कवियों की निरंकुशता से परेशान एक राजा

4

मनोज कुमार पांडेय/

मनोज कुमार पांडेय

कथाकार मनोज कुमार पांडेय की कहानियां आपने सौतुक पर पढ़ी हैं. लेखक अपनी कहानियों में उन मुद्दों को जगह देते हैं, जो सामान्यतः दर्ज नहीं हो पाता है. बेचैन कर देने वाली इनकी अनेक कहानियों से गुजरते हुए आपको अपने आसपास के भारत का एहसास होगा जिससे आप दूर कर दिए गए हैं.  इसी क्रम में पढ़िए उनकी एक और कहानी. कवि और लेखक मनोज कुमार पांडेय से उनके फोन : 08275409685 या ई-मेल : [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है.

स्वर्णदेश को प्राचीन काल से ही कवियों का देश कहा जाता था। इस मामले में जैसे स्वर्णदेश के हर बाशिंदे को कविता की देवी का वरदान हासिल था। यह दुनिया भर के लिए अचरज का विषय था कि इस देश के लोगों पर कविता की देवी इतनी मेहरबान क्यों हैं। लोग कविता में ही बोलते थे। कविता में ही रोते थे। कविता में ही हँसते बतियाते थे। कविता में ही प्रेम करते थे। कविता में ही खेती-किसानी और मेहनत-मजदूरी जैसे काम करते थे। कविता में ही खाते-पीते थे। कविता में ही दोस्ती करते और एक दूसरे पर कुर्बान भी हो जाते। कविता उनके लिए हवा और पानी की तरह थी। वे उसी में साँस लेते थे और उसी में जिंदा रहते थे।

यहाँ तक कि स्वर्णदेश के जिन बाशिंदों के पास रहने के लिए घर नहीं था वे भी बेपरवाह कविता के घर में रहते थे और खुश रहते थे। वे सारी चीजों के बिना रह सकते थे पर कविता के बिना नहीं रह सकते थे। इसी देश में कुछ लोग ऐसे भी थे जो कविता लिखते भी थे। वे न सिर्फ कविताएँ लिखते थे बल्कि उन्हें लोगों को सुनाते भी थे। अपनी किताबों में भी छपवाते थे। किताबें बिकती भी थीं। लोग उन कविताओं को पढ़ते भी थे। उन कविताओं में जाने क्या जादू था कि जो भी उन्हें पढ़ता अपने को थोड़ा और कवि महसूस करता।

वह अपने पड़ोसी से प्रेम करने लगता। किसी दुखियारे के दुख से दुखी हो जाता। किसी अनजाने की मदद करने लगता। वह और और गहरी साँस लेता और अपनी धरती, हवा, पानी और लोगों और जीव-जंतुओं यहाँ तक कि पेड़ों और पौधों से भी उसे मुहब्बत होती चली जाती। जो ज्यादा संवेदनशील होते वे तो कई बार कविताएँ पढ़कर उड़ने ही लगते। तब एक तरफ तो उन्हें इस धरती की खूबसूरती नए नए कोणों से दिखाई देती और वे उसे और और खूबसूरत बनाने में लग जाते। दूसरी तरफ उन्हें लोगों के दुख भी नए नए सिरों से दिखाई देने लगते और वे उन दुखों को दूर करने के उपाय करने में जुट जाते।

दुखों की स्वर्णदेश में कोई कमी नहीं थी। जितने मनुष्य थे उतनी ही तरह के दुख थे। उतनी ही तरह की पीड़ाएँ थीं। बल्कि कविता की भाषा में कहा जाय तो इस देश में एक तरफ दुखों के विशाल पहाड़ थे तो दूसरी तरफ पीड़ाओं की कभी भी न सूखने वाली नदियाँ। हर पल पहाड़ और ऊँचे हुए जाते और नदियों में साल भर बाढ़ की स्थिति बनी रहती।

यहाँ तक कि स्वर्णदेश के जिन बाशिंदों के पास रहने के लिए घर नहीं था वे भी बेपरवाह कविता के घर में रहते थे और खुश रहते थे

