तय तो यही हुआ था

1

चन्दन पाण्डेय/

अंधापन धीरे धीरे आता है – इसका पता मुझे अचानक चला. शुरुआती पड़ताल के बाद डॉक्टर ने पानी की तरह हल्की अंग्रेजी में पूछा: आपके साथ कोई आया है? उसका चैंबर नीम रौशनी में था. कहा: कोई नहीं. बीमारी आपको मुझे ही बतानी पड़ेगी. बीमारी का नाम तो जेहन में नहीं टिका लेकिन उसने बताया कि देखने की अपनी क्षमता का सत्तर से अस्सी प्रतिशत खो चुका हूँ.

तकरीबन डेढ़ दो साल से आँखों की रौशनी सिकुड़ रही थी और ये मैं जानता था. पर यह जानकारी रोग के शक्ल में नहीं थी. हर तरह की मुश्किलों को अपनी ही कोई कमजोरी मानने की आदत ने इस मुश्किल को रोग लगने ही नहीं दिया और इस कमजोरी के अनुरूप खुद को ढालना शुरू कर दिया था.

मुझे लगा था, जैसे जीवन से लोग जाते हैं, जीवन से जीवन जाता है उसी तरह आँखों से रौशनी जाने लगती है.टालता रहा. कभी यह ख्याल ही नहीं आया कि लापरवाही से जीवन से रौशनी भी जा सकती है. विज्ञान में गले तक डूबी हुई इस दुनिया में भरोसा था कि किसी भले दिन आँखों के डॉक्टर के पास जाऊँगा, वो अपने अस्पताल की तरह खूबसूरत हिदायतें देगा, आँखों में दो बूँद दवा रख कर चलता करेगा.

डॉक्टर ने बताया, दुनिया भर के वैज्ञानिक इस रोग के इलाज की खोज में लगे हुए हैं तो मुझे ताज्जुब हुआ. साल – डेढ़ साल पहले जब सब कुछ धुँधला दिखना शुरु हुआ उस वक्त भी अगर आगाह हो जाता तो यह नौबत शायद न आती- यह डॉक्टर से सुनना चाहता था. वो स्थिति समझ रहा होगा इसलिए कमरा छोड़ने के लिए नहीं कहा.

ज़रा देर रुक कर डॉक्टर के साथ दो कर्मचारी आए. एक ने सारे कागज समेटे और यों थमाया जैसे उपहार दे रहा हो. दूसरे ने छड़ी थमाई. स्टील की यह छड़ी छूते ही मैं मायूस पड़ गया. दो एक पल बीते होंगे, खुद को तमाशे से अलग किया और भरोसे वाली आवाज में कहा, अभी इसकी कोई जरूरत नहीं. जबकि सच्चाई जो थी डॉक्टर ने पहले ही बता दिया था, जाँच के अगले कई घंटों तक देखने में परेशानी होगी.

ऐसा दो-एक साल पहले से हो रहा था कि निगाह अब बाहरी रौशनी के सहारे ही टिक पाती थी. शाम ढलते न ढलते दिखना बन्द हो जाता. मैं अनुमान से पैर बढ़ाता, रास्ते मुड़ता. कुछ दिखता भी तो बस पुतलियों के सीध में ही दिखता था. बारीक. इंसान दशमलव और सड़कें टूटे तारे के पीछे बच गई लकीर की तरह दिखती थीं. मोड़ हर दम जिन्दगी में अचानक आते रहे थे पर अबशाम या रात के समय मोड़ भय पैदा करते हुए आने लगे थे.

यहाँ रुक कर अपनी निगाहों की दिशा बदलनी होती थी. अगर दायीं या बाईं ओर से बहती हवा महसूस हो तो जान लेता था कि यहाँ मोड़ है. ठहर कर मैं अपनी स्मृति के भरोसे यह तय करता कि यहाँ मुड़ना है या नहीं. इसे रियाज से साध पाया था. हाँ, यह जरूर था कि रास्ते में आई अन्यान्य मुश्किलों पर मेरे हाथ स्वत: उठ जाते जैसे उन्हें थाम कर कोई मुझे रास्ता पार करा देगा या कम से कम उन्हें अपने हाथों में लेकर तसल्ली देगा.

मैंने एहतियात बरतना शुरू कर दिया था. रातों में निकलने से बचता था. चलते हुए रौशनी की छाँव में ही चलता था. दृष्टि का दायरा संकुचित होता जा रहा था. प्रकाश की अनुपस्थिति में आखें अभ्यस्त से अनभ्यस्त होती जा रही थीं. अनुमान सही नहीं पड़ते थे.यह तो बाज मर्तबा हुआ होगा कि पैर ऊपर नीचे पड़ गए और मोच की हद तक चोट पहुँची. एड़ी, चनक कर, घायल हो जाती थी.

अस्पताल से लौटते हुए अंधे हो जाने के भय की स्मृति से भी सिहरन होती है. गाडी नहीं चलाना डॉक्टर की सख्त हिदायतों में से एक थी. हर एक दृश्य को आख़िरी बार देखे जा रहे दृश्य में बदलता महसूस किया. कार की चाभी, रिसेप्शन पर बैठी स्त्री, दरवाजे, सब जैसे आख़िरी बार दिख रहे थे. यहाँ तक कि अन्धेरा भी आख़िरी बार ही दिख रहा था.

अगले कुछ दिनों में अपने सारे कागजात दुरुस्त किया. बैंक, बीमा और ट्रेडिंग खातों में पत्नी का नाम जुड़वाने में ही चारेक दिन निकल गए. इन कागजातों को जब उसे कूरियर कर रहा था तो एक ख्याल आया, क्यों न पत्र के किसी किनारे में, पुनश्च के भागते अंदाज में, बेटी का हाल पूछ लूँ. लिखना शुरू किया लेकिन रोक लिया. बेटी का नाम लिख चुका था. काट-कूट करना नामुनासिब लगता. बेवजह के अनुमानों को जन्म देता. इसलिए नाम मिटाने के लिए व्हाइटनर का इस्तेमाल किया.

पुराने कागजों की पड़ताल में उसके कुछ पत्र और कार्ड्स मिले थे. मैं उन्हें भी वापस पठाना चाहता था लेकिन नहीं भेजा. यह एक चूक साबित हो सकती थी. पत्नी को लगता, बहाने से मैंने उसे कुछ याद दिलाना चाहा है. उन पत्रों को बाकी कई पत्रों के साथ नष्ट कर दिया. जैसे फूलों की बारिश होती है ठीक उसी अंदाज में उस दिन माज़ी मेहरबान हुआ था.

वो कुछ, पता नहीं कैसे बचे रह गए, पत्र थे. अधिकतर से जुडी याद्दाश्त तक मिट चुकी थी. कईयों को उलट पलट कर देखा. उनमें बसी तहरीर भी पहचान से बाहर हो रही थी. लिपि से कोई चेहरा रच पाने में मैं असफल था. उन पत्रों को पढ़ते हुए लग रहा था, कोई अपराध कर रहा हूँ. किसी दूसरे का तीसरे को लिखा पत्र चोरी छिपे पढ़ रहा हूँ.

उन पत्रों को पढ़ते हुए लग रहा था, कोई अपराध कर रहा हूँ. किसी दूसरे का तीसरे को लिखा पत्र चोरी छिपे पढ़ रहा हूँ.

इसी जखीरे में एक बंद लिफ़ाफ़ा मिला था. पत्र पढ़ते हुए मैं इसी हैरत में था कि क्या मैं इस दर्जे का आदमी रहा हूँ जो अपने लिए आए लिफ़ाफ़े भी नहीं खोला करता था. मौसम का पत्र था. दर्ज घटनाएं बेतरतीब तथा गैरपर घटी हुई लग रहीं थी. पिछले कुछ वर्षों से मौसम मेरे जेहन पर लगातार छाई रहने लगी थी लेकिन यह पत्र मुझे याद नहीं आ रहा था.

