मैं किसका कुत्ता था

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अनिल यादव

अनिल यादव हिंदी के कुछ उन विरल प्रतिभाओं में से हैं जो साहित्यकार और पत्रकार दोनों हैं  और इन दोनों ही क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है. इन्होंने पूर्वोत्तर पर आधारित ‘वह भी कोई देस है महराज ‘ जैसा चर्चित यात्रा वृतांत लिखा है. पिछले साल इनकी लम्बी कहानी ‘गौसेवक ‘ काफी  चर्चा में रही थी. राजकमल प्रकाशन ने इस कहानी को चित्रकार विक्रम नायक के इलेस्ट्रेशन के साथ पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया है. रचनाकार को इस कहानी के लिए ‘राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान (2019) से सम्मानित किया जा चुका है. पेश हैं उनकी नई कहानी ‘मैं किसका कुत्ता था’ जो साहित्यिक पत्रिका आलोचना में प्रकाशित हो चुकी है.

मैं किसका कुत्ता था

 

यह एक भारी, चपटा, सांवले रंग का आम था जो एनीमियाग्रस्त गोरी लड़कियों जैसे नखलऊ के दशहरी के साथ चला आया था. रामअंजोर सोच भी नहीं सकते थे कि एक अदना सा आम तीस साल के पोढ़े डर पर हावी होकर उन्हें इतना दुस्साहसी बना देगा.

उन्होंने पानी भरे भगोने में से डंठल पकड़ कर उठाया तो जरा सा घूम गया जिससे उसकी नुकीली चोंच साफ दिखाई देने लगी. वही चोंच जिसमें बच्चों से आम का चित्र बनवाने की प्रेरणा छिपी होती है. रंग भी कुछ ऐसा था जैसे उसके पके होने का भेद छिपाने के लिए हरे छिलके पर राख पोत दी गई हो.

उन्होंने उसे लुंगी से सुखाकर घुलाना शुरू किया तब महीने छिलके के भीतर फैली भारी गुठली का अंदाजा हुआ. वह पछताने लगे कि कोई खराब देसी आम होगा. जैसे ही चोप निकालने के लिए ढेंपी नोचकर हल्का सा दबाया वह कहीं और से फट गया. वह देख रहे थे, रस सरपट बहता हुआ कोहनी की ओर चला जा रहा था.

रामअंजोर के हाथ की कोशिकाओं में छिपी कोई बहुत पुरानी स्मृति थी या सुख को ठोस, द्रव, गैस किसी भी रूप में पहचानने की अचूक आदत, उनकी जीभ हाथ को लयबद्ध चाटने लगी. गाढ़ी मिठास में मूर्छित खटास घुली हुई थी. उन्हें हर बार जीभ की लपक के साथ धुंधला सा कुछ याद आ रहा था.

किसी अंतःप्रेरणा से अचानक चाटना बंद कर उन्होंने आम को एक बार फिर से धोया, चश्मा लगाकर निरीक्षण किया और सावधानी से छिलका उतारने लगे. उनका अनुमान सही निकला, भीतर सफेदी को छूते हल्के पीले रंग के मोटे रेशे थे जिनके बीच में मीठे-खट्टे के साथ किसी और अज्ञात के नाजुक संयोग से बना अद्भुत स्वाद वाला रस छलछला रहा था. उन्होंने आतुर हड़बड़ाहट से दांत धंसा दिए. चौतरफा चाट जाने के बाद वह गुठली को देर तक मुट्ठी में दबाए महसूस करते रहे, क्या यह वही है?

उन्हें अफसोस हुआ कि इतनी जल्दी क्यों खा गए, पता नहीं क्यों सूंघना भूल गए थे वरना अब तक पक्के नतीजे पर पहुंच चुके होते. उनके भीतर तेज इच्छा उठी कि गांव में बड़के भइया को फोन करके पूछें कि क्या वो लिटिया का पेड़ अभी है? लेकिन वह ठिठक कर अपना सिर सहलाने लगे.  उनसे कभी उनकी फोन पर बात ही नहीं हुई थी, अब महज एक आम के कारण कैसे करते. कोई गंभीर मसला होता तो शायद हो सकती थी. क्या पता तब भी नहीं होती क्योंकि बीच के लंबे समय में उन्होंने अपनी सहूलियत के लिए बहुत सी धारणाएं बनाई थी जो अब पथरीली दीवार बन चुकी थीं.

कुछ देर गुमसुम बैठे रहने के बाद उन्हें लगा गंजे सिर की चमड़ी सिकुड़ कर सख्त हो रही है. उन्होंने अनजाने में आम का रस सिर में पोत लिया था. इधर उधर देखने के बाद वह देर तक धीमे-धीमे खुरदुरे हाथों को मलते हुए एक बेआवाज, अपने में डूबी हंसी हंसते रहे जो कहीं सुदूर अतीत से आ रही थी.

वह आम सब्जी मंडी से उनकी पत्नी लाई थी. लाई क्या थी, वह आम ही उन्हें छलने के लिए दूसरे आमों के बीच छिपकर चला आया था. वह कई दिन उस या उस जैसी प्रजाति के किसी आम को फल की मंडी, रास्ते में खड़े ठेलों और सड़क किनारे बिछी ढेरियों में खोजते रहे, बेचने वालों से पूछताछ भी की लेकिन कुछ पता नहीं चला. हरे छिलके वाले सभी आम न जाने कहां गायब हो गए थे.

उन्हें एक इतवार को दोपहर की नींद में, बारिश से धुले पत्तों के बीच से झांकती राख के रंग की चोंचे दिखाई पड़ीं. एक ऊंचे भीटे पर आम की बारी में कमर लचकाए एक झूमता पेड़ खड़ा है, उसके तने के खोखल में बैठा, बड़ी आंखों से धमकाता उल्लू परिचित सा लग रहा है. बगल के ताल में जलकुभियां तैर रही हैं जहां सड़ने के लिए गाड़े गए सनई के बोझों से दुर्गंध उठ रही है. आसमान में तोतों की चांय-चांय के बीच आंधी को शरीर पर झेलने का खिलवाड़ करते बच्चे भाग रहे हैं लेकिन एक घुटे सिर वाला बच्चा उसी पेड़ के नीचे जमा हुआ है. भद्द की आवाज के साथ उसके शरीर में बिजली दौड़ जाती है, वह लड़खड़ाता हुआ भागता है तभी पेड़ पर कई दिनों से अटकी एक मुंगरी उसके सिर पर गिरती है. धूल से बचने के लिए भिंची आंखों से आम को ढूंढ़कर मुट्ठी में दबोच लेने के बाद पता चलता है कि सिर फूट गया है. वह जरा देर से जान पाता है कि उसके रोने की आवाज हवा में उड़ जाती है और अचानक चुप लगा जाता है. उसका बड़ा भाई घाव पर एक मुट्ठी धूल डालकर हथेली से दबाए हुए उसे घर की ओर ले जा रहा है.

