सत्यनारायण व्यास की आत्मकथा, ‘क्या कहूँ आज’ का एक अंश

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10 अप्रैल 1952 को जन्मे डॉ. सत्यनारायण व्यास हिन्दी साहित्य में एक अनवरत सक्रिय नाम है. ‘असमाप्त  यात्रा’, ‘देखा जो कुछ’, ‘बचा हुआ सुख’, ‘देह के उजाले में’, ‘रचना की आँखों से’ इनके प्रमुख कविता संग्रह हैं. ‘नहीं अरण्यरोदन’ उनके साहित्यिक निबंधों की किताब है. आनंद कुरैशी की कहानियों को सम्पादित करते हुए ‘औरतखोर’ संग्रह प्रकाशित कराया है. क्या कहूँ आज’ डॉ. सत्यनारायण व्यास की आत्मकथा है जो कौटिल्य बुक्स ने प्रकाशित किया है. प्रस्तुत है इनकी आत्मकथा का एक अंश:

सत्यनारायण व्यास/ 

हम नवीं क्लास में आ गए थे। मेरे प्रिय साथी थे – जगदीश ओझा, भँवरसिंह और सुजान। ये तीनों ही पास के गाँव के थे और हमीरगढ़ स्कूल में पढ़ने हेतु किराए पर कमरा लेकर साथ ही रहते थे। मेरा तो अपना घर था ही। किन्तु रात्रि को व स्कूल समय के बाद पढ़ाई हम चारों ही एक साथ एक जगह बैठकर करते थे। पढ़ते-पढ़ते भूख लगने लगती। बार-बार रोटी क्या खाना! कुछ बाज़ार से महंगी चीज़ लाकर खाना हमारे बजट में नहीं था। सबने सोचा। और एक अनोखा आइडिया सामने आया। क्यों न हम चन्दा करके इकट्ठा गुड़ खरीद लाएँ और पढ़ते समय जब भूख लगे, तभी खा लिया करंे। उपाय बहुत शानदार था। चारों ने एक-एक रुपया एकत्र किया और चार रुपए का देसी ढीला गुड़ ले आए। अब चींटियों की समस्या थी। कमरे में लाल और काली दोनों तरह की चींटियां मीठे की तलाश में तैयार थीं। हम आखि़र ‘मनुष्य’ ठहरे। उपाय निकाला। एक मिट्टी का बड़ा कलश जो पुराना पड़ा था, उसे धो-सुखाकर साफ़ कर लिया और चले बाज़ार में गुड़ खरीदने। तब रुपए किलो गुड़ था। चार किलो में वह पात्र मुँह तक भर गया – लबालब। हमारे चेहरे खिल गए।

कमरे पर पहुँचे और चींटियों से बचाने हेतु कलश – जिसे हम ‘छुकल्या’ कहते थे – के मुँह को कपड़े से ढँककर छींकी बान्धी। फिर छत के कड़े में रस्सा डालकर लटकाया और छुकल्या को रस्से से बान्धकर हवा में छत के पास लटका दिया। रस्से का सिरा दीवार के खूंटे से बान्ध दिया ताकि वह नीचे न फिसले। यह हमारा अद्भुत सामूहिक आविष्कार था। रोज़ पढ़ते और दुपहर बाद रस्सा ढीला छोड़कर छुकल्या उतार लेते और जी भर गुड़ खाने के बाद वापस उसे ऊपर तानकर लटका देते । ऐसी रसभरी पढ़ाई शायद गाँव में हमारे अलावा और कोई नहीं करता होगा।

रोज़ पढ़ते और दुपहर बाद रस्सा ढीला छोड़कर छुकल्या उतार लेते और जी भर गुड़ खाने के बाद वापस उसे ऊपर तानकर लटका देते। ऐसी रसभरी पढ़ाई शायद गाँव में हमारे अलावा और कोई नहीं करता होगा।

