मोदी पत्रकारवार्ता से दूरी क्यों रखते हैं, इसका जवाब हालिया अमेरिकी परिदृश्य में मिलता है  

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जितेन्द्र राजाराम/

वर्तमान में चारों तरफ फलती-फूलती राष्ट्रवादी राजनीति के दो धुरंधर डोनाल्ड ट्रम्प और नरेन्द्र मोदी के बीच बिल्कुल धागे भर का फर्क है. इतना महीन कि गौर से न देखें तो पता ही ना चले.

यह धारणा पिछले सप्ताह और प्रबल हुई जब अमेरिका के राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में सीएनएन के रिपोर्टर जिम अकोस्टा  ट्रम्प से मुखातिब थे. उनके तीखे सवाल पर ट्रम्प की नाटकीय प्रतिक्रिया देखकर ऐसा लगा कि मीडिया के कठिन सवाल से भागने वाली ये घटना कहीं और भी हुई थी. कुछ देखी-सुनी सी. जोर देने पर याद आया कि यह अपने ही देश भारत में हुई थी. मीडिया के सामने और कोई नहीं अपने माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी थे.

तब, बतौर गुजरात मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी, वरिष्ठ पत्रकार करण थापर को साक्षात्कार देने की प्रक्रिया में थे. लेकिन सवाल इतने भारी लगे कि मोदी जी को  पानी  पीना पड़ा और उससे भी बात नहीं बनी तो उन्होंने गले से माइक नोच लिया था. यह तस्वीर जेहन में बैठ गई थी जिसको याद दिलाया ट्रम्प और जिम अकोस्टा वाली घटना ने.

भारतीय मीडिया बात-बेबात मोदी की तुलना ट्रम्प से करता रहता है. किसके ट्वीटर पर फौलोअर अधिक हैं इत्यादि. लेकिन क्या मजाल जो मीडिया को इन दो नेताओं के मीडिया को दे रहे ऐसे साक्षात्कार की तुलना करने का ख्याल भी आया हो?

जिम अकोस्टा को यह कह कर वाइट हाउस से प्रतिबंधित कर दिया गया की उक्त प्रेस-कांफ्रेंस (जिसमें  ट्रम्प सवालों से भाग रहे थे) में उन्होंने इंटर्न महिला-पत्रकार से बदतमीजी की है. खैर, सीएनएन ने कोर्ट में इस फैसले के खिलाफ अपील की और तत्कालीन तौर पर इसे रद्द करवाने में सफलता हासिल की है.

शायद लोकतंत्र का चौथा खम्बा इसे ही कहते हैं. जुझारू और निर्भीक.सत्ता से टकराने की इच्छा और माद्दा रखने वाला. भारतीय पत्रकारिता के सेल्फी युग की तरह नहीं, जहां पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के सारे तीखे सवाल विपक्ष के लिए होते हैं. प्रधानमंत्री से जो सबसे तीखे सवाल पूछे जाते हैं वह हैं, ‘आप बहुत लगन और मेहनत से काम कर रहे हैं, ऐसा कैसे कर लेते हैं?’ या ‘आपमें एक फकीरी है, यह कैसे आई? धीरे-धीरे या अचानक से?’ ये सवाल भी प्रेस वार्ता में नहीं पूछे जाते. यह सब साक्षात्कार में पूछा जाता है जो उन चैनलों और पत्रकारों को नसीब होता है जो घोषित तौर पर जनता के खिलाफ हैं और सत्ता के साथ.

ट्रम्प का अकोस्टा के साथ उस बहस को देखते हुए उसका भारतीय सन्दर्भ दिमाग में चलता रहा और यह सवाल गूंजता रहा कि यह पत्रकार वार्ता है जो हमारे देश के प्रधानमंत्री कभी आयोजित ही नहीं करते. ऐसा क्यों? इसका जवाब ट्रम्प को देखते हुए समझ में आ रहा था.

