भारत के साथ सम्बन्ध प्रगाढ़ करने में इस्राइल क्यों दिखा रहा है इतनी रूचि!

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सौतुक डेस्क/

ऐतिहासिक तौर पर किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की इस्राइल की पहली यात्रा समाप्त हुई. नरेंद्र मोदी की तीन दिवसीय यात्रा को दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों के लिहाज से बड़ा कदम माना जा रहा है. अलबत्ता दोनों देशों के बीच नेपथ्य में यह कुटनीतिक सम्बन्ध करीब पचीसों साल से रहे हैं लेकिन भारत कभी खुलकर इस सम्बन्ध को ऐसे स्वीकार नहीं  करता रहा है.  इस यात्रा के बाद वैश्विक सम्बन्ध के हिसाब से नए ध्रुवीकरण की भी सम्भावना है.  दोनों देशों के लिए इस सम्बन्ध के अपने अलग मायने हैं जैसे भारत वैश्विक राजनीति में अहम भूमिका अदा करता हुआ दिखेगा. सनद रहे कि इस्राइल और अन्य अरब देशों में बहुत अच्छे सम्बन्ध नहीं रहे हैं. इसकी वजह रहा है फिलिस्तीन. चूँकि भारत इन अरब देशों से काफी जुड़ा रहा है और देश में मुस्लिम आबादी भी अच्छी खासी है, इसको देखते हुए इस्राइल से सम्बन्ध परदे के पीछे ही निभाया जाता रहा है. अरब देशों और इस्राइल की राजनीति में भारत को अब सामंजस्य बनाना थोड़ा कठिन होगा पर जो होगा वह विश्व राजनीति में नोटिस किया जायेगा. वहीँ इस्राइल भी यूरोपीय देशों पर व्यापार की अपनी निर्भरता को कम करते हुए एशियाई देशों की तरफ रुख करता दिख रहा है.

यह तो रहा एक पक्ष. इसका दूसरा पक्ष क्या है. भारत में बहुत ऐसे लोग हैं जो मानते हैं कि इस्राइल से सम्बन्ध बनाने के लिए  भारतीय जनता पार्टी अधिक आतुर रहती है और इसके पीछे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वैचारिक पक्ष काम करता है. अगर ऐसा है भी तो इस रिश्ते के प्रति इस्राइल क्यों इतना जोर लगा रहा है?

कहते हैं कि इस्राइल के प्रधानमंत्री सबकी आवभगत इतनी शानो-शौकत से नहीं करते जितनी इस बार भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की की है. अब तक ऐसे लगाव का इजहार अमेरिका के राष्ट्रपति और पोप के लिए ही अरक्षित रहा है. आखिर क्या वजह है कि इस्राइल के प्रधानमन्त्री बेंजामिन नेतान्याहू मोदी के लिए इतनी गर्मजोशी दिखा रहे थे.

इसको समझने के लिए कुछ आंकड़ो को समझना होगा. इसी अप्रैल में इस्राइल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज (आईएआई) ने भारत के साथ लगभग 2 अरब डॉलर के सौदे की घोषणा की और इस तरह  यह इस्राइल के इतिहास में सबसे बड़ा रक्षा सौदा तय हुआ. इस सहमती के अनुसार इस्राइल  भारतीय सेना को परिष्कृत हवा और मिसाइल रक्षा प्रणाली प्रदान करेगा.

वर्तमान में इस्राइल के कुल रक्षा निर्यात का लगभग 40 प्रतिशत भारत को आता है और इस तरह इस्राइल भारत के साथ रक्षा सौदा करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश बना.

रक्षा सौदों के अतिरिक्त इस्राइल रोबोटिक्स,  कृषि सिंचाई, डेयरी, ड्रोन इत्यादि मामले में काफी उन्नत तकनिकी रखता है और भारत आजकल तकनिकी सुधार जैसे डिजिटल भुगतान और ई-शासन पर काफी जोर दिए हुए है. इस लिहाज से भी देखें तो भारत इस्राइल के तकनिकी के लिए एक बड़ा बाजार है. इन दो देशों के बीच वर्ष 1992 में जहां द्विपक्षीय व्यापार 200 करोड़ डॉलर था वहीँ अब ये बढ़कर 4.16 अरब डॉलर हो गया है.

सनद रहे कि इस यात्रा के दौरान इन दोनों देशों के बीच मुख्य मुद्दे भी यही रहे हैं. भारत और इस्राइल के बीच जल, कृषि और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी से निपटने के लिए सात प्रमुख समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए हैं. दोनों देशों ने संयुक्त नवाचार के उद्देश्य से 40 मिलियन डॉलर का निधि भी बनाने की घोषणा की है.

इस यात्रा के दौरान पत्रकारों से नरेन्द्र मोदी कहा, “इजरायल नवाचार, जल और कृषि प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में अग्रणी राष्ट्रों में से एक है – यह भारत के विकास के प्राथमिक क्षेत्रों में भी है.”

 

ऐसे में यह स्पष्ट हो रहा है कि इस सम्बन्ध को गति देने में भारत के जो भी पक्ष हो इस्राइल का तो सिर्फ व्यसाय ही उद्देश्य दिखता है. इस्राइल भारत को अपनी तकनिकी बेचने के लिहाज से बड़ा बाजार मानता है और ग्राहक को खुश करने के लिए एक व्यवसायी जो कुछ कर सकता है करेगा.

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