पिताजी प्रायः मालवे में ही रहते थे। वहाँ वे सीतामाऊ के आसपास आठ गाँवों में कथा-पुराण और पौरोहित्य कर्म करते थे। इधर, गाँव में छोटी उम्र में ही यह कार्यभार मुझ पर आ गया था। मुझे याद है, दस साल का था तभी से गाँव में पूजा-पाठ, हवन-शांति, शादी-ब्याह-जनेऊ, पिण्ड-प्रदान, तर्पण आदि में जाने लगा था। मां मुझे घर और रास्ता समझाकर वहां भेज देती और मैं पैसे के लोभ में तत्परता से वहाँ पहुँच जाता। हमारे घर के अलावा वहां पंडिताई के औसरे में और भी ब्राह्मण परिवार अधिकृत थे और सच पूछो तो पूजा-पाठ का सारा काम वे ही कराते थे। मैं तो बच्चा था, पर ओथेराइज्ड हिस्सेदार था, सो उनकी मदद कर देता। जजमान के तिलक करना, लच्छा (मौली) बान्धना, दंपती के गठजोड़ा बांधना मैं कर देता। थोड़े-बहुत पूजा के मंत्र भी साथ-साथ बोल लेता। मैं अपने पिताजी की जगह उनका सहयोगी और बँटाईदार था। दो-तीन बड़े पंडित मुख्य काम संभालते। उनमें एक तो भट्टजी महाराज एक मेरे साथी गोपाल के पिताश्री और दो एक अधकचरा ज्ञान रखने वाले दाधीच-ब्राह्मण-युवक होते।

हवन-पूजा में मुझे लगता कि शास्त्रोक्त मंत्रोच्चार विधि-विधान गौण होता और लोकाचार खट्कर्म ज़्यादा होते। यजमान उसी से ज़्यादा प्रभावित और आश्वस्त होते।

एक रात मैं गहरी नींद में था कि माँ ने बड़े प्यार और लाड़ से मुझे जगाया और बोली – “ऐ बेटा, ऊठ तो। देखजे, पाछला बगेला में छोरी परणरी। तोरण पे बीन्द आग्यो। जा भाया। वां के परणबा की टेम व्हेगी। चँवर्यां में परणा’र आपणी पांती ले’र आजै। आपणे साग-भाजी का पईसा ही आजाई। उठो, बेटा। झट जा आओ।” नींद के गहरे सागर से मैं बाहर आया और आधी रात के सन्नाटे में, अन्धेरे और अकेलेपन से डरता विवाह स्थल पर पहुंच गया। घर में अंदर और बाहर शादी का शोरगुल था। सीधे वेदी पर पहुंचा। हवन की अग्नि प्रज्वलित हो चुकी थी। बुजुर्ग पंडितों ने मोर्चा संभाल रखा था। मुझे देखते ही बोले – “अरे सत्तू अबे आयो। व्हा कंई बात नीं। वा समिधा पड़ी जो ले’र आ। वां के तिलक कर दे, लच्छो बांध।”
विवाह संपन्न हो गया। विवाह का घर मेरे घर की पिछली गली में ही था। सब सामान समेटा। लपसी-चावल के दोने, पतासे, गुड़, गेहूं, देवताओं के राते-धोले कपड़े पर बने मंडल – सबकी पोटली बांध ली और बाहर आए। हम छोटे बड़े आठ-दस पंडित थे। हमेशा इतने ही रहते। हमारी गली का मुँह आ गया तो मैं बोला “यहीं पांती कर लो। आगे जाओगे तो मुझे अन्धेरे में वापस गोते खाकर आना पड़ेगा।” जानबूझकर मेरी बात को सबने अनसुना कर दिया और आगे बढ़ते रहे। वे मुझे सबक सिखाकर टोली से काटना चाहते थे, ताकि मैं पूजा का हिस्सा न ले सकूं। उनकी मनसा मैं भाँप गया पर छोटा था, क्या विरोध करता। ठेठ होळी की ठाण पर जाकर रुके और वहाँ पंचायती लेम्प की रोशनी में पांती करने बैठे। मैंने साथ नहीं छोड़ा। सामग्री-पैसे आदि की न्यायोचित पांती की गई। रात के तीन-चार बज रहे होंगे। आसपास कुत्ते भोंक रहे थे। उन सबके घर तो वहीं आसपास ही थे। मेरी पाँती में डेढ़ रुपए की रेज़गारी; कुछ पतासे जो गेहूं से भरे दोने पर मैंने रख लिए थे। दूसरे हाथ में लपसी चावल का दोना था। दोनों हाथों में दोने थामे, मैं डरता-डरता घर की ओर लौटने लगा। अन्धेरा, सन्नाटा और अकेला बालक। डर को दूर भगाया। पिताजी के बताए गायत्री मंत्र को जपता रहा।