देश का भूगोल पूरी तरह से नष्ट भ्रष्ट ही हो गया होता अगर इसे कविता की देवी का वरदान न मिलता। इस वरदान ने ही स्वर्णदेश को वह अपूर्व संतुलन प्रदान किया जिसकी वजह से दुखों के विशाल पहाड़ और पीड़ाओं की हरहराती नदियों के बावजूद यह देश न सिर्फ जीवित रहा बल्कि दिन दूनी रात चौगुनी की गति से आगे भी बढ़ता रहा। जाहिर है कि यह सब कविता के सहारे ही संभव हो पाया। ऐसे में इस देश के लोग सब कुछ छोड़ सकते थे पर कविता छोड़ दें यह उनके लिए असंभव बात थी।

कविता उनके लिए वह घर थी जिसमें उन्हें दुख और पीड़ाएँ कम सताती थीं। यहाँ वह कई बार दार्शनिक हो जाते तो कई बार आध्यात्मिक। कई बार कविता में वह दुखों और पीड़ाओं के खिलाफ एक बड़ी जंग ही छेड़ देते। और अक्सर वे यह लड़ाई कविता के मैदान पर जीत भी लेते। इस जीत से वे इतने खुश हो जाते कि वे उन दुखों के भयानक पहाड़ और पीड़ा की हरहराती नदियों के बारे में भूल ही जाते जिनकी वजह से उनका जीवन नरक बना हुआ था। पर यह पूरी तरह से सच नहीं था।

बहुत सारे कवि ऐसे भी थे जो दुखों के पहाड़ और पीड़ा की नदियों के बारे में ही कविताएँ लिखा करते थे। उनका सपना था कि उनकी कविताओं में इतनी ताकत हो कि वे दुखों के इन बंजर पहाड़ों से पीड़ा की नदियों को पाट डालें और स्वर्णदेश को एक सुंदर समतल मैदान में बदल दें। इस मैदान पर स्वर्णदेश के निवासियों के घर बनाए जाएँ। फसलें और बाग बगीचे लहलहाएँ। स्कूल और अस्पताल बनें। कल कारखाने लगाए जाएँ। इन मुद्दों पर बहुत सारी कविताओं के बावजूद यह सब सपना ही रहा क्योंकि एक तो इस तरह की कविताएँ बहुत ही कम लोगों को पसंद आती थीं दूसरे स्वर्णदेश में सपने इतनी आसानी से पूरे भी नहीं होते थे। और कवियों के सपने तो शायद ही कहीं पूरे होते हों।

स्वर्णदेश के पिछले राजा अपने देश के लोगों के कविता प्रेम से बखूबी परिचित थे। न सिर्फ परिचित थे बल्कि देश भर में कविता महोत्सव, कविता नदी, कविता पहाड़ आदि नामों से तरह तरह के आयोजन भी करते रहते थे। वे कवियों को बड़े बड़े इनाम देते थे। इसके अलावा जब कोई मौका आता वे कवियों के प्रति सम्मान भी प्रदर्शित करते रहते थे। इतना ही नहीं पिछले राजा उन कवियों के प्रति भी बहुत कोमल व्यवहार करते थे जो दुखों के पहाड़ और पीड़ाओं की नदियों पर कविताएँ लिखते हुए उनके लिए सीधे राजा को जिम्मेदार ठहराते थे।

वे राजा जरूर थे पर उन्हें इतना पता था कि अब जमाना बदल गया है। अब न तो पुराने तरह के राजाओं का जमाना रहा न ही उनके प्रिय दरबारी कवियों का, जो राजा की तारीफ करते थे और इनाम पाते थे। अब नए तरह का राजतंत्र आ गया था जिसमें राजा का चुनाव सीधे प्रजा करती थी। न भी करती हो तो कम से कम उसे यह भ्रम तो दिया ही जाता था। ऐसे में जनभावनाओं का सम्मान करते हुए राजा कवियों का आदर करते थे। इस बात से कविता के घर में ही रहने वाली प्रजा भी खुश रहती थी और कविता को मान देने वाले राजाओं को ही अपना राजा चुनती रहती थी।

नए चुनकर आए राजा भी एक खास कवि और उसके काव्यनायक की पूजा करते दिखाई देते थे। यह इतना आम दृश्य था कि स्वर्णदेश की प्रजा उन्हें बहुत बड़ा कविता प्रेमी समझ बैठी और उसने राजा को अपने नए राजा के रूप में चुन लिया। इसके बाद प्रजा बहुत दिनों तक राजा के प्रिय कवि की कविताओं में डूबी रही। यह जैसे एक स्वतःस्फूर्त उत्सव था। यह बहुत मायावी उत्सव था। पीड़ा की नदियों में बाढ़ आ गई थी और दुखों का पहाड़ इतना ऊँचा हो गया था कि अब वह सूरज की रोशनी को भी रोकने लगा था।

