और मौन से ही निकलती है वांछनीय बात:  मिर्ज़ा ग़ालिब के जन्मदिवस पर विशेष

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सुशील सुमन पेशे से असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. कूचबिहार में रिहाईश. प्रखर अध्येता सुशील  आजकल ग़ालिब की रचनाओं को आधुनिक पाठको के लिए हिंदी में उपलब्ध कराने का महती कार्य कर रहे हैं. सुशील सुमन के द्वारा ग़ालिब की रचनाओं का हिंदी अनुवाद आगे भी सौतुक पर उपलब्ध होता रहेगा.

 

नश्व-ओ-नुमा है अस्ल से, ग़ालिब फ़ुरू’अ को
ख़ामोशी  ही  से  निकले  है, जो बात  चाहिये

शाखाएँ होती हैं विकसित
मूल से ही
और मौन से ही निकलती है
वांछनीय बात।

लूँ वाम बख़्त-ए-ख़ुफ़्त: से, यक ख़्वाब-ए-ख़ुश,वले
ग़ालिब,    यह ख़ौफ़ है, कि   कहाँ से      अदा करूँ

सोये हुए भाग्य से
ले तो लूँ उधार
ख़ुशियों से भरा एक ख़्वाब
लेकिन यह सोचकर होता हूँ भयभीत
कि चुकाऊँगा कहाँ से!

ता  चन्द  पस्त   फ़ितरति-ए-तब’-आरज़ू
यारब, मिले बलन्दि-ए-दस्त-ए-दु’आ मुझे

हे ईश्वर!
मिले मुझे
प्रार्थना के लिए उठे हाथों की ऊँचाई
कबतक रहूँगा लस्त-पस्त
इन कामनाओं के कीचड़ में।

है ग़ैब-ए-ग़ैब, जिसको समझते हैं हम शुहूद
हैं ख़्वाब में हनोज़, जो  जागे हैं  ख़्वाब   में

है परोक्ष का भी परोक्ष
जिसे समझते हैं हम उपस्थित
जो हम जागे हैं स्वप्न में
हैं अभी तक स्वप्न में ही।

अहल-ए-बीनिश को,है तूफ़ान-ए-हवादिस,मकतब
लतम:-ए-मौज,  कम  अज़  सेलि-ए-उस्ताद,  नहीं

अक्लमन्द के लिए पाठशाला है
विपत्तियों की अधिकता
लहरों का थपेड़ा कतई कम नहीं
गुरु के तमाचे से।

न जानूँ  नेक हूँ  या  बद हूँ, पर  सोहबत  मुख़ालिफ़  है
जो गुल हूँ तो हूँ गुलख़न में,जो ख़स हूँ तो हूँ गुलशन में

जानता नहीं कि अच्छा हूँ या बुरा
किन्तु संगति है विपरीत
यदि हूँ फूल
तो आग की भट्टी में हूँ
और यदि हूँ घासफूस
तो हूँ मैं बगीचे में।

बा’द-ए-यक उम्र-ए-वर’अ, बार तो देता, बारे
काश, रिज़्वां  ही दर-ए-यार का  दरबां होता

यदि रिज़वान ही होता
जन्नत की तरह प्रिया के द्वार का भी दरबान
देता ज़रूर इजाज़त
अंदर जाने की
जीवन भर के इस संयम
और निस्पृहता के बाद।

ख़ज़ाँ क्या, फ़स्ल-ए-गुल कहते हैं किसको, कोई मौसम हो
वही हम हैं,   क़फ़स है,    और    मातम बाल-ओ-पर का है

क्या पतझड़,क्या वसन्त
हो कोई भी ऋतु
वही हम हैं
वही पिंजरा
और है
पंखों और डैनों का वही शोक।

ताज़: नहीं है नश्श:-ए-फ़िक्र-ए-सुख़न मुझे
तिरयाकि-ए-क़दीम  हूँ   दूद-ए-चराग़   का

नया नहीं है मेरे लिए
कविताई का नशा
इस चराग़ के धुएँ का
पुराना अफ़ीमची हूँ मैं।

हासिल-ए-उल्फ़त न देखा, जुज़ शिकस्त-ए- आरज़ू
दिल बदिल पैवस्त:, गोया इक लब-ए-अफ़सोस  था

देखा नहीं
प्रेम का अन्य कोई लाभ
कामना की पराजय के सिवा
मानो
पछतावे में बन्द होंठ की तरह था
दिल से लगा दिल।

फ़रदा-ओ-दी का तफ़रिक़: यक बार मिट गया
कल तुम गए, कि  हम  प  क़यामत  गुज़र  गई

एकबारगी मिट गया
बीते हुए कल
और आने वाले कल का अन्तर
कल
तुम्हारे जाते ही
जब हम पे मुसीबत टूट पड़ी

था ख़्वाब में, ख़याल को तुझसे  मु’आमल:
जब आँख खुल गई, न ज़ियाँ था न सूद था

ख़्वाब में था
तुमसे लेन-देन का ख़याल
लेकिन जब खुली आँख
हासिल था
नफा न नुकसान

ने मुशद:-ए-विसाल, न नज़्ज़ार-ए-जमाल
मुद्दत हुई, कि आश्ति-ए-चश्म-ओ-गोश है

अब ईर्ष्या का कोई कारण ही नहीं रहा
इसलिए हो गयी है मैत्री
आँखों और कानों के बीच
युग बीत गये
न तो प्रिय का दर्शन हुआ
न ही मिला मिलन का सन्देश

ज़ख़्मी हुआ है पाश्न: पा-ए-सबात का
ने भागने की गौं, न इक़ामत की ताब है

घायल पड़ी है एड़ी
स्थायित्व के पैर की
ठहरने की शक्ति है
न भागने का स्वार्थ

निकोहिश है सज़ा, फ़रियादि-ए-बेदाद-ए-दिलबर की
मबादा ख़न्द:-ए- दन्दाँ नुमा हो सुब्ह महशर की

प्रिय के ज़ुल्मों की शिकायत करने वाले की सज़ा है
निन्दा
कहीं ऐसा न हो
कि व्यंग्य की हँसी से भरी हो
आख़िरी फ़ैसले की सुबह।

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