उधार की व्यवस्था में आधार का रोल

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फोटो: हाउसिंग.कॉम से साभार

जितेन्द्र राजाराम/

अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या नरेन्द्र मोदी के पास आधार है? कौन पता करेगा? इस सवाल को थोड़ा  आगे बढायें तो बात अमित शाह, राजनाथ सिंह, अरुण जेटली से होते हुए मुकेश अम्बानी, अनिल अम्बानी तक पहुंचेंगी. क्या इन लोगों के पास आधार है? इस सवालों की गली में निकलने पर नीरव मोदी, मेहुल चोकसी, विजय माल्या का नाम भी जेहन में आता है कि उनके पास आधार था कि नहीं? यह सवाल इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि सरकार बात बेबात आधार के फायदों में, फर्जीवाड़ा कम होने की दुहाई देती है. तो अगर इनलोगों के पास आधार था तो वर्तमान के सबसे बड़े घोटाले क्यों नहीं रुक पाए! और अगर इनके पास आधार नहीं था तो हमारे पास क्यों हैं?

वो इसलिए कि आप भी इन बड़े नामों के चक्कर में कहीं गलती से अमीर होने की न सोच लें. या अमीर होना तो छोड़िये, कभी गलती से पढने-लिखने, इलाज वगैरह के वास्ते कोई लोन ले लिया और चुकाने के समय कुछ और बीमार हो गए तो बैंको को आसानी से पता चल जाए कि आप किस अस्पताल में इलाज करा रहे हैं. वरना यह यूँ ही नहीं है कि सरकार वर्तमान में दो ही कामों को सबसे अधिक तरजीह दे रही है, आपको कर्ज लेने के लिए प्रोत्साहित करना और आधार लेने के लिए मजबूर करना. ऐसे में यह तो नहीं हो सकता कि इन दोनों में कोई सम्बन्ध ही न हो.

ऐसे समझिये. फ़र्ज़ कीजिये की आपका कोई जाना-पहचाना शहर छोड़ के जा रहा हो, और आपको कोई अंदाजा न हो कि वो कहाँ जा रहा है. उसी समय वह शख्स आपसे उधार मांगने पहुँच जाए तो क्या आप उस दोस्त को उधार देंगे? और आपके पास पैसा भी हो और देने की मंशा भी. सोच में पड़ गए आप!

कोई बात नहीं, दूसरी स्थिति की कल्पना करते हैं. सोचिये कि अगर एक दोस्त जिसकी सरकारी नौकरी है. उसके पास अच्छा घर, गाड़ी और परिवार हो और वह दोस्त आपसे कहे कि इसे उधार दे दो अगर इसने वापस नहीं किया तो मैं हूँ न. इस ‘मैं हूँ न’ में दोनों कुछ भी हो सकता है कि सरकारी आदमी कर्जदार को ढूंढ निकालेगा या उसके बदले पैसा दे देगा…. तब तो फिर आप उस शख्स को कर्ज दे देंगे न! आपके मन में चल रहा द्वन्द कुछ कम हुआ होगा.

आधार,सरकार की तरफ से साहूकार को दिया गया एक वचनपत्र है कि अमुक इंसान का पता ठिकाना हमें मालूम है और अगर यह कहीं भागेगा तो उसे धर दबोचेंगे

वापस आधार पर आते हैं जिसे न्यायालय तरह-तरह के आश्वासन देकर उलझाए हुए है और इसी बीच भारत सरकार इस आधार का विस्तार करती जा रही है. ये सरकार की तरफ से साहूकार को दिया गया एक वचनपत्र है कि अमुक इंसान का पता ठिकाना हमें मालूम है और अगर यह कहीं भागेगा तो उसे धर दबोचेंगे. कर्ज देने वालों के लिए ये सरकार की तरफ से कितना बड़ा आश्वासन है!

सपाट लहजे में कह दी गयी बात थोड़ी असहज लगती है. सोचिये, जब क्रेडिट कार्ड से ऑनलाइन पेमेंट की सुविधा एक दशक पुरानी है और जब एक दशक पहले ही पे-पल ने लगभग पूरे यूरोप और पूरे अमेरिका में डिजिटल पेमेंट की क्रांति ला दी थी, तो फिर भारत में पेटीएम, एम-पैसा, जियो-मनी जैसे डिजिटल पेमेंट की क्रांति इतनी देर से क्यों आई? और अचानक भी? इसको पढ़ते हुए अगर सरकार के तीसरे बड़े काम ‘नोटबंदी’ का कोई ख़याल आपके मन में आ रहा है तो आप से इतना ही कहना है कि आप एक स्वतंत्र देश के नागरिक हैं और सोचने का अधिकार आपसे कोई नहीं छीन सकता.

खैर मुद्दे पर आते हैं और थोडा पीछे चलते हैं. फ्लिपकार्ट ने ऐसा क्या किया जो अमेज़न से लेकर बाकी सारे देशी-विदेशी ऑनलाइन दूकानें नहीं कर पाई थीं. इस पूर्व के देशी ऑनलाइन दूकान ने कैश-ऑन-डिलीवरी का अविष्कार किया था. यानि की आर्डर अभी दे दीजिये, पैसे तब दीजियेगा जब माल घर पहुँच जाये. सोच के देखिये कि इस धंधे में जोखिम कितना है. कहते हैं कि आधार के आने के बाद फ्लिपकार्ट उन इलाकों में भी कैश-ऑन-डिलीवरी देने लगा जहाँ से उधारी डूबने की स्थिति में बकाया वसूलने की लागत, बेचे गए सामान की कीमत से कहीं ज्यादा होती.

कहते हैं कि आधार के आने के बाद फ्लिपकार्ट उन इलाकों में भी कैश-ऑन-डिलीवरी देने लगा जहाँ से उधारी डूबने की स्थिति में बकाया वसूलने की लागत, बेचे गए सामान की कीमत से कहीं ज्यादा होती

आंकड़ों का खेल देखिये, बिल और रसीद का कोड अंक होता है, आर्डर दिया गए माल का कोड अंक होता है, ग्राहक का भी कोड अंक होता है लेकिन ग्राहक की पहचान का भी कोड अंक हो जाए तो ये मशीन लैंग्वेज हमारी जियो-लोकेशन को इतनी बारिकी से पकड़ेगा कहीं भी छिपना असंभव हो जायेगा. इस लहजे में आधार का महत्व समझिये.

आधार कार्ड कोई नयी विधा नहीं है, इसका सफल उपयोग पहले अमेरिका में हो चुका है, वहां इसे सिक्यूरिटी टैग कहते हैं. कई देशों ने वीजा-धारक परदेसियों को भी वहां का आधार कार्ड रखना अनिवार्य कर दिया है.  तो सवाल है कि आधार क्या है?

आधार कार्ड एक तरह का कंट्रोल सिस्टम है जो अर्थव्यवस्था में उधारी और तगादे (क्रेडिट फ्लो) को संचालित करता है. इससे पूंजीवाद का रक्त यानि कैपिटल का संचार बना रहता है. इस बात को अगले हफ्ते विस्तार दिया जाएगा.

(जितेन्द्र राजाराम  आजकल भोपाल में रहते हैं और सामाजिक राजनितिक बहस में खासा दिलचस्पी रखते हैं. इन विषयों को समझने -समझाने के लिए वे इतिहास और आंकड़ो  को अपना हथियार बनाते हैं. आप उनसे उनके नम्बर 9009036633 पर संपर्क कर सकते हैं.)

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