इसके बावजूद प्रजा बहुत खुश थी। उसे लग रहा था कि पीड़ा की नदियों में आई बाढ़ उनकी जमीनों को उर्वर बनाएगी और दुखों के ऊँचे होते पहाड़ की वजह से उन्हें सूरज की गर्म और झुलसानेवाली किरणों का सामना नहीं करना पड़ेगा। इस उत्सव में जल्दी ही खलल पड़ गया। कवियों का एक बड़ा वर्ग ऐसा था जो नए राजा को पहले से ही सशंकित भाव से देख रहा था। राजा बनने के बाद राजा ने जो फैसले लिए उसने तो और भी बहुतेरे कवियों की नींद उड़ा दी।

यह बहुत पुरानी बात है कि कवियों को नींद नहीं आती पर नया राजा इस तथ्य से अनजान था। इसलिए जब इन कवियों ने पीड़ा की नदियों में आई बाढ़ और दुखों के पहाड़ की बढ़ती ऊँचाई के लिए राजा को जिम्मेदार ठहराते हुए कविताएँ लिखनी और गानी शुरू कीं तो नया राजा एकदम से बौखला ही गया। उसने पहले तो इन कवियों को उपेक्षित रखा पर जब उपेक्षा से भी इन कवियों को नींद नहीं आई और वे रात रात भर कविताएँ लिखते रहे तब राजा की बेचैनी बढ़ी।

नए राजा में धैर्य नहीं था इसलिए बेचैनी की अधिकता में एक दिन उसने इन कवियों के विरोध में एक वक्तव्य जारी किया और कहा कि इन कवियों को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह प्रजा की सच्ची उम्मीदों को ध्वस्त करें और मायावी उत्सव में खलल डालें। इसके बाद भी इन कवियों का रात रात भर जागना और कविता लिखना नहीं रुका। राजा क्रोध से लाल हो गया। वह समझता था कि उसका हल्का सा इशारा भी राजाज्ञा की तरह से लिया जाएगा पर यहाँ तो उसके वक्तव्य का भी कोई असर नहीं दिख रहा था।

राजा इन कवियों को गिरफ्तार ही करा देता पर सही समय पर गुप्त मंत्री आ गया। उसने कहा कि राजा को इस मसले को राजनीति से ही हल करना चाहिए। गुप्त मंत्री की सलाह पर राजा ने प्रजा के नाम जारी अपने अगले वक्तव्य में कहा कि ये कौन लोग हैं जो कविता के बहाने स्वर्णदेश और उसके लोगों को बदनाम कर रहे हैं। फिर राजा ने बताया कि यह पिछले राजा के चाटुकार हैं और वह यानी नया राजा इन्हें चाटुकारिता का मौका नहीं दे रहा है इसलिए यह उसे और उसके प्यारे देश और उसकी प्यारी प्रजा को बदनाम कर रहे हैं। पर आखिर प्रजा अपनी और अपने देश की यह बदनामी कब तक स्वीकार करेगी। इन कवियों को समझना चाहिए कि अगर यह अब भी नहीं रुके तो स्वर्णदेश की प्रजा इन्हें मिट्टी में मिला देगी।

राजा ने कहा कि इन हमलों के लिए ये कवि खुद ही जिम्मेदार हैं फिर भी वह इन हमलों की निंदा करता है और प्रजा से शांति बनाए रखने की अपील करता है

अगले दिन से ही इन कवियों पर हमले शुरू हो गए। राजा ने कहा कि इन हमलों के लिए ये कवि खुद ही जिम्मेदार हैं फिर भी वह इन हमलों की निंदा करता है और प्रजा से शांति बनाए रखने की अपील करता है। राजा की शांति बनाए रखने की अपील के बावजूद कवियों पर हमले नहीं रुके और हफ्ते भर के भीतर नौ कवियों को मार गिराया गया। इससे देश भर में खलबली मच गई। यह कविता में ही रहनेवालों का देश था इसलिए कवियों की हत्या को उन लोगों ने भी नहीं पसंद किया जिन्हें उनकी कविताएँ समझ में नहीं आती थीं या कि वे इन्हें पसंद नहीं किया करते थे।

