क्या मध्य प्रदेश में मोदी और चौहान का चेहरा चुनाव जीताने वाला नहीं रहा?

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जितेन्द्र राजाराम/

मध्य प्रदेश में चुनाव सर पर हैं और नामांकन में महज गिनती के दिन बचे हैं. दिवाली की वजह से छुट्टियाँ भी इतनी हैं कि नामांकन के लिए कुल जमा चार तारीख बची है. ऐसे में दो बड़े दल, भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ने अभी तक अधिकतर उम्मीदवारों के नाम की घोषणा तक नहीं की है. क्या हैं इसके मायने!

मध्य प्रदेश के चुनाव में सक्रिय लोग इस देरी को कई तरीके से देख रहे हैं. खासकर, भाजपा के लिए लोग कह रहे हैं कि नरेन्द्र मोदी या शिवराज सिंह चौहान के नाम पर चुनाव जीतना संभव नज़र नहीं आ रहा है. इस बार स्थानीय उम्मीदवार जीत के हिसाब से बड़ी भूमिका में होंगे. अब दिक्कत यह है कि प्रत्येक विधानसभा सीट पर एक से अधिक उम्मीदवार हैं जो चुनाव जीतने की स्थिति में दिख रहे हैं. इनमे से कई ऐसे हैं जिन्हें अगर पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो ये पार्टी की हार सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगे. यह सब देखते हुए भाजपा के बड़े नेता पसोपेश में हैं कि करें तो क्या करें.

इस पार्टी के सामने दूसरी बड़ी चुनौती है संघ बनाम पार्टी के कार्यकर्ता. राज्य के कई सीटों पर संघ से जुड़े लोगों ने भी अपना दावा पेश किया है. भोपाल में बैठे भाजपा के लोगों को मालूम है कि अगर संघ को नाराज़ किया गया तो चुनाव जीतना मुश्किल होगा. यह पार्टी संघ कार्यकर्ताओं के बूते ही जमीनी लड़ाई लड़ती आ रही है. दूसरी तरफ पार्टी से जुड़े कई लोग हैं जिनको पार्टी नाराज़ नहीं करना चाहेगी. इन कार्यकर्ताओं ने भी पार्टी के लिए अपने पंद्रह बीस साल गंवाएं हैं और अगर ये नाराज़ हुए तो पार्टी को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है.

कांग्रेस के साथ भी यही स्थिति है. टिकट मिलते ही यह समझ में आ जाएगा कि कमल नाथ खेमा अधिक मजबूत स्थिति में है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया खेमा. यह स्पष्ट होते ही एक खेमा भाजपा से लड़ाई के प्रयास को आगे बढ़ाएगा तो दूसरा कांग्रेस के लिए किसी भी सम्भावना को ख़त्म करने की कोशिश में लग जायेगा.

दिक्कत यह है कि प्रत्येक विधानसभा सीट पर एक से अधिक उम्मीदवार हैं जो चुनाव जीतने की स्थिति में दिख रहे हैं

इसके अतिरिक्त और भी वजहें हैं जिसकी वजह से राज्य की दोनों बड़ी पार्टियाँ टिकट बंटवारे में देरी कर रहीं हैं.

सभी सर्वेक्षण दोनों दलों के बीच का फासला लगातार कम होता हुआ देख रहे हैं, ऐसे में, अन्य उभरते हुए दल समीकरणों को इस कदर बिगाड़ सकते हैं कि ज्यादा प्रतिशत मतदान प्राप्त करने वाली पार्टी के प्रत्याशी भी सदन से दूर रह जाएँ इसकी बड़ी सम्भावना है.

मध्यप्रदेश में ऐसा पहली बार हो रहा है की मुकाबला सिर्फ दो दलों के बीच न होकर कई दलों के बीच होना है. ग्वालियर संभाग में दलितों को एहसास हो गया है कि भाजपा उन्हीं का समर्थन लेकर उन्हीं की शाख़ काट रही है, इसलिए अब वो कालिदास के नए अवतार में आ रहे हैं. जबलपुर संभाग में गोंडवाना पार्टी ने भी आदिवासियों की चेतना में यह स्थापित कर दिया है कि अब मध्यभारत की राजनीति आदिवासियों का हित साधे बिना नहीं चलेगी. वहीँ झाबुआ-अलीराजपुर के आदिवासिओं ने भी ताल ठोंक दी है.

दिल्ली में एतिहासिक जीत दर्ज करने वाली आम आदमी पार्टी ने भी रिंग में अपनी हैट फेंक दी है. आम आदमी पार्टी मध्यप्रदेश की राजनीति में इस लिए भी मायने रखती है क्योंकि 2014 और 2015 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों में ‘आप’ के प्रचार के लिए सबसे ज्यादा स्वैच्छिक कार्यकर्ता मध्यप्रदेश से ही गए थे और दिल्ली के कई विधायक मध्य प्रदेश के मूलनिवासी हैं. ग्वालियर और छतरपुर के प्रान्त जो दिल्ली से सीधे संपर्क में रहते हैं वहां दिल्ली की राजनीति का खासा असर देखने को मिलता है.

दोनों मुख्य दलों के अलावा राज्य में कई छोटे दलों ने भी पूरे 230 सीटों पर चुनाव लड़ने का मन बनाया है. लेकिन इन दलों की अपनी सीमाएं हैं. इनको उम्मीदवार चाहिए जो अपने बूते जीत नहीं तो कम से कम तंदरुस्त लड़ाई ही सुनिश्चित कर सके. इन सारे छोटे दलों ने कुछ सीटों पर तो उम्मीदवार बनाएं हैं और बाकी के लिए इस इंतज़ार में बैठे हैं कि भाजपा और कांग्रेस जब टिकट दे देगी और वैसे उम्मीदवार जिन्हें टिकट नहीं मिलेगा वो इनकी तरफ से लड़ाई लड़ेगा.

अब ये भाजपा और कांग्रेस जैसे पुरानी पार्टियों की समझदारी कहें या मजबूरी कि वे टिकट देने में अधिक से अधिक देरी कर रहीं है ताकि इन छोटी पार्टियों को नाराज़ लोगों को टिकट देने का मौका न मिले.

(जितेन्द्र राजाराम  आजकल भोपाल में रहते हैं और सामाजिक राजनितिक बहस में खासा दिलचस्पी रखते हैं. इन विषयों को समझने -समझाने के लिए वे इतिहास और आंकड़ो  को अपना हथियार बनाते हैं. जितेन्द्र इन दिनों भारतीय राजनीति की बारीकियों को समझने के लिए दिल्ली, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक होते हुए मध्य प्रदेश पहुंचे हुए हैं.)

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