और खो जाये।

सुधा ने उसे देखा और प्याला मेज़ पर रख दिया।

-सुनो, मन में जितना कम्पन बचा रहे उतना ही जीवन बचा रहता है। अधखिली कली भी सुबह हुए काँप के पंखुरी खोलती है। निष्कम्प दिया भले ही मंदिर में क्यों न हो, बुझ ही जाता है। दीप में जुगनू जगमगाता रहे, झिलमिलाता रहे इस कारण हवा का कांपना बहुत ज़रूरी है। पर बहुत तेज़ हवा आग लगा देती है यहाँ तक मंदिर को ही फूँक देती है। अपनी आंच को ढांप के रखो। मेरी अम्मा कहा करती थीं कि बहुत ज्यादा आंच चूल्हे से निकल घर फूंक देती है । तिस पर तुम तो फूस के घर हो ज़रा सी चिंगारी सब फूँक देगी। इसे मन में छुपा कर रखो अप्पू, प्यार की नमी से हल्का करो इसे।

-सुधा! कौन जाने जिसे तुम प्यार कहती हो वो कोई सूखी बेल हो जो हरी होने पर किसी सांप सी लहराए।

-तुम जब ऐसी बातें करते हो तो मुझे डर लगता है अप्पू।

वो चुप रहा और सुधा को खाना गरम करते हुए देखता रहा।

-तुम्हारे घर वाले अगर तुम्हें मेरे घर खाना खाते देख लें तो तुम्हारा हुक्का-पानी बंद कर दें।

-अब बचा ही कौन है देखने वाला। मम्मी-पापा रहे नहीं और भाई बहनों से मेरी बनती नहीं। उसने फीकी हँसी हँस कर कहा। अच्छा चलूँ में वो एक दम कुर्सी से उछल कर खड़ा हो गया।

-अरे खाना?

-नहीं भूख नहीं लग रही।

सुधा जानती थी ऐसी बेचैनी उसे अचानक उठती है और फिर उसे रोके रखना बहुत मुश्किल हो जाता है। ये बीमारी के प्रोग्रेशन का एक चरण है। जैसे-जैसे दिन बीतेंगे वैसे-वैसे उसके कण्ट्रोल टूल्स फ़ेल होंगे। वो उठी अलमारी के दराज़ में से कुछ पैसे निकाल उसकी जेब में रख दिए।

-ये रख लो।

-ये पैसे क्यूँ? मैं खाना लाया इस लिए?

-पागल हो क्या? तुम्हीं ने कहा था न की ए.टी.एम गड़बड़ है तुम्हारा। कल शनिवार को बैंक से कैसे पैसे निकालोगे। कल चले जाना डॉक्टर के पास और माथा दिखाओ। कोई एंटी हिस्टेमाइन लो एलर्जी लग रही ये। लो चप्पल पहन लो सुधा ने उसके कंधे को सहलाते हुए कहा।

-नीचे चल रही हो?

-हाँ, चप्पल वापस नहीं लाऊंगी क्या, वो हँस कर बोली। रास्ते से कुछ खाने को लेते जाना, भूखे मत सोना और ध्वनि से बात कर लेना।

नीचे पहुँच कर सुधा ने दुबारा वही प्रश्न दोहरा दिया।

-मैं चलूँ क्या साथ इक्कीस को?

-खामखाँ ही, मैं खुद ही जाऊंगा भई।

-अच्छा अगर ऐसा है तो फिर मैं परसों शाम देहरादून चली जाऊँगी।

-किसलिए?

-एन.जी.ओ. के काम से, अबके ज़्यादा वक़्त रहना होगा सात-आठ महीना लगभग। आके मिला जायेगा।

-ठीक है।

-चलो बाय।

सुधा ने उसे जाते हुए देखा। देखा तो बस चेहरे पर विदा का हँसता हुआ भाव। वो उस मुस्कान को तो छू पायी जो होंठों पर थी पर उस अँधेरे को नहीं पकड़ पायी जो उसके जाने की ख़बर सुन कर उसके मन में चला आया। संसार की हर सड़क एक तरफ़ से ढ़लान को जाती है और हर यात्री अपनी यात्रा में उस उतार पर बहुत तेज़ी से उतरता है। चढने के बरक्स उतरना जीवन का असल संघर्ष है। वो उसे हँसते, हाथ हिलाते, बूंदों भरी रात में जाते देखती रही। वो अपनी यात्रा की ख़ुशी में ये देख ही नहीं पाई की वो अपनी यात्रा के ढलान पर है। यहाँ से इंच भर पैर बढ़ाया और अनंत अँधेरे में।