राजा विदेश में था। विदेश से लौटते ही राजा ने कवियों पर हमले की कड़ी निंदा की और सभी विरोधी कवियों को सुरक्षा देने का एलान किया। साथ में राजा ने यह भी कहा कि यह कवियों की भी जिम्मेदारी है कि वे स्वर्णदेश में शांति बनाए रखें। सभी प्रमुख कवियों की सुरक्षा में सैनिक लगा दिए गए। यह कवियों की सुरक्षा का सवाल था इसलिए सैनिकों को आदेश दिया गया कि वह पल भर के लिए भी कवियों को अकेला न छोड़ें।

कवियों को इसकी आदत नहीं थी कि वे दिन भर बंदूकधारियों को अपने साथ लेकर घूमें। वे कविता लिख रहे होते तो उसी समय सैनिक अपनी निशानेबाजी का अभ्यास करने लगते। उनसे कहा गया था कि वे हर क्षण सतर्क रहें। कवि जब आँख मूँद कर पीड़ा की नदियों में गोते लगा रहे होते ठीक उसी समय सैनिक राजा के प्रिय कवि की कविताओं का सस्वर पाठ करना शुरू कर देते। कवि अपनी कलम को पोंछकर कागज पर रखते ही कि एक धायँ की आवाज के साथ कलम उड़ जाती। कवि जब शिकायत भरे स्वर में सैनिकों की तरफ देखता तो सैनिक कवि से विनम्र स्वर में क्षमा माँगते और बताते कि इसमें कवि की सुरक्षा ही छिपी हुई है कि सैनिकों की निशानेबाजी एकदम दुरुस्त रहे।

इसके बावजूद इन कवियों को कविता लिखने से नहीं रोका जा सका। ऐसी कविताएँ लगातार लिखी जाती रहीं जिनमें दुखों के ऊँचे होते पहाड़ और पीड़ा की भयानक नदियों का जिक्र होता। ऐसी भी कविताएँ लगातार सामने आ रही थीं जिनमें राजा को भी सीधे तौर पर चित्रित किया जा रहा था। राजा उन कविताओं को देखता तो उसके चेहरे पर एक क्रूर मुस्कराहट तैर जाती और इस बात से तो वह दंग ही रह जाता कि किसी कवि की अगली किसी कविता में उसकी वह क्रूर मुस्कराहट जस की तस दर्ज होती। वह डर जाता। वह समझ नहीं पाता कि आखिर एकदम अकेले में भी वह जो कुछ सोचता या करता है वह इन कवियों को कैसे पता चल जाता है। वह लाख कोशिशों के बावजूद भी कवियों को न तो डरा पा रहा था न ही कविता लिखने से रोक पा रहा था।

गुप्तचरों से मिली एक और खबर ने उसे परेशान कर दिया था। राजा के कई विश्वस्त गुप्तचरों ने उसे बताया था कि प्रजा के बीच राजा की कविता प्रेमी वाली छवि तेजी से खंडित हो रही है। प्रजा में यह सुगबुगाहट फैल रही है कि राजा का कविता प्रेम एक दिखावा भर था बाकी उसे किसी भी तरह की कविता में कोई दिलचस्पी नहीं है। उसने कविता के प्रति प्रेम का नाटक करके स्वर्णदेश की प्रजा को बेवकूफ बनाया था। राजा जब भी इन चीजों के बारे में सोचता उसे कँपकँपी होती। बहुत सोच विचार और सलाह मशविरे के बाद उसने पाया कि वह राजा बना रहे इसका एकमात्र रास्ता यही है कि इन कवियों और उनकी कविताओं को नियंत्रित किया जाय।

अगले दिन प्रजा को संबोधित करते हुए राजा ने कहा कि पिछले दिनों कवियों के साथ जो दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ घटी हैं उनसे वह भीतर तक आहत है। वह समझता है कि स्वर्णदेश के लोग अपने कवियों और उनकी कविताओं से किस हद तक प्रेम करते हैं। वह खुद बचपन से ही कवि बनना चाहता था बल्कि अभी भी वह भीतर से कवि ही है। वह स्वर्णदेश की गौरवशाली कवि परंपरा पर गर्व महसूस करता है और चाहता है कि कविता से प्रेम करने की यह पावन परंपरा अगली सदियों तक भी जारी रहे। आगे से ऐसी कोई अप्रिय घटना न हो इसलिए स्वर्णदेश का राजा होने के नाते वह कुछ स्थायी इंतजाम करना चाहता है। राजा ने बताया कि कविता के लिए अलग से एक विभाग बनाया जा रहा है जिसके मंत्री गुप्त मंत्री होंगे।