यह भी जान पाना मुश्किल था कि इसे लिखा कब और क्यों गया था. आश्चर्य कि जिस वाकये की सर्वाधिक चमकीली स्मृति मेरे तईं थी, जिसका भय मुझे किसी अपराध की तरह सताता था जिसमें हम पुलिस के हत्थे चढ़ा दिए गए थे, उसका जिक्र इशारों में भी नहीं था. लेकिन जो था, वह मुझे उस आईने की मानिंद दिख रहा था जिसमें मैं खुद को एक लौ की तरह देख पा रहा था.

उन्हीं दिनों यह भी तय किया कि जितनी संभव है दुनिया, उतनी देख लूं. लोगों से मिल भी लूँ. मिलने के नाम पर मुझे मौसम ही याद आई थी. अनेक अंतहीन वर्षों के बाद याद आई थी. यह आश्चर्य था क्योंकि जिन दिनों वो मेरे जीवन से जुडी थी उस समय भी कभी उपस्थित नहीं रही. यह भी जीवन का कोई हुनर है कि जिन-जिन से प्रेम में पड़कर मशहूर हुआ वो याद भी कम आते हैं. न के बराबर.

 

 

पनवाड़ी की गुमटी में दाहिनी तरफ सुलग रही सुतली बंधी थी.सिगरेट लेते हुए तो नहीं अलबत्ता सुलगाते हुए मन हुआ कि काश, दुकान मालिक मुझे पहचान जाए. अपने इस बेबाक ख्याल पर हँसी आई. मैं ही कौन सा उसे पहचान रहा था. आई टी ओ मेट्रो के इस दुकान को लेकर स्मृति इस कदर धुंधली हो चुकी थी कि जो कोई भी दुकान के भीतर होता, पहचाना पहचाना सा ही लगता.

दुकान के भीतर एफ.एम. पर बज रहा था: एक रात होकर निडर/मुझे जीने दो. आवाज तो हेमन्त कुमार की ही थी लेकिन खुद को आवाज पहचानने की कोशिश करता हुआ पाया. लगा कि इस गाने के मार्फत अधूरे अपने अतीत का कोई एक हिस्सा दुबारा महसूस करना चाहता हूँ. तीन-चार कश के बाद भी जब सिर्फ हेमंत कुमार का नाम ही मन में घूमता रहा तो याद करने की कोशिश छोड़ दी और गाना सुनने लगा.

दुकानदार के बालों में सफेदी कम थी. अपनी ही उम्र का लगा. बूढ़े होते जाने को धकेलता हुआ. आखिरी कश का लंबा दम भरा और उससे पूछा, आस पास टॉर्च वगैरह की कोई दुकान है क्या? पूछ कर सिर ऊपर कर लिया. कभी कभी धुएँ के अपने बनाए छल्ले बेहद खूबसूरत लगते हैं. दुकान से बाहर झाँकते हुए चौराहे से आगे तीन चार दुकानों की तरफ इशारा किया. उसका जवाब छल्लों में घुल रहा था. विदा के अंदाज में अपने हाथ को जरा ऊँचा कर उसे धन्यवाद दिया.

सवा बजने में अभी वक्त था. घुटनों का ख्याल आया लेकिन स्मृतियों का हमला इस कदर जंच रहा था कि रुके हुए ऑटो को जाने दिया और सी.पी. तक पैदल चल पड़ा. दोपहर थी लेकिन बादल थे. कहीं कुछ बदला हो, ऐसा लग नहीं रहा था. चारदीवारियों पर चिपकी हुई तस्वीरें, फेंके पंवारे हुए सामान, गाड़ियाँ, यहाँ तक कि एक एक ईंट अपनी ही बीती हुई उम्र लग रही थी.

पैदल चलते हुए ख्याल आया कि उस गाने के बहाने मैं हाईस्कूल के दौरान भूगोल के अपने शिक्षक को याद कर रहा था. उनका एक पैर छोटा था और वो स्कूल में हर महीने की आखिरी सभा में हेमन्त कुमार के गाने गाते थे. लग रहा था कि बचपन की इस घटना को गुजरे एक पल भी नहीं हुआ और उनके सामने बैठा हूँ. उनके सामने बैठा हूँ और वो गा रहे हैं.वो गा रहे हैं और प्रियंवदा आ कर मेरे बाजू में बैठ गई है.

आसमानी रंग के स्कर्ट को दोनों हाथों से दबाते हुए वो घुटनों को सलीके से मोड़ कर बैठ रही है, पिछले पैंतीस-छत्तीस वर्षों से उसे बैठते हुए ही देख पाता हूँ. आज, इस भागती सड़क पर, भी वो हू-ब-हू वैसे ही दिख रही है.

भला हो आँखों की जाती हुई रौशनी का जिसने मुझे खामखयालीसे भर दिया. मैंने रुक कर तसल्ली कर ली कि कहीं वो सचमुच तो साथ नहीं चल रही. यह वहम था और उस शानदार बचपन में प्रियंवदा के साथ चलने का मौका तो कभी आया ही नहीं शायद. तो फिर ख्याल किसका आ रहा है? जिन जिन के जीवन में मैंने अपने लिए प्रेम तलाशा वो मुझे याद नहीं आते. याद आती भी है तो एक के चेहरे पर दूसरे के लिए मेरी निस्सीम इच्छाओं का हुजूम बिछलता हुआ आता है.

नौवीं कक्षा के दौरान मिली विशी के ख्याल से भी मन उमग जाता है. उसके साथ तो स्मृतियाँ भी न्यूनतम है, सिवाय इसके कि मैं उसके इर्दगिर्द बहाने से चक्कर लगाता रहता था. उसे अपनी साईकिल पर बिठाने का एक मौका मिला था पर पूरे रास्ते उससे कुछ बोल नहीं पाया. विशी की स्मृति किसी दुःख या अपराधबोध से लद कर नहीं आती. अब तो वो सारी घटनाएँ किसी दूसरे के जीवन से सटी हुई लगती हैं. आग, प्रेम, पहिया और अक्षरों के बाद यह पृथ्वी जिस आविष्कार का अनुभव चाहती है वह अपने प्रियजनों को अपनी ही स्मृति में बड़ा होते हुए देखना है.

इतना जरूर याद है कि बाद के जीवन में मौसम का सुंदर नाम पुकारने में जब अटपटा लगने लगा तब उसे मैंने मिसी का पुकार नाम दे दिया था. उसे अच्छा लगा था. यह मुझे याद है, उसे अच्छा लगा था. वो इसलिए याद है क्योंकि लो-फ्लोर बसें उन दिनों दिल्ली में नई नई आईं थी और उनमें चलते हुए उसे मिसी पुकारा था. उसने मेरे कंधे से अपना कंधा सटा लिया था.

वो खुश होना चाहती थी. खुश होकर मुझसे लिपट जाया करती थी-पहले पहल तो प्रेम में गुम होकर, फिर मुझे खो देने के भय के कारण, यह अब सोच पाता हूँ. उन दिनों वो निरी नौटँकी लगती थी. याद है, उसकी इस हरकत के लिए झिलमिल या द्वारिका मेट्रो स्टेशन पर ज़रा जोर से डांटा था. जगह ठीक ठीक याद नहीं. तब से वो जब खुश होती थी या मुझसे जुदा हो रही होती थी तो अपना कंधा मेरे कंधे से छू भर लेती थी. मुझे याद है, गुस्सा मुझे इस हरकत पर भी आता था. बाद के दिनों में तो खैर उसके ख्याल भर से रोष किया करता था.

जिन दुकानों को पनवाड़ी ने दिखाया था, वहाँ टॉर्च उपलब्ध नहीं थे. सोचा, मौसम को एस.एम.एस. डाल दूँ, आते हुए टॉर्च लेती आना.लेकिन बीते कल जो संदेश मैंने उसे भेजा था, उसका कोई जवाब नहीं आया था. रात में तीन-चार दफा मोबाइल स्क्रीन देखा. सोने जाने से पहले स्क्रीन देखते हुए ख्याल आया कि यह संदेश भेजना ही नहीं चाहिए था: ‘कल की मुलाकात के लिए बेचैनी आज ही हो रही है.‘

यह खासी खराब बात थी लेकिन इसका इलहाम लिख भेजने के बाद हुआ. मुलाकातों के सिलसिले में खुद की उद्विग्नता, अनिश्चितता आदि को सामने वाले पर जाहिर करना बाज मर्तबा उस पर बढ़त लेने की कवायद होती है. किन्तु कभी कभी यह भी हो जाता है कि सामने वाले की अनिच्छा, अगर है तो, बढ़ जाती है. मुलाकात की अनिच्छा.