इस बार उन्होंने खुद को और बड़के भइया को पहचान लिया. वही पुरानी कच्ची खंभिया थी. सिर धोकर घाव में एक पुड़िया रंग भर दिया गया था ताकि पकने न पाए. उनकी डबडबाई आंखों में आंसुओं के परदे के उस पार से वह बेना डोला रहे थे. उनका चेहरा नहीं दिख रहा था लेकिन प्यार हवा बनाकर हल्के झकोरे की तरह लगता था. बेना की चर्र-चूं आवाज दर्द को सहलाता हुआ संगीत थी. वह तब तक बेना झलते रहे जब तक वह दोबारा सो नहीं गए. पता नहीं यह सपने की तासीर थी या किसी और चीज की जिसकी उत्तेजक मिठास और गरमाई साफ महसूस हुई.

अब शायद संदेह की गुंजाइश नहीं थी, यह उसी पेड़ का लिटिया था जो कई मालिक, ट्रक औऱ बोरे बदलता हुआ उन तक पहुंच गया था. उन्होंने गरूर के साथ सोचा, और कोई लिटिया हो भी कैसे सकता है, यह कोई आम की प्रजाति थोड़े है, राख पुती लिट्टी के रंग का और वैसा ही चपटा होने के कारण उसका यह नाम पड़ा था. उसको आसपास के चार-छह गांवों के लोग ही पहचान सकते थे.

उनके भीतर हुड़क उठी, एक बार गांव जाकर यदि लिटिया का पेड़ अब भी हो तो खाकर देखें. अगर वही निकला तो हुआ करें दुनिया में बड़े बड़े गुप्तचर, अनुसंधानकर्ता, वैज्ञानिक और पुरातत्व के ज्ञानी लेकिन स्वाद और गंध की स्मृति के आधार पर अगर वे ठीक उसी पेड़ तक पहुंच गए तो यह उनके जीवन की इकलौती सच्ची, रोमांचक घटना होगी. उस दुनिया में वापसी जिससे बिछुड़ जाने की कसक खाली वक्त में परेशान करने चली आती है.

वह तीस साल से हर साल गांव जाना चाहते थे लेकिन डरते थे.

उन्हें इस बीच के समय में दो बार मजबूरी में गांव के पास के कस्बे तक जाना पड़ा था. एक बार उनकी इलेक्शन ड्यटी उसी जिले में लगी थी, एक बार एक फौजदारी के मुकदमें में, जिसमें उनका भी नाम गेहूं के साथ घुन की तरह लिखा दिया गया था. उन्हें कचहरी में जाकर बताना पड़ा था कि उस तथाकथित वारदात के दिन वह नौकरी पर मौजूद थे. डर का कारण शत्रुताएं, हिंसा और जातिगत भेदभाव थे जो सीधे सरल दिखते गांव के जीवन के भीतर खून की तरह बहते थे.

वह अपनी ही जन्मभूमि से डर को हर्गिज स्वीकार नहीं करते थे लेकिन अपने मन का क्या करते जो सहमते हुए ही बना था. उन्हें अच्छी तरह पता था कि एक सवर्ण, एक दलित, एक पिछड़े और एक मुसलमान का गांव जाना एक दूसरे से कितना अलग होता है. जो लोग एक बार शहर आने के बाद वापस नहीं लौटते उसका कारण सिर्फ खुदगर्जी नहीं होती. लेकिन ‘वह क्या होता है’, इसे खुद से भी कह नहीं पाते थे क्योंकि उसे स्वीकार करते ही वह एक सरकारी अफसर से गिरकर एक बेवकूफ, दीन देहाती में बदल जाते जो हजारो सालों से जातियों और कपटी संबंधों की आपस में उलझी सेवार से सड़ते तालाब के किनारे बैठा कलप रहा है जबकि शहर के स्वीमिंग पूलों में पानी उसके स्वागत में हिलोरें ले रहा है. रेस्त्राओं की बत्तियां बुला रही हैं.

वह जब भी गांव जाने की सोचते उन्हें खटिया पर ले जाया जाता खून से लथपथ एक आदमी, हंडा-परात खरीदने के इंतजाम लगा एक कुजात काटा हुआ परिवार, उतरती सांझ को कुएं की जगत पर रोती एक औरत, भूख से बिलबिलाते नंगे बच्चे, धार्मिक दंड के फलस्वरूप दिए गए भोज में खाते लोगों की पांत और बहुत से शव दिखाई देते. उनके खुद के देखे, भोगे दृश्यों के बीच ये लोग उनके मन के परदे पर किसी अंतहीन फिल्म के चरित्रों की तरह आते थे लेकिन लगातार नकारे जाने के कारण वे उनकी स्मृति को लात मारकर अवचेतन की अंधेरी खोह में उतर गए थे.

उस खतरनाक जगह से पहले शारीरिक फिर मानसिक रूप से भी खुद को अलगा लेने के कारण उन्हें कभी कभार सिर्फ वे क्रूरताएं याद आती थीं जो न घटित हुई होतीं तो उनकी जिंदगी में संताप कुछ कम होता. जैसे प्राइमरी स्कूल वे मरखन्ने मास्टर जिनके डर से पैंट में उनका पेशाब टपकने लगता था. अपनी असहायता से समझौता करते हुए उन्होंने उस विराट हिंसक शक्ति को भुला ही दिया था जिसने उनके सामाजिक जीवन को जन्म लेते ही लकवाग्रस्त कर दिया था. उन्हें नहीं पता था कि बांभन, ठाकुर या दूसरे सवर्ण अपने घरों में कैसे रहते हैं क्योंकि वह बचपन में अपमान की आशंका और आत्मरक्षा के चौकन्नेपन के साथ उनके टोले से गुजरे जरूर थे लेकिन किसी के दरवाजे पर बीस बाइस सालों में एक घंटा भी सहज होकर बैठे नहीं थे. सिर्फ एक बार वह बड़के भइया की देखादेखी कथावाचक रामपदारथ पांड़े के पैर छूकर भाग निकले थे, वे हैरत से मुंह बाए पूछते ही रह गए, “किसका लड़का है?”

उन्हें बहुत ज्यादा अज्ञात और थोड़े से समझ में आने वाले डरों ने कुलांचे मारने की उम्र में डिप्रेशन का शिकार बना दिया था. तब उन्हें इस बीमारी का क्या, यह शब्द तक पता नहीं था. उन्हें आम खाने के कई दिनों बाद फिर एक बार नींद में वह व्याकुल आंखों वाला लड़का दिखाई दिया था जो बैलों की नांद और खपरैल की लंबी खंभिया के बीच में छाए नीम के पेड़ के नीचे धूप और छाया के साथ सरकती जाती एक बंसखट पर सिर के नीचे गमछा लगाए हमेशा लेटा रहता था. सचमुच, वह हमेशा से इतनी थकान महसूस करता था कि हड्डियां दुखती थीं. इस बार भी पाटी पर बैठे बड़के भइया बेना डोला रहे थे लेकिन वह चाहता था कि उसे उसकी हवा न लगे. कहीं और चली जाए.