मैं खाली हाथ काँपने लगा। सामग्री और रेज़गारी धूल में पड़ी थी। अन्धेरा था, न तो कुछ दिख रहा था और न सूझ रहा था। अपनी कमाई को मैं ऐसे ही छोड़ नहीं पा रहा था। न जा पा रहा था, न रुक पा रहा था।

थोड़ी दूर आया होऊंगा कि कजोड़ जी सेठिया हलवाई की दूकान की भट्टी के पास बैठे वो कुत्ते अचानक उठे और झपटकर भौंकने लगे। मुझे जो आशंका थी, वही हुआ। मैं एकदम इस अप्रत्याशित घटना से हिल उठा और मेरे हाथों से दोनों दोने नीचे धूल में गिर पड़े। कुत्तों ने भौंकना बन्द नहीं किया। मैं खाली हाथ काँपने लगा। सामग्री और रेज़गारी धूल में पड़ी थी। अन्धेरा था, न तो कुछ दिख रहा था और न सूझ रहा था। अपनी कमाई को मैं ऐसे ही छोड़ नहीं पा रहा था। न जा पा रहा था, न रुक पा रहा था। बड़े होने पर अपने अध्ययन में पाया कि मेरी हालत ‘कुमारसंभव’ में वर्णित तपस्या के बाद प्रकट हुए शंकर के द्वारा हाथ पकड़ लिए जाने पर पार्वती की ‘न ययौ न तस्थौ’ (लज्जा और संभ्रम के मारे पार्वती न तो जा पा रही थी और न खड़ी रह पा रही थी) वाली मनोदशा जैसी हो गई थी।

कुत्ते चबूतरे पर खड़े भौंके जा रहे थे। फिर भी, एक बार नीचे झुककर धूल में हाथ फेरा तो दो एक पतासे और दो-तीन सिक्के मेरे हाथ लगे। दोने धूल में औंधे पड़े थे, जिन्हें उठाना फिज़ूल लगा। मेरी जान की पड़ी थी। मैं धीरे-धीरे डग रखते हुए कुत्तों की आक्रामक रेन्ज़ से बाहर आया और हाँफते हुए घर की तरफ दौड़ लगा दी। माँ को सारा हाल कह सुनाया। माँ की व्यथा का क्या कहना! बोली, ‘व्हा बेटा, परा बळबादे पीस्या अर दूनां नै। गनकड़ा थारै बटको तो नँ भर्यो।” पुचकार कर मां ने मुझे वापस सुला दिया। दिन उगते ही, मैं घटनास्थल पर पहुंचा तो देखा के दोनों की भोज्य सामग्री कुत्ते खा चुके थे। कुछ पतासे और दो-चार सिक्के अब भी धूल से मेरी ओर झाँक रहे थे। पतासे-दोने छोड़ दिए और लपककर सिक्के उठा लिए। चलो, हादसे के बाद भी यही प्राप्ति क्या कम है? रुपया उन दिनों ‘रामजी’ था। सिक्के और मुद्रा इतने दुर्लभ थे कि गाँव का आधा कारोबार तो केवल धान या अनाज के विनिमय से ही आवश्यक चीज़ें खरीदकर चल जाता था।

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