राजा ने कपड़े बदल बदल कर देश का विकास किया

3
चित्रकार- महेश वर्मा

मनोज पांडेय/

मनोज पाण्डेय

भारतीय समाज के वर्तमान का जो हिस्सा दर्ज करने से छोड़ दिया जाता हैउसे जानना हो तो आपको मनोज पांडेय की कहानियाँ पढ़नी  होंगी. एक असफल अभिनेता के जीवन के किंचित किन्तु अनिर्वचनीय सुखों पर अपनी शुरुआती कहानी  (चंदू भाई नाटक करते हैं) लिखते हैंआपराधिक मनोवृति का स्पाइरल घुमाव अपनी कहानी जीन्स में दर्ज करते हैं और फिर पानी जैसे अनिवार्य मुद्दे पर  पानी‘ जैसी बेहतरीन कहानी लिखते हैं. बेचैन कर देने वाली इनकी अनेक कहानियों से गुजरते हुए आपको अपने आसपास के भारत का एहसास होगा जिससे आप दूर कर दिए गए हैं. उसी क्रम में पढ़िएलेखक  की ये कहानी:

स्वर्ण देश का राजा दिन में कम से कम पाँच बार कपड़े बदलता था। कपड़े सिलने वालों का एक बहुत बड़ा समूह इस काम में लगा हुआ था। हालाँकि उसके सभी अंगों की नाप कपड़े सिलनेवालों के पास थी पर चूँकि वह राजा था सो किसी दिन उसका मन करता तो थोड़ा मोटा हो जाता या फिर किसी दिन पतला। राजा के दर्जियों के प्रधान के सामने इस वजह से कई बार समस्या उत्पन्न हो जाती इसलिए उसने राजा के पीछे कई जासूस लगा दिए। जैसे एक जासूस राजा की रसोई में था। दूसरा राजा की विदेश जाने की तैयारी करने वाली टीम में था। तीसरा उस टीम में तोड़ा गया जो राजा के देशी दौरों की कमान सँभालती थी। चौथा राजा के गुप्त मंत्री के पीछे लगाया गया। इन जासूसों से प्राप्त सूचनाओं का विश्लेषण करके प्रधान दर्जी यह पता लगा ही लेता कि राजा कब और किस दिन पतला दिखेगा और कब और किस दिन मोटा।

यह तो सिर्फ कपड़ों की बात थी। इसके अलावा राजा की केश सज्जा, आँखों के रंग, चेहरे की चमक और लाली आदि के लिए भी तमाम विशेषज्ञ नियुक्त किए गए थे। इसी तरह से राजा की घड़ियों और जूते चप्पल के लिए भी एक पूरी टीम थी जो देश काल और राजा के मूड और ज्योतिषियों की सलाहों के आधार पर राजा के लिए सही परिधान चुनती थी। इन लोगों के रहने के लिए राजमहल के भीतर ही जगह मुहैया कराई गई थी। इसके पीछे राजा की सुरक्षा की बात तो थी ही, यह खतरा भी था कि लालच में फँसकर इन लोगों ने वही सेवा किसी और को दे दी जो वे राजा को देते आए हैं तो फिर राजा और स्वर्ण देश की इज्जत का क्या होगा? पिछले राजा ने पहले से ही इस देश की इज्जत का कबाड़ा कर रखा था।

राजा के दर्जियों के प्रधान के सामने इस वजह से कई बार समस्या उत्पन्न हो जाती इसलिए उसने राजा के पीछे कई जासूस लगा दिए।

पिछले राजा ने कभी देश की इज्जत के बारे में नहीं सोचा। वह इस हद तक गया गुजरा था कि हमेशा एक ही तरह के पाजामे कुर्ते में नजर आता। वह भी सब के सब सफेद। यह पता भी न चलता कि उसके पास कितने जोड़ी कुर्ते हैं। एक दो कोट पैंट थे वही पहन कर वह विदेश भी घूम आता था। कोई फैशन का सेंस ही नहीं था उसमें, न ही देश की प्रतिष्ठा का कोई खयाल। दुनिया के लोग इस देश को कितना फटीचर समझते रहे होंगे। राजा ने सोचा और उसका सिर शर्म से झुक गया। पर नया राजा सोचता कम और करता ज्यादा था इसलिए तुरंत उसने अपने प्रधान दर्जी को बुलाया और कहा कि इस बार की विदेश यात्रा पर उसके लिए जो कपड़े तैयार किए जाएँ वह सोने चाँदी के तार से तैयार किए जाएँ। प्रधान दर्जी ने जो हुकुम कहा और मुस्कराता हुआ चला गया।