वह उलझा हुआ यातनादायक भदेस समय था जो सोते-जागते आने वाले दुःस्वपनों के बोझ से इतना धीमें चलता था कि ऊब ने भी धीरज रखना सीख लिया था. इसका पता अनियमित अंतराल पर लड़के की भारी उसांस और कराहों से लगता था.

लड़का करवटों की आड़ में बचने की कितनी भी कोशिश करे, न चाहते हुए भी हर जगह सबसे अधिक उसकी अम्मा दिख जाती थी. पंपिंगसेट का पट्टा उतर जाता, छूंछे चक्के ढनढनाते हुए और तेज घूमने लगते, पाइप किसी भयानक जानवर की तरह डकार लेता और वह दूसरी ओर मुंह फेर लेता. वह कहीं से हड़बड़ाई हुई आकर स्टार्टर गिराती, कुंए के किनारे पर पैर जमाकर हांफती हुई पट्टा चढ़ाती, लड़के छरहरी पीठ पट्टे की तरह इतनी तन जाती कि पसलियां तड़कने लगतीं. पंपिंगसेट दोबारा चलने पर अम्मा की कंपकंपाती आवाज आती, “अंजोरिया दस मिनट!”

उसे लगता अम्मा जानबूझ कर उसे त्रस्त करने के लिए मोटर के पास खड़ी होकर चक्कों के उस पार से चिल्लाती है ताकि उसकी आवाज कटफट कर भयानक हो जाए वरना उसे ऐसा करने की जरूरत क्या है, किसको नहीं पता कि पानी के रजिस्टर में दस मिनट की कटौती लिखनी है. वह टिन की नाली पर चरी रखकर अकेले चारा मशीन चलाती तो उसे लगता वही गंड़ासे के नीचे आ गया है, जल्दी से करवट घूमकर बचता. वह अकेले गोबर की खांची उठाती तो उसकी कंपकंपाती पीठ देखने से बचने के लिए मुंह घुमा लेता. वह जानवरों को पानी पिलाने के लिए इतनी देर तक हैंडपंप चलाती कि उनके अकालग्रस्त कंठों से उठने वाली अनवरत घट्ट घट्ट की आवाज असह्य हो जाती, वह तेजी से उठकर किसी और के दरवाजे पर जाकर लेट जाता.

अगर कोई अकेली काम करती मां की मदद करने के बजाय लेटे रहने का ताना देता तो उसकी आंखों में खून उतर आता. क्या उसे इतना भी नहीं पता है कि यह हृदयविदारक परिश्रम व्यर्थ है, न खेती में कुछ रखा है न जिंदगी में…लेकिन जब रात में पानी लगाना हो अम्मा लालटेन और फावड़ा लिए पलंगरी के बगल में खड़ी हो जाती, तब तक चुपचाप खड़ी रहती जब तक कि वह बुझे मन से फावड़ा थाम कर उसके पीछे न चल पड़ता. वह कटी हुई मेड़ों और पानी रोकने वाले ढूहों की ओर इशारा करती, वह आंख मूंद कर उन्मादी की तरह फावड़ा चलाने लगता. होंठ दबाए अम्मा भगवान से मनाती रहती कि वह कहीं अपना पैर न काट डाले.

जब अम्मा नहीं होती तो धरती माता सताने चली आतीं. बैलों की नांद के आगे दसियों साल से चली आती मुकदमेबाजी में फंसकर बंजर पड़े घसियाले खेत के किनारे पर एक लंबी पीली पट्टी थी जिसके एक कोने पर एक फुफकारती भैंस बंधी होती थी, दूसरे कोने पर एक छप्पर होता था. हर साल बरसात के बाद छप्पर बड़ा हो जाता और भैंस का खूंटा खेत में सरकता जाता था. हर दिन कोई न कोई कूटनीतिज्ञ जैसी तटस्थता से पीली पट्टी की ओर इशारा करके पूछता, ‘छप्पर है रबड़ का अंग्रेजी तम्बू, फैलता ही जा रहा है’, तब लड़का अपनी बिलबिलाहट को किसी तरह दबाकर कहता, “यहां से नहीं पता चलेगा, जरा पास से छू कर देख आइए.”

पट्टीदार चाचा रोज सुबह दिशा मैदान से लौटते हुए एक लोटा पियरवा मिट्टी लाता था, उतना खेत पाटकर दबा लेता था. आंख खुलते ही लड़के के भीतर एक लोटा अवसाद जमा हो जाता था जो पूरे दिन लिटाए रहने के लिए काफी था. वह जान गया था कि लेटना इस खतरनाक दुनिया से सुरक्षित दूरी पर बने रहने की सबसे कारगर तकनीक है…लेटना सोने के करीब है, सोना बेहोशी के करीब है, बेहोशी मृत्यु के करीब है. खड़े या बैठे रहने पर आदमी पास आते हैं लेकिन लेटने को मृत्यु का संकेत समझ कर दूर ही रहते हैं.

वह मौसम बदलते समय एक बार, बहुत दिनों से इकट्ठा गुस्से के झटके से अचानक उठकर पट्टीदार के पास जाकर पूछता, “चाचा, हमारा खेत क्यों हड़प रहे हो?”

चाचा चुपचाप मिट्टी बराबर करने में लगा रहता जैसे कोई विनम्र बहरा अपने श्रम से आनंद निचोड़ रहा हो. तभी पता नहीं कहां से बतास की तरह अम्मा प्रकट होती, हाथ पकड़कर खींचते हुए सीधे आंगन में ले जाती, आंखों में डबडबाई आंखे डालकर समझाती, अंजोरिया तुम्हें पढ़ लिख कर बहुत कुछ करना है, अभी से मुकदमा-फौजदारी में पड़ गए तो मेरी तपस्या व्यर्थ चली जाएगी. उस समय उसके चेहरे पर वह सब भयानक रूप से पसर जाता जिसे वह तुम्हारे लड़के को किसी रात खटिया समेत उठाकर…जैसी धमकियों को प्रत्यक्ष या कानाफूसी में सुनते हुए हिम्मत से छिपाए रहती थी. वह अपमान और असहायता के पनीले परदे के पीछे से उसकी मांग से फूटते सलेटी तारों को देखते हुए पिनपिनाता, “व्यर्थ होने के लिए बचा ही क्या है, कोई पेड़ काट ले जाता है, कोई मछलियों को जहर दे देता है, कोई पानी का पैसा मांगने पर लाठी निकालता है और कुछ नहीं तो हमारे घर की ओर भूतों की बरात हंकवा देता है.”

