मनोज कुमार पांडेय की कविता: चलती ट्रेन में तुम्हारी याद

1

 

मनोज कुमार पाण्डेय

कथाकार मनोज कुमार पांडेय की कहानियां आपने सौतुक पर पढ़ी हैं. लेखक अपनी कहानियों में उन मुद्दों को जगह देते हैं, जो सामान्यतः दर्ज नहीं हो पाता है. बेचैन कर देने वाली इनकी अनेक कहानियों से गुजरते हुए आपको अपने आसपास के भारत का एहसास होगा जिससे आप दूर कर दिए गए हैं.  लेखक का वही तेवर उनकी कविताओं में भी देखने को मिलता हैं. प्रस्तुत हैं उनकी एक लम्बी कविता: चलती ट्रेन में तुम्हारी याद. कवि और लेखक मनोज कुमार पांडेय से उनके फोन : 08275409685 या ई-मेल : [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है.

 

चलती ट्रेन में तुम्हारी याद

पिछले बीस साल से एक पैसेंजर ट्रेन में सवार हूँ
जो चलने से ज्यादा रुकी रहती है
और यह रुकना भी स्टेशन की बजाय कहीं बीच में ज्यादा होता है
जहाँ दूर दूर तक पेड़ पौधे खेत और तालाब आदि होते हैं
और पीछे से झाँक रहा होता है कोई गाँव
तब मुझे तुम्हारी याद बहुत ही ज्यादा सताती है
यह खुद को याद करने से जरा भी अलग नहीं होती

मेरी छोटी छोटी उम्मीदों को मारती हुई
हर दिन के साथ अकेला कर रही है मुझे यह ट्रेन
जो बात कहनी हो कह न पाओ कभी
या तब कहो जब इतनी पुरानी हो जाय कि असर खो बैठे
समूचा आसमान ढक लेना चाहता है मुझे
धरती समो लेना चाहती है खुद में
नदियाँ बुलाती हैं अपने भीतर
मैं जाता हूँ उनके पास एक एक कदम चलता हुआ
और एक चुप बातचीत के बाद लौट आता हूँ

एक रास्ता है जिस पर या तो साइकिल से चला जा सकता है या पैदल
तुम्हारी यादें हैं बीस साल पुरानी जो और और पुरानी होती जानी हैं
हमारा मिलना असंभव होता जा रहा है
मैं जिस ट्रेन पर सवार हूँ वह मुझे तुमसे और और दूर लिए जा रही है
बगल में ही कहीं तुम्हारा गाँव है पर मेरा उतर पाना मुश्किल
मेरे जूतों में चुंबक है मुझे खींचता हुआ
और बिना जूतों के मेरा चलना असंभव

तब भी जब कई बार जूतों के फीते जरा ढीले होते हैं
मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है
इतनी कि कई बार रोने ही लगता हूँ
मैं अभी भी वही हूँ तुम्हारा भावुक रोंदू
यह अलग बात है कि अब आँसू मर्म का आईना नहीं
जब रोता हूँ तब हो जाते हैं अदृश्य
और कई बार बेवजह आते हैं तो आते ही चले जाते हैं
सस्ती फिल्मों के सस्ते भावुक दृश्यों पर भी
वह सारी फिल्में मैं ही हिट कराता हूँ

कल यह ट्रेन रुक गई थी बहुत देर के लिए कहीं
और तब मुझे वह मिला हमारे बीच का पत्रवाहक
वहीं स्टेशन पर पानी बेचता हुआ
जो एक चिट्ठी पहुँचाने का पाँच रुपया लिया करता था हमसे
मैंने उससे तुम्हारे बारे में पूछा
वह बड़ी अश्लील हँसी हँसा और बोला कि अब तक तो तुम लड़कोर हो गई होगी
मैंने उसकी अश्लीलता पर ध्यान नहीं दिया और तुम्हारा हाल पूछा
उसकी आँखे फिल्मीं ड्रैकुला की आँखों की तरह सफेद हुईं
और उनमें दृश्य दिखने बंद हो गए।
अपनी खाली आँखों में वह दयनीय लगा मुझे
तब मैंने उससे एक बोतल पानी खरीदा
पानी में लोहे के कीड़े थे जो जेली की तरह चिकने और मुलायम थे