इसके बाद राजा ने अपना प्रिय अखबार पढ़ना शुरू किया। संपादकीय पेज पर राजा की निंदा करने वाले एक अखबार की निंदा करते हुए संपादकीय लिखा गया था। उस गर्हित अखबार ने राजा के कपड़ों पर सवाल उठाया था। देश के कई फटीचर अखबार समय समय पर राजा के परिधान पर सवाल उठाया करते थे कि जिस देश में करोड़ों भूखे नंगे रहते हों उस देश के राजा को दिन में पाँच बार अपना कपड़ा बदलने का क्या हक है? राजा के प्रिय अखबार ने उन सवालों का जवाब देते हुए लिखा था कि दुनिया में देश का प्रतिनिधित्व देश के करोड़ों नंगे भूखे नहीं करते। देश के राजा करते हैं। विरोधी अखबार क्या अपने विरोध में इस हद तक गिर गया है कि वह राजा को उन भूखे नंगों जैसा देखना चाहता है जिनके लिए पिछले राजा की नंगी-पुंगी नीतियाँ जिम्मेदार हैं। अगर राजा उन्हीं नंगों-भूखों की तरह के पहनावे में विदेश जाएगा या कि अपने ही राज्य में विदेशी मेहमानों का स्वागत करेगा और ऐसा करते हुए मीडिया में उसकी छवि जाएगी तो भला देश का कितना मजाक बनेगा। पर विरोधी अखबार को इस बात की क्या चिंता…।

अखबार पढ़ते हुए राजा के होंठों पर मुस्कान आ विराजी। एक यही तो अखबार है जो बिना किसी डर के सब कुछ सही सही लिख देता है। काश बाकी अखबार भी इसी तरह से निडर होते। पर बाकी अखबारों ने तो निडरता का मतलब राजा का असम्मान समझ लिया है। यह हमारी उदारता है कि हमने कुछ सवालों को पूछने की छूट दे रखी है तो क्या कुछ भी पूछने लगोगे। यह सब सोचते हुए राजा की मुस्कान गायब होने लगी। उसकी जगह पर ऐसा क्रोध आ विराजा जो किसी राजा के चेहरे पर ही शोभा पा सकता था। राजा के क्रोध की वजह से राजमहल का तापमान तेजी से बढ़ने लगा। राजमहल पिघलकर बह ही गया होता पर सही समय पर गुप्त मंत्री आ गए।

गुप्त मंत्री ने राजा के हाथ में अखबार देख लिया था। उसने तुरंत जान लिया कि राजा के गुस्से की असली वजह क्या है। वह बड़ी अदा से राजा के सामने झुका पर राजा अभी गुस्से में था इसलिए उसे गुप्त मंत्री की अदा पसंद नहीं आई। इससे गुप्त मंत्री पर कोई असर नहीं पड़ा। उसने मुस्कराते हुए राजा का हाथ अपने हाथों में लिया और बोला कि हाथी अपनी चाल से चलता है और कुत्ते भौंकते रहते हैं। इसलिए राजाजी को इस तरह की बातों को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। राजा थोड़ा सहज हुआ था कि अचानक से फिर तुनक गया। उसने तुर्श आवाज में गुप्त मंत्री से कहा कि तुम मेरी तुलना एक जानवर से कर रहे हो। यह राष्ट्रद्रोह है। मैं इस देश का राजा हूँ यह बात तुम्हें कभी नहीं भूलनी चाहिए।

चित्रकार-महेश वर्मा

गुप्त मंत्री ने तुरंत ही अपने शब्द वापस लिए और क्षमा माँगी। अब तक उसे अंदाजा हो गया था कि आज राजा ने किसी बात को ज्यादा ही दिल पर ले लिया है। उसने राजा से पूछा कि हुजूर बुरा न मानें तो कृपया अपनी समस्या उसे भी बताएँ। तब राजा ने बुरा न मानते हुए वह विकराल समस्या बताई जिसने सुबह सुबह ही उसके मूड का सत्यानाश कर दिया था। गुप्त मंत्री मन ही मन हँसा पर ऊपर से बहुत ही गंभीर बना रहा। कुछ देर सोचने विचारने का अभिनय करने के बाद उसने कहा कि इन अखबारों को बंद ही करा देते हैं। इन सबका सरकारी विज्ञापन बंद कर देते हैं और निजी क्षेत्रों की जो कंपनियाँ या लोग इन अखबारों को विज्ञापन या किसी अन्य तरह की मदद करते दिखाई दें उन सब को काली सूची में डालते हैं। या फिर आप आदेश दें तो कल ही इनमें से कुछ के संपादकों की दुर्घटना या कि शराब की ओवरडोज से मौत की खबर छपवा दूँ। या फिर गृह मंत्री को कहें कि इनका कोई लिंक शत्रु देश की गुप्तचर एजेंसियों से निकलवा दें और इन्हें गिरफ्तार करके, इनके कपड़े उतार कर और उल्टा टाँग कर…।