लड़का पैर पटकता हुआ झिलंगी खटिया में बने देह के आकार में फिर से लेटकर अपनी फैक्ट्री में चला जाता था जहां हर तरह के सपनों और हताशा से निजात दिलाने वाली कल्पनाओं की असेम्बलिंग लगातार चलती रहती थी. वहां युद्ध के नगाड़े बजते थे, छप्परों और फसलों में आग लगती थी, कमीने लोग बीवी-बच्चों के गिड़गिड़ाने के बावजूद गंड़ासे से तड़पा तड़पा कर काटे जाते थे, उन्हें माफी मांगने पर खून सने बल्लम से कोंचा जाता था, जो बहुत ताकतवर और चालाक होते थे उनके लिए ऐसे षडयंत्र रचे जाते थे कि वे न जाने कहां से चलाई गई गोलियों से छलनी होकर मर जाते थे और उनके हत्यारे का कभी पता नहीं चलने पाता था. यह सब दूर खड़ी अम्मा गर्व से देख रही होती थी.

इस फैक्ट्री की एक जुड़वा ब्रांच भी थी जिसमें कोई अमर कारीगर था जो अपने काम की चीजों पर पैनी नजर रखता था. वह दुश्मनों से राहत पाते ही नींद के अंधेरे में किसी की आंख, किसी के होंठ, किसी के नितंब, किसी की पीठ, किसी के स्तन, किसी के बाल, किसी की सांस, किसी की चाल, किसी की आवाज, किसी का स्पर्श, किसी की महक सबको आपस में जोड़कर एक तमतमाया सा चेहरा लगा देता था. उलझन तब होती थी जब किसी धड़ पर दो या ज्यादा चेहरे लग जाते थे और उनमें से कोई भी हटने से इनकार कर देता था या किसी के शरीर के एक अंग से चिपका पूरा व्यक्तित्व चला आता था या अचानक वह पाखंड से लबालब नैतिक भीड़-जिसे समाज कहते हैं- कारीगर को कुचल कर मार डालती थी, फैक्ट्री पर ताला डालकर हड़ताल करा देती थी.

रहस्यमय योजनाओं, समीकरणों और संयोगों से कारीगर बचा रहता था, फैक्ट्री दोबारा चालू होती थी. सपने तीव्र और सघन होते हुए सचाई के इतने करीब जा पहुंचते थे कि दम घुटने लगता था. जीवन को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में प्रवाहित करने वाला तरल, विस्फोट के साथ लड़के के समूचे अस्तित्व पर अपराधबोध बनकर फैल जाता था.

रामअंजोर ने यूं ही हिसाब लगाया तो पाया कि उन्होंने अपनी जिंदगी का आधे से भी ज्यादा समय बिस्तर, सोफा, कुर्सी, कार और घास पर वास्तविकता से दूर लगभग क्षैतिज हालत में बिताया है. वह इस समय भी कमरे में लगे उपकरणों में बिजली का बहना, दीवार पर छिपकली के दिल का धड़कना, घर के सदस्यों की फोनों पर बातचीत, बाहर ट्रैफिक का अनिश्चित लयबद्ध शोर, जाले के भीतर से मकड़ी का म्यूजिक कंडक्टर की तरह हाथ हिलाना ऐसे महसूस कर रहे हैं जैसे यह सब कई प्रकाशवर्ष दूर घटित हो रहा है. वह इस दूरी के बीच कहीं अपने भीतर के गुप्त रास्तों पर फिसल कहां गुम हो जाते हैं उन्हें खुद नहीं मालूम, थोड़ा बहुत जगह का अंदाजा तब होता जब अचानक उनका गांव आ जाता है जहां उनके बड़के भइया सोच रहे हैं कि वे अपना हिस्सा लेने आए हैं. जबकि वह एक आम के बहाने सिर्फ अपनी इंद्रियों को आजमाना चाहते थे जिनके फेल हो जाने पर कितनी ही जमीन और संपत्ति मिल जाए उसका कोई उपयोग नहीं किया जा सकता. सब मिट्टी हो जाएगा.

उन्हें चौथाई सदी से भी अधिक पुराने स्वाद की स्मृति के आधार पर लिटिया आम की खोज के रोमांच ने जकड़ लिया था लेकिन उन्होंने तय किया कि वे अपने गांव नहीं जाएंगे. उस रास्ते से गुजरेंगे, रूक कर अपने गांव को बाहर से सिर्फ देखेंगे. वह खुद इतने बदल गए हैं और वहां भी सबकुछ इतना बदल चुका होगा कि किसी के पहचानने का सवाल ही नहीं पैदा होता. अगर चमत्कार ही हो गया, किसी ने पहचान ही लिया तो अजनबी बन जाएंगे, कितनी देर, अधिकतम पांच मिनट, फिर वह आदमी अपनी आंखों को दोष देता हुआ चला जाएगा, इसके बाद वह सीधे बारी तक जाएंगे, परीक्षण के नमूने के लिए एक आम लेकर वापस लौट आएंगे. अगर कोई भ्रम या संदेह हुआ तो पास के कस्बे के किसी होटल में एक रात रूक जाएंगे, अगले दिन किसी पक्के नतीजे पर पहुंचने के बाद ही लौटेंगे.

बारी तक का रास्ता खाईं, खंदक वाला हुआ करता था. अब तक तो चकरोड या सड़क बन जानी चाहिए लेकिन पुराना रास्ता ही हुआ तो भी नो प्रॉब्लम, अपनी काले रंग की एसयूवी फोर्ड एन्डेवर से जाएंगे जिसमें 197 इलेक्ट्रिक हार्सपॉवर का डीजल इंजन लगा हुआ है. हाई क्लाइंब पिकअप है जिससे गाड़ी तीस अंश कोण वाले पथरीले रास्ते पर भी आसानी से चढ़-उतर सकती है. यहां शहर के घोंघा ट्रैफिक में डर लगा रहता है कि कोई अनाड़ी ठोंक न दे, पार्किंग की किचकिच अलग, जगह ही नहीं है फिर भी पता नहीं क्यों लोग जंगल, पहाड़, रेगिस्तान छानने वाली गाड़ियां लिए चिकने कंक्रीट पर रेंग रहे हैं…खैर मुझे तो इसे इन्वेस्टमेंट के लिए खरीदना पड़ा, मार्च के अंत में सीए ने अतिरिक्त पैसे को मैनेज करने का यही तरीका बताया था.

लिटिया के अलावा एक और रोमांच ने उकसाया, वह था उबड़ खाबड़ रास्तों पर पहली बार खुलकर गाड़ी चलाने का ख्याल. रामअंजोर का तमाम प्रपंचों में उलझा दिमाग एसयूवी खरीदने के बाद से मार्केट और मंदिर के अलावा और कहीं जाने के बारे में सोच ही नहीं पाया था. अचानक बिना किसी कारण के उन्हें अपने ही गांव चोरों की तरह जाने का निर्णय बचकाना लगने लगा, तभी भीतर कोई नाराजगी से भुनभुनाया, जाना है जो अभी जाना होगा, भूलो मत, लिटिया एक साल छोड़कर फलता है.

