अशोक वाजपेयी पर सीबीआई जांच: डराकर निडर बनाने वाली खबर

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तस्वीर इंडियन एक्सप्रेस से साभार

शशिभूषण/

युवा से भी अधिक तत्पर, जुझारू, कर्मठ, सन्नद्ध, इस समय में प्रतिरोध के अगुआ वरिष्ठ  कवि, संपादक, समीक्षक, कला-संस्कृतिकर्मी इत्यादि-इत्यादि… अशोक वाजपेयी जी के विरुद्ध सीबीआई द्वारा किन्हीं अनियमितताओं की जांच
कराने का आदेश दिया जाना विचलित करनेवाली अत्यंत डरावनी ख़बर है. यह ख़बर हम जैसों को जितना उदास करती है उससे अधिक आसन्न डर की सूचना देती है. यह डर कहता है अब कोई भी जो मुंह में ज़बान, कंधों में इंकार और हाथों में अस्वीकार रखता है वह निगरानी और बदले की निपटाओ कार्यवाई से बाहर नहीं है. जिसके भी विरोध प्रभावी, संगठित होंगे उन्हें निशाने में लिया जाएगा.

सीबीआई जाँच का सरकारी आदेश अंत में भले एक कवायद साबित होकर रह जाये लेकिन अभी वह एक ऐसी गाज है जो चेताने का काम कर रही है कि बाकियो अपना-अपना समझ लो! हमारी ताक़तवर नज़र,ऑक्टोपस पकड़ से ओझल नहीं है कोई विरुद्ध आवाज़!! निःसंदेह इस दमनकारी प्रतीत होनेवाली कार्यवाई से बौद्धिक जमात में भविष्य में ठिकाने लगा दिए जाने के डर से दुबकने की प्रवृत्ति बढ़ेगी. हो सकता है ऐसा ही अनुमान भी किया जा रहा होगा!

संभव यह भी है कि मुखर लोगों का डर कम ही होने लगे. जब लग जाता है कि यही होना है तो इससे अधिक क्या होगा सोचकर डर कम भी हो जाता है.

संभव यह भी है कि मुखर लोगों का डर कम ही होने लगे. जब लग जाता है कि यही होना है तो इससे अधिक क्या होगा सोचकर डर कम भी हो जाता है. कहते हैं कभी-कभी सीमा से अधिक बढ़ा हुआ डर निडरता बन जाता है. खैर, हम सब दुर्बल लोग हैं. समानधर्मा लोगों पर पड़नेवाली विपत्तियों से चिंतित और दुःखी हो जानेवाले लोग. किस बल से ललकारें या चुनौती देने का जोखिम उठाएंगे? केवल यही गुहार लगा सकते हैं- जानबूझकर लेखक जैसे कमजोर इंसानों को डराया न जाये. जो इंसानियत के पक्ष में हैं, अच्छाइयों और देश की महान आदतों को बचा लेने के हिमायती हैं, जिन्होंने कला और संस्कृति के लिए अपना सर्वोत्तम दिया है उन्हें इरादतन सताया न जाये. जो हाँ में हाँ नहीं मिलाते है या अपने विवेक के अनुसार विपक्ष में अपना मत व्यक्त करते हैं उन्हें भी डर और अन्याय से मुक्त रखा जाए. इसी से लोकतंत्र और शासकों का इकबाल बचेगा. अगर बलशाली मिलकर कमजोरों के मुंह ही बंद करने में लग गए तो देश का क्या होगा? कलावीथिकाओं का किसी भी हाल में बूटों से मुआयना नहीं होना चाहिए. उनके अतीत में अगर झांकना ही ज़रूरी हो गया हो तो देखना चाहिए जो कलाकार वहां तक पहुंचने से रह गए उन्हें अब ससम्मान आमंत्रित किया जाए. रही बात अशोक वाजपेयी जी की तो उन्हें तो यह देश चाहे तो इसी बात के लिए अपना विश्वासपात्र मान सकता है कि इस उम्र में यह इंसान अपनी सक्रियता में युवतम प्रतिभाओं को अपने परिश्रम और मेधा से मात देता है.