इस ऐलान के बाद राजा प्रजा की प्रतिक्रिया जानने के लिए देर तक रुका। इस बीच गुप्त मंत्री राजा को मुग्ध भाव से देखता रहा। फिर राजा ने कहा कि प्रजा को यह भी जानना चाहिए कि हाल में कुछ कवियों के साथ जो अप्रिय घटनाएँ हुईं उनके लिए कवियों की निरंकुशता ही ज्यादा जिम्मेदार थी। कवियों ने हमारी प्रजा की भावनाओं को चोट पहुँचाई थी। किसी को भी यह हक नहीं दिया जाना चाहिए कि वह किसी की भावनाओं को चोट पहुँचाए। कविता बहुत जिम्मेदारी का काम है, कवि को तो और जिम्मेदार होना चाहिए। इसलिए कविता लिखने के संदर्भ में आगे से कुछ नियम कायदे तय किए जा रहे हैं जिनका हर कवि को पालन करना ही होगा।

स्वर्णदेश की सुरक्षा और सम्मान को देखते हुए अब कविता के लिए विषय निश्चित किए जा रहे हैं। इन विषयों से इतर जो कविता लिखेंगे उन्हें कवि नहीं माना जाएगा। उनके साथ जो कुछ भी होगा राज्य उसके लिए जिम्मेदार नहीं होगा। इसके बाद गुप्तमंत्री ने विस्तार से बताया कि किन विषयों पर कविता लिखी जा सकती है और किन विषयों पर नहीं। गुप्तमंत्री ने यह भी कहा कि जीवन में संतुलन बहुत जरूरी है पर हमारे कवि अक्सर यह संतुलन भूल जाते हैं। इस वजह से वे ऐसे बहुत सारे विषयों को छोड़ देते हैं जिन पर कविताएँ लिखी जानी चाहिए पर बहुत कम लिखी गई हैं।

इसलिए कवियों की यह जिम्मेदारी है कि वे पहले इन विषयों पर लिखें जिससे कि संतुलन स्थापित किया जा सके। उन्हें स्वर्णदेश के सम्मान में, राजा के सम्मान में, हमारे धार्मिक नायकों के सम्मान में, स्वधर्मी राष्ट्रीय नायकों के सम्मान में, हमारे सैनिकों के सम्मान में खूब खूब कविताएँ लिखनी चाहिए जिससे कि इन कविताओं के माध्यम से देश और दुनिया में हमारे प्यारे स्वर्णदेश का नाम आलोकित किया जा सके। इसी तरह से पीड़ा की नदियों के अलावा भी बहुत सारी नदियाँ हैं और दुखों के पहाड़ के अलावा भी बहुत सारे पहाड़ हैं जिन पर लिखा जाना चाहिए।

अगर कवि इन पर लिखते हैं तो बाद में उन्हें दुखों के पहाड़ या पीड़ा की नदियों पर भी कुछ कविताएँ लिखने की छूट देने पर विचार किया जा सकता है। गुप्तमंत्री ने आगे कहा कि कौन सी कविताएँ छपने लायक हैं और कौन सी कविताओं से स्वर्णदेश के मान सम्मान और शांति को खतरा है इसका फैसला कविता संपादक मंडल करेगा। स्वर्णदेश के प्रमुख विश्वविद्यालयों के साहित्य विभागों से पाँच ऐसे आचार्य चुने गए हैं जिनकी स्वर्णदेश और उसके राजा के प्रति निष्ठा अंसंदिग्ध है। लिखी जाने के बाद सारी कविताएँ कविता विभाग को भेजी जाएँगी। और तब हमारा संपादक मंडल यह तय करेगा कि कौन सी कविताएँ अभी छापी जाएँगी, कौन सी कविताएँ कुछ साल रुककर छापी जाएँगी और कौन सी कविताएँ कभी नहीं छापी जा सकेंगी।