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हर छाया के इतर एक छाया और होती है जो पाँव-पाँव साथ चलती है। जैसे जलकुम्भी के ठीक नीचे पानी आँखें बंद किये छम शांत सोया रहता है, ठीक वैसे ही। कभी ये पानी ज़रा से पात से डर जाता है तो कभी ये ही संसार के सबसे बड़े पर्वत को अपने भीतर समेट लेता है। सामने जो दिखता है वो पर्वत की छाया भर है, असल पत्थर तो बहुत गहरे सोया हुआ है। ये ठीक ऐसे ही है जैसे बित्ते भर का मन, जो जितना दिखता है उससे कहीं ज़्यादा अँधेरे में डूबा रहता है। आप मन को इस पर्वत की छाया भले मान लें पर मन की छाया माउना केया से भी ज़्यादा बड़ी और गहरी है। मन इतने भीतर तक पैठा हुआ है कि किसी समुद्र तल से इसका नाप नहीं लिया जा सकता। बरसात की गीली सड़क पर उसकी कार सरपट भाग रही थी और ख्याल उससे भी तेज़। पनालों से टपकता पानी गिर के पल भर को रूकता और फिर जहाँ जगह मिलती वहीं बढ़ जाता।

-पानी का सारा जीवन इसी दुविधा में बीतता है कि पहले किस ओर मुड़ना है। उसने सोचा।

घर अँधेरे में डूबा हुआ था। उसने जूते उतारे, रैक में रखे। चौके में जा कर तांड पर रखी मोमबत्ती जलाई और मेज़ पर रख दी। घर इतने करीने से लगा रखा था उसने की बंद आँखों से भी वो हर चीज़ छू सकता था, उठा सकता था। उसने शेल्फ़ में रखा हाथ पंखा उठाया, खिड़की खोली और कुर्सी पर पसर गया। पानी रुक चुका था, बादल छंट गए थे। आसमान पर महीनों की जमी धूल उतर कर बैठ चुकी थी। इक्का-दुक्का तारे कहीं-कहीं चमकते और फिर अँधेरे में खो जाते। कुर्सी पर बैठा-बैठा वो सोचता रहा, रात के आख़िरी पहर तक जलते सब पत्थर, सब ईधन भोर से पहले धुआं हो कर आसमान में खो जाते हैं। वो आसमान जहाँ पारे की रंगत वाला चंद्रमा पिघल कर किसी दूसरे कोने में सूरज की ढब बना कर निकलने को तैयार है। वो आसमान जिसके कपड़े पर सैकड़ों सूरज और चाँद जुड़े रहते हैं उसी आसमान के नीचे कहीं कोई नंगी सड़क ऐसी गुडीमुड़ी पड़ी रहती है जिसे देखने भर से ताज़्जुब हो। मैंने जब भी किसी मकान की किसी खिड़की से किसी सड़क को अकेला बिना उजाले के रात में चुप देखा तब-तब इस बात का ताज़्जुब माना कि भला जिसके माथे के ऊपर इतना विराट,अनगिनत जलते हुए तारों वाला आसमान हो उसका सीना इतना सर्द, ख़ामोश और धुंधला कैसे हो सकता है। बात सिर्फ़ ऐसी किसी सड़क की तो नहीं जहाँ कोई उजाला न हो, रौशनी के लिए इंतजाम न हो।  बात है कुछ जुगनुओं जैसी चमकीली आँखों का मौजूद न होना, जिसे देख कर हर ओर रौशनी बिखर जाएँ। दोनों ही चाहे कोई सड़क हो या मन किसी ऐसे पहरेदार की आशा में चुपचाप सांस भरते रहते हैं, जो कभी आये बुझे हुए अलाव को जलाए,पत्थरों में आंच भरे और उन्हें धुआं होने से बचा सके।

उसका ऐसा पहरेदार कौन है? जो बुझते हुए अलाव को हरहरा के फिर जला सके। ध्वनि, ध्वनि, ध्वनि…………………………… नहीं सुधा जैसे कोई एकदम ही कानों में आ कर बोल गया हो

सुधा को उसके इतनी जल्दी वापस आने की उम्मीद तो नहीं थी पर उसे वापस लौट के आया देख कोई ताज्जुब नहीं हुआ।

-तुम्हें कुछ बताना है। उसने अन्दर घुसते हुए कहा।

-क्या?

