क्या 2018 का चुनावी साल 2019 को समझने में मददगार साबित होगा?

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जितेन्द्र राजाराम/

राजस्थान और तेलंगाना को छोड़ कर इस वर्ष के सभी अन्य विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. यह चुनावी साल भी अब ख़त्म होने वाला है. इस साल जहाँ पंजाब, कर्नाटक और गुजरात के चुनाव कांग्रेस के लिए हौसला बढ़ाने वाले रहे वहीँ गोवा, मणिपुर, त्रिपुरा मेघालय के चुनाव में मोदी लहर के ब्राण्ड से भाजपा ने ख़ूब माहौल बनाया.

लेकिन जिन राज्यों में भाजपा को स्पष्ट बढ़त मिली उन राज्यों के चुनाव परिणाम से राष्ट्रस्तर की राजनीति का तापमान मापना मुश्किल जान पड़ता है. इसके उलट पंजाब, कर्णाटक और गुजरात के चुनाव जो इशारा करते हैं वह सत्तारूढ़ दल के लिए चिंता का सबब हो सकता है. इसी श्रृंखला में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव परिणाम भी देखे जायेंगे.

अगर इन राज्यों के परिणाम भी गुजरात, कर्णाटक जैसे रहे तब तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि केंद्र सरकार के खिलाफ हवा बहनी शुरू हो चुकी है. मीडिया के द्वारा खड़ा किया हुआ ‘मोदी-करिश्मा’ अब फीका पड़ने लगा है. लेकिन अगर इसके उलट हुआ तो चुनावी पंडितों को गुणा-गणित करना थोड़ा और भारी पड़ेगा. उनके लिए अनुमान लगाना मुश्किल होगा कि 2019 के लोकसभा चुनाव में क्या समीकरण बनेगा!

अगर इन राज्यों के परिणाम भी गुजरात, कर्नाटक जैसे रहे तब तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि केंद्र सरकार के खिलाफ हवा बहनी शुरू हो चुकी है

अभी जो स्थिति बनती दिख रही है वह यह कि इन राज्यों में सत्ता की चाभी छोटे व्यापारियों, किसानों, युवाओं और महिलाओं के पास होगी. लेकिन इसके बावजूद भी चुनावी परिणाम का आंकलन करना मुश्किल प्रतीत हो रहा है.

अब मध्य प्रदेश का ही उदाहरण लें, तो जब राहुल गांधी के इंदौर रोड शो के दौरान रजवाड़ा स्थित कपड़ा और बर्तन व्यापारियों ने कांग्रेस अध्यक्ष का भव्य स्वागत किया तो स्थिति स्पष्ट होती दिख रही थी.

इंदौर-5 विधानसभा के वोटर प्रमोद शर्मा  कहते हैं कि इन्होंने पहली बार कांग्रेस को वोट दिया है. उनके मुताबिक़ वो और उनका परिवार आजीवन भाजपा का वोटर रहा है. लेकिन इसबार इनके परिवार को परिवर्तन होते देखना है इसलिए इनलोगों ने कांग्रेस के साथ जाना चुना है. इनके अनुसार भाजपा मध्य प्रदेश में बेहद निरंकुश हो चुकी है.

वहीँ दूसरी तरफ, लोग इस क्षेत्र यानी मालवा की तुलना गुजरात चुनाव के दरम्यान सूरत क्षेत्र से आये चौंकाने वाले परिणाम से कर रहे हैं. नोटबंदी और जीएसटी लाये जाने के बाद सूरत के व्यापारियों ने केंद्र सरकार के खिलाफ बड़े-बड़े विरोधी आयोजन किये थे लेकिन भाजपा गुजरात में इसी सूरत के बदौलत इज्जत बचाने में कामयाब हो पाई.

इसी तरह चुनावी पंडितों को लग रहा है कि अगर भाजपा मध्य प्रदेश में चौथी बार वापस आती है तो वह मालवा के रास्ते ही आ सकेगी. वर्तमान में मालवा को भाजपा का गढ़ माना जा रहा है.

खैर चुनावी परिणाम जो भी हों इन राज्यों के चुनावी प्रचार ने कम से कम यह तो स्पष्ट कर ही दिया है कि भाजपा आने वाला लोकसभा चुनाव विकास के मुद्दे पर नहीं लड़ने वाली है. स्टार्ट-अप इंडिया, स्टैंड-अप इंडिया, मेक इन इंडिया, विकास जैसे इस सरकार के अति-प्रचारित मुद्दे इस चुनाव से सिरे से गायब हैं. बल्कि इनकी जगह सबरीमाला, पाकिस्तान, अयोध्या, राम-मंदिर, जवाहरलाल नेहरु  इत्यादि जैसे मुद्दों ने ली है. इसमें सबसे मजेदार बात यह है कि इन सबको उछालने वाला दल कोई और नहीं बल्कि सत्ताधारी पार्टी भाजपा ही है. इसका सीधा से मतलब तो यही निकलता है कि सरकार के पास जनता को दिखाने के लिए कोई ख़ास उपलब्धि नहीं है.

दूसरी तरफ, कांग्रेस भी इन मुद्दों को मुद्दा नहीं बना पा रही है. मुख्य विपक्षी दल होने के नाते कांग्रेस से यह अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि वह सरकार को इन मुद्दों के इर्द-गिर्द घेरे. राहुल गाँधी राफेल और किसानों के मुद्दे को तो इस्तेमाल कर रहे हैं पर स्टार्ट-अप इंडिया जैसे भारत सरकार के अति-महत्वाकांक्षी योजनाओं का क्या हुआ इसपर बात नहीं कर रहे हैं.

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