राजा को हँसी आ गई। उसने इशारों से गुप्त मंत्री को बरजा। राजा को हँसते देखकर गुप्त मंत्री भी विनम्र भाव से हँसने लगा। राजा ने कहा कि यह सब तो हो जाएगा पर अगले संपादक ने आकर फिर से वही सब कुछ लिखना शुरू कर दिया तो। और फिर इससे मेरी वैश्विक छवि का क्या होगा। अभी जो खबरें देशी अखबार छाप रहे हैं कल को विदेशी अखबारों में भी यही सब छपने लगा तो? तो कुछ ऐसा सोचो कि जिससे साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे और हमें कुछ फायदा भी हो जाय। गुप्त मंत्री ने सोचने के लिए एकांत में जाने की अनुमति माँगी। जवाब में राजा ने कहा कि यहाँ राजा के महल से ज्यादा एकांत कहाँ मिलेगा। आओ यहीं मिलकर सोचते हैं। इसके बाद राजा और गुप्त मंत्री अगले दो दिनों तक एकांत में इस समस्या पर विचार करते रहे। राजा इस समस्या को लेकर कितना गंभीर था यह इससे भी पता चला कि इन दो दिनों में उसने कुल दस बार की बजाय बस सात बार ही कपड़े बदले। और आखिरकार गुप्तमंत्री ने समस्या का हल खोज निकाला। चूँकि दीवारों के भी कान होते हैं इसलिए उसने यह बात सीधे राजा के कान में ही कही। पूरी बात सुनते ही राजा भाव-विह्वल हो गया और बार बार गुप्त मंत्री को गले लगाने लगा।

अगले दिन देश के सभी अखबारों में पहले पेज पर पूरे एक पेज का विज्ञापन प्रकाशित हुआ। देश के वित्त मंत्री की तरफ से दिए गए इस विज्ञापन में राजा ने ऐलान किया था कि वह राजा नहीं फकीर बनकर रहना चाहता है।

अगले दिन देश के सभी अखबारों में पहले पेज पर पूरे एक पेज का विज्ञापन प्रकाशित हुआ। देश के वित्त मंत्री की तरफ से दिए गए इस विज्ञापन में राजा ने ऐलान किया था कि वह राजा नहीं फकीर बनकर रहना चाहता है इसलिए वह अपने इस्तेमाल में आई हुई सभी चीजें नीलाम कर रहा है। इस नीलामी से जो भी राशि प्राप्त होगी वह स्वर्ण देश के विकास पर खर्च की जाएगी। साथ ही राजा ने यह भी एलान किया कि वह अब सरकारी धन को अपनी पोशाक आदि पर खर्च नहीं करेगा। अब इस देश की प्रजा को तय करना है कि उसका राजा कैसे कपड़े पहने और खासकर विदेश यात्राओं के समय में वह किस तरह के कपड़े पहनकर देश का प्रतिनिधित्व करे। विज्ञापन में वित्त मंत्री ने राजा के इस कदम की भूरि भूरि सराहना की थी और कहा था अगर राजा अपनी प्रजा को विकास देने के लिए इस हद तक त्याग कर सकता है तो प्रजा का भी फर्ज है कि वह इस यज्ञ में बढ़ चढ़ कर आहुति दे। इसलिए वह राजा की जरूरतों को पूरा करने के लिए एक नया कर लगा रहा है जो किसी भी तरह की उपभोग सामग्री की खरीद पर लिया जाएगा। प्रजा को इस कर के बारे में ज्यादा परेशान होने की जरूरत इसलिए भी नहीं है कि जब राजा हर हफ्ते अपने इस्तेमाल की चीजें नीलाम करेगा तो उससे प्राप्त धन वापस प्रजा के विकास पर ही खर्च किया जाएगा। इससे भी ज्यादा खुशी की बात यह है कि प्रजा को इस नीलामी में हिस्सा लेने की खुली छूट होगी।