वो बैचैनी में थोडा इधर उधर टहलता रहा, ज़ेब से सिगरेट निकाल कर सुलगाली। फिर एक दम से उसने जल्दी जल्दी बोलना शुरू कर दिया। वो जाने दो चार मिनट क्या-क्या बोलता रहा उसे खुद ही नहीं मालूम ।

-मुझे कुछ समझ नहीं आया अप्पू। धीमे-धीमे रुक कर बोलो।” वो बोली।

-मेरा शहर में मन नहीं लगता।

-क्यों?

-ये शहर उदास बदहवासियों के जाल हैं। इनकी इंच-इंच हैरान करने वाली ये रौशनी किसी बर्फ़ की नोक सी आँखों में उतर जाती है। चोट दे कर ये बर्फ़ पिघल जाती है। हम सब उस पिघले हुए पानी से अपने घाव जीवन भर साफ़ करते रहते हैं। ये जानते हुए भी कि उसमें कुछ नमक जैसी चीर के रख देने वाली चीज़ मिली हुई है। शहर हमारी रगों में नमक उतार देता है।

-तो कहाँ जा कर रहोगे? सुधा ने पूछा।

-मुझे तो कहीं चैन नहीं आये शायद।

-बदहवासियां तो हर ओर, कोने-कोने में हैं। जहाँ चले जाओ उनसे पीछा छुड़ाना बहुत मुश्किल है अप्पू। ख़ुद पर क़ाबू रखने की कोशिश की जाए बस यही उपाय है चैन पाने का।

-मैं करूँगा इस उपाय को।

वह जानती थी कि वो अक्सर ऐसी ही बातें करता है। जोश से भरी बातें, फिर उन पर फ़ौरन ही अमल करने को तैयार, और हमेशा ही फेल हुआ है ऐसे किसी वादे को निभाने में। ऐसे चहचहाते, हँसते हुए दिनों के साथ-साथ एकदम ही सुस्त उदास शामें उसे घेरे हुए चलती रही हैं हमेशा। पर वो ये नहीं जानती थी कि उसका मिजाज़ अब उस हद पर पहुँच चुका है जहाँ से वो उसे छज्जे के कोने पर चलने को उकसायेगा और वो कभी भी अपना पाँव ख़ाली हवा में बढ़ा देगा। उसके हाथ में फंसी सिगरेट निकाल कर सुधा ने चाय के ख़ाली कप में डाल दी। उसने पलट कर सुधा के हाथ थाम लिए।

-मुझे से शादी कर लो सुधा?

-पगला गए हो क्या? ऐसा हो सकता है क्या? वो हंस के बोली।

-क्यों?

-तुम और ध्वनि?

-आह! वो तो कब का ख़त्म हुआ किस्सा।

-फिर भी ?

-फिर भी क्या ? मेरी बीमारी से डर रही हो।

-तुम्हारी बीमारी से भी और हमारे परिवेशों से भी। तुम्हारा परिवेश मेरे बैकग्राउंड से टकराता रहेगा। मैं जिस जगह खड़े हो कर तुम्हारा साथ दे सकती हूँ जगह बदलने पर ज़रूरी तो नहीं इतना भी हो पाये। संबंधों के बंधन भारी चीज़ होते हैं। घर जाओ अप्पू, बहुत रात हो रही और ध्वनि से बात करने की कोशिश करो।

-सुधा,ध्वनि कोई नहीं है। मैंने कई सालों से सब से झूठ बोला है।

सुधा ने उसे ऐसे देखा मानो कुछ समझ में आया हो और कुछ नहीं।

उसने दरवाज़े के पास खड़े हो कर सुधा को देखा और उसके कुछ कहने से पहले ही बाहर निकल गया।

…………………………………

-वो रात को घर आया था उदय । सुधा ने डॉक्टर से कहा।

-कुछ कहा उसने।

-कहा तो बहुत कुछ पर मुझे इतना ही समझ में आया की वो शायद ध्वनि को ले कर किसी तरह की उलझन में है।