बीते दिनों में कुछेक दफे यह ख्याल आया कि क्या ये मुलाक़ात मैं सच में चाहता हूँ? या नहीं? मौसम को देखना चाहता हूँ भी या नहीं? और क्यों? ये तो मैं सच में नहीं समझ पाया कि क्यों ? इतने प्रेम मैंने किये लेकिन मौसम की स्मृति मुझे हैरत में डाल देती है. उससे तो प्रेम, शायद, किया भी नहीं था.लेकिन मुझे टॉर्च चाहिए था. अँधेरे का एक टुकडा भी बिना कृत्रिम रौशनी के सहारे पार नहीं कर पाता. फिर भी मैंने सन्देश नहीं भेजने का निर्णय लिया.

फोन बजा. मिसी थी: कहाँ तक? मैं: ‘परिक्रमा’ पहुँचने में अभी बीस मिनट लगेंगे. मिसी: पैदल हो क्या? फिर वो ठहरी, उसे लगा हो शायद उसके जवाब में मैं आईटीओ से सी.पी. तक पैदल आने का जिक्र करूंगा, जो हम दोनों अपने खुशरंग दिनों में किया करते थे.उसने पिछले वाक्य पर अगला वाक्य लादते हुए कहा: आओ.

तय समय से पहले पहुँचना नहीं भाया या इन्तजार करना, स्पष्ट नहीं था. पसीने में और थकान में झुंझलाहट की एक परत मुझ पर खुल रही थी कि मिसी या किसी से मिलना भी क्यों चाहता था? पिछले दो चार दिनों से यह ख्याल चढ़ बैठता था कि अंधेपन का स्वागत मैंने किसी भगोड़े की तरह किया है. दुनिया देख लेना, लोगों से मिल लेना, गाँव-घर देख लेना..यह सब तय करना जिस किसी अनबूझे भय से उपजा था, वो भय अब क्षीण हो रहा था.

अंतरिक्ष भवन के बाहर वाली सीढ़ियों पर बैठा था. अक्तूबर का यह दिन इतना सुन्दर था कि जैसे मुलाक़ात के लिए आदेश देकर रचा गया हो. आते जाते हुए जोड़े अपनी ही किसी स्मृति की परछाईं लग रहे थे. यहाँ से बाएं मुड़ते ही कैफे कॉफ़ी डे है, वहाँ जाकर अपनी ये परछाईयाँ कुर्सियों पर धंस जायेंगी. कुछ छायाएं उठकर अलग राह पकड़ लेंगी. अब तो यह भी नहीं मालूम सी.सी.डी वहाँ है भी या नहीं. या यह कि क्या अब भी वहाँ आईरिश कॉफ़ी मिलती है?

ठीक सामने एक गाडी रुकी. उसके रुकने और दरवाजा खुलने के बीच जो वक्फा था, उस बीच खिड़की से एक स्त्री मुस्कुराती हुई दिखी. कसम से, एकबारगी लगा मौसम है. मैं अचकचा गया. यह जरुर था कि मिलना तय हुआ था लेकिन मिलने के पहले कदम पर, यानी एक दूसरे को पहली मर्तबा देखते हुए, इतने वर्षों में पहली मर्तबा देखते हुए, अपने बीच के सारे रिश्ते मिटा चुकने के बाद मिलते-देखते हुए, अतीत के बेताल को मन-मस्तिष्क पर लादे मिलते हुए, उसका अभिवादन कैसे करना होगा, निगाह ही कैसे मिलानी होगी, इस बाबत तो सोचा भी नहीं था.

मौसम ही थी.

मेरे सामने खड़ी थी. मैं गले न लगाता तो क्या करता. लेकिन नहीं, गले नहीं लगाया. बैठा रहा. मुस्कुराया. पहले वो भी मुस्कुराई फिर किंचित चकित दिखी. उसने पूछा, चलें? मैंने उठते हुए एहतियातन उसकी तरफ हाथ नहीं बढाया.

‘चलें!’ इस एक शब्द ने पूरा अतीत किनारे लगा दिया. उसके साथ कदम –दर-कदम चलना, जो कभी उसी का स्वप्न था, आज अच्छा लग रहा था. हमारे बीच की दूरी उतनी ही थी जितनी चुप्पियाँ ताने हुए लोगों के बीच होती है. हर कदम दो भिन्न समयों में पड़ रहे थे. एक अतीत में और दूसरा अतीत-मोह वाले इस समय में, जहाँ मैं न मालूम क्यों खुद को गुनहगार माने चल रहा था.

हर कदम दो भिन्न समयों में पड़ रहे थे. एक अतीत में और दूसरा अतीत-मोह वाले इस समय में

लिफ्टमें एक ज़रा मुश्किल आई. हम दोनों निपट अकेले थे. पच्चीसवीं मंजिल तक का अंतहीन सफ़र इतने सुनसान में बिताना गजब ही लग रहा था. उसने सुनसान को परे धकेलने के लिए पूछा: ‘और?’ हम दोनों ही हँसें. चारो तरफ मौजूद आदमकद आईनों में वो उतर चुकी थी, जैसे रौशनी दीवारों पर उतरती है. अखरोट के रंग की सोनाझुरीकांथा साड़ी थी जिस पर राम-सीता-लक्ष्मण के वनवास की चित्र कथा थी. मारीचवध का चित्र दिख रहा था लेकिन आगे की कथा चुन्नट में उलझ गयी होगी. धूसर रंग वाले ब्लाऊज के कॉलर पर उसके बाल झूल रहे थे. उसने फिर तनिक जोर देकर कहा, ‘और बताओ ?’ मैं कहता, ‘क्या?’ लेकिन तब तक लिफ्ट रुक चुकी थी.

जब बैठ गए और मीनू कार्ड हाथ में ले लिया तब हमें ‘परिक्रमा’ की परिक्रमा महसूस हुई. धीरे-धीरे. जहाँ हम बैठे उस जगह से अभी सी.पी. का अंदरुनी हिस्सा दिख रहा था. सी.पी. को मौसम अपना दूसरा घर कहा करती थी, यह बात मुझे अचानक याद आई और इस कदर अचानक याद आई कि उससे पूछ लिया, अब भी सी.पी. को दूसरा ही घर कहती हो? उसने मीनू से निगाह हटाई. मेरी तरफ यों देखा जैसे रास्ता पूछते किसी अजनबी को देखते हैं. ‘ठहर कर सोचते हुए और फिर कुछ याद आते हुए’ देखना. कहा, अब इधर कम आना जाना होता है, वैसे बीच में कुछेक साल तक दफ्तर इसी इलाके में रहा.

‘दफ्तर?’

‘हाँ जी.फोर्टिस में ब्रांड लीड करती हूँ.’

‘वाह!’

‘शुक्रिया’

इस शुक्रिया के लिए मैंने न जाने कितनी बार शुक्रिया अदा किया. मन ही मन किया. तो क्या आपके कलाम आपका साथ नहीं छोड़ते? इस शब्द के बोलने से ही कितने बाँध टूट रहे थे. वह जो हमारे बीच का असीम अबोला था, भरभरा रहा था.

मीनू बंद करते हुए मौसम ने बैरे से कहा, खस का शरबत. फिर मेरी तरफ देखते हुए पूछा, खस का शरबत?

पूछना चाहता था कि इतने वर्षों तक याद क्यों नहीं किया? लेकिनपूछ  नहीं सकता था. इसलिए पूछा, रिहाईश कहाँ है?

वो प्रश्न समझ नहीं पाई. अच्छा ही हुआ. कहा, तुम तो घर आया जाया करते थे? पापा नहीं रहे. तीनों भाई स्टेट्स में बस गए हैं.

