मिथिलेश कुमार राय की कवितायें

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मिथिलेश कुमार राय/

बिहार के सुपौल जिले में जन्म. सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं व वेब पत्रिकाओं में कविताएं व कहानियाँ प्रकाशित. वागर्थ व साहित्य अमृत की ओर से क्रमशः पद्य व गद्य लेखन के लिए पुरस्कृत. कहानी स्वरटोन पर ‘द इंडियन पोस्ट ग्रेजुएट’ नाम से फीचर फिल्म का निर्माण. कुछ जगहों पर स्तंभ-लेखन. कुछेक साल पत्रकारिता करने के बाद फिलवक्त ग्रामीण क्षेत्रों में अध्यापन. इनसे इनके फोन- 09546906392 पर संपर्क किया जा सकता है.

गंभीर होकर क्या करूँगा

उतना गंभीर होकर ही क्या कर लूंगा चेहरे पर उस भाव को लोग उदासी पढ़ेंगे आँखों
में जो सूनापन झलकेगा वह जितने सारे अच्छे दृश्य देखें हैं मैंने उन सब पर
पानी फेर देगा शब्द कितने सारे हैं और कितने ही तरह के तब मेरे हिस्से सारे
भारी आ जाएंगे उसका अर्थ कौन तलाशेगा

मैं जब भी चलूँगा लोग दूर से ही देखकर बातें बनाएंगे कि मैं इतने धीरे-धीरे
क्यों चल रहा हूँ जैसे कि कोई बीमार चलता है

सरसों में फूल आ रहे हैं मगर मैं बार-बार शून्य में ही देखूंगा और अफ़सोस जाहिर
करूँगा शून्य में भी भला कभी कुछ उगता है मैं दूर का सुनकर दुःख में सिर
हिलाऊंगा बगल में एक बच्चे की हंसी मेरे कान नहीं सुन पाएंगे

जब सब सो जाएंगे तब भी मेरी नींद गायब रहेगी ऐसा करते-करते एक दिन मैं अपने ही
सिर के बाल नोचूंगा और कहूँगा कि दुनिया में अब कोई उम्मीद की किरण नहीं बची
है मेरे दिमाग में यह बात कभी नहीं आएगी कि इसी वक्त कहीं बहुत सारे लोग
मामूली-मामूली चुटकुले पर ठठा कर हंस रहे होंगे कि उनके कहकहों से वहां का
माहौल भी कितना प्यारा हो गया होगा

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थोड़ा सा उस बस के बारे में

थोड़ा सा उस बस के बारे में जो रोज तीन घंटे मुझे अपनी गोद में झूलाती है  कि
कोई हाथ हिलाता है तो वह समझ जाती है कि ये कहीं जाने के लिए अपने घर से निकला
है या कि शाम पैर पसार रही है इन्हें जल्दी अपने घर तक पहुंचना है कि देखो तो
कैसे बार-बार इसका फोन भी बज रहा है बस उन्हें बिठाती है वह फोन पर कहता है कि
हाँ बस मिल गई है और सीट भी फिर चैन की एक साँस लेता है

क्या बस को यह पता है कि उसका नहीं मिलना एक चिंता का विषय है कि उसका मिल
जाना कोई ख़ुशी की बात है वह इसीलिए बड़ी दूर से हॉर्न बजाती है कि उसे पता रहता
है कि कोई उसके इंतज़ार में कब से बैठा होगा और बार-बार जेब से मोबाइल निकालकर
समय देख रहा होगा वह हॉर्न की आवाज सुनेगा तो उसकी भाग रही ख़ुशी लौट आएगी और
चेहरे पर पसरी उदासी वहां से छंट जायेगी

जब कभी दो रुपए के लिए कोई झगड़ता है तो उसे ऐसा लगता है जैसे कि उसके अंदर कोई
गांव बसा है कि उसकी किसी सीट पर कोई ठठा कर हंस रहा है कोई सो गया है कोई
गप्प मार रहा है

जब कोई गुस्से में यह कहता है कि अब कितने के लिए रुकोगी कहाँ खड़ा करोगी तो
बगल से ही एक मुस्कुराती आवाज आती है कि कौन सा चार दिन रहना है अभी कोई चढ़ा
है तो आगे कोई उतर भी जायेगा सबको घर पहुँचने की जल्दी है बस यह सब सुनती है
तो एक गीत गुनगुनाने लगती है और फिर चलने में मगन हो जाती है