कल सौतुक डॉट कॉम में यह ख़बर पढ़कर ऐसा ही कुछ सोच रहा था. कृपया इसे किसी प्रकार का जवाबी बयान न समझा जाये. निवेदन की कोशिश में यह मेरे मन में चलनेवाली बात है. यह भी निरा संयोग है कि कल ही वागर्थ के दिसम्बर अंक में ये दो गीत पढ़ने को मिले. देर तक इन्हें हो सोचता रहा था तो आज टाइप करने का लोभ छोड़ा न गया. पढ़ियेगा ये बहुत कुछ कहते हैं-

 कैटेलोनिया के दो गीत

रेमोन थेलेगेरो सेंचिस

*1. अमन की बाबत*

कभी-कभी अमन
कुछ और नहीं होता
इसके नाम पर बस होता है डर
तुम्हारा डर, मेरा डर
उनका डर जो डरते हैं रात के घिरने से
कभी-कभी अमन
कुछ और नहीं होता
इसके नाम पर बस होता है डर

कभी-कभी अमन कहने- सुनने से
सड़ांध आती है मौत की
उनकी मौत की जो ज़िंदा नहीं मरे हुए थे हमेशा
ओढ़े रहे चुप्पी का कंबल हमेशा
कभी-कभी अमन का नाम लेते हुए
लगता है जैसे कोई फैला हुआ हो रेगिस्तान
जहाँ न आवाज़ें हों, न घास, पेड़ पौधे
ऐसा भयावह ख़ालीपन
जो साबुत लील जाए इंसानों को
कभी-कभी अमन का नाम लेते हुए
लगता है जैसे कोई फैला हो रेगिस्तान

कभी-कभी अमन हाथ बढ़ा कर
चौड़ी सी पट्टी बांध देता है मुँह पर
लपेट डालता है दोनों हाथ कस कर
बस छोड़ देता है दोनों टाँगे खुली
भागना चाहे तो कोई भागे
कभी-कभी अमन यह भी करता है

कभी-कभी भोला भाला सा दिखने वाला अमन
कुछ नहीं होता
सिवाय एक खोखले शब्द के
जिसका कोई अर्थ नहीं
ताकि कहना संभव न हो सके कुछ भी
कभी-कभी अमन ऐसा भी होता है

कई बार अमन ऐसा होता है
जिसको हम नाम देते हैं अमन
उल्टे वह
कुछ ज़्यादा ही लहूलुहान कर देता है
जिसको हम कहते हैं अमन
वह अपने अर्थ से इतर ऐसा भी होता है
अपने अर्थ से इतर ऐसा भी करता है।

*2. डर के ख़िलाफ़*

जब हम बात करते हैं तो गोल मोल नहीं
लोगों के और चीज़ों के नाम लेते हैं
यदि हम चुप्पी नहीं तोड़ेंगे
मर जाएंगे एक दिन चुपचाप
डर के ख़िलाफ़ खड़ा होना जीवन है
डर के ख़िलाफ़ खड़ा होना प्यार है
निडर होकर
डर के ख़िलाफ़ खड़े होते हैं हम
जब हम बात करते हैं तो गोलमोल नहीं
लोगों के और चीजों के नाम लेते हैं
बात करते हैं उनकी जिन्हें झेलनी पड़ी यातना
भारी भरकम बूट का वजन भी
तेज़ धार वाली तलवार भी
उनको मालुम है डर क्या होता है
यह भी कि बहुत मुश्किल है
लोगों के और चीजों के नाम लेकर
बात करना आज कल
डर के ख़िलाफ़ खड़ा होना जीवन है
डर के ख़िलाफ़ खड़ा होना प्यार है

हम नहीं डरते किसी से
अब हम नहीं डरेंगे किसी से…

अनुवाद : यादवेंद्र पाण्डेय

(शशिभूषण खुद कथाकार हैं. दूरदर्शी आलोचक हैं. सोशल मीडिया को जो कुछ लोग अपनी सामयिक और तीक्ष्ण टिपण्णीयों से मौजूँ बनाये रखते हैं, शशिभूषण उनमें से एक हैं. केंद्रीय विद्यालय, शाजापुर में बतौर स्नातकोत्तर शिक्षक कार्यरत शशिभूषण अपने स्वभाव से ही शिक्षक हैं.)

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