युवा कवयित्री अनुपम सिंह की अम्मा! तुम्हारे बेटे और अन्य कविताएँ

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तस्वीर saatchiart.com से साभार

अनुपम सिंह का जन्म उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में लबेदा नामक गाँव में हुआ.  प्रारंभिक शिक्षा गाँव के ही सरकारी विद्यालय में हुई. इन्होंने स्नातक,परास्नातक की डिग्री इलाहाबाद विश्वविद्यालय तथा पीएचडी की डिग्री दिल्ली विश्वविद्यालय से प्राप्त की. कवितायें लिखती हैं, अनेक पत्र-पत्रिकाओं में छप चुकी हैं. कविताओं के साथ-साथ समकालीन कवयित्रियों के रचनाकर्म पर आधारित लेख भी इधर प्रकाशित हुए हैं. इनसे इनके इमेल[email protected] पर संपर्क किया जा सकता है.

अनुपम सिंह

 हे मेरी अन्नपूर्णा

चमकती है उनकी देह

जब चमकती है

आँगन में कुदाल

खेत का कोन गोड़ते

जब कभी लगती है

पाँव में चोट

साथिन लगा देती है

खेत की मिट्टी

 

रात आती है उन्हें नींद

जब उनके बच्चे

पढ़ -लिख,

खेल-कूद

खा – पी

सो जाते हैं

 

दोनों रसोई में बैठ

देर तक करते हैं

दुधहे धान की बातें

लटकी बालियों का वज़न नापते

एक दूसरे को

अकवार भर प्रेम

करते हैं

 

ख़ुश होते हैं

अपने पसीने की गंध से

जब कोई फ़कीर

कोई जोगी

सारंगी की धुन पर

कहता है

 

हे! मेरी अन्नपूर्णा

हे! मेरे अन्नदाता

***

अम्मा ! तुम्हारे बेटे

बांस की कैनियों से लचकदार

देह और मन की यह लोच

बनी रहे तुम्हारे बेटों की

 

जिनके अभी रेख उठी है

जिनके हाथ फ़ौलादी नहीं हैं

वे इस बात पर शर्मिंदा हैं

यह शर्म बची रहे

 

मन किसी छनौटे के समान

जिससे छन जाता है

उनका किशोर झूठ

उनमें अभी इतना लड़कपन है

यह लड़कपन बना रहे

 

वे हँसते हैं

खेलते हैं

उनकी तरल हंसी का

नदी होना बना रहे

अम्मा ! कभी जवान न हों तुम्हारे बेटे

***

 जहाँ मैं हूँ

यहाँ स्त्री की आग से अच्छी मेल-जोल है

उसके चुटकी में अट जाती है

उसकी मुक्ति

चुटकी भर मुक्ति के लिए

गीले उपले-सी

सुलगती है वह

 

यहाँ जहाँ मैं हूँ

आसमान साफ़ है

दिन बर्फ की तरह ठंडा

शिविर नहीं है फिर भी

यातनाओं में गुजरती है रात

यह जो नए साल में

सूरज-सा चमक रहा है

यह रात का हत्यारा है .

***

जबड़े में रोटी दबाये

 

जबड़े में रोटी दबाये

दरवाज़े से बाहर चली जाती है रात

हिंस्र पशुओं-सा

झपट्टा मारता है सुबह का सूरज

तसले में ख़ून की तरह

रिसती रहती है सांझ

अधूरी कविताओं का बोझ लादे

छटपटाहट में पन्ने फाड़ती

दांत भीतर की तरफ़ भींचे रहती हूँ

रेक्सीन की फाइलों-सी

चमकदार है मेरी मुस्कान

***

मुकम्मल क़ैदखाना

क़ैदखाने की तरह खुलता है एक घर

बंद होता है क़ैदखाने की तरह

चेहरे पर खींच दी गई हैं लकीरें चुप्पी की

दम साध रेंगती हैं औरतें

मेरे सपनों में

 

एक रोबीले चेहरे वाला आदमी

जिसके चेहरे में दिखाई देता है

कई-कई चेहरा

उसकी आँखों को ताने हुए हैं लाल डोरे

मूंछों से झांकती है नृशंस हँसी

 

यह न जेल है

और आदमी न जेलर

फिर भी यह मुकम्मल क़ैदखाना है

जाने कहाँ-कहाँ से लाकर

यहाँ क़ैद की गयी हैं औरतें

 

एक दूसरे की झुकी हुई  पीठ का

रक्त साफ़ करती

मलहम मलती औरतें

छज्जों से चिपकी हैं छिपकलियों सरीखी

सूखते हुए घावों ने चमोट लिया है

उनकी पीठ

वे लटकी हैं पंखे की कमानी पर

जैसे कुएं की घिर्रियों पर

बाल्टियाँ लटकती हैं

उनके सांसों की बदबू से

ठस्स हो गई है हवा

 

मैं खोज रही हूँ

क़ैदखाने की चाभियाँ

धरती आसमान को उलटकर

लगाती हूँ गोता नदियों में

जबकी चाभियाँ खुद ही  छुपा आई थी

अपनी पहुँच से बहुत दूर

अपनी आत्मा गिरवी धर

खोज रही हूँ आँखें अपनी

***

तुम मेरे तलुए तक कभी क्यों नहीं जाते

मेरे चहरे पर खोने और पाने के दुःख

एक साथ तैर आते हैं

मैं चल रही हूँ एक थिर से

दूसरे थिर के बीच

 

मेरा एक पाँव कीचड़ में है

एक तपती रेत में

सब जानते हैं प्रेम की ठोस हकीकतें

फिर भी कल्पनाओं ने लहरों पर घर बनाया

 

मेरी भौतिक आस्थाओं ने

गढ़ लिया है एक स्वर्ग

अपनी बिखरी उम्मींदें लिए

तुमसे वे रोज मिलती हैं

 

उसी सड़क पर खड़ी हूँ

जहाँ थामा था हाथ मेरा

हमारे निशान यहाँ पेड़ों पर

अब भी बाकी हैं

एक बार फिर से

वही सड़क दिखाना चाहती हूँ

 

चाहती हूँ अपनी तार्किकतायें गाड़ दूँ

फिर हहाकर व्यक्त करूँ

अपना दुःख

अपना शोक

मेरी भावुकताएं ही कसती हैं गला मेरा

कोई! खरीद क्यों नहीं लेता इन्हें

कौड़ी के मोल

 

दृश्य एकदम साफ़ झलक रहे हैं

फिर कुछ दिखाई क्यों नहीं देता

मैं कैद हूँ प्रेम और बिछोह

श्राप और आशीर्वाद की कंदराओं में

 

मैं उनकी ब्याहता हूँ

उनकी बिधवा

प्रेमिका हूँ उनकी

मैंअपने बच्चों कीसरल ह्रदय माँ हूँ

फिर भी मैं प्यासी हूँ

और डूब रही हूँ

 

मैंने पीने दिया आत्मा का सारा अमृत

विष छुपा लिया अपनेतलुए में

मेरे तलुए में छुपी बैठी है मेरी औरत

तुम रेशा-रेशा उघाड़तेहो मुझे

तुम मेरी औरत को कभी खोज नहीं पाते

तुम मेरे तलुए तक कभी क्यों नहीं जाते .

***

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