विपिन चौधरी की पांच कवितायें

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विपिन चौधरी

विपिन चौधरी/

(जैसे यथार्थ कोई झालर हो जिसमें लगे बल्ब भविष्य पर अपनी टिमटिमाहट भरी रौशनी डालते हों-वैसी ही बिपिन चौधरी की कविताएं हैं। अनगिनत विचार उनकी कविता में आवाजाही करते हैं। बाज मर्तबा वो कविताएँ किसी विचार को बिल्कुल नए ढंग से देखने की कवायद भी होती है।- सौतुक)

 

हत्या

(गौरी लंकेश के लिए)

जमीन पर उतरते ही
विचार
सबसे पहले खुद के लिए
आसमान सुनिश्चित करते हैं

फिर उनके टाई और सूट पहनने का काम तो दिनचर्या जैसा है
दिमाग को खुराक देते
विचार
देहरी से बाहर जाते समय
अपने तस्में बांधते
विचार

रुको मगर
देखो, कोई तुम्हारे इन विचारों पर तिरछी नज़र गड़ाए बैठा है
उसे अपने विचारों से ज्यादा
तुम्हारे विचारों की फ़िक्र है
एक दिन लाता है वह बंदूक
करता है तुम्हे ढेर

मारे जाने पर तुम्हारी देह के घेरे में सिमटे सैंकड़ों
विचार
वायुमंडल में हर कतरे में घुल गए हैं

वे हैरान हैं
कि आखिर उन्होंने जिसकी हत्या की थी
वह मरा क्यों नहीं

डर

बचपन में छत पर रात को हमें भूत दिखते थे
अकेले पगडंडी पर उतरते ही प्रेत
झाड़ियों के निकल सामने आ जाते
गाँव के पीपल पर चुड़ैलों की कहानियां
उलटी लटकी हुई दिखती अक्सर

युवा होने पर अपने बाजुओं के फैलाव पर नज़र रखने वाले हम
डर की बात पर अक्सर हंस दिया करते थे

अब मगर डर का चेहरा साफ़ दिखता है
दिख जाती है उसके हथियारों की शातिर चमक
कई कदम आगे बढ़ कर डर
कई बार हमारी त्वचा को छू कर भी चला गया है

डर के इतना नज़दीक हम कभी नहीं थे
कि वह सीटी बजाती हवा की तरह आये और कानों में
मक्कारी का पाठ पढ़ाने की कोशिश कर डाले

इसपर भी हमारी रूह में सिहरन को कोई जगह नहीं
अब हम डर की हवा निकाल कर अपने बगल में रहते हैं
कदम-कदम पर सलाम बजाने वालो
सुनो
वहीं हमें डर की आँखे दिखा कर भीड़ का हिस्सा हो जाते हैं
जिन्हें हमनें ही चढ़ाया था अपने कांधों पर
थपथपाई थी कभी उनकी पीठ
हमारी हार थी वह
और उसी हार की ज़मीन पर बो दिया था उन्होंने
डर

हमारा लहू

एक बार की बात है
किसी देश का राजा बड़ा न्यायप्रिय था
एक बार की बात है
शेर और भालू में गहरी दोस्ती थी

हमारी कहानियों की तासीर कहीं
इस तरह न हो जाए कि
शुरू हो कहानियां

कहीं पर कुछ लोग ऐसे थे जिनका लहू उबाल खाता था
लोग भूल ही ना जाए कि

खून का भी क्वथनांक होता है
पानी और दूसरे तरल पदार्थो की तरह

सुविधा

यह सुविधा सिर्फ इंसान को हासिल है
जिसके चलते वह अपने भीतर नफरत के कीटाणु समेटे कर
मंदिर में माथा टेक कर
आस्थावान बना रह सकता है
बहन को राखी बाँध
बन सकता है स्नेहिल भाई
बच्चों के सिर पर वात्सल्य से हाथ फेर कर
श्रेष्ठ पारिवारिक की उपाधि पा जाता है
खूबसूरत समय को हिंसक पलों में तब्दील कर
दूसरे धर्म को सिरे से खारिज कर
बाशिंदों के खून का प्यासा हो सकता है

हिंसक उग्रवादी के रूप में आ कर
दोहरा सकता है वह
सांप्रदायिक वैमनस्य के गगनभेदी नारे

इंसान से जानवर में तब्दील होने इस सुविधा को अपनाने के बाद
उस समय जब सड़कों में बह रहा होता है
उसके बचपन के दोस्त सलीम, उस्मान का लहू
उसके उपद्रवी सहोदर
कर रहे होते है घरों में लूटपाट
वह हररोज़ की तरह घर आकर बिना किसी हिचक के
बोल उठता है ‘शांता खाना लाओ जोर से भूख लगी है’
ठीक उस दिन के बाद वह अपनी आत्मा को अपने जिस्म पर ढ़ोने लगता है
जाहिर है तब तक उसे प्रकृति द्वारा उसके भीतर रोपी गई इस सुविधा के बारे में पता नहीं था कि
अब वह
जीते जी मृत होने की सुविधा प्राप्त कर लेना
और ढोएगा अपनी ही आत्मा को
अपने झुक चुके कंधो पर ताउम्र

यही सच है उसके जीवन का

बचपन में वह अपनी तोतली जुबान से कहता था
“तुम मुझे थून दो, मैं तुम्हे आदादी दूंगा”

कुछ बड़ा हुआ तो वह वह नाना पाटेकर का प्रसिद्ध जुमला दोहराता
“बता कौनसा खून
हिन्दू का है
कौनसा
मुसलमान का
जब बनाने वाले ने फर्क नहीं किया
तो तू कौन है इसमें फर्क करने वाला ”

जवानी में अपनी फड़कती भुजाओं और मूछों पर ताव देते हुए
सड़क के बीचों बीच आ कर कहने लगा वह
“जिनको मेरे धर्म में आस्था नहीं है वे उस दूसरी पंक्ति में खड़े हो जाओ ”

अब वह बुड्ढा हो गया है
ठहर गया है उसकी धमनियों में शोर मचाता हुआ लहू
अब वह बिलकुल अकेला है
और बेहद उदास भी

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