अब समय आ गया है कि यह तय कर लिया जाय कि कवियों की निरंकुशता ज्यादा बड़ी चीज है या कि स्वर्णदेश की सुख शांति और सम्मान। सभी लोगों ने सभी संभव तरीकों से ताली बजाई। आखिर कौन हो सकता था जिसे स्वर्णदेश की सुख शांति से एतराज होता। कविता लिखने के बारे में इन दिशा निर्देशों के बाद स्वर्णदेश में अजीब सी कविता स्थितियाँ पैदा हो गईं। वे कवि जो रात रात भर जागकर दुख के पहाड़ों और पीड़ा की नदियों के बारे में कविताएँ लिखा करते थे वे चुप हो गए।

वे रात रात भर जागते पर कविता की एक पंक्ति भी न लिख पाते। दूसरी तरफ ऐसे अनेक नए कवि प्रकट हो गए जो दिए हुए विषयों पर धड़ाधड़ कविताएँ लिखे जा रहे थे। कविता मंत्री के रूप में गुप्त मंत्री ने उन कवियों का राजकीय सम्मान किया और कहा कि असली कवि यही लोग हैं जो किसी भी विषय पर कविता लिख सकते हैं। चुप हो गए कवि उन लद्धड़ विद्यार्थियों की तरह हैं जिन्हें बस एक ही सवाल का जवाब आता है। दूसरा सवाल पूछने पर वे बगलें झाँकने लगते हैं। यह हमारे राजा ही कर सकते थे जिन्होंने असली और नकली कवियों के बीच एक स्पष्ट विभाजक रेखा खींच दी है।

ऐसा नहीं था कि स्वर्णदेश की प्रजा की पीड़ा और दुखों को अपनी कविता में जगह देनेवाले कवि चुपचाप बैठे हुए थे। वे बार बार लिखते और काटते। कई बार तो कविताएँ पूरी भी हो जातीं जिन्हें वह मन ही मन बुदबुदाते फिर फाड़कर फेंक देते। उनकी सुरक्षा में लगे सैनिक उन टुकड़े टुकड़े कागजों में देर तक कविताएँ खोजते रहते। कविताएँ अक्सर तो उन्हें मिलती ही नहीं और कभी मिल भी जातीं तो वे उन्हें समझ ही न पाते। कभी समझ में आ जाती तो वे निशानेबाजी का अभ्यास शुरू कर देते। उन्हें यही आदेश था।

पर कवि लोग भी कम शातिर नहीं थे। उन्होंने जल्दी ही कविता लिखने के कुछ ऐसे तरीके खोज निकाले कि एक बार तो राजा दंग ही रह गया। ऐसे ही एक कवि ने राजा का एकदम अलग ही चित्रण कर डाला। इस कवि के राजा में एक भी बुराई नहीं थी। यह राजा हर तरह से ईमानदार था। कभी झूठ नहीं बोलता था। इसने कभी भी किसी गलत व्यक्ति को मंत्री नहीं बनाया। इसे चाटुकारिता से भयानक चिढ़ थी।

इस हद तक कि कई बार तो उसने चाटुकारों को अपने राजमहल से उठवाकर बाहर फिंकवा दिया था। वह हमेशा अपनी कमियाँ जानना चाहता था। यहाँ तक कि अखबारों वगैरह में भी अगर कोई उसकी झूठी तारीफ करे तो वह उस अखबार को मिलने वाले सरकारी विज्ञापन आदि पर रोक लगा देता था। वह फकीर की तरह रहता और खाता पीता था। बेईमानी न तो वह खुद करता था न ही अपने किसी भी छोटे बड़े सहयोगी को करने देता था। अब तक राज्य की आम प्रजा का खून चूसनेवाले पूँजीपति उसके नाम से ही थरथर काँपते थे।

इसी तरह से उस कवि ने राजा की और भी न जाने कितनी अच्छाइयों का वर्णन किया।     संपादक मंडल कवि के झाँसे में आ गया और किताब प्रकाशित हो गई। पर हुआ यह कि कवि की यह किताब छपकर आई ही थी कि उसे गिरफ्तार कर लिया गया। उस पर आरोप था कि वह राजा की छवि खराब कर रहा है। ऐसा राजा स्वर्णदेश तो क्या दुनिया के किसी भी देश में मुमकिन नहीं है।

