आखिर असली मुद्दों पर चुनाव कब लड़ा जाएगा!

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आज़ाद सिंह डबास/

आगामी 28 नवम्बर को मध्यप्रदेश विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं. भारतीय वन सेवा के अधिकारी के रुप में अगस्त 1987 में मेरा मध्यप्रदेश में आगमन हुआ. शासकीय सेवा में 30 वर्ष तक विभिन्न पदों एवं विभिन्न जिलों में कार्य करते हुए मैंने छः चुनाव देखे हैं. मेरे सामने मध्यप्रदेश का पहला चुनाव 1990 में हुआ. मैं तब रायगढ़ (अब छत्तीसगढ़) में वनमण्डलाधिकारी के पद पर कार्यरत था. वर्ष 1990 एवं इसके बाद हुए 5 चुनावों को मुझे नजदीक से देखने एवं समझने का मौका मिला. मुझे इस बात पर अत्यंत हैरानी होती है कि 2003 के चुनाव को छोड़कर कभी भी विधानसभा के चुनाव असली मुद्दों पर नही लड़े गये. उमा भारती की अगुवाई में 2003 में भाजपा ने जरुर बिजली, सड़क और पानी को मुद्दा बनाया लेकिन इसे भी पर्याप्त नहीं माना जा सकता.

विगत छः चुनावों में मैंने अनुभव किया कि शिक्षा की बदहाली, चिकित्सा सेवाओं की दुर्गति, सुशासन, भ्रष्टाचार, कुपोषण, बेरोजगारी, गरीबी, बढ़ती हुई मंहगाई, किसानों की खराब माली हालत, महिलाओं पर बढ़ते अपराध, औद्योगीकरण नहीं होना, नर्मदा एवं सहायक नदियों से रेत की लूट, खनिज संसाधनों का कुप्रबंधन, वनो की बरबादी, मंहगी बिजली, खराब सड़के, स्वच्छ पेयजल की पहुंच नही होना, सिचांई हेतु प्रयाप्त पानी की अनुपलब्धता, जनसंख्या विस्फोट, राजनीति में बढ़ता परिवारवाद, दलित, आदिवासी एवं अन्य पिछड़ा वर्ग की निचली जातियों को मुख्य धारा में लाने जैसे असली मुद्दे हाशिये पर रहे हैं.

उपरोक्त गंभीर मुद्दे न तो राजनेताओं के भाषणों का हिस्सा बनते हैं और ना ही मीडिया द्वारा इन्हें प्रमुखता से उठाया जाता है. जैसे-जैसे चुनाव पास आते हैं त्यों ही असली मुद्दे पीछे छोड़ दिये जाते हैं और धर्म एवं जातिगत मुद्दे सारे चुनावी परिदृष्य पर छा जाते हैं. नेताओं द्वारा आपस में की गई ओछी टिप्पणियां भी भाषणों एवं मीडिया में प्रमुखता से स्थान पाती हैं.

ऐसा नही है कि यह सिर्फ मध्यप्रदेश में ही होता है अपितु पूरे देश में ऐसे ही निराशाजनक हालात हैं. जिस ‘गुजरात माॅडल‘ के विकास का अनेक वर्षों तक ढोल पीटा गया, वह गत वर्ष हुए गुजरात विधानसभा चुनाव में ढूंढे नही मिला. अत्यंत हैरानी हुई कि विकास के बजाय हिंदुस्तान-पाकिस्तान, शमशान-कब्रिस्तान, ऊंची जाति-नीची जाति जैसे घिसे-पिटे जुमलों से गुजरात जैसे तथाकथित विकसित प्रदेश का चुनाव लड़ा गया.

जिस ‘गुजरात माॅडल‘ के विकास का अनेक वर्षों तक ढोल पीटा गया, वह गत वर्ष हुए गुजरात विधानसभा चुनाव में ढूंढे नहीं मिला

