षोडशी की षोडशोपचार उपासना २

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कल आपने हिंदी के प्रतिभाशाली युवा साहित्यकार अम्बर पांडेय के लिखे जा रहे धारावाहिक उपन्यास माँमुनि का एक अंश षोडशी की षोडशोपचार उपासना १  पढ़ा. इसी क्रम में आज प्रस्तुत है अगला अंश.

अम्बर पाण्डेय/

फुलौरी की थाली हाथ में पकड़े ठाकुर सबके मुख में फुलौरी धरते घूम रहे थे। योगेश्वरी ब्राह्मणी कोने में बैठी दीये बना रही थी। ह्रदयराम और लक्ष्मी दोनों कोई पोथी के लिए झगड़ा कर रहे थे। शारदा का सहोदर प्रसन्न हँस हँसकर दोनों को देख रहा था। लाहाज़मींदारों की बालविधवा बेटी प्रसन्नमयी और शारदा कढ़ाई से फुलौरियाँ उतार रही थी।

“ललना के लिए तो रसोईघर ही मन्दिर है। मछली बनाने से बढ़कर कोई साधना है क्या! अन्न सिद्ध करना ब्रह्म सिद्ध करने से कम नहीं” ठाकुर ने धुएँ से भरी फुलौरी मुख में डालते कहा।

“हाँ, हाँ ब्रह्मा जब संसार बाँट रहा था तो पुरुषों ने ब्रह्म ले लिया और अभागी अबलाओं के हाथों में अन्न आया” प्रसन्नमयी ने मधुर स्वर में किंचित कटु होकर कहा।

“प्रसन्नमयी, तुम्हारा सौभाग्य बचपन में नष्ट हो गया तो इसका अर्थ यह नहीं कि समस्त अबलाजाति अभागिन हो गई” हृदय ने लक्ष्मी से पोथी छीनकर कहा।

“बाल्यावस्था में विधवा होने के कारण प्रसन्नमयी ने पोथियाँ पढ़ पढ़कर अपनी विद्या नष्ट कर ली किन्तु प्रसन्नमयी, बता, क्या किसी को भरपेट भोजन करवाकर तृप्ति नहीं होती?” ठाकुर ने कहा और थाली से चटनी चाटने लगे।

“तृप्ति केवल स्त्री को ही क्यों, यदि किसी भूखे को भरपेट भोजन करवाए तो पुरुष को भी उतनी ही तृप्ति मिलेगी, यह कहे देती हूँ” प्रसन्नमयी को तर्क किए बिन शान्ति प्राप्त न होती थी।

“पुरुष की रसोई में वह रस कहाँ इसलिए तो अन्नपूर्णा माँ है भोलेनाथ नहीं। माँ से प्रतिदिन हाथ जोड़कर, पाँव पड़कर माँगता हूँ कि माँ मुझे स्त्री बना दे क्योंकि स्त्रियों को जो रागानुगा भक्ति सहज सिद्ध है वह पुरुष के बस की नहीं।

बचपन से ही मेरी साध थी कि बालविधवा का जीवन पाऊँ। ब्रह्ममुहूर्त में उठकर ठाकुरघर में झाड़ू दूं। गंगा से धोकर गोबर से लीपूँ। नैवेद्य में भाँत भाँत के मिष्ठान बनाऊँ” ठाकुर स्वगत भाषण करते रहे

बचपन से ही मेरी साध थी कि बालविधवा का जीवन पाऊँ। ब्रह्ममुहूर्त में उठकर ठाकुरघर में झाड़ू दूँ, गंगा से धोकर गोबर से लीपूँ। नैवेद्य में भाँत भाँत के मिष्ठान बनाऊँ” ठाकुर स्वगत भाषण करते रहे।

“स्वामी के बिना स्त्री मरणप्रायः” चुपचाप फुलौरी उतारती शारदा ने अन्तत: कहा।

“अनुभवहीन के स्वप्न बहुत निर्मल होते है, बड़दा और बालविधवा लौन, मछली, लाल पाड़ की साड़ी के स्वप्न देखती है” प्रसन्नमयी के नेत्र बरसने लगे। उसने आँचल से मुख ढँक लिया।

उसे देखकर ठाकुर भी रोने लगे। दूसरे जन मौन रहे। ब्राह्मणी ने दीये जलाते हुए कहा, “प्रसन्नमयी बिटिया, तेरा स्वामी जीवित भी होता तो कौन सा सुख देता! शय्या का सुख देता तो बदले में अपशब्द भी कहता। प्रतिदिन मछली पकाने को लाता तो अनुकूल न बनने पर गाल पर थप्पड़ भी लगाता, काशी से धूपछाँहवाली साड़ियाँ लाकर देता तो काशी की वेश्या की दुकान चढ़कर उतना ही अपमान भी करता। अरी, तू तो भली छूटी। रामनाम लेती है गुड़ खाकर सोती है”।

“रामनाम कहाँ लेती है प्रसन्नमयी। सब समय अभावों का दुःख मनाती है” हृदय को कड़ुवे वचन कहने में देर नहीं लगती थी।

“क्या प्रसन्नमयी ने कभी आकर तुमसे अपने अभावों का रोना रोया है, हृदूदा” लक्ष्मी बोली, हृदय के पुस्तक छिना लेने के कारण वह पहले से ही हृदय से रूष्ट थी।

लक्ष्मी के केश खींचते हृदय बोला, “चल भाग। नारी की बुद्धि उसकी चोटी में रहती है। कबसे तैल-कंघा नहीं डाला इस पुआल के ढेर में?”