उन्होंने पत्नी-बच्चों से कहा, वह दफ्तर के काम से एक दिन के दौरे पर जा रहे हैं.

उस सुबह आसमान पर बादल थे जो अनिश्चित आकार के टैंकरों की तरह मनमौजी ढंग से धरती पर छिड़काव करते हुए पुरवाई के झोंकों पर सवार घूम रहे थे. वे पानी के अनियंत्रित बोझ और तालमेल की कमीं के कारण आपस में टकरा जाते थे तब गाड़ी की विंडस्क्रीन पर बिजली की परछाई कांप जाती थी. छाते, रेनकोट और प्लास्टिक की पन्नियों में लिपटा फ्लाईओवरों और दुकानों के बरामदों के नीचे पसीना फेंकता-सुखाता शहर उस चूहादौड़ में शामिल हो चुका था जिसे कभी नहीं खत्म होना था.

रामअंजोर ने शहर को विशाल अजगर की तरह जकड़े रिंगरोड को पार कर, हाईवे पर पहुंच कर, गाड़ी के शीशे गिराकर, म्यूजिक सिस्टम पर दुनिया के सबसे पुराने चावल से भी पुरानी एक कजरी मद्धिम वाल्यूम में लगा दी. ठंडी हवा के झोंको के साथ जुल्फें झटकने का मुकाबला करती एक पर्याप्त नखरीली शहरी गायिका थी जो अपनी कजरी के भाव की ओर मुलाहिजा फरमाने की ढिठाई से चिढ़ाती थी लेकिन उसके भीतर एक बहुत पुरानी देहातिन नायिका भी थी जो परदेश जाते पति से बुलबुल की तरह लड़ रही थी… अगर उसे जाना ही है तो जाए लेकिन उसको मायके छोड़ दे, अगर उसमें कुछ मर्दानगी है तो छोड़ने से पहले उसे वैसी लावण्यमयी बना दे जैसी वह व्याह के दिन हुआ करती थी. पति हतप्रभ होकर चुगद बन गया था जो पत्नी से उतने पैसे वापस करने की मांग के अलावा और कुछ नहीं बोल पा रहा था जो उसने अब तक आलता, ओंठलाली, पाउडर और चोली पर खर्च किए थे.

उन्होंने खेतों में हवा के साथ नदी की तरह बहती घास, अपने में लीन चरते जानवरों, पेड़ों की छांव में गुमसुम चरवाहों और बिजली के तारों पर फूली, विचारमग्न चिड़ियों को देखते हुए नतीजा निकाला, ये सभी जानते हैं कि सचमुच की जिंदगी में एक इंच भी कहीं वापस लौट पाना संभव नहीं है लेकिन लौटना सब चाहते हैं. इस कोशिश में जो जितनी दूर जा पाता है उतना सुख लेकर लौट आता है, कितनी अजीब बात है.

बादलों की धूप-छांव के नीचे ऊंघते कस्बों और गांवों की साप्ताहिक हाटों में उनकी रीढ़ के नीचे महीन सा स्फुरण हुआ. वे समझ नहीं पाए कि सूनी सड़के देखकर इतने खुश क्यों हो रहे हैं जबकि इतनी विविधता से भरी दुनिया में उन्हीं को छांटकर हर रोज एक जैसी जिंदगी थमा दी गई है जिसे वे तीस साल से जिए जा रहे थे. अचानक सड़क के किनारे कूड़े के ढेर पर कहीं आम की चाटकर चमकाई गईं गुठलियां दिखाई दे जातीं तो वह कृतज्ञता से मुस्करा कर सिर हिलाने लगते जैसे वे उनकी मंजिल की ओर इशारा कर रही हों.

अचानक अपने गांव के सफर पर निकलने के कारण उनमें आया बदलाव इतना दिलफरेब था कि वह पूरे छह घंटे तक वही कजरी बार बार सुनते रहे. उन्हें सरपत से ढके टीलों के पीछे आकाश जितनी परिचित नदी का पाट दिखाई दिया तो चौकन्ने हुए. अपने गांव के करीब के कस्बे में घुसने से पहले उन्होंने शीशे चढ़ा लिए. स्मृतियों में डूबते उतराने के बीच बरसाती हवा के साथ उनके भीतर इतनी उत्तेजना चली गई थी कि वे बाजार में एकाएक कंपकंपाने लगे. उन्होंने एक बूढ़े के पास अचानक गाड़ी रोक कर हाथ जोड़ लिए जो टेढ़ी टांगों पर लचकते हुए बारिश से बचने के लिए नील में रंगा खादी का गमछा ओढ़े जा रहा था. उन्हें भ्रम हुआ था, बड़का भइया हैं, बाजार करने आए होंगे!

गांव की तरफ जाने वाली सड़क पर चटक धूप थी, खेत कहीं छिप गए थे और हवा में अधमरे व्यापार की गंध थी. सड़क के किनारे जिन जमींनों पर पहले खेती होती थी फसल बदल कर दुकानें बो दी गईं थीं, बिना पलस्तर की कोठरियों में कुछ फूल रही थीं, ज्यादातर खाद-पानी न मिलने से मुरझा गई थीं, उनसे भी ज्यादा अभी ईंटों से घिरी क्यारियों में दबी थीं जिन्हें कभी अनुकूल मौसम में उगना था.

यह तो अच्छा था कि कुछ पुराने पेड़ बचे थे जिन्हें उन्होंने पहचान लिया वरना वे रास्ता भटक कर कहीं और पहुंच जाते. गांवों के पुराने नाम याद थे. वे अनुमान लगा रहे होते कि पता चलता हर फर्लांग पर किसी न किसी जाति के नाम पर एक नगर की नींव रख दी गई थी क्योंकि वे सब शहर होना चाहते थे. हर जगह कम से कम एक शराब का ठेका और एक झोला छाप डाक्टर जरूर था जिसका क्लिनिक भी जाति के नाम पर था. लोगों को जाति का डाक्टर पहचानने में दिक्कत न हो इसलिए यह इंतजाम किया गया था, मरीजों को हमेशा से अपने डाक्टर से ही आराम मिलता था, दूसरी जाति वाले से जहर और ठगी का खटका लगा रहता था जो ठीक नहीं होने देता था.