नीचे राजा के इस्तेमाल में आई हुई वस्तुओं की सूची थी। जिसमें हजारों की संख्या में कपड़े, जूते, चप्पल, घड़ियाँ और कच्छा बनियान आदि थे। यह भी बताया गया था कि राजा की गरिमा और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए राजा के इस्तेमाल में आई अनेक चीजें गुप्त रखी गई हैं। वे भी बिक्री के लिए हैं पर उनकी खरीददारी की पात्रता सब लोग नहीं रख सकेंगे। उन गोपनीय वस्तुओं की खरीददारी के लिए कई चरणों में अपनी राष्ट्र भक्ति और राजा के प्रति भक्ति साबित करनी होगी। कुछ चीजों की बोली आनलाइन भी लगाई जा सकती थी तो कुछ चीजों की नीलामी देश की संसद की बगल में मौजूद देश के सबसे बड़े हाल में की जानी थी। यह भी बताया गया था कि यह एक महान प्रयोग है जो सफल हुआ तो इसी रास्ते पर चलते हुए दूसरी भी बहुत सारी चीजों की नीलामी की जाएगी।

पूरे राज्य में राजा की जय जयकार होने लगी। वे अखबार जो अभी तक राजा के दिन में पाँच बार कपड़े बदलने पर सवाल उठाया करते थे उन्होंने भी माना कि राजा को समझने में उनसे चूक हुई। स्वर्ण देश के इतिहास में ऐसा त्यागी राजा पहले कभी नहीं हुआ। राजा ने देश के लिए अपना सब कुछ नीलाम कर एक ऐसा उदाहरण पेश किया है जो न सिर्फ अनोखा और कल्पनातीत है बल्कि इस महान यज्ञ में राजा का वह संकल्प पूरी ताकत के साथ दिखाई देता है जिसमें उन्होंने इस राज्य को हमेशा के लिए बदल देने का बीड़ा उठाया था। राज्य के सभी चैनलों पर देश के बुद्धिजीवी दिन रात राजा के गुणगान में जुटे हुए थे। वे यह भी दिखा और बता रहे थे कि राजा के इस कदम ने उसे न सिर्फ स्वर्ण देश बल्कि दुनिया भर के सम्मानित और शीर्ष नेताओं में जगह दिला दी है। राजा के इस त्याग भरे अवदान से राज्य को विदेश नीति के मोर्चे पर भी भारी सफलता हासिल हुई है। विदेश मंत्री ने बताया कि दुनिया के सभी देश स्वर्ण देश की तरफ देख रहे हैं और उससे दोस्ती के लिए लालायित हैं। कुछ देशों ने तो यह भी गुहार लगाई है कि उन्हें भी नीलामी में हिस्सा लेने दिया जाय ताकि वह भी स्वर्ण देश के नवनिर्माण में अपना बहुमूल्य योगदान दे सकें।

इन्टरनेट से साभार

राजा ने नीलामी में शामिल होने के लिए इच्छुक विदेशी लोगों और कंपनियों का जी खोलकर स्वागत किया। इस अवसर पर राज्य के नाम अपने संदेश में राजा ने कहा कि अगर हमारे विदेशी मित्र इस पवित्र नीलामी यज्ञ में हिस्सा लेना चाहते हैं तो हम उनका स्वागत करते हैं और इस अवसर पर एलान करते हैं कि मेरे द्वारा इस्तेमाल की गई किसी भी वस्तु को खरीदते ही इस वे इस देश के नागरिक माने जाएँगे। लेकिन चूँकि वह पहले से ही किसी और देश के भी नागरिक हैं इसलिए मैं यह एलान करता हूँ कि जहाँ उनका लाभ हमारे देश के कानूनों से हो रहा होगा वहाँ उन पर देश के कानून लागू होंगे और जहाँ उनका लाभ अपने देश के कानूनों से होगा वहाँ वह स्वर्ण देश की कानूनी बाध्यताओं से मुक्त होंगे। हमारे अपने देश की कंपनियों और नीलामी में हिस्सा लेने वाले लोगों – जोकि मेरे बहुत ही अपने हैं – को कोई पक्षपात न लगे इसलिए मैं यह भी एलान करता हूँ कि वे भी अपनी मर्जी का कोई एक देश चुन लें जहाँ का कानून उन पर लागू किया जा सके। दुनिया को पता चलना चाहिए कि हम भी किसी से कम ग्लोबल नहीं हैं।

इसी तरह से हम अखबार और मीडिया हाउसों को भी राष्ट्र-निर्माण के इस पवित्र यज्ञ में शामिल होने का निमंत्रण देते हैं। जो भी अखबार या चैनल इस अभियान में शामिल होंगे उनको मिलने वाला सरकारी विज्ञापन दोगुना कर दिया जाएगा। इसी तरीके से देश के सभी लोगों को इस यज्ञ में आहुति देने का निमंत्रण दिया गया। चूँकि यह यज्ञ था इसलिए इसमें सभी तरह के अपराधियों को भी न्यौता गया ताकि इसमें आहुति देकर वह अपने पापों से मुक्त हो सकें और फिर देश निर्माण की मुख्यधारा में शामिल हो सकें। इसमें कई कानूनी अड़चनें सामने आ रही थीं इसलिए तत्काल प्रभाव से उन कानूनों को बदल दिया गया जो स्वर्ण देश के नवनिर्माण की इस योजना में बाधक सिद्ध हो रहे थे।