विगत कुछ वर्षों से मध्यप्रदेश में भी तथाकथित विकास का खूब ढोल पीटा जा रहा है. जब भी भाजपा के नेताओं और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान को मौका मिला है, उन्होंने मध्यप्रदेश में हुए विकास, जिसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नही है, पर खूब शेखी बघारी है. सवाल यह पैदा होता है कि अगर वास्तव में विकास हुआ होता तो मुख्यमंत्री को करोड़ों रुपये खर्च कर जन आशीर्वाद यात्रा क्यों निकालनी पड़ती? विगत दिनों भाजपा द्वारा कार्यकर्ता सम्मेलन में 50 करोड़ रुपये क्यों खर्च करने पड़ते? भारी बेरोजगारी के बावजूद कर्मचारियों को खुश करने के लिए उम्र की सीमा बढ़ाने का फैसला क्यों लिया जाता? लगभग हर वर्ग के कर्मचारियों हेतु चुनाव के पास ही आर्थिक लाभ देने की घोषणाएं क्यों की जाती? किसानों के असंतोष पर मलहम लगाने के लिए भावांतर जैसी योजना क्यों प्रांरभ करनी पड़ती? मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने वाली संबल जैसी योजना क्यों लागू की जाती?

सवाल यह भी पैदा होता है कि शिवराज सिंह चौहान तो फिर भी अपने भाषणों में अपनी योजनाओं के झूठे लाभ गिनाते रहते हैं लेकिन मुख्य विपक्षी दल के नेता असली मुद्दों पर चर्चा क्यों नही कर रहे हैं ? क्या इसके पीछे उनकी विगत सरकार की नाकामीयों का डर है अथवा वे जानबूझकर ऐसा कर रहे हैं. हकीकत यह है कि वर्तमान भाजपा की प्रदेश सरकार हर मुद्दे पर फेल है. चाहे शिक्षा का मामला हो या चिकित्सा सुविधाओं का, कुपोषण का मामला हो या बेरोजगारी का, किसानों के मसले हों अथवा युवाओं के, महिलाओं पर बढ़ते अपराधों के मामले हों या दलित, आदिवासियों एवं पिछड़ों के मसले हों, बढ़ती हुई मंहगाई का मसला हो या सुशासन अथवा भ्रष्टाचार की रोकथाम की बात हो, हर मसले पर प्रदेश की सरकार बुरी तरह विफल है. ऐसी अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद कांग्रेस पार्टी का इन विफलताओं पर हमलावर नहीं होना समझ से परे है.

हैरानी इसलिए भी होती है कि उपरोक्त सभी मुद्दों पर सरकार की हालत पतली होने के बावजूद कांग्रेस पार्टी के नेता राम वनगमन पथ यात्रा निकालने में वयस्त हैं. पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गाँधी प्रदेश  के दौरों में अपने को शिवभक्त, राम भक्त, नर्मदा भक्त बताने पर तुले रहते हैं. राहुल गाँधी द्वारा रफाल लड़ाकू विमान की खरीद-फरोक्त में हुई अनियमितता का मुद्दा उठाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को तो कटघरे में लाने का आधा-अधूरा प्रयास किया जाता रहा है लेकिन प्रदेश  सरकार की विफलताओं पर ध्यान केन्द्रित नहीं कर शिवराज को बख्शा जा रहा है.

राहुल गाँधी को चाहिए कि मंदिर-मस्जिद और गुरुद्वारों के चक्कर न लगाते हुए प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री की विफलताओं पर जनता का ध्यान आकर्षित करें. इस सरकार के कार्यकाल में हुए अनेक घोटालों जैसे व्यापम घोटाला, ई-टेंडर घोटाला, कुपोषण घोटाला, रेत एवं खनिजों की अवैध लूट इत्यादि सैकड़ो घोटालों को प्रमुख मुद्दा बनाया जाना चाहिए.

अभी प्रदेश के चुनाव में लगभग 40 दिन का समय है. सभी पार्टियां उम्मीदवारों के चयन में वयस्त हैं. मुझे यकीन है कि जैसे ही चुनाव अभियान तेजी पकड़ेगा वैसे ही पूर्व की तरह असली मुद्दे पीछे छूट जायेंगे और नकली मुद्दे सामने आ जायेंगे. एक जागरुक नागरिक की हैसियत से मेरा प्रयास रहेगा कि इस बार के चुनाव में जनता असली मुद्दों से रुबरु हो. आगामी लेख में किसी एक मुद्दे पर विस्तार से बात की जायेगी. यह सिलसिला लगातार चलेगा ताकि प्रदेश की जनता एक बार फिर से न ठगी जा सके.

(लेखक मध्य प्रदेश स्थित सिस्टम परिवर्तन अभियान के अध्यक्ष हैं.)

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