वो सही कह रही थी.

अपने घर ले जाया करती थी. जाना मुझे पसंद नहीं था लेकिन जाना पड़ता था. ये लोग रेवाड़ी के राव थे. उनकुछ भाग्यशाली लोगों में से जिन्होंने जबरिया बिकी जमीन के पैसे का सदुपयोग किया था. इस परिवार को देख कर लगता था कि पैसे से जो विनम्रता जाती है, वो पूरी तरह गई नहीं थी. पैसे को बचाने के लिए जो न्यूनतम आवश्यक क्रूर निस्संगता चाहिए थी वो इस परिवार में अभी आनी थी.

पहली घूँट की एक छोटी बूँद उसके होंठों पर थिर गई थी और फैलना चाहती थी. मौसम ने ऐसा होने नहीं दिया. हम दोनों ही औपचारिकता का यह अवांछित दरवाजा खोल नहीं पा रहे थे. अतीत का भारी भरकम पैर हमारी जुबान पर पड़ रहा था. जो विडंबना खुद मुझे ही घेरे थी, मैं उसकी कल्पना भी नहीं कर पा रहा था: जिनमें कभी प्रेम रहा हो कभी वो बतौर अज़नबी मुखातिब होंगे. मैं बारम्बार खुद को यह समझाइश देता था कि किसी स्मृति बोध को बगलगीर रखकर मिलने से, मुलाकात भारी पड़ जाएगी. यों भी अपराधबोधों में आकंठ डूबा रहा हूँ और मेरे जीवन का कोई लेखाचित्र बनाए तो ये बोध अखंड लेखाचित्र की तरह दिखेंगे. लेकिन मौसम भी तो चुप थी, वही कुछ कहती.

वजन उस पर फब रहा था. चेहरे को एक जरा बदलाव भी वजन ने दिया था. मैं ठीक ठीक याद नहीं कर पा रहा था कि अपनी शुरुआती निर्भार मुलाकातों में मौसम दिखती कैसी थी? उसका आकर्षण याद है, उसकी नफ़ासत याद है; आधा आकर्षण तो उसके हिज्जों में ही था. किसी भी शब्द को उच्चारित करते हुए अपने समूचे व्यक्तित्व में वो दिल्ली की बेहतरीन अदाओं की नुमाइंदा लगती थी. उम्र दिख रही थी मगर परछाईं की तरह दिख रही थी. कभी, किसी ख़ास पल में जब वो कुछ बोलने पर आ रही थी तो भंगिमाओं से पता पड़ जा रहा था कि हम हमउम्र हैं.

रेस्तरां घूमते हुए उस दिशा में आ पहुंचा था जहाँ से दिल्ली जंगल में फंसीं किसी आवाज की तरह दिख रही थी. मेरे देखने को मौसम देख रही थी. कहा: कैंटोनमेंट.अतीत उस सरसराहट की तरह सुनाई दे रहा था जो झाड़ियों में गुमगई गेंद को खोजते हुए सुनाई देती है. झिझक मेरी स्मृतियों को कल्पना बनाये दे रही थी. आरोपित कल्पना. अक्सर हम बस से कैंट की तरफ जाते थे. हमारी समूची तलाश एकांत की रहा करती थी.

भारीभरकम मौन को मौसम ने ही झिड़का, ‘तुम तो गायब ही हो गए? कैसा रहा जीवन? बताओ कुछ?’ लगे हाथ यह भी पूछ लिया, ‘मिलने का यह कार्यक्रम कैसे बना लिया’. खुद ही कहने लगी, ‘सच बताऊँ तो मिलने का मन नहीं था. तुमसे बात हुई तो ये नहीं जान पाई थी कि तुम मिलने चले ही आओगे, इसलिए हामी भर दी थी. लेकिन उसके बाद मन बार बार जवाब दे जा रहा था.’

मौसम के एकालाप ने जी डरा दिया.

‘बता दिया होता’

‘क्या’

‘यही कि नहीं मिलना’

‘अच्छा’. अच्छा के अक्षर ‘छ’ पर उसने जोर दिया था. उसके भीने अंदाज से लगा कि मैंने नाराज़गी जताते हुए यह कहा है. यह मेरा पहले का अंदाज रहा होगा. मैंने उससे सच ही कहा था कि बता दिया होता तो मिलना मुल्तवी कर सकते थे. तो क्या मौसम अब भी मुझमें उसी देवेन्द्र शर्मा के अंदाज ढूंढ रही है.

मैं खुद भी कहाँ जानता था. लेकिन नहीं जानना तो एक बात है पर क्या ऐसा भी हो सकता था कि हम जीवन में कभी दुबारा मिलते ही नहीं? ये तो ख्याल तब भी नहीं आया था जब मैं मौसम से अलग हो रहा था. यह तारीखी सच है किन्तु आपराधिक सच भी है, आपराधिक कहते हुए अनजाना कोई भय मेरे भीतर उतर रहा है क्योंकि वो सारे पल जो मौसम के साथ गुजारे होंगे सब अनायास ही मेज पर खुल रहे थे, जिसे मैं ही मैं जानता हूँ क्योंकि मौसम मेरी एक पुकार पर हाजिर रहती थी. एकसन्देश, एक मेल, एक फोन: थोड़ी उदासी, थोड़ा गुस्सा, थोड़ा(मेरा) स्वार्थ और मौसम हाजिर. इसलिए जब इसने आखिरी बार मिलने से मना किया तो मुझे गुस्सा कम आया, आश्चर्य अधिक हुआ था. और फिर ताउम्र, जब तक मौसम स्मृति की लकीर जैसी धुंधली होकर मिट नहीं गयी तब तक, मुझे यही लगता रहा कि मैं कभी भी मौसम के पास जा सकता था.

उसके भीने अंदाज से लगा कि मैंने नाराज़गी जताते हुए यह कहा है. यह मेरा पहले का अंदाज रहा होगा.

हमदोनों मिलने की आदर्श स्थिति में मिले थे. कोई पूर्व परिचय नहीं, कोई साझा कोई मित्रता नहीं. उन दिनों की शाम दिल्ली मेट्रो में गुजरती थी. मैं जो जाहिर प्रेम कर रहा था, जाहिर इसलिए कि जिसे दोस्त मित्र जानते थे, घर वाले जानते थे, उसके दोस्त मित्र जानते थे और कितना कम उसको मैं जानता था कि अब उसका नाम भी याद नहीं आ रहा, तो जिस घोषित प्रेम में था उससे सम्बन्ध टूटने के दिन चल रहे थे.

उस स्त्री ने अलग होने का मन बना लिया था. इस एक निर्णय के बाद हमारी स्थिति उन समुद्री लहरों की हो गयी थी जो किनारे तक आती ही दम तोड़ने के लिए हैं. हम मिलते. तपाक से मिलते, जैसे हम दोनों एकदूसरे के कितने बड़े पूरक हों और अच्छा खासा समय बिताने के बाद, बात मोड़ते तोड़ते मैं उस जगह ले आता, जहाँ से अगला प्रश्न होता या सुझाव होता कि प्लीज, मेरे साथ रहो.

वो रोज ही नए सिरे से इनकार करती थी. वजहें वही थीं जो बाद में मैंने मौसम को दी लेकिन उसके पास सीधे सपाट एक ‘ना’ भी हुआ करता था.बाज दफा तो रोने लगती थी जब उससे अपनी नजदीकियाँ याद दिलाता. ऐसे किसी रोने वाले दिन हम दिन रहते ही विदा हुए. मेट्रो लेकर अपने मित्र के घर लौट रहा था. उसी मेट्रो में वो दिखी थी: मौसम.

अधिकतर प्रेम संबंधों में परिचय, रिश्तों और उम्मीदों का बोझ शुरू से ही इतना अधिक रहा करता था कि वो सारे सम्बन्ध प्रेम के बजाय कुछ और ही बनते गए. जीवन की धूप ज्यों ज्यों आप पर बढ़ती जाती है आपका अकेलापन पारदर्शी होता जाता है. इतना कि खुद आप ही अपने आप को दिखने लगते हैं. मौसम हर लिहाज से प्रेम बन कर आई थी. परिचय के बाद ही, बिना कहे, बिना जाने, हम प्रेमवत थे.

