षोडशी की षोडशोपचार उपासना ४

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लिखे जा रहे उपन्यास माँमुनि की तीन किश्त अब तक आप पढ़ चुके हैं. लेखक अम्बर पांडेय की लेखनी का जादू पाठकों के सर चढ़कर बोल रहा है. लगातार नौ दिनों तक उपन्यास अंश को यहाँ प्रकाशित करने के क्रम में आज प्रस्तुत है चौथा अंश.

अम्बर पांडेय

जो चला जाता है उसे तो नया भुवन मिल जाता किन्तु जो पीछे रह जाता है उसके पुराने संसार में क्षण क्षण जानेवाले का अभाव खटकता है।

ऐसी ही दशा प्रसन्नमयी की हुई। शारदा और ठाकुर के जाने के पश्चात् वह चौका करती और शेष दिन माला फेरती रहती। ठाकुर के आने से जीवन में जो उत्सव हुआ था अब वहाँ मेले के उठ जाने के पश्चात् सूनी भूमि की नीरवता पसरी हुई थी। माला फेरते फेरते नयन मूँदें ठाकुर और शारदा के संग हुई बातों को दुहराने लगती।

चातुर्मास यों बीत गया जैसे पूर्णिमा की रात्रि बीत जाती है। स्वामी के संग की कामना करती शारदा प्रसन्नमयी को अपने जैसी ही लगती। फिर मन झटककर कहती ‘प्रसन्नमयी कहाँ तू बालविधवा स्वयं की सौभाग्यवती सती शारदा से तुलना करने बैठ गई! विधवा का एक ही आभूषण है- लज्जा।’ संकोच के कारण प्रसन्नमयी अपने मन से ही अबोला साध लेती।

माला पर जल्दी जल्दी अंगुलियाँ फेरने लगती। दिन हो जाता था तो रात्रि होने का नाम नहीं लेती थी और रात्रि होती तो नींद नहीं आती। ऐसी अनन्त रात्रियाँ केवल प्रसन्नमयी, ब्राह्मणी और शारदा जैसी वियोगिनियों के कपाल पर ही विधाता ने लिखी थी। ठाकुर की निशा तो कालीमाँ से बोलने-बतियाने में ही बीत जाती थी।

कोई ऐसे से मन लगा ले जिसे स्वयं को ही गढ़ना पड़ता हो तो जीवन कैसे आँख झपकते बीत जाए, प्रसन्नमयी सोचती। जैसे ठाकुर ने दक्षिणेश्वर की काली से मन लगा लिया। जो गढ़ते है ठाकुर ही गढ़ते है और प्रेम के कारण कल्पना कैसी प्रबल हो जाती है। ब्रह्मा ने संसार बनाकर कौन सा चमत्कार किया जैसा ठाकुर जैसे गढ़ैये ने भगवान बनाकर किया!

ठाकुर ने काली गढ़कर भी कौन सा चमत्कार किया जैसा शारदा ने ठाकुर को गढ़कर किया। मिट्टी में जल मिलाकर मूर्ति गढ़ना सरल है किन्तु जो पहले से वर्तमान हो उससे वांछित प्रतिमा गढ़ना कितना कठिन। जगत के ठाकुर से शारदा का ठाकुर गढ़ना खेल है क्या! पाषाण काटकर मन्दिर बनाने से भी अधिक कठिन। संसार का सबसे कठिन काज।

और उससे भी अधिक गूढ़विद्या है ठाकुर को जो भाती है वैसी मछली बनाना। सोचकर प्रसन्नमयी अकेली बैठी भी हँस पड़ती। घर की बहुएँ देखकर व्यंग्य करती। मीठा अधिक खाकर बालविधवा का माथा फिर गया है। कीर्तन के कारण ऐसी दशा होती है। दिवसभर बाहर कीर्तन रातभर भीतर कीर्तन।

प्रसन्नमयी से कोई पूछता तो बाहर बाहर का कीर्तन माँग लेती। ठाकुर और शारदा के जाने के पश्चात् तो केवल भीतर भीतर कीर्तन शेष था। बाहर केवल भग्न देवालयों का मौन और एक आधा लिखा हुआ पत्र। वह पत्र प्रसन्नमयी के जीवन की सबसे अमूल्य वस्तु था। उसकी निरावरण आत्मा का परिधान।

कैसी अपूर्व घटना है। अक्षरज्ञानशून्य शारदा का ठाकुर को पत्र! ठाकुर तो लिखापढ़ी को ऐसा मानते थे जैसे चन्द्रदर्शन के लिए कोई पंचांग बाँचे; दृष्टि उठाकर आकाश की ओर देखे तक न। जो बात सम्मुख बैठकर दृष्टि से दृष्टि मिलाकर कही जाना चाहिए थी उसे कहने के लिए शारदा ने पत्र क्यों लिखा?