-कुछ पर्टिकुलर बोला अपूर्व ने।

-इतना ही कहा कि ध्वनि कोई नहीं है।

-आई नो, ध्वनि एक फिक्शनल करैक्टर है उसकी लाइफ में।

-कोई इतने साल कैसे झूठ बोल सकता है उदय। तुमने तो खुद उससे कहा था कि ध्वनि से बात करे।

-ऐसे केसेज़ में लोग सालों तक किसी एक चीज़ को लगातार मैनयुपुलेट कर सकते हैं। पहले तो यूज़अली वो लोगों में अपनी एक अलग इमेज बनाने के लिए ऐसे झूठ बोलते हैं और फिर धीरे-धीरे वो खुद इस कदर इस इमेज में फँस जाते हैं कि कई बार वो खुद ही रियलाइज़ नहीं करते कि ऐसा कोई इंसान है ही नहीं जिसे वो क्लेम करते हैं और कुछ केसेस में वो जानते हैं पर लोगों के सामने झूठे न पड़ जाए इस लिए लगातार इस बात को दोहराते रहते हैं। अपूर्व दूसरी कैटोगरी में फिट बैठता है।

-इज़ इट अ काइंड ऑफ़ स्किटज़ोफ्रेनिया??

-नहीं, वो अपूर्व की कंडीशन से बहुत डिफरेंट चीज़ है। हम अपूर्व को उस कैटोगरी में नहीं रखेंगे। ये तो बाइपोलर टू का केस है ये सुधा।

-एक्ज़ेक्ट्ली क्या सिचुएशन है?

देखो मूड्स साइकिलिंग तो होंगी इसे पर हाइपरमेनिया का पीरियड डिप्रेशन पीरियड के कम्पेरिज़न में कम रहेगा। हद से हद एक या दो साइकिल आयेंगी। ऐसे में वो एक आईडिया से तुरंत ही दूसरे पर जम्प करेगा, बहुत जल्दी-जल्दी बात करेगा। बहुत खुश दिखेगा और कॉन्फिडेंस में गज़ब का उछाल लगेगा पर ये ड्यूरेशन बहुत छोटा रहेगा या कुछ महीने भर चल के एक दम ही खत्म हो जायेगा। इस बीमारी में एलेवेटेड मूड कभी फुल स्विंग पाता ही नहीं सुधा। अपूर्व के केस में मुझे इस पीरियड का डर नहीं। मेरा कंसर्न उसके डिप्रेशन से है जो बार-बार उभरेगा और हर बार ज्यादा ख़तरनाक होगा। आई हैव अ फियर फॉर हिम।

उदय ने कुछ कहा नहीं पर सुधा समझ गयी की इशारा किस तरफ़ है।

-कोई दवाई? कोई एडवांस मेडिसिन हो उदय जिससे ये खत्म किया जा सके।

-देखो ये तो हम डॉक्टर्स के लिए भी कहना मुश्किल है कि इसे कम्प्लीटली प्रिवेंट किया जा सकता है या नहीं। अपूर्व के केस में भी क्लोज़ मोनिटरिंग पर डिपेंड करेगा की क्या प्रेसक्राइब किया जायेगा। मोटा-मोटा ये समझ लो हाइपरमेनिया के लिए वाल्प्रो-8 देंगे और डिप्रेशन के लिए लिथियम और कुछ कॉमन एंटी-डीप्रेसेंट  देंगे और अगर ज़रूरी लगा तो कुछ एंटी-सायकोटिक्स देनी होंगी।

-उदय उसने ये बात मुझे ही क्यों बताई? चाहता तो तुम्हें भी बता सकता था।

-मेरे ख्याल से वो तुमसे इमोशनली ज़्यादा कनेक्टेड है और तुम पर उसका ट्रस्ट भी औरों की अपेक्षा ज़्यादा है। मुझसे ओपन होने में अभी और टाइम लगेगा उसे। मैं उसके सेशंस अब वीकली करने वाला हूँ।

-जैसा तुमको ठीक लगे। कह कर सुधा उसके क्लिनिक से बाहर निकल आई।

……………………………….