अब इस ख्याल से भी तबीयत बचना चाहती है लेकिन उस समय अपनी हैसियत मुझे ठीक लगने लगी थी. मैं सुख और दुःख दोनों को एक साथ जी रहा था. उन दिनों आगरा में नौकरी कर रहा था और हफ्ते में दो तीन दिन के लिए दिल्ली पहुँच जाया करता था. दिन में मौसम का पहलू, संग-साथ घूमना- घूमने में भी प्रेम, मेट्रो की आवारागर्दी में दिल्ली की सैर और वहाँ भी प्रेम, मेट्रो में हम अच्छा खासा समय गुजार देते थे.

दिल्ली मेरी उसकी ही निगाह से देखी हुई थी, पैदलपैदल चलते जाना और उस चलने में भी प्रेम, सिनेमा और सिनेमा में भी प्रेम – हमारे पास जगहें इतनी कम थी और पैसे तो थे नहीं कि हम जगह खोजें इसलिए एक ही फिल्म लगातार तीन तीन दिन देखने जाते, दोस्तोंका कमरा और वहाँ भी प्रेम. दिन में मौसम का साथ और शाम उस स्त्री के दायरे में गुजरती थी, जिससे जीवन भर के संग साथ के मनुहार करता था. उसके इस वाक्य के लिए परेशान, मरा-मरा फिरता था कि वो कह दे, मुझसे प्रेम करती हो.

मौसम से तूफानी मुलाकातों के पहले दिल्ली के लगातार प्रवास में ठहरने के लिए अमूमन उन दोस्तों के पास जाया करता था जिनके करीब मैं रहना चाहता था, जो किसी न किसी क्षेत्र में आदर्श दिखते थे, ये वही लोग थे जो दुनिया-जगत में मेरे जाहिर प्रेम के बारे में जानते थे, हाँ, उसका टूटना नहीं जानते थे.

जब से मौसम का साथ मिला था मैं उन दोस्तों के यहाँ जाने लगा जो मुझे कम जानते थे. उन्हें मुझे देख कर खुशी होती थी. ऐसे दोस्त कम थे जो मेरे घोषित प्रेम को न जानते हों. लेकिन इन्हीं दोस्तों के यहाँ मैं मौसम के साथ आ सकता था. शुरूआत में झेंप हावी रहती थी. किसी भी शहर में, जहां आपके पास अपना घर न हो, रूहानी प्रेम ही प्रेम का दर्जा पाता है. हमारी स्थिति अलग थी. ‘रूह’ की लोकप्रिय बदमाशियों तक तो अपने रिश्ते में हम तब आए जब मुझे इस रिश्ते से अलग होने की तलब लगी. या अब तक भी नहीं आए थे.

किसी भी शहर में, जहां आपके पास अपना घर न हो, रूहानी प्रेम ही प्रेम का दर्जा पाता है.

‘तुम्हें रौनक याद है’. सवाल मौसम से था लेकिन मैं खुद चकित हो गया. मुझे ही वो पंद्रह सत्रह वर्षों बाद याद आ रहा था. एकदम अचानक जैसे दांतों का दर्द कभी नहीं जाने के लिए आता है. लगा, मौसम को रौनक का ख्याल नहीं दिलाना चाहिए था.

‘याद रखने जैसा उसमें कुछ नहीं था और भूल भी चुकी थी लेकिन पाँचेक वर्ष पहले अस्पताल में मिल गया. उसके बेटे का इलाज चल रहा था. मेरे पास आया था’

‘तुमने मदद की?’

‘मदद की बात नहीं थी. उसे आश्वासन चाहिए था. उसे लगा होगा कि मेरे जरिए उसका यकीन इस इलाज पर पक्का हो जाएगा. हस्पताल में कोई परिचित मिल जाए तो मुझे भी ऐसा ही लगा करेगा. अलबत्ता उसे कॉर्पोरेट डिस्काउंट जरुर दिलवा दिया. अब भी कभी कभी फोन करता है. किसी कंपनी में क्लर्क लगा हुआ है’

इस बीच वो अपना फोन देखने लगी थी. लगा, रौनक का नंबर मुझे बतायेगी. मैंने भी अपना फोन देखा. देखते हुए याद आया कि फोन तो बंद पडा है. उसीने पूछा: ‘खाना ऑर्डर करें?’

मौसम वाले दिनों में रौनक भले मित्र की तरह याद आया था और जब हमारे बीच का पानी थिर गया तो भी कुछ दिनों तक वही एक टूटा हुआ पुल रहा. छूटे हुए रोजगार के सिलसिले में वो दिल्ली रहता था. अपने प्रेम का पहला ठीहा हमने उसके ही कमरे को बनाया था. शुरू शुरु में यों होता कि हमारे आने से वो बहुत खुश हो जाया करता था. उसे लगता था कि हम दोनों उससे मिलने आए हैं.

वो बड़ी तैयारियां करता था. बढ़िया भोजन, घर की बेहतरीन सफाई. खूब बातें करता था. घूमने ले जाता. ऐतराज करने पर उसे लगता कि हमलोग उसके बेतहाशा खर्चे और परिश्रम से परेशान हो रहे हैं. इधर मेरी स्थिति दूसरी थी. मुझे मौसम और उसके शरीर से अतिरिक्त कुछ सूझता ही नहीं था. धीरे धीरे उसने हमारी अधीरता समझ ली. वो हाय-हेलो के बाद घर से निकल जाता था. हम तभी ही एक दूसरे से खुद को बिलगाते जब वो थक हार कर बाहर से लौटता.

लेकिन बाद के दिनों में ऐसा नहीं रहा. वो घर पर ही रहता. हम आते. हाय हेलो का बिजली के कौंध जितना लंबा दौर और फिर हम एक कमरे में बंद हो जाते. कुछ लम्बे वक्फे के बाद हम खुद बाहर आते. सच कहूँ तो जो प्रेम की खुशी थी उसमें जगह की यह कमी खलती थी. रौनक के मन में या ऐसे अन्य दोस्तों के मन में जो अपनी छवि थी वो क्रमवार टूट रही थी.

लेकिन आज इस दोपहर में, मन में अंधड़ की तरह घूमते इस रेस्तरां में, सामने बैठी मौसम के मन में, जिससे मिलने के लिए मुझे दूसरा जीवन चाहिए होगा, जहाँ पसरी खामोशी ने मेरा जीना मुहाल कर दिया था, ऐसे में रौनक की याद नहीं आनी चाहिए थी?

ऐसी ही कोई बीती दोपहर है, रौनक का घर है, सिगरेट है, अपने बुतों के छिलके हैं,बेख्याली है और मौसम का एक सवाल है जो इतने वर्षों से लगातार चक्कर लगा रहा है. वो मुझमें सिमट आई है जबकि यह उसकी अदा नहीं है. सिमटते हुए कह रही है: शादी कर लो मुझसे.

इतना बड़ा जीवन हम किन्हीं लम्हों द्वारा तय झंझावातों की गुलामी में गुजार देते हैं. उस एक पल तक, अगर मेरी चालबाज स्मृति साथ दे रही है तो, हम दोनों बराबरी पर थे. दुनिया के लिए, मेरे लिए घोषित प्रेम कोई दूसरा था, भले ही वहाँ इनकार की बारिश हो रही हो लेकिन जैसा भी था प्रेम वही था. मैंने मौसम को शुरुआती बातें याद दिलाई थी, उस एक क्षण वो समझ भी गयी थी. लेकिन वहीं से, ठीक उसी पल से, हमारा किरदार पारिभाषित हो गया था.