मिट्टी में जल मिलाकर मूर्ति गढ़ना सरल है किन्तु जो पहले से वर्तमान हो उससे वांछित प्रतिमा गढ़ना कितना कठिन

लिखा कहाँ! प्रसन्नमयी से लिखवाया। योगेश्वरी ब्राह्मणी के काशी प्रस्थान के पश्चात् ठाकुर बालकों की भाँति दक्षिणेश्वर जाने की हठ करने लगे, “वर्षा बीत गई। गंगा का जल गुड़ की भाँति मीठा हो गया होगा रे हृदू। चल, अब लौट चले गंगाघाट।” शारदा ने मछली बनाने की सब विधियाँ सिद्ध कर ली थी। गंगा में नहाकर कालीपद से उठाकर सिंदूर लगाने के स्वप्न से उसकी नेत्र ऐसे भरे थे जैसे धान से कार्तिक में कृषकों के भण्डार भरे रहते है।

एकादशी के दिन प्रसन्नमयी शीघ्र ही फलाहार की व्यवस्था करके जब ठाकुर के घर आ पहुँची तो देखती है शारदा ठाकुरघर के आगे बैठी धीमे धीमे भजन गा रही है।

“चूल्हे-चौके की ऐसी व्यस्त बेला में तुम भजन गाती बैठी हो, भाभी?” प्रसन्नमयी ने पूछा, “किसी ने बताया नहीं आज एकादशी है। मछली नहीं सींझने रखी?”

“एकादशी के दिन की गई यात्रा सब प्रकार से शुभ होती है, प्रसन्नदी” शारदा ने रघुवीर के विग्रह से गिरा श्वेत जवाकुसुम अपने केशों में खोंसते कहा।

“कहाँ चली अब? ठाकुर की सेवा करने के लिए तुम्हें ब्याहकर लाई मेरी बुआ। बार बार नैहर जाओगी तो बड़दा दूजी रख लेंगे, कहे देती हूँ मैं और रखे भी क्यों न! जब स्त्री बार बार माँ के घर जाकर छुप जाए। दूजी लाने को मैं ही कहूँगी उनसे” प्रसन्नमयी झूठमूठ रूठने का अभिनय करने लगी।

“ठाकुर तो पौ फटने से पूर्व ही दक्षिणेश्वर को चले गए। देर तक मैं सोचती रही ‘नहाकर लौटते होंगे’ फिर किसी बालक ने आकर बतलाया कि ठाकुर तो गए। बताकर जाते तो झालमूड़ी तो संग धर देती; यात्रा का आधार हो जाता।”

प्रसन्नमयी ने कुछ नहीं कहा। देर तक अचंभित बैठी रही। फिर पड़ौस से शारदा के लिए मछली का एक टुकड़ा मँगवाया। प्रसन्नमयी एकादशी के दिन भाभी को निरामिष रखने का अपराध कैसे करती भला!

शारदा का अनुज प्रसन्न मुखोपाध्याय बाहर प्रतीक्षा कर रहा था। मध्याह्न होने में विलम्ब था और शारदा प्रसन्नमयी को कोई पत्र लिखवा रही थी। यह परमगुप्त और वेदना से भरा हुआ कार्य चौके के पीछे अंधेरे भण्डारे में दोनों कर रही थी। शारदा दीया पकड़े खड़ी थी और भूमि पर बैठी प्रसन्नमयी जल्दी जल्दी लिख रही थी।

पत्र

श्रीकालीप्रसन्न

तुम्हें सम्बोधित करके पत्र लिखवाऊँ ऐसा साहस सम्भवतः कभी नहीं जुटा पाऊँगी। जाती बेला तुम्हारे चरणों की धूल से वंचित रही इसलिए इस पत्र के माध्यम से उसे धूलि को पाने की कामना करती हूँ।

अधिक समय तुम्हारे संग न बिता पाने के पश्चात् भी इतना तो जान गई हूँ कि मेरा लग्न किसी साधारण मनुष्य से नहीं हुआ है। संसार की अभ्यस्त मेरी दृष्टि ने तुम्हारी दिव्यता के दर्शन में अवश्य ही अधिक समय लिया हो किन्तु मन ने उसे अपनाने में क्षण का भी विलम्ब नहीं किया।

जिस काया को धरकर इस भंगुर जग के पुरुष इठलाया करते है उसे कुम्हार की मिट्टी सा कोमल कर श्रीराधा बननेवाला पुरुष क्या साधारण हो सकता है!

केवल इतना कहना चाहती हूँ कि आपके इस मार्ग पर मैं विघ्न तो न बनूँगी।

-पीछे पीछे दीपक लिए आने की आज्ञा की आकांक्षिणी

शारदा।

पूरा पत्र कहकर शारदा ने प्रसन्नमयी के हाथ से पत्र ले लिया। बड़ी देर तक देखती रही। फिर कागज लौटाते कहा, “बताओ प्रसन्नदी, ये आढ़ीटेढ़ी अल्पनाओं जैसी आकृतियों को पढ़कर ठाकुर इतना सब जान सकते है तो क्या मेरे नेत्र पढ़कर न जान सके होंगे। यह पत्र उन्हें भेजना उनका अपमान होगा। लिखा अक्षर मिटाना पाप है। इसे कहीं छुपाकर धर दो।”

कहकर शारदा चल दी। प्रसन्नमयी पत्र बारंबार पढ़ती थी किन्तु दिगंत की भाँति उसका अर्थ प्रत्येक बार और अधिक विस्तीर्ण होता जाता था।

(क्रमशः जारी….)

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