“सही तो कहती है लक्ष्मी। प्रसन्नमयी ने कब किसी से अपना अभाव कहा। इतने बड़े घर की बेटी, जिसके घर सौ से कम व्यंजन नहीं बनते वह एक बेला भोजन करके सोती है” शारदा अब पूड़ियों का परातभर आटा गूँध रही थी।

“काली चिन्तन से सब अभाव भर जाते है” ठाकुर कहने लगे, “मैं माँ से हमेशा पूछता था कि मेरी प्रसन्नमयी के संग ऐसा क्यों किया रे माँ? माँ कभी उत्तर नहीं देती थी। एक बार दशमी तिथि को माँ के चरण पर माथा फोड़ने का निश्चय कर लिया तब माँ ने केश पकड़कर उठाया और कहने लगी, ‘रे ठाकुर, तू भी निरा बालक है, जानता नहीं क्या कि प्रसन्नमयी के स्वामी की आयु केवल तेरह वर्ष थी। सिंदूर मिटाकर तप करना क्या सबके भाग्य में होता है; यह तो बिरलों के भाग में आता है। तप है यह तप।” ठाकुर ने कहा और भीतर सोने चले गए। पूड़ी और शाक धरा का धरा रह गया। सभा तितरबितर हो गई। प्रसन्नमयी को यह स्वयं का दोष अनुभव हुआ। अकारण अपना प्रसंग ले बैठी।

प्रसन्नमयी जाने को उद्धत होने लगी तो शारदा ने रोक लिया, “खाए बिना न जाने दूँगी, दीदी।”

“मैं तो एक समय हविष्यान्न खाकर सो रहती हूँ। इतना गरिष्ठ भोज करके यह विधवा केवल भोग के स्वप्न देखेगी। तुम खाओ, तुम्हारी वय भोगने की है” प्रसन्नमयी ने शाक पूड़ी में लपेटकर लाड़ से शारदा के मुख में ठूँस दी।

कैसी कदम्ब के फूलों की अंतस जैसी गन्ध थी ठाकुर के शरीर की। लगता था अपने स्वामी से लगकर नहीं वरण पर्जन्यों की घटा के निकट सो रही है। दीपक लज्जा के कारण शारदा ने अब तक बुझाया न था किंतु घी घट जाने के कारण वह लुपझुप करता था

लक्ष्मी ने ठठोली में और प्रसन्नमयी ने बहुत विचारकर शारदा को ठाकुर के कक्ष में धकेल दिया। छोटे से स्थान में दीपक अब भी जल रहा था और ठाकुर खाट में औंधे सो रहे थे। बहुत अबेर तक शारदा दूर खड़ी रही। एक पाँव थक जाता तो दूसरे पर खड़ी हो जाती। दूसरा जब खड़े खड़े सो जाता तो पहले पर खड़ी हो जाती। दिवसभर की श्रांत जब शारदा खड़ी न रह सकी तो ठाकुर के निकट जाकर सो गई।

कैसी कदम्ब के फूलों की अंतस जैसी गन्ध थी ठाकुर के शरीर की। लगता था अपने स्वामी से लगकर नहीं वरण पर्जन्यों की घटा के निकट सो रही है। दीपक लज्जा के कारण शारदा ने अब तक बुझाया न था किंतु घी घट जाने के कारण वह लुपझुप करता था। ऊपर मोखे से शरद का नवशीतल पवन आ रहा था। दूर महोख बोल रहे थे।

अचानक ठाकुर खाट से उछलकर खड़े हो गए जैसे किसी प्रेत का स्पर्श उन्हें हो गया हो। उसका शरीर स्वेद से भर गया था। ललाट दिपदिपा रहा था। श्वास लेने में भी कष्ट था।

“नारियल के तैल की महक से मेरी कनपटियाँ टहकती है। शिरा शिरा फकड़ती है। मैं चटाई-चादर लेकर नीचे भूमि पर सो जाता हूँ। ठाकुर ने हाँफते हुए कहा और चटाई भूमि पर फैलाने लगे।

“मुझे पाप पड़ेगा जो आप भूमि पर सोए और मैं निर्लज्ज सी खटिया तोड़ती रही” शारदा ने ठाकुर के हाथ से चटाई ले ली और चादर ओढ़कर सोने लगी। दीपक बुझने के कारण कक्ष में अँधेरा हो गया।

“तेरा अपरूप रूप वरदान है, शारदा क्योंकि इससे कामना नहीं वैराग्य उपजता है। संयम से बड़ा धन नहीं” शारदा को ठाकुर का निष्कंप स्वर सुनाई दिया किन्तु कालीघाट की श्यामा की गोद में धरे ठाकुर के शीश के दर्शन अन्धकार में नहीं हुए।

“देखो तो महामाया की माया, कालीघाट की श्यामा भूमि पर पड़ी है और उसका निठल्ला पूत खाट तोड़ रहा है। माँ, तू सेवा करवाना नहीं जानती किंतु तेरा दुलारचन्द्र स्वयं को कष्ट देना अब तक भुला नहीं है” ठाकुर ने कहा किन्तु शारदा ने सुना नहीं। वह सो चुकी थी।

ठाकुर खाट से उठे और भूमि पर बिना चटाई-चादर और तकिए के सो गए

(क्रमशः जारी …)

1 COMMENT

  1. मैंने ठाकुर का कथामृत और माँ शारदा की कई सारी किताबें पढ़ी है…
    ठाकुर की दृष्टिकोण से पड़ता हूँ तो लगता है मास्टर जी को ही पढ़ रहा हूँ…
    और माँ की दृष्टिकोण से पड़ता हूँ तो लगता है…
    जैसे स्वामी गम्भीरानंद जी को ही पढ़ रहा हूँ…
    शानदार लेखनी अम्बर जी …
    बहुत बहुत धन्यवाद।

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