राजा ने गुप्त मंत्री से कहा कि मेरी छवि इतनी तो उन कवियों ने भी नहीं खराब की जो मेरा विरोध करते हैं। इस कवि को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए ताकि दूसरे तमाम कवि ऐसा कुछ लिखने से पहले कम से कम सौ बार सोचें। राजा ने आदेश दिया कि उस राजाद्रोही कवि की किताब की सभी प्रतियाँ जब्त कर ली जाएँ और उन किताबों की लुग्दी बनाकर कवि के पिछवाड़े में तब तक डाला जाय जब तक कि वह मर ही न जाय। इस पर तुरंत ही गुप्त मंत्री ने राजा को याद दिलाया कि हुजूर इस किताब में कुल एक हजार पंद्रह बार आपका नाम भी आया है। इस तरह की सजा तो खुद राजा की यानी कि आपकी ही अवमानना हो जाएगी।

उन्होंने जल्दी ही कविता लिखने के कुछ ऐसे तरीके खोज निकाले कि एक बार तो राजा दंग ही रह गया

राजा गुप्त मंत्री की इस तत्परता से बहुत खुश हुआ। वह इस बात से भी बहुत खुश हुआ कि गुप्त मंत्री ने राजा यानी कि खुद उसके नाराज होने की परवाह किए बिना राजा की गरिमा का मान रखा। राजा ने उसे गले लगाया और अपने कर्तव्य पालन के लिए बधाई दी। इसके बाद अपने संशोधित आदेश में राजा ने कहा कि कवि को एक कैंची दी जाय और उससे कहा जाय कि वह अपनी पुस्तक की सभी प्रतियों से राजा का नाम ससम्मान काट कर उन्हें निकाले। और जोर जोर से उन्हें पढ़ता हुआ एक एक कर अपने घर की दीवारों पर चिपकाता जाय। इसके बाद ही उसे वह सजा दी जाय जिसका आदेश पहले दिया गया था।

यह अलग बात है कि इसके बाद भी वह कवि आश्चर्यजनक तरीके से बच गया। उसने राजा का नाम अपनी किताब से काटने में बहुत सारा समय लगाया और इस बहाने लगभग पूरी किताब ही काटकर चिपका डाली। राजा के आदेश के पालन में बचे हुए कागजों की लुग्दी बनाकर उसके पिछवाड़े में डाला तो गया पर इस लुग्दी ने उसकी घातक बवासीर पर मलहम का ही काम किया।

कुछ दूसरे कवियों ने दुश्मन देश के राजा के खिलाफ कविताएँ लिखनी शुरू कर दी। इसमें उन्हें अलग से कुछ नहीं करना था। वे पहले की तरह ही राजा के खिलाफ कविताएँ लिखते और नीचे लिख देते कि यह कविता पड़ोसी देश के राजा पर है जिसके अत्याचारों से पड़ोसी देश की प्रजा त्राहि त्राहि कर रही है। कितना अच्छा हो कि उन्हें भी स्वर्णदेश के राजा जैसा राजा मिले। ये कवि कुछ दिन तक तो बचे रहे और अपनी कुछ नई किताबें छपवाने में कामयाब भी हो गए पर राजा ने उन्हें भी एक दिन पकड़ ही लिया।

एक दिन जब उनमें से कुछ राजा के राजा बनने की तीसरी वर्षगाँठ पर राजा की उपस्थिति में कविता पाठ कर रहे थे तो राजा अचानक से भड़क गया। उसने चिल्लाते हुए सभी कवियों को बंदी बना लेने का आदेश दिया। बाद में उसने गुप्तमंत्री को गुदगुदी करते हुए बताया कि क्या वह जानता नहीं कि कौन सी बुराइयाँ उसके अंदर हैं और कौन सी पड़ोसी राजा के अंदर। ये कवि लोग अपने को बहुत चालाक समझते हैं। ये पड़ोसी राजा के बहाने उसकी ही बुराई कर रहे थे।

अनेक कवियों ने कविता का शिल्प ही त्याग दिया। वे अपने लिखे को टूटा फूटा गद्य, पागलपन की डायरी, न तुक की न ताल का जैसे अजीबोगरीब नाम देते और पत्रिकाओं में छपा लेते। गुप्त मंत्री ने उनकी भी चालाकी पकड़ ली और नई आज्ञा जारी की कि कवियों को सिर्फ कविता लिखने का ही अधिकार है। वे कुछ और लिखना चाहते हैं तो उन्हें इसके लिए विशेष अनुमति लेनी होगी और कारण बताना होगा कि उन्होंने कविता लिखना क्यों बंद कर दिया है। सैनिकों से कहा गया कि कवियों द्वारा लिखित जवाब न देने की स्थिति में उनसे कलम और कागज विनम्रतापूर्वक छीन लिया जाय। उनके टाइपराइटर और कंप्यूटर उनसे माँग लिए जाएँ और उन कवियों के हवाले कर दिए जाएँ जो राजा द्वारा सुझाए गए विषयों पर कविता लिखना चाहते हैं। संसाधनों को सिर्फ उनके पास होना चाहिए जो उनका स्वर्णदेश और उसके राजा के हित में सही उपयोग जानते हों।