वो उठ कर खिड़की के पास पहुंची, फिरा हुआ पर्दा खोला। सामने आकाश देखते-देखते नीले से काला पड़ गया। छम से एक बादल हवा से टूट कर गिरा,उसने पल भर ही में सारे आकाश को असंख्य बादलों से पाट दिया। ऐसा ही तो उतरता अगस्त था वो कोई नौ बरस पहले का। दर-दर सरकता हुआ हवा और पानी का महीना। उसे याद है कि बंद पंखे में भी उसे झुरझुरी छूट रही थी और वो नंगे फ़र्श पर आराम से लेटा हुआ था।

-सुधा,भूख लग रही है,कुछ खाने को दो यार।

-ताज़ा बनाऊँ या चाय से कुछ चलेगा।

-जो भी हो।

वो जब चाय ले कर लौटी तो वह खिड़की के बाहर पैर लटका के बैठा हुआ था।

-अरे नीचे उतरो,इस विंडोसिल पर बहुत काई जमी रहती है रपट जाओगे।

-कैसा मनहूस दिन है। उसने उतरते हुए कहा।

सुधा ने देखा आकाश पर धीमी गति से बढ़ते-बढ़ते बादल हर तरफ़ पसर गए थे। नीम और कनेर के जो दो पेड़ ठीक सामने की ओर थे हवा में ऐसे लहक रहे थे जैसे अभी जड़ से उखड़ जायेंगे। पंछी घरों को लौटने के लिए पंख फड़फड़ा रहे थे।

-कितना तो प्यारा दिन है अप्पू। ऐसी सांझ कब-कब उतरती है इस शहर के आकाश पर। इन पंछियों को देखो कैसे राग गाते फिर रहे हैं। हवाएं बादलों के जूते पहन कितनी मस्त हैं।

उसने सुधा के हाथ से चाय ली और उसे खिड़की के सामने खड़ा कर दिया।

-घर ,घर है तुम्हारे पास इस वक़्त इस लिए तुम पंछियों का राग सुन रही हो।जबकि मुझे तो इस उड़ान में अँधेरे में गुम होते रास्ते की बदहवासी दिख रही है। वो चौथा पंछी उधर नीम के ठीक ऊपर उसे ज़रा गौर से देखो, कैसे बारबार नीचे गोते लगा रहा है। जानती हो इस तरह बार-बार नीचे आना दिमाग के डूबने की निशानी होती है सुधा। हवाएं नंगे पैर चलती हैं, ये कभी किसी बादल को पैर में पहन ही नहीं सकती। इस मौसम में पेड़ों में अँधेरा उतरता है ठीक वैसे ही जैसे मेरे अन्दर। आसमान में भी भंवर उठता है जो धीरे-धीरे समूचा आदमी निगल जाता है। इन बादलों के मौसम में बहुत सी इमारतें ढह जाती हैं। ये डोर धीरे-धीरे आपको लटकता हुआ छोड़ कर गायब हो जाती है और फिर आप हवा में हाथ-पाँव मारते रहते हैं।

-ऐसी फ़िज़ूल बातें न करा करो।

-हर आदमी अपने संघर्ष से ही चीज़ें देखता है। तुम मेरी कंडीशन क्या जानो?

-संघर्ष की बात न करो अप्पू। तुम्हारी तरह संघर्ष से डरते तो कब का ख़त्म हो गए होते हम। अम्मा जब अस्पताल में भर्ती हुई तब मेरे अलावा और कोई नहीं था घर भर में। अस्पताल से घर, घर से अस्पताल उसके बाद एक घंटे अनूप भाई साहब के घर गणित पढने जाती थी। वहीं दिन भर की पहली चाय मिलती थी। पुराने,घुंडी टूटे चीनी मिट्टी के प्याले में। वो अपमान भी मन मार के इस लिए पी जाती थी कि टूटे कप में ही सही पर ख़ाली पेट को कुछ मिल तो जाता था और पढने का साधन तो बन ही रहा था।अम्मा ख़त्म हुई तब हाई स्कूल के पहले पेपर में पांच दिन बचे थे। सोचो उसके बाद भी मैंने इम्तिहान दिए, पूरी पढाई की, एम.एस.सी की, डाइटीशियन का कोर्स किया। हॉस्टल में दोस्तों को बर्तन तो छोड़ो मेरे पानी पीने के बाद प्लास्टिक की बोतल तक को मांजते देखा है। ऐसी जात से जिसका काम मैला,गंद उठाना हो उससे निकल कर कोई पढ़ लिख ले तिस पर नौकरी भी कर ले, इस संघर्ष का तुम हिसाब लगा सकते हो। इसी लिए कहती हूँ अपने मन को कण्ट्रोल करना सीखो, ऐसे ऑटो सजेशन दोगे मन को तो कंडीशन बिगड़ेगी ही। लांघने को तो आदमी समंदर लांघ जाए अप्पू पर कौन अपना माथा लांघ पाया है कभी। जिस-जिस ने भी ये कोशिश की अपनी जान पर ही बना ली। जाओ काउंसलर से रेगुलरली मिलो और चीज़ों को ज़रा होल्ड करने की कोशिश करो।