‘परिक्रमा’ में भोजन लग चुका था. मुझे ये तक याद था कि मौसम बाएं हाथ की उँगलियों से कोई टुकडा उठायेगी. हम चुपचाप थे. कोई बात उठती लेकिन चुप रहने की इच्छा उन बातों को दबा देती थी. हम, जैसे, मन ही मन बात कर रहे थे. तबीयत हुई, पूछूं, ‘हम किस बात पर अलग हुए थे’. लेकिन यह प्रश्न भी अपराध होता. तय करना मुश्किल हो रहा था कि माफी मांगने का कौन सा मौक़ा निकाला जाए. दूसरे, माफी तो मैं माँग लेता लेकिन माफ कर देने का अतिरिक्त बोझ मैं उस पर नहीं डालना चाहता था.

किन्तु यह तो मुझे जानना था कि क्या पुलिस वाले उस दिन के बाद उसके घर आये थे? या नहीं? लेकिन यह प्रश्न, मैं जानता था, न सिर्फ इस मुलाक़ात को रौंद देता बल्कि इतने वर्षों में भरा, अगर भरा हो तो, घाव खुल जाता. फिर मैं पूरे जन्म के लिए अपराधी हो जाता. यह प्रश्न उससे पूछा नहीं लेकिन मन में उठे इस प्रश्न ने मुझे धीमा कर दिया था.इतना धीमा कि मौसम उठे, मुझसे उठने के लिए कहे- कितना गजब होगा, मौसम उठती है, मुझे भी साथ उठने के लिए कहती है, साथ चलने के लिए कहती है, मैं अनगिनत वर्षों पीछे छूट गए किसी मोड़ तक, जीवन के अंत तक, उसके साथ चलता हूँ – उठने के लिए कहे तो भी इस प्रश्न की आंच में झुलस कर मैं बैठा ही रह जाता.

शादी के प्रस्ताव से पहले की मुलाकातों में हम कितनी बार एक दूसरे से कह चुके थे कि हमारी हर मुलाक़ात ऐसी हो जैसे आख़िरी मुलाक़ात हुआ करती है. कोई वादा नहीं, कोई दिलासा नहीं, लेकिन प्रकृति ने हमें एक दूसरे के प्रति इतना कठोर रहने नहीं दिया. शरीर अपना जादू रच रहा था. आज से पीछे पलट कर देखता हूँ, लगातार देखता हूँ तो वो सारी स्त्रियाँ मुझे तस्वीर जितनी याद आती हैं जिनसे मैं मन के स्तर तक जुड़ा रहा. लेकिन मौसम मुझे हू-ब-हू याद है. उसके साथ की अपनी कामनाएं भी याद हैं. यही तो वो भी चाहती थी.

हमारे एजेंडे में फर्क था इसलिए रवैये में भी. मौसम, इसे पुकारना भी कितना अच्छा लगता है और जीवन भर कितना अच्छा लगते रहना चाहिए था

शादी के प्रस्ताव् के बाद उसमें एक बदलाव आने लगा था. वो प्रेम करने के साथ साथ मेरा ख्याल रखने जैसा बर्ताव करने लगी थी. जैसा मैं उन स्त्रियों के साथ किया करता था, जिनजिन को मैं अलग अलगसमयों पर पसंद करता रहा था. मुझे बहुत बुरा लगना चाहिए था अगर स्थिति हमें पलट देती यानी मैं मौसम से उतना ही बेरुखा बर्ताव करता जैसा मेरे साथ होता आया था.लेकिनउ स समय होश कहाँ था.

‘बताओ कुछ. कहाँ रहे. क्या किया’. मौसम की आवाज दो अलग अलग वक्तों से आ रही थी.

‘नौकरी किया. अभी लम्बी छुट्टी पर हूँ’. यहां मुझे ख्याल आया कि नजर के दोष मौसम को बताऊँ लेकिन रोक लिया.

‘तुम चेन्नई ही रह गए’

‘तुम भी तो दिल्ली में ही रह गई’

‘मुझे कहां जाना था’

इस पर हम दोनों हँसें. पहले उसकी हँसी बजी फिर मैनें संगत देने के लिए हंसना शुरू किया.

‘यहाँ किसी काम से आये हो?’

‘हाँ, लेकिन तुमसे मिलने के अलावा भी कुछ काम हैं’

‘अच्छा!’ इस ‘अच्छा’ कहने में भी वही पुरानी रेघ थी.

अब वो नर्म पल आया कि बीतीबातों का जिक्र उठाकर ‘सॉरी’ बोल दूं. लेकिन यह तय नहीं कर पा रहा था कि कौन सी बात उठाऊँ. रौनक वाली बात सही जगह पड़ती नहीं दिखी थी और उसके बाद जो भी था, याद था लेकिन याद करने लायक नहीं था और याद दिलाने लायक तो कत्तई नहीं था. मैं उससे क्या बताता! यह कि बीते जीवन को फिर से शुरू करते हैं? या यह कि मेरा गुस्सा उसने पहाडगंज के होटल वाले पर क्यों निकाला था? ये सब तो वो भी जानती होगी, मैं बताता तो क्या बताता?

रौनक के घर की उस दोपहर के बाद जो महीन बदलाव हमारे बीच शुरू हुए वो दिखने भी लगे थे. मिलने के शुरुआती लम्हें किसी रोष में गुजरते. बढ़त मेरे ही पास रहती और उसके जिम्मे मनाने का काम होता था. आश्चर्य यह कि हफ्तों और कई दिनों के ख्यालों में जमी मैल तुरंत मन से उतर जाती थी.

हमारे एजेंडे में फर्क था इसलिए रवैये में भी. मौसम, इसे पुकारना भी कितना अच्छा लगता है और जीवन भर कितना अच्छा लगते रहना चाहिए था, मौसम का प्रेम पारदर्शी था और साथ रह जाना उसकी कल्पना थी इसलिए वो नित नए दोस्तों से मिलवाती थी. उसके दोस्त जो उससे मुझे लेकर बाते करते,वो बताती थी. उस बताने में कहीं न कहीं एक भाव यह भी होता था कि सब हमारे रिश्ते को पसंद करते हैं. इन्हीं वजहों से शायद वो मुझे अपने घर भी ले जाया करती थी.

दूसरी तरफ, मैं था. अपनी हत्या तो सिर्फ इस वजह से कर सकता था कि प्रेम को समझने में मैंने भूल कैसे की? मौसमको मैं हर किसी से दूर रखता था. जिन दोस्तों से कमरा चाहिए था और जो बड़े रसूख के न थे, उन्हें ढूँढना और उनसे मिलवाना अलग था लेकिन किसी और से मैंने कभी नहीं मिलवाया. उसके भाईयों में जो सबसे छोटा था, अनिर्बान, उसका चेहरा मुझे याद है.

शादी के प्रस्ताव् के बाद उसमें एक बदलाव आने लगा था. वो प्रेम करने के साथ साथ मेरा ख्याल रखने जैसा बर्ताव करने लगी थी.

बैरा कुछ मीठे के लिए पूछ रहा था. जबकि वो मुझे बता चुकी थी कि भाई अमरीका में बस गए हैं, फिर भी मैंने पूछा, अनिर्बान कहाँ है?

उसने बताया,‘डेल’ में है. क्यों?

‘वो मुझे याद है. उसकी ही वजह से हम न जाने कितनी बार चाँदनी चौक जाते थे.’

‘हाँ, करीम्स चिकेन का वो अब भी मुरीद है.’

लेकिन क्या वो मुझे इसी वजह से याद था?

होने यह लगा था कि बाद के दिनों में, और यह कितनी खराब बात है कि, मैं उसके साथ कुछ ही समय बिताता. उसके शरीर के अलावा कुछ भाता ही नहीं था. साथ घूमना, खरीदारी, घर जाना, दोस्तों से मिलना..कुछ भी नहीं. यह बात वो समझ जाती. एक बदलाव यह भी आया था कि दोस्तों के घर से अलग हम लोग पहाड़गंज के सस्ते होटलों में मिलने लगे थे.