अकोस्टा से बहस करते हुए ट्रम्प फ़िज़ूल की बातें कर रहे थे पर उनके चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं थी. ट्रम्प कहीं से नर्वस नहीं लग रहे थे. उनके चेहरे पर जो आत्मविश्वास था वह काबिलेतारीफ था. मैंने जब मोदी को ट्रम्प की जगह पर रखा और कारन थापर के साथ उनका साक्षात्कार याद किया तो लगा कि अगर मोदी यहाँ रहते तो उनका चेहरा लाल हो जाता. उनके चेहरे से परेशानी दिख जाती. यह उनको पसंद नहीं है. लोगों के बीच उन्होंने मजबूत नेता की छवि बनाई है. शायद यही वजह है कि मोदी ट्रम्प की तरह खुला पत्रकार वार्ता आयोजित ही नहीं करते.

इन दो नेताओं के तुलना के बाद वापस अमेरिका और भारत के मीडिया की तुलना पर आते हैं. उस अकोस्टा वाले उस पत्रकारवार्ता में या उसके बाद की घटनाओं से अमेरिकी पत्रकारिता का चरित्र देखा जा सकता है. इस चरित्र के दूरगामी परिणाम होते हैं. मीडिया अपने सवालों से जनता में आत्मविश्वास पैदा करती है. लोगों को खुद पर भरोसा होता है.

शायद यही वजह है कि अमेरिकी युवा वहाँ के चुनाव की तैयारी में लग गए हैं. वहां के नौजवान बढ़-चढ़ कर मतदाता सूची में अपना नामांकन करवा रहे हैं. न्यू जर्सी के सीनेटर कोरी बुकर अफ़्रीकी-अमिरीकी मूल के पहले सेनेटर हैं. उन्होंने प्रचार किया कि “वोट नहीं देना मतलब बागी होना नहीं है बल्कि यह सत्ता के समक्ष समर्पण करने जैसा है”.

दूसरी तरफ, भारत में मध्यप्रदेश की कुछ विधानसभाओं में एक राजनीतिक सर्वेक्षण में पाया गया कि ज्यादातर जनता ये मानती है की उनकी गरीबी, उनका तरस खाने लायक कठिन जीवन उनकी बदकिस्मती की वजह से है. वो मान चले हैं कि उनके जीवन का स्तर कोई सांसद, विधायक या मंत्री ठीक नहीं कर सकता. ये सर्वेक्षण मध्यप्रदेश के सुदूर हलकों से लेकर राजधानी भोपाल के विधानसभा गेट से ठीक 200 मीटर दूर एक घनी बस्ती भीम-नगर में भी किया गया था. वह बस्ती जिसके सामने से 230 विधायक और दर्जनों मंत्री साल में कम से कम 50 बार गुजरते होंगे. इन नेताओं को देखकर भी इन लोगों में बदलाव की कोई उम्मीद नहीं दिखती क्योंकि मीडिया ने सपने दिखाना बंद कर समर्थक बनाने का जिम्मा उठा लिया है.

इन लोगों के पास बदलाव का कोई स्वप्न नहीं है बल्कि बुद्दू-बक्से पर नाग-नागिन का नाच और पुनर्जन्म के किस्से और सरकारी गुणगान ही हैं. ऐसे कंटेंट से स्वप्न नहीं आते बल्कि अन्धविश्वास बढ़ता है और आत्मविश्वास कम होता है.

(जितेन्द्र राजाराम  आजकल भोपाल में रहते हैं और सामाजिक राजनितिक बहस में खासा दिलचस्पी रखते हैं. इन विषयों को समझने -समझाने के लिए वे इतिहास और आंकड़ो  को अपना हथियार बनाते हैं. जितेन्द्र इन दिनों भारतीय राजनीति की बारीकियों को समझने के लिए दिल्ली, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक होते हुए मध्य प्रदेश पहुंचे हुए हैं.)

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