-इतना आसान तो नहीं ये सब।

-अरे आसान नहीं, पर विल पॉवर नाम की भी एक चीज़ होती है। उसे मजबूत करो और देखो क्या होता है फिर।

सोचते-सोचते उसने खिड़की पर पर्दा फिर से सरका दिया।

…………………………………………..

मौसम लगभग डेढ़ महीना खराब रहने के बाद अब ज़रा सा खुला था। पहाड़ों की पीठ लगातार कई दिन नहाने से इस ज़रा सी खिली धूप में चाँदी सी चमक रही थी। ऐसे ही मौसम के बाद इन्हीं पहाड़ों से उतरती धूप सबसे ज़्यादा थकी और असंतुलित होती है, ठीक वैसे ही जैसे कोई परिंदा नीचे आते-आते ज़मीन के ऊपर से वापस लौट जाए। ये थकान अपनी तलहटी में बहुत एकाकी है।इस दौरान सुधा की लगातार प्रशांत से बात होती रहीं। प्रशांत ने ही उसे बताया था कि घर लौट कर आने के बाद भी सारा सारा दिन सोया रहता है। कई कई दिन नहाता भी नहीं है। दो-दो तीन-तीन दिन एक ही चायदान में चाय बनाता रहता है उसी को सिंक में पटक देता है उसी को सिंक से निकाल बिन मांजे गैस पर चढ़ा देता है। इस बात को सोच कर ही सुधा का मन खराब हो गया। कितने रिफाइंड टेस्ट का आदमी था, और अब देखो। जो रात को भी प्रेस किये कपड़े पहन के सोता हो अब तीन तीन दिन एक ही जोड़ी में गुज़ार देता है। अम्मा कहा भी करती थी।

-बीमारी कैसी भी हो सुधा आदमी की गत बिगाड़ देती हैं। टट्टी-पेशाब की बीमारी से लेकर सादी छींक- खांसी तक आदमी को खोल के रख देती हैं।बड़ी बीमारियों के बारे में तो सोचना ही क्या।

अम्मा के अनुभव से उपजी बात आज उसे अपूर्व के लिए कितनी सटीक लग रही है। कल वो देहरादून लौट जायेगी और वहां से परसों दिल्ली। बस दो ही दिन की तो बात है। पर सोचने में दो दिन जितने छोटे लगते हैं कभी-कभी गुजरने में बहुत लम्बे पड़ जाते हैं।

-कहाँ पहुंची? प्रशांत का फ़ोन सुबह सुबह ही आ गया।

-अभी तो गाड़ी दिल्ली के बाहर ही खड़ी है। लगभग घंटा भर और लगेगा।

-ठीक है मैं वहीं मिलूँगा।

प्रशांत के साथ उदय की क्लिनिक का हेल्पर भी था, उसे वहां देख उसके मन में किसी चीज़ का खटका हुआ। अक्सर ऐसी यात्राओं से लौटने पर प्रशांत ही उसे रिसीव करने आया करता था। पर आज?