ऐसे ही किसी दिन हम मिले और मिलने की रस्म अदायगी के बाद उसे घर जाने की सलाह मैं देने लगा. कोई फिल्म थी जिसे वो साथ देखना चाहती थी. मेरा हाल यह था कि उसकी लाई टिफिन भी खाने जितना वक्त नहीं देना चाहता था. बात रूखी होती गई थी. कहासुनी हुई वो याद नहीं लेकिन उसका धधकता हुआ चेहरा याद है. प्रिया सिनेमा पर मैं उतर गया था क्योंकि मैंने किसी को मिलने का समय दे रखा था.

यह सब मुझे क्यों याद है?

कुछ समय बीता होगा. दिल्ली की दोपहरें अकेली नहीं झेली जाती. मैं बैठा था और दोपहर के बीतने के इन्तजार कर रहा था. शाम के समय मैं मनुहार वाले रस्ते पर निकलता.उसी समय मौसम का फोन आया. उधर अनिर्बान था. मौसम का सबसे छोटा भाई. उसकी आवाज के पीछे से बीच बीच में रुलाई की आवाज भी आ रही थी और वो मुझसे जो कुछ भी कहे जा रहा था, उसके बरक्स मैं इतना भर ही कह पाया था: ‘तुम अभीछोटे हो’.

अनिर्बान की आवाज मेरा पीछा करती है. उस दिन अनिर्बान की आवाज समय पार कर गई थी और वो अब मुझे अधिक सुनाई देती है. आप मेरी दीदी के साथ ठीक नहीं कर रहे हो, तुम अभी छोटे हो, ये मर जायेगी, तुम अभी छोटे हो, ये आपका आदर करती है, तुम छोटे हो, इसे कुछ हो जाएगा आप समझ क्यों नहीं रहे, तुम छोटे हो, चाहे तो वो पुलिस में जा सकती है, तुम अभी छोटे हो, इसे कुछ हो गया तो अच्छा नहीं होगा देवेन्द्र.

इस वाकये ने हमारा भविष्य निर्धारित कर दिया था. मौसम को मेरे दुःख का इल्हाम हुआ होगा: उसकी चहक पुराने अंदाज पर लौट आई थी. अब मिलते तो बस उसी पल में रहते जिसमें मिल रहे होते थे. शादी की बात दूर हो गयी थी.

किसी इम्तहान के सिलसिले में उसे चेन्नई जाना था. उसने घर वालों को मना लिया था कि दोस्तों के साथ जायेगी और दूसरी तरफ, शिद्दत से मेरे साथ छुट्टियों की योजना बना रही थी. वो बार बार कहती कि ये घंटे-दो घंटे का मामला हमारी जिन्दगी से दूर जाएगा. रेल का टिकट घर वालों को दिखाने के लिए कराया लेकिन हमारी तैयारी थी कि हम दोनों जहाज से जायेंगे और चेन्नई जियेंगे.

पर उससे पूर्व पहाडगंज का एक होटल हमारी जिन्दगी में आया.

‘सी.पी. का एक चक्कर लगाते हैं. क्यों?’ उसकी ओर से यह प्रश्न उछला. हम भोजन कर चुके थे. हो सकता है, यह विदा के पहले की भूमिका हो. परिक्रमा इस बीच दो चक्कर लगा चुका था.

टहलते हुए एक चिर परिचित कामना मन में दौड़ गयी. उसे मन ही मन रखा. डूबते उतराते कुछ संवाद अब भी हो रहे थे. इत्तेफाक था कि दोनों ने सेन्ट्रल पार्क की तरफ इकट्ठा ही देखा. दोनों हँसें. दोनों मुड़े और जा बैठे. मैं लगातार यही सोच रहा था क्या इसे मैं ज़रा भी याद नहीं? अगर याद होता तो क्या ये मिलने आती? या क्या पता, आती ही.

शाम गेंद की तरह लुढ़कती हुई नजदीक आ रही थी. बैठते ही मैं लेट गया. इस पार्क में जितने लोग थे सब उतने ही लग रहे थे जितने बीस वर्ष पहले लगते थे, जिन दिनों मैं दिल्ली ही दिल्ली किए रहता था.

मैं यह सोचना भी नहीं चाहता था कि आज जब हम यहाँ से उठेंगे तो शायद इस जीवन में कभी इस पार्क में न लौटें. मुलाक़ात जो अभी छीज रही थी वो भी फिर कभी होगी या नहीं. एक चाय वाला आया. यहाँ हमारे बीच का चिराग ज़रा फड़का: चाय. हम दोनों ही इस पार्क का घूमंतू चाय पिया करते थे. या तो यहाँ की चाय या महीने की शुरुआत हो और तनख्वाह की तपिश तो, सी.सी.डी. आईरिश कॉफ़ी में चीनी मिलाना मौसम ने ही सिखाया था.

आज भी, बिना कुछ बात किए, इस चाय की चुस्कियों में अतीत को ही पीता रहा. उससे पूछना चाहता था कि तुम ये लगातार क्या सोच रही हो? लेकिन नहीं पूछ सकता था. ऐसा कोई सवाल नहीं कर सकता था, जिससे लगता, मुझे उसकी फ़िक्र है. बात का रुका हुआ दरिया बिगड़ जाता.

वो लम्हा गुजरा, जिसके गुजरने का खौफ मुझमें तब से बैठा हुआ था जब से इस मुलाक़ात की कल्पना मैंने कर रखी थी. ‘चलूं?’ उसने कहा था. मैंने उसे कहते हुए देखा था. ‘हाँ?’ उसने बैठे ही बैठे फोन मिलाया. ड्राईवर रहा होगा. उठने लगी.

‘दिल्ली में कब तक हो’

‘हूँ अभी’

‘फिर भी?’

‘दो चार दिन’

‘दो या चार?’ और उसने बात मोड़ दी. ‘कहीं छोड़ दूँ तुम्हें?’

‘नहीं मुझे मत छोडो’ यह जाहिर न मैं कहना चाहता था. लेकिन क्या ही मैं और क्या ही मेरा कहना! बताया, किसी का इन्तजार है. साथ ही न जाने किस साहस या कामना के वशीभूत हो कर यह भी कह बैठा कि अभी मैं कुछ दिनों के लिए दिल्ली में हूँ. मैं उससे पूछना चाहता था कि क्या मैं तुम्हारे फोन का इन्तजार करूँ? लेकिन नहीं पूछा, अलबत्ता बताया, द्वारका के रेडीसन ब्लू में रुका हूँ. उसने हाथ बढाया, यह कहते हुए: मिलते हैं.

मेरी आँखों की रौशनी इतनी कम भी नहीं थी कि मैं उसे जाते हुए नहीं देख सकता था.अन्धेरा उतर रहा था. क्योंकि मेरा फोन बंद था और मेरे पास टॉर्च भी नहीं था इसलिए एहतियातन मुझे उसकी मदद से इस पार्क से निकल जाना चाहिए था लेकिन ऐन मौके पर मेरी आँखों में पानी भर आया. इस उतराती हुई बाढ़ को उसने भी देखा. उसके देखने को मैंने देखा लेकिन पानी नहीं रुका.

वो चली गई.

 

 

उसके विदा होने से लेकर पार्क के बाहर निकलने तक मैं बहुत रोया. फूटफूट कर रोया. एक सज्जन मेरे पास आकर बैठे. पूछा, चचा, क्यों रो रहे हो? आश्चर्य कि मुझे मालूम नहीं था मैं क्यों रो रहा था. उनके करीब आकर बैठने से या मेरे रो लेने भर से, जाने कैसे, मुझे आराम आया. मौसम के सामने रोना शायद हमारी आख़िरी लड़ाई औरआख़िरी निर्णय था. मुझे अपने रोने का मलाल हो भी रहा था और नहीं भी हो रहा था. ख्याल बड़े तेज अंदाज में बदल रहे थे. इस भले मानस ने होटल तक की टैक्सी दिलवाई और बदले में मैं बस उसका नाम पूछ पाया था.

हम दोनों में से किसी ने एक दूसरे को विदा नहीं कहा था. मशीन की तरह साथ चलते हुए तीन नंबर गेट तक पहुंचे. मैं रुक गया और वो आगे निकल गई थी

रात गाढ़ी हो रही थी. टैक्सी वाले से कहा, एक बार पहाड़गज दिखा सकते हो. उसने जाम का हवाला दिया. मुझे भी अब न वो होटल याद है, न वो सड़क, न वो जगह याद.