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चिल्लर

है तो यह एक मजाकिया शब्द जिसका प्रयोग किसी ऐसे ही माहौल में किया गया था और
सबकी हँसी भी छूटी थी यहाँ तक की एक व्यक्ति हँसते-हँसते लोटपोट हो गया था
लेकिन बाद में जब किसी ने यह कहा कि यही शब्द आधी से अधिक दुनिया के होंठों पर
मुस्कराहट लाता है तो उसने हँसना बंद कर दिया था और सोचने की मुद्रा अख्तियार
कर ली थी

यह जो दस रुपए का और पांच रुपए का या एक या दो रुपए का सिक्का है न सब के सब
पाँच सौ या दो हजार के नोट के बच्चे हैं वो चाहे जहाँ जन्मते हो सब हमारे ही
घरों में पलते हैं हमीं से प्यार पाते हैं हमीं से इन्हें इज्जत मिलती है
हमारी माँ इसे जतन से गांठ में रखतीं हैं हमारे बच्चे इसे गुल्लक में डाल कर
बजाते हैं और उससे जो ध्वनि उत्पन्न होती है उस पर मन्त्र-मुग्ध होकर वे नाचते
हैं कोई गीत गाते हैं

शाम को काम से लौट कर जब घरवाली हमारी जेबें टटोलती हैं उनके सामने यही
मुसकाता है जिसे देखकर उसके चेहरे पर लाली पसर जाती है आँखों में चमक आ जाती
है वह इन्हीं में से किसी को कहीं बड़ी उम्मीद से रखती हैं किसी दिन की आस की
तरह और जीवन में जब घटा छा जाता है यह निकल कर घर के छेद में फंस जाता है और
हम भींगने से बच जाते हैं

कल कहा भी था उस पनवाड़ी ने कि पान का स्वाद लेना हो तो जेब में पांच का एक
सिक्का लेकर चला करें हजूर और वह बूढ़ी सब्जी वाली ने भी कहा था कि हम तो एक-एक
रुपैये के मुनाफे के लिए घर-घर भटका करती हैं मालिक उस दिन बरफ वाले को देने
के लिए दो का एक सिक्का मिल गया था उस बच्चे को तो लग रहा था कि उसे पूरा जहान
ही मिल गया है

हो सकता है कि ये चिल्लर ही हो लेकिन यह कहने से पहले हमें उस मूंगफली वाले से
भी पूछ लेना चाहिए कि इसके लिए उसने कितनी बसों कितनी रेल गाड़ियों में
कितनी-कितनी बार अपने गले को फाड़ा है

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उम्र पैतीसवें में

अगर मैं वही लड़का हूँ जो पढ़ाई के दिनों में अपना खर्चा निकालने के लिए एक
संस्था की पत्रिकाओं में अभिषेक राय के नाम से लिखा करता था तो इससे क्या फर्क
पड़ता है

इससे भी क्या फर्क पड़ता है कि मैं वही लड़का हूँ कि जिसको जब प्यार हुआ था तो
वह हरेक समय सिर्फ प्यार के बारे में ही सोचा करता था और ऐसा सोचते-सोचते वह
ऐसा बीमार पड़ा कि मरते-मरते बचा

कहिये कि इस बात से कितना फर्क पड़ता कि मैं वही लड़का हूँ जो दिल्ली गया वही से
गया जयपुर और लुधियाना फिर पढाई बीच में छोड़ कर भाग आया और अपने ही देश में
रहा छूप कर पांडवों की तरह

अगर मैं वही लड़का हूँ जिसके कल तक कई सितारों से दोस्ती थी लेकिन आज नहीं होती
किसी से बातचीत क्योंकि मोबाइल को ऑफ़ रखने करने का बटन उसे बड़ा प्यारा लगता है
तो इससे क्या फर्क पड़ता है

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बड़े लोग

सौ-पचास करके छोटे लोगों ने ही जमा किया सात हजार फिर मरणासन्न बीवी को
अस्पताल लेकर भागा वहां डॉक्टर को पैसा भी दिया उनसे आरजू-मिन्नत भी की उसे
विश्वास दिलाया कि कैसे वह भगवान हैं और जब सब निपट गया जिन्दा होकर बीवी पहली
बार मुस्कुराई सबने खिलखिलाकर यह बताया कि हम जीत गए हैं इसी खुशी में जब वे
गा रहे थे कीर्तन और भेद रहे थे आकाश झूमते हुए यह बात याद आ गई

उस वक्त में भी बड़े लोगों ने पहले ब्याज की बातें करनी चाही नहीं कहा यह मुँह
से कि उसे जान की चिंता नहीं है पैसे डूब जाएंगे तब क्या होगा उसने लाने को
कहा वह कागज जिससे एक घर होने का सबूत मिलता था

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