यह तो शुरुआत भर थी। वे लोग जो स्वर्ण देश से प्यार करते थे इस यज्ञ में शामिल होने के लिए पागल हुए जा रहे थे। जैसे ही आनलाइन नीलामी के लिए पंजीकरण शुरू किया गया एक साथ इतने लोग आ गए कि नेट का सर्वर ही ठप्प पड़ गया। तब राजा ने अपने प्रिय धन्ना सेठ को निर्देश दिया कि हफ्ते भर में वह एक ऐसा साफ्टवेयर विकसित करवाए जिस पर बिना रुके चौबीसों घंटे नीलामी की जा सके। और कमाल की बात थी कि धन्ना सेठ ने दो दिन में ही यह काम कर दिखाया। राजा उसकी राष्ट्रभक्ति से बहुत प्रसन्न हुआ। उसने एलान किया कि हर नीलामी का दस फीसदी प्रिय धन्ना सेठ को जाएगा क्योंकि अगर वह यह साफ्टवेयर न विकसित करवाता तो यह नीलामी कभी न संभव हो पाती। इस पर दूसरे तमाम धन्नासेठों ने एतराज जताया और कहा कि उन्हें भी स्वर्ण देश के नवनिर्माण में हिस्सा लेने दिया जाय। तब राजा ने उन्हें आश्वासन दिया कि अगली परियोजनों में उनका ध्यान रखा जाएगा और उनके लिए कुछ नई नीलामी परियोजनाएँ शुरू की जाएँगी।

दोबारा नीलामी शुरू हुई तो देश भर में जैसे आग लग गई। लोग राजा के इस्तेमाल में आई हुई चीजें खरीदने के लिए पागल हुए जा रहे थे। शांति एवं व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस को कई जगहों पर लाठियाँ चलानी पड़ीं। पहले ही दिन इस यज्ञ में करीब सौ लोगों ने अपनी बलि दी। कई जगहों पर सेना को बुलाना पड़ा तब भी कहीं मुश्किल से शांति संभव हो पाई। उधर स्वर्ण देश के नवनिर्माण में शामिल होने को लालायित विदेशियों ने गुहार लगाई कि उनके लिए अलग से नीलामी की व्यवस्था की जाय। राजा ने तुरंत उनके लिए अलग से व्यवस्था की। यह देखकर अनेक देशभक्त लोगों ने तुरंत स्वर्ण देश की नागरिकता का त्याग कर विदेशी नागरिकता लेने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि नागरिकता त्याग देने के बावजूद स्वर्ण देश उनके दिलों में चमकता है। यह इससे भी साबित होता है कि देश की नागरिकता उन्होंने छोड़ी ही इसलिए है कि वह देश के विकास के इस पवित्र यज्ञ में हिस्सा ले सकें। इन लोगों की कोई गलती नहीं थी। हर कोई इस यज्ञ में शामिल होना चाहता था।

राजा इन लोगों का देशप्रेम देखकर बहुत खुश हुआ और उसने  ऐलान किया कि नीलामी में ज्यादा से ज्यादा लोग शामिल हो सकें इसलिए वह दिन में कम से कम दस बार कपड़े बदलने की कोशिश करेगा।

कैदियों ने लाखों की संख्या में पैरोल या जमानत के लिए आग्रह किया ताकि वह इस नीलामी में हिस्सा ले सकें। उनके इस आग्रह को तुरंत स्वीकार किया गया। बल्कि स्वर्ण देश के नवनिर्माण में शामिल होने की उनकी ललक को देखते हुए उनमें से ज्यादातर की सजा माफ कर दी गई। जिनके अपराध के बारे में अभी तक कोई फैसला नहीं हो पाया था उन्हें यह कहकर बाइज्जत बरी कर दिया गया कि अपने देश से इतना प्रेम करने वाला व्यक्ति कोई अपराध कर ही नहीं सकता। और अगर उनसे कोई अपराध हुआ भी है तो जाहिर है कि यह अनजाने में हुआ है। अनजाने में हुए अपराध के लिए न्यायालय कोई सजा नहीं दे सकता इसलिए उन्हें रिहा किया जाता है। बेवजह गिरफ्तार और आरोपित होकर मानसिक तौर पर वह पहले ही बहुत कड़ी सजा भुगत चुके हैं। यह समझना किसी के लिए भी मुश्किल नहीं होना चाहिए कि इन निर्दोष आत्माओं पर इस दौरान क्या बीती होगी।