द्वारका पहुचते ही वह होटल दूर से ही दिखा. जगमगाता हुआ यह सितारा होटल शहर के बीच किसी टापू की तरह था. मैं कमरे की तरफ बढ़ रहा था लेकिन याद आया, कमरे की चाभी रिसेप्शन से उठानी है. वहां रिसेप्शन पर मौजूद तमाम स्त्री कर्मचारियों में पता नहीं क्यों और पता नहीं कैसे वो एक बदमाश आदमी भी दिख रहा था जो एक मुद्दत पहले पहाडगंज के होटल और रिसेप्शन संभाल रहा था. मैं इधर कमरे की तरफ बढ़ रहा था लेकिन वर्षों पहले का एक वाकया मुझे घटते हुए दिख रहा था, सुन्दर एक स्त्री औरअभिमानी एक पुरुष कश्मीरी गेट पर मिलते हैं. स्त्री लिपट जाती है, पुरुष उसे दूर करता है. वो दूर होती है. ऑटो रिक्शे वाला उन्हें कश्मीरी गेट से पहाड़गंज ले जाता है जो होटलों का समुद्र है.

स्त्री शादी की मनुहार करती है. पुरुष स्त्री पर ही भावनाओं के दोहन का आरोप लगाता है. पुरुष ही रूठता है, स्त्री मनाती है. और लगता है कि सब शांत बीत गया. घुटते इस संसार में प्रेम का एक और दिन निकल गया.

दोपहर हमें साथ लेकर गुजरने वाली है.

होटल से निकलते हुए, बिल चुकाते हुए हमलोग चेन्नई की योजनाओं पर बात कर रहे थे तभी सीढ़ियों से सटे रिसेप्शन पर खड़े होटल वाले ने अतिरिक्त पाँच सौ रूपये की मांग कर दी. मैं चूंकि बाहरी था इसलिए मेरे पहचान पत्र की छायाप्रति रख कर वापस लौटा देते थे लेकिन मौसम के साथ यह स्थिति नहीं थी. वो दिल्ली की ही रहने वाली थी. पहाडगंज की सँकरी गलियों में होटल वालों का नियम था कि अगर दो पुरुष साथ हैं तो एक के पहचान पत्र से काम चल जाए लेकिन स्त्री साथ है तो दोनों के पहचान पत्र लगते थे. स्थानीय लोगों के पहचान पत्र पर कमरा नहीं मिलता था. एक अनकहा नियम था कि स्थानीय लोगों का पहचान पत्र रिसेप्शन पर जमा हो जाता और वापसी के वक्त उसे लेना होता था. हम हमेशा ही यही करते लेकिन इस बार पहचान पत्र वापस करने के ऐन पहले रिसेप्शन वाले ने पाँच सौ रूपये की मांग कर दी थी.

‘क्यों?’

‘क्यों, क्यों बे? लौंडिया लेकर कमरेमें घुसे रहते हो और पूछते हो क्यों, पुलिस बुलाता हूँ तब समझ आयेगा कि क्यों ’वो चाहता तो आराम से बात कर सकता था लेकिन फिर शायद हम हावी हो जाते.

मैंने जिरह जारी रखी थी लेकिन जेब में हाथ भी डाल लिया था. मेरे हर वाक्य से मामला तल्ख़ हो गया. अंतिम वाक्य जो उसका था उसमें वो मुझ पर रंडीबाजी का आरोप लगा रहा था. पाँच सौ रुपये का नोट निकाला और देने वाला था कि मौसम ने मेरा हाथ पकड लिया.

‘नहीं देते’ मौसम ने कहा. ‘रंडीबाजी किस बात पर बोला तुमने’ मौसम ने फिर कहा.

होटल वाले को क्या सूझा कि वो भागा. थोड़ी देर में वो पुलिस वाले के साथ नमूदार हुआ. आते ही उसने पुरानी टेर उठा ली, ‘मेरे होटल को रंडीबाजी का अड्डा बना रखा है!’. मौसम ने फिर उसे टोका. पुलिसवाला हमारी मदद को नहीं आया था. मैं नहीं चाहता था लेकिन माहौल ऐसा बन रहा जिसमें मौसम उलझती गयी और मैं भी उलझता गया. बातबिगडती गई. गाली गलौज में पुलिसवाले और होटल वाले इतने आगे निकले कि मौसम रोने लगी. मौसम का यह गुस्सा मैं पहली बार देख रहा था.

पुलिस वाले ने मेरा पहचान पत्र भी रखवा लिया. भीड़ की जोर पर सारे पैसे निकाल लिए. होटल वाले एटीएम् भी निकाल रहे थे लेकिन पुलिस वाले ने उसे नहीं लेने दिया. मेरा बैग और मौसम का पर्स भी जब्त हो गया. हमें भगाते हुए उसने कहा था, थाने से आकर ले जाना तब जानूंगा कि यह रंडीबाजी नहीं कुछ और था. वरना मैं तुम्हारे घर आऊँगा.

हम चुपचाप चले जा रहे थे. मैंने उसे कश्मीरी गेट मेट्रो पर छोड़ा. कश्मीरी गेट तक के ऑटो में भी वो दूसरी तरफ देखती रही थी या घुटनों में सिर को छुपाए रखा था. प्रेम के वश में हो कर नहीं बस इंसानियत के नाते मैं मौसम को गले लगा लेना चाहता था. चाहता था कि वो रुके, मेरे कंधे पर सिर रखे, अपमान को आंसुओं में भिगों कर किनारे कर दे लेकिन मैं नहीं कर पाया. मैं सॉरी भी नहीं कह पाया.

हम दोनों में से किसी ने एक दूसरे को विदा नहीं कहा था. मशीन की तरह साथ चलते हुए तीन नंबर गेट तक पहुंचे. मैं रुक गया और वो आगे निकल गई थी. उसने मुझे पलट कर भी नहीं देखा, मैं चाहता रहा कि एक बार वो मुझे देख ले. या मैं उसे देख लूं. लेकिन नहीं, उसे पलटना नहीं था.

हम चेन्नई नहीं जा पाए. उस अनखुले पत्र को पाने से पहले मैं यह समझता रहा कि मेरे सभी फोन, सारे मेल्स अनुत्तरित रह गए थे.आज इस रौशन होटल में मैं बिस्तर पर लेटे खुद को टॉर्च की तरह जलते हुए देख रहा हूँ. रौशनी बाहर है और राख भीतर. दीवाल पर मेरी रौशनी में अनेक दृश्य जन्म लेते हैं लेकिन किसी भी दृश्य में वो पलट कर देखती नहीं. अंधेपन के शुरुआती दिनों में यह ख्याल हमेशा पास रहता था कि वर्तमान ही नहीं शायद अतीत दिखना भी बंद हो जाये. लेकिन धुंधले रंगों वाला अपना अतीत तो आवाज की तरह निथरता जा रहा है. ऐसे में सोचता हूँ, जब मैं पूरी तरह रौशनी के बगैर हो जाऊंगा तब मेरे मन में कोई दृश्य जरुर उभरेगा. उस दृश्य में वो मेरी तरफ देखेगी. मेरा हाथ दबाएगी. अगर गले लगना चाहा तो क्या कहने! लेकिन अपने बीच की बढ़ आई दूरियों के नाते कंधे से कंधा भर भी छू ले तो उसे गले लगा लूँगा. रौशनी विहीन जीवन की कामना यों भी तो हो सकती है.

(कथा शीर्षक, शरद बिल्लौरे की कविता ‘तय तो यही हुआ था’ से.)

इस कहानी में प्रयोग सारी पेंटिंग महेश वर्मा की बनाई हुई है. यह कहानी पहले तद्भव पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है.  

 

1 COMMENT

  1. Dhanyawad .kahani padhvaane hetu .ek paadh aur karna chahunga.tab hi kuch kahunga.kahani ek hi baithak me khud ko padhvaane lene me safal hui.baki baad me. thanks

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here