आखिर क्या है असम का यह एनआरसी का मुद्दा जिसपर पूरा देश बहस कर रहा है?

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तस्वीर दी हिन्दू अखबार से साभार

सौतुक डेस्क/

देश में अभी सबसे बड़ा मुद्दा है असम का राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC). सरकार ने दो दिन पहले इसका मसौदा जारी किया जिसमें करीब 40 लाख लोगों का नाम नहीं हैं. माने ये कि इस मसौदे के अनुसार ये 40 लाख लोग भारतीय नागरिक नहीं हुए. इस मसौदे के जारी होते ही देश में एक तरह से राजनितिक भूचाल आ गया. एक तरफ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने ममता बनर्जी ने अनर्गल बयान जारी किये जिसमें उन्होंने मसौदे में नहीं शामिल लोगों को पश्चिम बंगाल में आश्रय देने का वादा किया तो दूसरी तरफ दंगे इत्यादि की धमकी दे डाली.

दूसरी तरफ केंद्र और राज्य में सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने भी माहौल बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी. एक तरफ तो सरकार ने कहा कि यह आखिरी रिपोर्ट नहीं हैं और इसमें सुधार की गुंजाईश मौजूद है. जैसे संसद में ही बोलते हुए केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि असम में राष्ट्रीय नागरिकता पंजीकरण का मसौदा प्रकाशित कर दिया गया है. “मैं यह स्पष्ट‍ करना चाहता हूं कि यह सिर्फ एक मसौदा है अंतिम सूची नहीं है. हर किसी को कानून में किए गए प्रावधानों के तहत इस पर अपने दावे और आपत्तियां दर्ज करने का पूरा अवसर मिलेगा. इन दावों और आपत्तियों को निपटाने के बाद ही एनआरसी की अंतिम सूची प्रकाशित की जाएगी.”

बात इतनी सरल होती तो दिक्कत किस बात की थी. इस पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने संसद में बोलते हुए उन सब लोगों को घुसपैठिया कहा जिनका नाम इस लिस्ट में नहीं है. इसी पार्टी के एक नेता ने इन सब लोगों को गोली से मारने की सलाह तक डे डाली. यही वजह है कि इस मुद्दे पर राजनीति गर्म है और संसद का मानसून सत्र इससे प्रभावित हो रहा है.
इस मुद्दे की जटिलता को देखते हुए इसे विस्तार से समझने की जरुरत है.

असम देश का इकलौता राज्य है जहां नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिज़न्स (NRC) है. पहले पहल यह रजिस्टर 1951 में अस्तित्व में आया. इससे साबित होता है कि वहाँ के मूल नागरिक और बाहर से आये लोगों का विवाद बहुत पुराना है. ये बाहर से आये लोग मूलतः बांग्लादेश से हैं. बांग्लादेश से पूर्वोत्तर राज्यों में आने वाले लोगों की तादाद उस समय और बढ़ गई जब पूरी और पश्चिमी पकिस्तान में जंग छिड़ी. भारत की मदद से पूर्वी पकिस्तान 1971 में एक नया देश बना और इस तरह बांग्लादेश अस्तित्व में आया. यह सिलसिला बाद में भी जारी रहा.

यही वजह है कि अस्सी के दशक में असम में छात्र आन्दोलन इस मुद्दे पर मुखर हुए. आन्दोलन के तीव्रता को देखते हुए राजीव गाँधी के कार्यकाल में भारत सरकार और असम गण परिषद के बीच एक समझौता हुआ जिसमें इस पर सहमति हुई कि 1971 के पहले आये बांग्लादेशी लोगों को नागरिकों का दर्जा दिया जाएगा और बाकी के लोगों को वापस भेज दिया जाएगा.

NRC की सूची के मुताबिक 3.39 करोड़ में से 2.89 करोड़ लोगों को नागरिकता के लिए योग्य पाया गया. अगर यही आखिरी सूची रहे तो बाकी लोग अवैध नागरिक माने जायेंगे

तब से अब तक कुल सात बार एनआरसी जारी करने की कोशिश हुईं है पर जारी नहीं किया जा सका. इसके पीछे बड़ी संख्या में लोगों के प्रभावित होने और उससे जुड़ी राजनीति ही वजह रही. पर 2013 में यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और अदालत ने आदेश दिया कि इस काम को पूरा किया जाए.

अब जब NRC की सूची आई है तो उसके मुताबिक 3.39 करोड़ में से 2.89 करोड़ लोगों को नागरिकता के लिए योग्य पाया गया. और 40 लाख लोग इससे वंचित हो गए. केंद्र सरकार और उस दल के नेता इस विवाद को सुलझाने के बजाय आग में घी डाल रहे हैं.

आखिर कैसे किया जा रहा है नागरिक होने को परिभाषित? यह सवाल आपके मन में जरुर आता होगा. सरकार ने इसका साधारण उपाय निकाला है. इसके अनुसार एनआरसी में असम के सिर्फ ऐसे लोगों को ही भारतीय नागरिक माना जाएगा, जिनके पूर्वजों के नाम 1951 के एनआरसी में या 24 मार्च 1971 तक के वोटर लिस्ट में मौजूद हों. इसके अलावा 12 दूसरे तरह के सर्टिफिकेट जैसे जन्म प्रमाण पत्र, पासबुक आदि दिए जा सकते हैं. यदि किसी दस्तावेज में उसके किसी पूर्वज का नाम है तो उसे रिश्तेदारी साबित करनी होती है.

दूसरा जटिल सवाल है कि भाजपा इस मुद्दे को इतना हवा क्यों दे रही है.तो इसका जवाब है कि भाजपा के राजनीति की जो लाइन है वह यहाँ फिट बैठता है. हिन्दू-मुस्लिम की लाइन. 2014 में लोकसभा के चुनाव प्रचार के दरम्यान नरेन्द्र मोदी ने इस मामले को देश की सुरक्षा से जोड़ दिया. जब राज्य में इस पार्टी की सरकार आई तो पूरी ताकत से इसे अमली जामा पहनाया गया. सरकार की इस तत्परता को समझने के लिए यह जानना होगा कि पूर्वोत्तर के सात राज्यों में कुल 25 लोकसभा सीट है. ऐसा माना जाता है कि बांग्लादेश से आये लोग इन सीट के चुनावी फैसले में अहम् भूमिका अदा करते हैं. असम अपने 14 सीट के साथ सबसे महत्वपूर्ण है.

सरकार पूर्वोत्तर की राजनीति को तो इससे साध ही रही है साथ साथ देश के राजनीति में भी उन पार्टियों को अलग थलग करने की कोशिश कर रही है जो बड़े पैमाने पर प्रभावित हो रहे लोगों से किसी तरह की हमदर्दी दिखाने की कोशिश कर रही हैं. याद रहे कि अगर यही आंकड़ा आखिरी हुआ तो किसी भी देश में यह सबसे बड़ी जनसँख्या होगी जो बिना नागरिकता के रह रही होगी.

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