वे बंद शीशों के पीछे से देख रहे थे, धोती वाले कम हुए थे, पैंट वाले बढ़े थे, शराब से लड़कों का हुस्न ढला था, लड़कियों का शैंपू से निखर आया था, उन्हें अपनी अम्मा जैसी लटियाए बालों वाली एक भी औरत नहीं दिखी. एक नौजवान साइकिल सवार जो हड़बड़ा कर जेबें टटोल रहा था, गाड़ी के आगे आते आते बचा. उनके ब्रेक लगाते ही उसने एक जेब से फोन निकाल कर कान पर लगा लिया और बेफिक्री से बात करने लगा. उनका ध्यान गया, हर जाति के नगर में मोबाइल में गाना भरने की कई दुकाने थीं. सड़कों के आरपार लगे बैनर और दीवारों पर लिखी इबारतों से जाहिर था कि जल्दी ही विधानसभा का चुनाव होने वाला है, चुनाव चिन्हों के बीच दूरदराज के बाबाओं के फोटो वाले रंग बिरंगे पोस्टर खड़खड़ा रहे थे जिनमें से कुछ के प्रवचन हो चुके थे, कुछ के होने वाले थे. खेती की जगह व्यापार ले रहा था इसलिए जहां तक नजर जाती हरियाली के बीच कोई न कोई विज्ञापन झलक जाता था.

रामअंजोर गांव को जाने वाले चकरोड तक तो बड़े मजे से पहुंच गए लेकिन वहां न कोई बारी-बगीचा दिखाई दे रहा था न उबड़ खाबड़ रास्ता, न बरसात की मिर्चीली धूप में कोई आदमी. वह गाड़ी में बैठे अंदाजा लगाते रहे. किसी से रास्ता पूछने का जोखिम नहीं लेना चाहते थे, अगर पूछना ही पड़ जाता तो क्या पूछते क्योंकि बारी का कोई नाम नहीं था. उन्हें अपने घर में अकेले रह गए बड़का भइया का नाम लेना ही पड़ता तब उनका प्रपंच में फंसना तय था जिससे वह अब तक बचते आए थे.

वह बेवजह इतना लंबा सफर करके यहां आने के लिए पछता रहे थे तभी एक बच्चा देवदूत की तरह प्रकट हुआ जो भैंसों और बकरियों के झुंड को एक पुलिया की ओर हांक रहा था जिसके आगे की ढलान की तरफ दूर एक पोखरी और पेड़ों का झुरमुट दिखाई दे रहा था. वह हैरानी से सोचते हुए कि जमीन कैसे ऊंची हो रही है, अनिश्चय से ठिठकते-बढ़ते उसके पीछे चल दिए.

ताल सिकुड़ कर पोखरी रह गया था. जिस भीटे पर बारी थी उसे यूकेलिप्टस के मोटे पेड़ों ने घेर कर छिपा लिया था. ज्यादातर पुराने पेड़ कट चुके थे, पोखरी की ढलान की तरफ दो पीपल और एक महुआ बचे थे. बीसियों लोग उस रास्ते पर, खेतों और टीलों के क्षितिज तक फैले विस्तार में लगातार आ जा रहे थे लेकिन वस्तुतः कहीं नहीं थे. वे सब तीस साल पहले के जाने पहचाने लोग थे जो अचानक उनकी स्मृति में जाग गए थे. वह हर बार जब भूल जाते कि यह भ्रम है तो उनकी सांस फूलने लगती थी. समय के उस काफी पुराने टुकड़े ने सक्रिय होकर उन्हें व्याकुल कर दिया था.

उनकी नजर भीटे पर बकरी चराती लड़कियों पर गई जो कत्थक की तिहाई का अभ्यास कर रही थीं- ता थेई थेई तत, आ थेई थेई तत्त, थेई ता थेई थेई तत्त…उन्हें यह या तो टेलीविजन सिखा रहा था या व्यूटी पार्लरों की तरह आसपास कोई डांस स्कूल भी खुल गया था. झुराए हुए तीन बच्चे पोखरी के उस पार दलित बस्ती के रास्ते से भागते हुए गाड़ी के पास आकर ठिठक गए. वे इतने ही अजनबी थे जितना कि मनुष्यों की पीढ़ियां एक दूसरे हुआ करती हैं.

उनका ध्यान लगातार आती ठक-ठक की आवाज की ओर गया, वह यूकेलिप्टस की दवा जैसी गंध से होते हुए पेड़ों के झुरमुट की ओर बढ़े और धक्क रह गए. दो आदमी बारी में अकेले रह गए लिटिया को काट रहे थे जो कुल्हाड़ी के हर प्रहार से दहल उठता था. क्या सचमुच, इस आम के पेड़ ने खुद को बचाने के लिए मुझे बुलाया होगा, सोचते हुए उन्होंने तेजी से लौट कर गाड़ी से पानी की बोतल निकाली और पेड़ के पास पहुंच कर पानी उसकी जड़ में धीरे धीरे गिराने लगे. पेड़ काटने वाले लकड़हारों के लिए भी यह उतना ही हैरतअंगेज था जितना जमीन पर लकड़ी की छिपटियों के पास रेंग रहे चींटों के लिए जो अब बिलबिलाकर भाग रहे थे.

वे दोनों कुल्हाड़ियां रोककर उकडूं बैठ गए, थोड़ी दूर पर पीपल के नीचे बिछी खटिया की ओर देखने लगे जिस पर एक जीन्स पहने एक लड़का लाल अंगौछे से मुंह ढांप कर सोया हुआ था. जमीन पर रखे पानी के लोटे के पास उसकी मोटरसाइकिल खड़ी थी. उन्होंने पेड़ की परिक्रमा करते हुए पूछा, “तुम लोग यह पेड़ किसके कहने पर काट रहे हो भाई?”

लकड़हारे उन्हें किसी अनहोनी की आशंका से देखते हुए देर तक चुप बैठे रहे. उन्हें लगने लगा कि वे कुछ कहने के बजाय फिर से अपना काम शुरू कर देंगे तब खटिया के पास गए, कई बार खंखारने के बाद भी लड़का सोया रहा. उन्होंने लकड़हारों की ओर मुड़कर पूछा, “ये कौन है भाई?”

इस बार अंगौछे के नीचे हलचल हुई, “इधर आओ सेंटर में तब बताएं कि कौन हैं, इतना तो जानते ही होगे न पेड़ क्यों काटा जाता है.”

उन्हें एक चुप्पी फैलती हुई लगी जिसके बीच में लड़के ने अचानक पूछा, “गाड़ी किसकी है?”

गांव छोड़ने के बाद के लंबे अंतराल ने उनका स्वामित्वबोध खत्म कर दिया था, उनकी यह कहने की हिम्मत नहीं हुई कि यह पेड़ मेरा है. उन्हें पहले पेड़ के बारे में कुछ कहने की हैसियत पानी थी, काफी टटोलने पर भी उन्हें भीतर कुछ नहीं मिला तो खोखली आवाज में पूछा, “जानते हो हम कौन हैं?”

“देखने में तो घूसखोर सरकारी दामाद लगते हो”, लड़के ने अंगौछे के भीतर से कहा.