कुल मिलाकर हुआ यह कि नीलामी शुरू हुई तो राजा के पिछले कई सालों से इस्तेमाल में आई हुई चीजें दिन भर में ही समाप्त हो गईं। जो इस यज्ञ में आहुति देने और बदले में प्रसाद पाने में सफल रहे वे उल्लास में भरकर घर वापस लौटे। उनके यहाँ दीपोत्सव मनाया गया। अनेक लोगों ने इस खुशी में सार्वजनिक भोज का आयोजन किया जिसमें पानी की जगह मदिरा पीना अनिवार्य था। खुशी के मारे उनकी नींदें उड़ गई। देश के निर्माण में शामिल होने का खुमार उनकी आँखों में छा गया। नीलामी से प्राप्त बिल और राजा के इस्तेमाल में आई हुई वस्तु के खरीद पत्र की कई कई प्रतिलिपि बनवाकर उसे लैमिनेट करवा लिया गया। आने वाले दिनों में किसी भी मुश्किल में फँसने पर यह सबसे ज्यादा काम आया। इस खरीद पत्र का धारक बिना किसी जाँच के किसी भी तरह के आरोपों से मुक्त माना गया।

जिन्हें नीलामी में कोई भी वस्तु खरीद पाने में कामयाबी नहीं मिली थी वे अपने को दोयम दर्जे का नागरिक महसूस कर रहे थे और जल्दी से जल्दी इस दोयम दर्जे से मुक्ति पाना चाहते थे। इसलिए वे सड़कों पर उतर आए थे और तोड़ फोड़ पर उतारू थे। उनकी माँग थी कि नीलामी की यह प्रक्रिया हफ्ते में एक दिन या दिन में एक बार की बजाय चौबीसों घंटे चलती रहे। स्वर्ण देश के नवनिर्माण का यह यज्ञ निरंतर चलते रहना चाहिए। इसके रुकने का मतलब है कि देश का नवनिर्माण रुक गया है। सड़क पर उतरे हुए लोग इसे किसी हाल में रुकने नहीं देना चाहते थे इसलिए उन्होंने देश भर में जमकर तोड़ फोड़ की। आखिर पुराने को नष्ट किए बिना नया निर्माण किस तरह से संभव हो सकता था। राजा इन लोगों का देशप्रेम देखकर बहुत खुश हुआ और उसने एलान किया कि नीलामी में ज्यादा से ज्यादा लोग शामिल हो सकें इसलिए वह दिन में कम से कम दस बार कपड़े बदलने की कोशिश करेगा।

वहीं दूसरी तरफ बहुत सारे ऐसे भी मूढ़ लोग थे जिन्हें नीलामी और देश के नवनिर्माण के बीच कोई कनेक्शन समझ में ही नहीं आ रहा था। वे दिन भर अखबार पढ़ रहे थे। बदल बदल कर चैनल देख रहे थे। यहाँ तक कि राजा के सभी संदेश और वह पहले पेज वाला विज्ञापन – जहाँ से यह खेल शुरू हुआ था – उन्हें जबानी याद हो गए थे। वे अक्सर उन्हें मंत्र की तरह बुदबुदाते और उसमें कोई अर्थ ढूँढ़ने की कोशिश करते जो उन्हें कहीं नहीं मिल रहा था। तब वे विशेषज्ञों और बुद्धिजीवियों के पास जाते जिनकी इस देश में वैसे भी कोई कमी नहीं थी। बुद्धिजीवी उन्हें समझाने की बजाय उनके कंधे पर चढ़ बैठते और कहते कि उन्हें समझाने का इससे बेहतर तरीका नहीं आता। विशेषज्ञों की तो भाषा ही किसी को समझ में न आती। लोग किसी तरीके से वहाँ से निकल भागते और किसी नई जगह दस्तक देते जहाँ से उन्हें यह सब समझ पाने की जरा भी उम्मीद होती। यह लोग देश की सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर डाल दिए गए। इनकी नासमझी यह नहीं थी कि ये इस नीलामी यज्ञ को नहीं समझ पा रहे थे। इनकी नासमझी यह थी कि इन्होंने अपने राजा पर भरोसा नहीं किया था। अगर राजा ने कहा कि नीलामी से देश का नवनिर्माण होगा तो यह भरोसा करने की बात थी। इसमें भला सोचने समझने की क्या बात थी।