-सामान ये ले जायेगा। हम लोग सीधे उदय के पास चल रहे हैं। प्रशांत ने कहा।

-उदय कहाँ है। सुधा ने पूछा।

-मालवीय नगर थाने। अपूर्व हैंगड हिमसेल्फ।

इसके आगे सुधा को कुछ पूछने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। वो वहीं सीढ़ियों पर बैठ गयी। आने जाने वाले लोग उसको रोता देख उसे घेर कर खड़े हो गए। अपने आस-पास मजमा सा जमता देख उसे होश आया। वो उठ खड़ी हुई और प्रशांत का हाथ थामे स्टेशन से बाहर निकल आई।

-कब हुआ? उसने पूछा।

-शायद कल शाम या रात को। पुलिस को रात तीन बजे ख़बर मिली। किसी मोटरसाइकिल वाले की गुज़रते हुए खिड़की पर नज़र गयी तो पता भी चल गया। उसी ने इन्फॉर्म किया पुलिस को।

उसके बाद सुधा ने रास्ते भर एक शब्द भी नहीं बोला। थाने में भी वो चुप ही रही। उदय उसकी केस हिस्ट्री, दवाइयों के पर्चे, सफ़दरजंग हॉस्पिटल की रिपोर्ट्स सब ले कर वहां मौजूद था। सुधा ने देखा उदय के चेहरे पर कैसा भी भाव नहीं है। शायद पुलिस से ऐसे मिलना डॉक्टर्स के लिए आम बात हो उसने सोचा।

-कुछ मिला सर आपको घर से? प्रशांत ने टीम के हेड से पूछा।

-किन्हीं सुधा के नाम एक नोट और ज़ेब में से एक पर्ची जिस पर “ सितारे सफ़र के देखते हैं” लिखा हुआ है।

-मैं ही सुधा हूँ। ये फ़राज़ की ग़ज़ल की एक लाइन है। बहुत पसंद है मतलब पसंद थी उसे ये ग़ज़ल। सुधा ने कुर्सी से उठते हुए कहा।

………………………………………………

सुधा के हाथ में उसकी वही चिट्ठी थी जो वह उसके लिए छोड़ कर गया था। इन सालों में वो इसे जाने कितनी ही बार पढ़ चुकी थी।

“सुधा,

घर लौट आया हूँ हॉस्पिटल में हफ़्ता भर रह कर। घर आ कर किसी काम में मन नहीं लगता। सारा सारा दिन बस नींद सी हावी रहती है। जब से आया हूँ तब से कुछ नहीं सूझता दिमाग एक दम ही ख़ाली रहता है। हाँ पर हॉस्पिटल में जब भी अकेले कभी चमकदार तारों और बड़े चंद्रमा वाले आकाश को देखता था तो मेरा मन उस चमक के पीछे अँधेरे को तलाशने लगता था। मन ऐसा कमरा ढूँढ लेता था जहाँ मेरे बहुत सारे प्यारे लोग एक साथ बैठ के हँस-बोल रहे हों। मुझे ऐसा लगता था कि हँसता हुआ जो इंसान सामने बैठ कर बात कर रहा है ठीक उसी पल वही इंसान उस भीड़ से हाथ छुड़ा कहीं किसी अँधेरे में खोने के लिए उठ रहा हो। ऐसा सोच कर बहुत उदास हो जाता हूँ और अपनी आँखें बंद कर लेता हूँ। इन बंद आँखों से मैंने कितने ख़ुशबाश लोगों को हाथ छुड़ा कर जाते देखा है। ऐसा लगता है कि हम सब के मन में रोशनी के लिए एक रोशनदान होता है। पर मैंने अपने उस रोशनदान पर जाने कैसे अँधेरा रख दिया है जो अब हटता ही नहीं। तुम कहा करती थीं कि लांघने को तो लोग समंदर भी लांघ जाते हैं, पर अपना माथा कौन लांघ पाया है, अपना साया कौन पार कर पाया है। सो इन दिनों लम्बी परछाईओं को पार करने की कोशिश में हूँ, अपना ही माथा लांघने की कोशिश कर रहा हूँ। शायद लांघ ही जाऊं। घर बदल लेना कब तक उस ख़राब लिफ्ट वाले घर में रहोगी।

अप्पू।”

-घर तो कब का बदल लिया, और तुम सिर्फ़ खुद को ही नहीं हम सब को लांघ कर चले गए। यू वर ऑलवेज़ अ मैन ऑफ़ सेल्फ़ पिटी अप्पू।

कह कर सुधा ने कागज़ के उस टुकड़े को मोड़ कर गद्दे के नीचे सरका दिया। लैंप बुझाया और बिस्तर पर लेट कर आँखें बंद कर ली।

—समाप्त—

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