अच्छा यह बताओ कि लड़कोर होकर कैसा लगता है तुम्हें
तुम्हारे कितने बच्चे हैं और उनमें से कितनों की शक्ल तुम पर गई है
क्या उनमें भी तुम्हारे जितना ही नमक है
या उनका भी नमक चुरा ले गए नमक के चोर
उन्हें खूब प्यार करना और बेरोजगारी का ताना मत देना कभी
यह एक साजिश है हमारे खिलाफ और वे होंगे अबोध
पुरइन के उन लहलहाते फूलों की तरह
जिनके किनारे मिला करते थे हम

सुनो तुम्हारा पति कैसा है
प्यार तो करता है न तुम्हें… और तुम…
उसकी आँखों में नमी और चमक है तो न तुम्हारे लिए
कभी नमी ज्यादा दिखे और चमक कम तो भी नाउम्मीद न होना
वह बहुत शानदार आदमी है मिलता है अक्सर मुझे ट्रेन में
उसके जूते मेरे जूतों से बहुत ज्यादा अलग नहीं हैं
वहाँ भी एक कील है उसके तलवों में चुभती हुई
तुम्हारे अलावा यह भी एक बात है हम दोनों को जोड़ने वाली
मैं उससे एक दिन तुम्हारा हालचाल पूछूँगा

तुम्हें हमारे पत्रों की भाषा याद है
बीच में तरह तरह के संकेत, चित्र और रंग
बिना नाम के ही एक दूसरे को संबोधित
वे खत कहाँ होंगे अभी कहाँ होगी उनकी मिट्टी
क्या उनकी खाद से खिला होगा एक भी फूल
मान लो कि वह फूल किसी दिन मैं फिर से भेंट करूँ तुम्हें
तो क्या वह सारे संकेत, चित्र और रंग और खाली जगह में फिर से बदल जाएगा
या फिर यह एक नई ही हलचल होगी
चलो जहाँ भी हम हैं वहीं से एक दूसरे को एक बार फिर से खूब खूब प्रेम करते हैं

सुनो मेरी सखी कैसी हो तुम
तुम्हें पता है उन खतों की भाषा अपनी पत्नी को सिखाने की कोशिश की थी मैंने
और उसने बिना सिखाए ही सब कुछ समझ लिया
क्या कोई कील है उसके भी तलवों में चुभती हुई
मैं उसके तलुए सहलाते हुए तुम्हारे तलुओं में चुभ रही कील ढूँढ़ता हूँ
वह खिलखिलाकर हँसती है तब कई बार
और गजब कि यह खिलखिलाहट अक्सर हमें उदास कर जाती है

उसी उदासी में यह ट्रेन कहीं रुकी हुई है
मैं सोचता हूँ कि यह तुम्हारा ही गाँव हो शायद
कि ट्रेन पूरी पृथ्वी का एक चक्कर पूरा कर आई हो
और थककर तुम्हारे गाँव में आराम कर रही हो
सोचा था क्या कि यह एक दुर्लभ बात होगी कभी
कहीं किसी बाग में खड़े खड़े ही पूछ सकूँ तुम्हारा हाल
तुम्हारी याद के रास्ते में बहुत सारी मुश्किलें हैं
रास्ते में बहुत धूल है कुछ दिखता नहीं दृश्य खो जाते हैं

यह ट्रेन चलती है तो बाहर की भागती हुई दुनिया
हवा हुई जाती है दृश्य रफ्तार में गायब

कई बार ट्रेन की रफ्तार एकदम स्मृतियों की रफ्तार के बराबर होती है
और तब बाहर दिख रहे लोग एक दूसरी दुनिया के लोग लगते हैं
जो स्पीड के चलते हमसे पीछे छूट गए स्मृतियों की वजह से
मैं अपनी तबाही को जीते रहना चाहता हूँ
एक तुममें ही समूची दुनिया को खोजता हुआ
यह दुनिया के नियमों के खिलाफ है
यही समझाने आते हैं मुझे दुनिया भर के किस्से
खिड़कियों के रास्ते हवा पर चलते हुए
मुश्किल यह है उनके चरित्रों ने किस्से बदल लिए हैं
उनकी यह स्वच्छंदता मेरा ही साथ देने लगती है कई बार
मैं उनसे कोई सीख नहीं ले पाता
अपनी गलतियाँ दोहराता हुआ तुममें खो जाता हूँ

1 COMMENT

  1. मनोज सर शानदार कविता है आपकी …..एक सोच एक दुनिया में ले जाती है यह कविता….💐💐💐💐💐

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here