ऐसा नहीं था कि ऐसे लोग नहीं थे जो उन्हें सब कुछ सही सही समझा नहीं सकते थे। ऐसे लोग थे और बड़ी संख्या में थे। राजा खुद यह बात जानता था इसलिए उसने तमाम मीडिया को निर्देश दे रखा था कि वह ऐसे लोगों द्वारा कहे गए एक भी शब्द को अपने भीतर जगह न दें। ऊपर से इन बुद्धिजीवियों की समस्या भी भयानक थी। यह सब कुछ जानते थे। दुनिया की गूढ़ से गूढ़ बातें इनके लिए बच्चों की पहेलियाँ थीं पर इनकी मुश्किल यह थी कि वे वह भाषा ही भूल गए थे जिनमें कि वह पैदा हुए थे। इसलिए जब भी वह कुछ समझाने की कोशिश करते या कि देश की समस्याओं पर बड़े बड़े पर्चे और किताबें लिखते तो यह सब कुछ जिनके बारे में होता या कि जिनकी समस्याओं के बारे में होता वे इन्हें बस मुलुर मुलुर ताकते रह जाते। कई बार वे इनकी बलैयाँ लेना चाहते कि ये बेचारे हमारे लिए कितना परेशान रहते हैं पर इनकी बात तब भी उन्हें समझ में नहीं ही आ रही होती। बाद के दिनों में तो यह बात सबसे अच्छे तरीके से राजा ने ही समझी। वह उन किताबों को पढ़ता और हँसता जिनमें उसका विरोध किया गया होता। कई बार तो उसे उन किताबों के लेखकों पर इतना प्यार आता कि वह उन्हें सम्मानित ही कर डालता और उनसे अनुरोध करता कि अपनी अगली किताब का विमोचन राजा से ही कराएँ।

इन्टरनेट से साभार

खैर और भी बहुत सारे लोग थे जो इस नीलामी से दूर ही रहे। उनमें से ज्यादातर तक तो यह बात पहुँच ही नहीं पाई। उन तक अगर यह बातें किसी तरह से पहुँचा भी दी जातीं तो वे आनलाइन जैसे शब्दों पर ही अटक जाते। वे रेल लाइन जानते थे जो उनके तब काम आती थी जब वे इस देश-दुनिया से इस हद तक निराश हो जाते थे कि एक एक साँस उन्हें भारी लगने लगती थी। उन्होंने एक और लाइन के बारे में सुन रखा था और कुछ ने तो देखा भी था जो खंभों पर लटके हुए तारों से आती थी और रोशनी देती थी। कई बार बार यह घरों में तो रोशनी न दे पाती पर खलिहान जरूर रोशन हो जाते। ये लोग जिस लाइन को सबसे ज्यादा जानते थे वह सस्ते राशन या मिट्टी के तेल या ऐसे ही दूसरी तमाम चीजों की लाइन थी जो बहुधा किसी खिड़की के बाहर लगा करती थी और जब तक उनका नंबर आता खिड़की बंद हो जाती थी।

राजा अक्सर इन लोगों के बारे में सोचता और भावुक हो जाता। वह दिल से इन लोगों का भला चाहता था पर वह क्या कर सकता था जब यह लोग खुद ही अपना भला नहीं चाहते थे। राजा ने इन लोगों के मसले पर एक कमेटी बनाई थी जिसने राजा को सलाह दी थी कि इन लोगों को सभ्य और आधुनिक बनाने के लिए सैकड़ों साल तक चलने वाली परियोजना पर काम करना पड़ेगा। इस परियोजना से उन्हें कष्ट तो होगा पर इस कष्ट की तुलना किसी डाक्टर द्वारा अपने मरीज को दिए गए उस कष्ट से की जानी चाहिए जिसे कि वह अपने मरीज को स्वस्थ करने के लिए देता है। विशेषज्ञों ने राजा से सिफारिश की थी कि इन लोगों का जीवन इतना कठिन बना दिया जाय कि राहत की तलाश में यह शहरों की तरफ निकलें। खेती असंभव बना दी जाय। स्थानीय स्तर पर रोजगारों को समाप्त किया जाय। इनकी जमीनें छीन ली जाएँ। इनके घर उजाड़ दिए जाएँ। इनकी स्त्रियों का बलात्कार किया जाय। इनके साथ हर वह काम किया जाय कि ये अपनी जगह छोड़ कर शहरों की तरफ भागें। विस्थापन में ही विकास छुपा हुआ है, यह बात प्राचीन काल से आधुनिक काल तक के तमाम उदाहरणों से समझी जा सकती है।

