मोदी पाकिस्तान के साथ मिलकर साजिश करने वालों के खिलाफ एक्शन क्यों नहीं लेते?

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उमंग कुमार/

पाकिस्तान को औकात दिखाने के नाम पर सत्ता में आये नरेन्द्र मोदी को देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाले तीन साल हो गए. अगर उनकी मानें तो इन तीन सालों में पाकिस्तान की औकात इतनी बढ़ गयी है कि अब यह पडोसी मुल्क भारत के राज्यों का मुख्यमंत्री तय करने लगा है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात चुनाव प्रचार के दरम्यान कांग्रेस के बड़े नेताओं जिनमें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी शामिल हैं, पर पकिस्तान के साथ मिलकर गुजरात के खिलाफ साजिश रचने का आरोप लगाया.

लेकिन सवाल यह है कि देश के प्रधानमंत्री होने के नाते नरेन्द्र मोदी को ऐसी किसी साजिश की खबर मिलते ही तुरंत एक्शन में आना चाहिए था. साजिशकर्ताओं के खिलाफ कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए थी. लेकिन प्रधानमंत्री ने अब तक ऐसा कुछ भी नहीं किया गया जिससे इतने संवेदनशील मुद्दे पर उनकी गंभीरता का पता चले.

बनसंकठा में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए देश के प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख गुजरात चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं. पाकिस्तानी लोग मणिशंकर अय्यर के घर पर मीटिंग कर रहे हैं. इस मीटिंग से गुजरात के लोग, पिछड़ा समुदाय, गरीब लोग और मोदी की बेइज्जती हुई है. ऐसा कहते हुए उन्होंने लोगों से पूछा कि आपको नहीं लगता कि ऐसी चीजों से संदेह होता है.

“यह एक गंभीर मसला है,” मोदी ने कहा और साथ में कांग्रेस से यह भी मांग की कि गुजरात में भाजपा को तगड़ी चुनौती देने वाली पार्टी को जनता के सामने अपना पक्ष रखना चाहिए.

लेकिन सवाल यह है कि देश के प्रधानमंत्री होने के नाते नरेन्द्र मोदी को ऐसी किसी साजिश की खबर मिलते ही तुरंत एक्शन में आना चाहिए था. साजिशकर्ताओं के खिलाफ कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए थी.

ये सब न करके गुजरात की रैली में लोगों के सामने पाकिस्तान को लाकर मोदी ने न केवल अपनी पोल खोली है बल्कि उस जनता के भी जिसको मोदी जैसे नेता इतना कमजोर समझते हैं कि पकिस्तान के नाम पर कुछ भी बोल दो और जनता उनके दल को वोट दे देगी.

अलबत्ता पूर्व सेना प्रमुख और मनमोहन सिंह दोनों ने पत्र लिखकर मोदी के इस बयान की भर्त्सना की है और यह समझाया है कि चुनाव जीतने के लिए किसी हद तक नीचे गिरना प्रधानमंत्री को शोभा नहीं देता. सिंह ने तो आधिकारिक बयान जारी करते हुए नरेंद्र मोदी से क्षमा मांगने की अपील की है. उधर पकिस्तान से भी बयान आ गया है कि भारत को अपनी रोजमर्रा की राजनीति में पकिस्तान का इस्तेमाल करना बंद करना चाहिए. लेकिन क्या इससे नरेन्द्र मोदी पर कोई असर पड़ेगा?

इसका जवाब बहुत आसान है. मोदी को मालूम है कि जीतने पर सबकुछ जायज है और हारने पर सबकुछ गलत. मोदी भारत के शायद पहले प्रधानमंत्री है जो चुनाव को कुछ अधिक गंभीरता से लेते हैं और राज्यस्तरीय चुनाव में भी उतनी ही सक्रियता से भाग लेते हैं जैसे जैसे दूसरे प्रधानमंत्री लोकसभा चुनाव में भाग लेते रहे हैं. यह तो फिर भी गुजरात है जहां मोदी का अपना गुजरात मॉडल दांव पर लगा है जिसके नाम पर पूरे देश से वोट माँगते रहे हैं. इसलिए मोदी सारी लक्ष्मण रेखा पार कर वहाँ गुजरात के जनता से वोट मांग रहे हैं.

बिहार चुनाव के प्रचार में यह कहा था कि अगर भाजपा हारती है तो पकिस्तान में पटाखे छूटेंगे

इसके पहले बिहार के विधान सभा चुनाव में भाजपा ने पकिस्तान का नाम इस्तेमाल किया था. अमित शाह तो ने दो तिहाई बहुमत आने का दावा करते हुए बिहार चुनाव के प्रचार में यह कहा था कि अगर भाजपा हारती है तो पकिस्तान में पटाखे छूटेंगे. अलबत्ता अब तक ऐसा कोई सबूत सामने नहीं आया है जिससे अमित शाह की बात मानी जाए. बिहार की जनता ने नरेन्द्र मोदी और उनकी टीम के नकारत्मक चुनाव प्रचार को ख़ारिज कर दिया था. शाह के दो-तिहाई बहुमत के दावे की तो बात ही अलग है.

गुजरात चुनाव में भी अमित शाह ने दो तिहाई बहुमत लाने का दवा किया है और राज्य में 22 साल से सत्तारूढ़ दल के सर्वेसर्वा नरेन्द्र मोदी फिर उसी पुराने हथकंडे को अपनाने की कोशिश कर रहे हैं. अगर इससे कुछ अंदाजा लगाया जाय तो यही लगता है कि भाजपा की हालत गुजरात में सही नहीं है और पार्टी के लोगों को इसकी भनक लग गयी है.

 

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