अबकी चुप्पी इतनी लंबी खिंची कि असह्य हो गई. वे चलते हुए पोखरी की तरफ गए कि कुछ सोच सकें. उन्हें अशक्त कर देने वाली हैरानी हुई कि वे कुछ सोच ही नहीं पा रहे हैं, सिर्फ देखे चले जा रहे हैं कि पुरवाई में पोखरी का गंवई पानी हिलोर ले रहा है लेकिन उसमें कचरा शहर का उतरा रहा है. पान मसाले के पाउच, बोतलें, प्लास्टिक की पन्नियां, सैनिटरी नैपकिन, थर्मोकोल के गत्ते, धुल कर चमकते हुए टूटे खिलौने हिलते हुए दिखा रहे हैं कि यह जगह जितनी परिचित लगती है उतनी ही अजनबी हो चुकी है. अगर वह गांव में जाकर बड़के भइया से लिटिया को बचाने के लिए कहें भी तो वे यही समझेंगे कि मैं कहीं से भीटा बिकने की खबर पाकर हिस्सा बंटाने आया हूं. वह वापस लौटते हुए आखिरी बार पेड़ को देखने के लिए गए तो लड़के ने कहा, “ज्यादा जानकारी करनी है तो स्टेशन चले जाओ, अमेरिका भाई की सभा हो रही है, यहां वही कुछ बनवाएंगे.”

इतनी देर में उन्होंने जान लिया था कि यहां की हर चीज से उनके निशान मिट चुके हैं. अब दावा जताने का मतलब अपनी संपन्नता और सुविधापूर्ण जिंदगी का दिखावा करना और उसके जवाब में अपमानित होना होगा जबकि उनकी गुप्त इच्छा सराहे जाने की थी जो तब तक संभव नहीं थी जब तक कि वह गांव वालों के किसी काम नहीं आते. इस प्रक्रिया में इतना वक्त लगता कि तब तक लिटिया को कुर्सी, मेज, दरवाजा और खिड़की में बदल जाना था. वैसे भी जमीन शायद किसी अमेरिका नाम के आदमी ने खरीद ली थी जो पेड़ों को काटकर घर बनवाने जा रहा है.

वे वापस शहर लौट जाना चाहते थे, गाड़ी में बैठ भी चुके थे तभी उनके भीतर आशा पैदा हुई कि एक बार अमेरिका से मिलकर सिर्फ इस पेड़ को छोड़ देने के लिए कहें. क्या पता वह मान जाए, उसे भी तो लिटिया की खूबी का पता होगा. अगर नहीं माना तो वह इस जमीन को वापस खरीदने की बात भी कर सकते हैं जिसके लिए बड़के भइया आसानी से राजी हो जाएंगे क्योंकि इसे उन्होंने पैसे की तंगी में ही बेचा होगा. उन्हें अच्छा लगेगा कि वे इतने दिनों बाद घर-जमीन में अपना हिस्सा बंटाने नहीं, पूर्वजों की बनाई संपत्ति बचाने आए हैं.

उन्हें खुशी हुई कि वह अंततः इस समस्या का एक व्यावहारिक हल खोजने में कामयाब हो गए हैं. साथ ही कौतुक भी हुआ कि क्या राजनेता हारी बाजी को जीतने के लिए सबके द्वारा स्वीकार कर लिए जाने वाले प्रस्ताव का चुनाव इसी तरह की विपरीत परिस्थितियों में अचानक करते होंगे. उन्होंने वापस लड़के की खटिया के पास जाकर पहली बार आत्मविश्वास से ऊंची आवाज में कहा, “ठीक है, मैं तुम्हारे अमेरिका जी से बात करने जा रहा हूं, जब तक न लौटूं पेड़ कटवाना बंद कर दो.”

लड़के ने जल्दी से मुंह पर से अंगौछा हटाकर उन्हें हैरानी से देखा, “कोई है साथ में या अकेले!”

रेलवे स्टेशन की लाल बिल्डिंग विधानसभा चुनाव में खड़े एक मात्र शेरदिल प्रत्याशी एवं युवा हृदय सम्राट अमेरिका पटेल के पोस्टरों से इस तरह ढकी थी जैसे वह ईंट नहीं कागज की हो जिसे एक युवक की फोटो की चिनाई करके बनाया गया हो. छत पर पार्टी के झंडे लगे हुए थे.

रेल की तीन पटरियों के पार आम के बड़े बाग के बीच में ऊंचे टीले पर एक अखाड़ा हुआ करता था जहां पहले नागपंचमी का दंगल होता था, उसी टीले पर चौकियों के ऊपर चांदनी लगाकर मंच बनाया गया था. पेड़ों पर जहां तहां बंधे लाउडस्पीकर चिंघाड़ रहे थे. बाग के किनारे से लेकर पास के गांव को छूती नहर के बीच के चकरोड पर कारों, जीपों, ट्रैक्टरों की लंबी कतार थी. पेड़ों के नीचे चाउमिन, पकौड़ी, पान की दुकाने लग जाने के कारण मेले जैसा माहौल बन गया था. एक कसाई ने एक बकरा काट कर जमीन पर गड़े बांस की थूनी में लटका दिया था. किशोर लड़के सिर पर लाल टोपियां पहने दौड़ भाग रहे थे जिन पर “आई एम अमेरिका” लिखा हुआ था.

बाग के बीचो बीच दरी पर बैठे आसपास के गांवों से आए लोगों के आगे मंच पर अमेरिका का ऊंचा, तंदुरूस्त ललछौंहा कुत्ता खड़ा था जिसके गले में पीतल की जंजीर और बदन पर चर्बी की कसावट के ऊपर बाल चमक रहे थे. कुर्सी पर बैठा एक अधेड़ आदमी, अमेरिका के रुतबे को मिथकीय आभा देता हुआ, ताड़ के पंखे से कुत्ते को हवा कर रहा था. मंच के पीछे सफेद कुर्ते वालों के बीच तीन चिलमें घूम रही थीं, आसपास साफा पगड़ी बांधे राइफल-बंदूक लिए इतने लोग खड़े थे कि मंच किसी कबीले का खेमा लग रहा था.

हर कहीं हवा में झपटने को आतुर एक उत्तेजना थी, असहनशीलता सबसे अधिक उन युवाओं की आंखों में दिखाई दे रही थी जो इंतजाम में लगे हुए थे. रामअंजोर तुरंत समझ गए कि यह ऐसी जगह नहीं है जहां भीड़ में बेफिक्री से धक्के खाते हुए चला जा सके. इसी सतर्कता के कारण ही उन्हें बिना किसी से कुछ पूछे अमेरिका से बात करने का एक स्थायी सूत्र हाथ लग गया था. कान खुल जाने से उन्होंने जानलिया कि वह उनकी जमीन दबाने वाले पट्टीदार चाचा का लड़का यानि उनका छोटा भाई है जो उनके गांव छोड़ने के बाद पैदा हुआ था इसीलिए उससे अब तक अपरिचित थे.