कवि चुप हो गए थे। वे दिन रात अस्फुट स्वरों में न जाने क्या बड़बड़ाते रहते। उनकी बड़बड़ाहट स्वर्णदेश की हवा में अजीब सी बेचैनी पैदा कर रही थी। स्वर्णदेश की कविता प्रेमी प्रजा पहले से ही बेकल-विह्वल थी। मायावी उत्सव का जादू तार तार हो रहा था। प्रजा फिर से उन कवियों को ढूँढ़ रही थी जो दुखों के पहाड़ और पीड़ाओं की नदियों के बारे में कविताएँ लिखा करते थे। प्रजा की समझ में ही नहीं आ रहा था कि आखिर राजा को इन कवियों से क्या परेशानी हो रही थी। अगर दुख और पीड़ा की बात कविता में भी नहीं की जा सकती तो फिर कहाँ की जा सकती है।

जल्दी ही लोग अपनी अपनी पसंद की कविताओं के लिए सड़कों पर उतर आए। उन्होंने एक स्वर में एलान किया कि राजा कुछ भी करे उन्हें कोई खास मतलब नहीं पर कविताओं पर किसी भी तरह का प्रतिबंध बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। अपनी apani पसंद की कविताओं को जोर जोर से पढ़ते हुए प्रजा ने राजमहल को सब तरफ से घेर लिया। कविताओं के शोर और संगीत से राजा का महल काँप रहा था।

उधर दुखों के पहाड़ या कि पीड़ा की नदियों पर तैर रही बहुत सारी कविताएँ जिन्हें कवियों द्वारा लिखा जाना था इंतजार करते करते थक गई थीं। वे व्यग्र होकर हवा में इधर उधर चक्कर काट रही थीं। देखते ही देखते वे कविताएँ लोगों की साँसों में समा गईं। लोग साँस लेते और कोई तीखी कविता उनके भीतर का हिस्सा बन जाती। हवा बहती तो उसमें कोई बेचैन कविता सुनाई पड़ती। हवा चुपचाप लोगों के कान में कोई कविता गुनगुना जाती। बारिश होती तो सब तरफ कविताएँ ही कविताएँ नजर आतीं। कविताओं के असर से लोग भीग भीग जाते।

राजा इन स्थितियों से अनजान नहीं रहा। वह जान चुका था कि स्थितियाँ अब उसके काबू के बाहर चली गई हैं। स्थितियों पर काबू करने की आखिरी कोशिश के रूप में राजा ने हवा को आदेश दिया कि वह बहना बंद कर दे। बदले में हवा ने राजा को जी भरकर कविताएँ सुनाईं। राजा ने बारिश को बरसने से मना किया। बदले में बारिश ने कविताओं की ऐसी बारिश की कि कविताओं की बाढ़ में राजा बह ही गया। यह बारिश बहुत ही अलबेली थी। दुखों का पहाड़ कविताओं की मार से बौना नजर आ रहा था और पीड़ाओं की नदियों का पानी इतना पारदर्शी हो गया था कि नदियों के तल में छुपी हुई पीड़ाएँ भी साफ साफ पहचानी जा सकती थीं।

समाप्त!

(यह कहानी हिंदी की मासिक पत्रिका हंस में पहले प्रकाशित हो चुकी है)

4 COMMENTS

  1. मनोज कुमार पाण्डेय हिंदी की युवा पीढ़ी के प्रतिनिधि लेखक है।उनकी यह कहानी भी बड़ी कुशलता से सत्ता को बेनकाब करती है।
    उन्हें बधाई।

  2. Anoothe pratikon ke madhyam se snkalan samsyaon ko batane ka adbhut prayas. Shubhkamnaen Sir! Aap lagatar dhardar lekhan karate rahen.

  3. Anoothe pratikon ke madhyam se smkalin samsyaon ko batane ka adbhut prayas. Shubhkamnaen Sir! Aap lagatar dhardar lekhan karate rahen.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here