इस दौरान वह अपने ही देश के इन पीछे छूट गए लोगों के लिए कई बार रोया। गुप्त मंत्री राजा को चुप कराते-कराते कई बार खुद ही रोने लगा पर आखिरकार दोनों एकमत हुए कि प्रजा की भलाई के लिए इस कमेटी की सभी सलाहों को सख्ती से लागू करना ही पड़ेगा।

जब तक यह अपनी जगह से विस्थापित नहीं होंगे तब तक आधुनिक रहन-सहन, सोच-विचार और देश प्रेम आदि को कैसे समझ पाएँगे। बल्कि बेहतर तो यह है कि इन्हें कुछ समय तक सभ्य लोगों के बीच सेवक की तरह रखा जाय जिससे कि यह सभ्य दुनिया के तकाजे सीख सकें। यह इसलिए भी जरूरी है कि नीलामी के माध्यम से देश और देश के बाहर के जो तमाम लोग स्वर्ण देश के नव निर्माण की प्रक्रिया में हिस्सा लेना चाहते हैं उन्हें बहुत सारे सेवकों की जरूरत पड़ने वाली है जो बिना किसी सवाल के दिन रात आदेश का पालन कर सकें। इस तरह से ये लोग देश के नवनिर्माण की मुख्य धारा में भी शामिल हो सकेंगे। राजा इस कमेटी की सलाहों पर गुप्त मंत्री के साथ कई दिनों से मनन कर रहा था। इस दौरान वह अपने ही देश के इन पीछे छूट गए लोगों के लिए कई बार रोया। गुप्त मंत्री राजा को चुप कराते कराते कई बार खुद ही रोने लगा पर आखिरकार दोनों एकमत हुए कि प्रजा की भलाई के लिए इस कमेटी की सभी सलाहों को सख्ती से लागू करना ही पड़ेगा। तभी जाकर इस नीलामी यज्ञ से देश का नवनिर्माण संभव हो पाएगा।

अगले दिन देश भर की मीडिया में राजा ने एलान किया कि स्वर्ण देश के नवनिर्माण के लिए शुरू की गई नीलामी परियोजना बड़े स्तर पर सफल हुई है। उससे जो राशि प्राप्त हुई है वह गिनी जा रही है और उसमें अभी लंबा समय लगने वाला है। बल्कि संभव तो यह है कि आखिरकार उस राशि को सही सही गिन पाना कभी संभव ही न हो पाए क्योंकि नीलामी की प्रक्रिया अभी भी चल रही है। राजा ने प्रजा को धन्यवाद दिया और कहा कि जिन लोगों ने इस यज्ञ में हिस्सा लिया है उन्हें सभी सरकारी योजनाओं या नौकरियों आदि में प्राथमिकता दी जाएगी। लेकिन जो लोग इस यज्ञ से जान-बूझ कर दूर रहे हैं उन पर नजर रखी जाएगी। पूरी संभावना है कि उनके संबंध शत्रु देशों से हों या कि विदेशी विचारों ने उनके दिमागों को हमेशा के लिए अपसंस्कृति से भर दिया हो। यह यज्ञ सफल हो सके इसके लिए जरूरी है कि देश के सभी लोग किसी भी तरह के पूर्वाग्रह से मुक्त होकर इसमें शामिल हों। जो नहीं शामिल होंगे उन्हें हम जबरदस्ती शामिल करेंगे पर स्वर्ण देश का नवनिर्माण करके ही रहेंगे। राजा की यह घोषणा सुनकर मीडिया कई दिनों तक ताली की तरह बजता रहा। इस तरह से राजा थोड़ा और बहरा हुआ। राजा के बहरेपन की कथा कभी और कही जाएगी।

(इस कहानी में प्रयोग  किये गए दो चित्र हिंदी के बेहतरीन कवि और चित्रकार महेश वर्मा के हैं.)

3 COMMENTS

  1. मनोज भाई कभी कभी जादूगर लगते हैं। कभी उनकी कहानी वर्तमान की किसी समस्या को प्रबलता से रखती है तो कभी वो ऐसी कहानी लिखते हैं जो समस्या भविष्य के गर्त में होती है पर उसका अंदाज नहीं होता। इस उम्दा कहानी के लिए सौतुक का आभार।

  2. बढ़िया कहानी। आज ऐसी कहानियों की जरूरत है।

  3. आज तक की मेरे द्वारा पढ़ी गयी कहानियो में बहुत अच्छी साथ ही बात रखने का अंदाज़ एकतरफा ह श्रीमान आपसे कहानी के माध्यम से बहुत कुछ सीखने को मिला

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here