उन्हें उम्मीद थी कि मंच के पास खानदान का कोई न कोई ऐसा आदमी जरूर मिल जाएगा जो उन्हें अमेरिका तक पहुंचा देगा लेकिन वहां तो नितांत अपरिचित लोगों की आक्रामक दीवार थी. वे बंदूकधारियों के बीच से मंच की ओर जाने लगे लेकिन थोड़ी देर बाद उन्हें पीछे धकेल दिया गया, “आपको दिखाई नहीं दे रहा है, उन्हीं का भाषण होने वाला है, कैसे आप बात कर लेंगे!”

रामअंजोर मंच के बिल्कुल पास पहुंच चुके थे. निराशा में ठिठक कर देखने लगे, जैसे बिजली गिरी हो, उन्होंने अचानक पहचाना, अमेरिका यादव के कुत्ते को पंखा झलने वाले वाले कोई और नहीं उनके बड़के भइया थे. वह एक मैली धोती के ऊपर चटक नया कुर्ता पहने, एक पैर कुर्सी पर धरे लयबद्ध पंखा डोलाने में इतने लीन थे कि पत्थर की मूर्ति लग रहे थे. जर्मन शेफर्ड नस्ल का ऊंचा कुत्ता बीच में हैरानी से उनकी ओर देखता तो वह उसकी पीठ सहला कर पुचकारते हुए कुछ कहते और वह आश्वस्त होकर सामने देखने लगता. उनके भीतर क्षोभ का भभका उठा, उन्होंने कुछ कदम आगे बढ़कर एतराज किया, “अरे वह मेरा छोटा भाई है, मुझे मंच तक तो जाने दो,”

“भाई!”

“हां भाई! मैं बहुत दूर से उसी से मिलने आया हूं, आज ही लौटना भी है.”

“हम लोग क्या उनके दुश्मन हैं, चलो बैठो अभी बुला लिया जाएगा.”

एक किनारे खड़े होकर जरा थिर होने के बाद उनका ध्यान सफेद पैंट कमीज पहने अमेरिका पटेल पर गया, वह हांफकर चीखते हुए बोल रहा था. लाउडस्पीकरों की एक दूसरे को काटती ध्वनियों के बीच जो कुछ कहा जा रहा था अब तक शोर था. अब शायद हवा बदल जाने के कारण कानों की झनझनाहट के बावजूद अचानक साफ सुनाई देने लगा, “…पाकिटमारी करके गुजारा चलाने वाले हमारे विरोधी हमें अपराधी कहते हैं, मैं आज उनको अपराधी का मतलब बताऊंगा लेकिन पहले आप जान लीजिए कि हमने आपकी आन-बान-शान की रक्षा का संकल्प लिया है, आपको दबाने की जो कोशिश करेगा, जो आपका हक मारने के लिए आंख उठाकर भी देखेगा वो इस हालत में पहुंच जाएगा कि देखने लायक नहीं बचेगा…मतलब आप समझ गए होंगे.

वह तालियों और हुल्लड़ के बीच सांस को सम करने के लिए रूका, रामअंजोर का ध्यान गया कि वह एक ऐसी सधी हुई भाषा में अपने विरोधियों को आंख निकाल लेने की धमकी दे रहा था कि उसे कानूनी रूप से पकड़ पाना संभव नहीं था. अगर संभव भी हो तो कानून का राज यहां कभी पहुंचा ही नहीं था. सारे वास्तविक फैसले उसकी हद के बाहर की जगह में किए जाते थे.

भाषण खत्म हो चुका था. देर से उनकी आंखे बड़के भइया पर टंगी थी जो मंच पर आते जाते लोगों से बचते हुए पंखा झले जा रहे थे. भीड़ बाग से बाहर जाने लगी तब रामअंजोर फिर अधीरता से मंच की ओर लपके. इस बार उन्हें दीवार ने बताया कि अमेरिका भाई अगली मीटिंग के लिए निकल चुके हैं, वहां पहुंचिए. वह फिर भी किनारे होकर मंच की ओर बढ़ते रहे, दो राइफलधारी लड़कों ने उन्हें खींचकर किनारे ले जाकर कहा, “आप प्रचार के लिए अपनी गाड़ी देने आए हैं न, चाभी और फोन नंबर दे दीजिए, चुनाव के बाद आपके घर पहुंचा दी जाएगी.”

वे अकबका गए, उनके कुछ कहने से पहले लड़कों ने पूछा,“तो क्या आप उनके रिश्तेदार नहीं हैं?”

“हां वो हमारे बड़का भइया हैं.”

उन्हें पीठ में लोहे की चुभन और रीढ़ की हड्डी में भय की झुरझुरी लगभग एक साथ महसूस हुई, पीछे से किसी ने भिंचती हुई आवाज में कहा, “चुपचाप चाभी दे!”

उन्होंने यंत्रवत जेब से चाभी निकाल कर एक राइफलधारी को थमा दी.

“अब अपना नंबर बताओ?”

उन्होंने बहुत कोशिश की, कुछ कहने के लिए कई बार व्यर्थ मुंह खोला लेकिन न फोन नंबर याद आ रहा था न आवाज निकल पा रही थी. उन्होंने गरदन मोड़कर कनखियों से पीछे देखा, वहां लिटिया का पेड़ कटवाने वाला लड़का हाथ में तमंचा लिए खड़ा था.

उनकी आवाज गायब हो गई थी और आंखे बाहर की ओर लटक आई थीं. अंततः उन्होंने बहुत कोशिश से मुंह खोलकर, थूक के झूलते तारों के बीच से कहा, “तब मैं किसका कुत्ता था!”

वे लड़के उन्हें हैरत से देखते हुए अचानक हंसने लगे क्योंकि वहां शब्द नहीं सिर्फ एक क्रुद्ध रिरियाहट थी. उन्हें लगा होगा कि एक अफसर उनके भय के कारण जानवर की तरह बोलने लगा है.

पनियल आंखों के आगे भीड़ रंगबिरंगे धब्बों में बदल गयी थी, उतरती सांझ में आम का बाग घूमता हुआ लग रहा था, उन्हें अपने भीतर सोचने समझने समेत हर तरह की शक्ति तेजी से निचुड़ती महसूस हो रही थी. वह किसी तरह भीड़ में लोगों से टकराते, लड़खड़ाते हुए स्टेशन की टिकट खिड़की ओर चले जा रहे थे. उनकी नजर एक छोटी सी भीड़ से घिरे कसाई पर अटक गई. उसने एक नया बकरा पैर से दाब रखा था, गर्दन पर छुरा चलाने के बाद गुनगुना खून छोटी सी लहर के रूप में उछलता हुआ उसके पंजों पर चढ़ रहा था. वह होंठ आगे की ओर निकाले, आंखे मूंदे, आनंद से सिसकारी ले रहा था.

(समाप्त)

 

 

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