किसानों के हाथ आया बस ज़ीरो बजट

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फोटो: साभार 'द हिन्दू'

अजीत सिंह/

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के पहले बजट से किसानों को बड़ी उम्मीदें थी। चुनाव से पहले जिस तरह किसानों के लिए 6 हजार रुपये सालाना की मदद का ऐलान किया गया और सरकार बनते ही सबसे पहले छोटे-बड़े सभी किसानों को इसके दायरे में लाया गया, वह उम्मीद जगाने वाला था। वैसे, भी देश का बड़ा हिससा सूखे की चपेट में है। पूरी अर्थव्यवस्था पर मंदी के बादल मंडरा रहे हैं। ऐसे में कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में प्राण फूंकने जरूरत है।

लेकिन बजट से किसानों की उम्मीदें ‘जीरो’ साबित हुई। किसानों की आमदनी बढ़ाने, उपज का लाभकारी मूल्य दिलाने, खेती को फायदेमंद बनाने और किसान आत्महत्याएं रोकने जैसी चुनौतियों से निबटने के लिए इस बजट में न तो कोई पुख्ता रणनीति दिखी और न ही कोई कारगर एक्शन प्लान। घोषणाओं के नाम पर प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना है। 10 हजार किसान उत्पादक संगठन बनवाने की बात कही गई। इसके अलावा एग्री बिजनेस में निजी उद्यमिता को बढ़ावा देने का इरादा है। नए उद्यमी और तकनीक खेती में आए यह अच्छी बात है लेकिन जो लोग अभी खेती कर रहे हैं वे ना पछताएं इसका कोई उपाय बजट में नहीं है।

किसानों को 6 हजार रुपये सालाना देने वाली पीएम-किसान योजना के लिए बजट में 75 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। यह राशि देश के कृषि बजट से भी बड़ी है। इसकी वजह से देश का कृषि बजट करीब 68 हजार करोड़ रुपये से बढ़कर 1.31 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। आंकड़ों के लिहाज से यह 92 फीसदी की उल्लेखनीय बढ़ोतरी है। लेकिन इसका श्रेय केंद्र सरकार पहले ही ले चुकी है और चुनाव में इसे भुना भी चुकी है। इसके आगे बजट में कुछ नहीं है। ऐसा लगता है कि सरकार कृषि क्षेत्र और किसानों की सभी मुश्किलों का समाधान 6 हजार रुपये सालाना मदद के भरोसे छोड़कर बेफिक्र हो गई है। जबकि किसानों की हालत सुधारने के अलावा अर्थव्यवस्था की सुस्ती दूर करने के लिए भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में निवेश करना बेहद जरूरी है। अपने चुनावी घोषणा-पत्र में भाजपा ने कृषि और ग्रामीण विकास के लिए 25 लाख करोड़ रुपये के निवेश की बात कही थी।

वित्त मंत्री निर्मला सीतरमण ने किसानों को जड़ों की तरफ लौटने और जीरो बजट खेती अपनाने का मंत्र दिया है। यह अस्पताल में पड़े आदमी को योग करने की सलाह देने जैसा है। यह सही है कि सुभाष पालेकर जैसे कई किसानों ने परंपरागत या जैविक खेती के उदाहरण पेश किए हैं। लेकिन अभी बहुत थोड़े किसान इन तरीकों को अपना रहे हैं। बड़े पैमाने पर जीरो बजट खेती के नफे-नुकसान का आकलन होना बाकी है। दावा है कि फर्टिलाइजर और कीटनाशकों के बजाय गाय के गोबर और गोमूत्र आदि का इस्तेमाल करने वाली इस खेती में लागत जीरो हो जाती है। लेकिन सवाल यह भी है कि लागत जीरो होने के बावजूद किसानों ने अभी तक इसे अपनाया क्यों नहीं? कौन-सा किसान ऐसा है जो कर्ज लेकर फर्टिलाइजर खरीदना चाहे। जीरो बजट वाली खेती कौन नहीं करना चाहेगा?

बेशक, खेती में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का इस्तेमाल घटाना पर्यावरण, स्वास्थ्य और लागत घटाने के लिए जरूरी है। इसलिए जैविक या पारंपरिक खेती को बढ़ावा मिलना चाहिए। लेकिन यह काम किसानों को सिर्फ सुझाव या सलाह देने से नहीं होगा। बजट में वित्त मंत्री ने यही किया। एक तरफ किसानों को जीरो बजट खेती अपनाने की सलाह दी तो दूसरी तरफ फर्टिलाइजर सब्सिडी 70 हजार करोड़ रुपये से बढ़ाकर करीब 80 हजार करोड़ रुपये कर दी। यह राशि मनरेगा के बजट से भी बड़ी है, जिसमें 10 हज़ार करोड़ की बढ़ोतरी की गई है। मतलब, सरकार मान रही है कि जीरो बजट फार्मिंग एक जुमला है। वास्तव में रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल बढ़ेगा। फिर परंपरागत खेती को बढ़ावा कैसे मिलेगा?

परंपरागत खेती को बढ़ावा देने वाली केंद्र सरकार की एकमात्र योजना का बजट महज 300 करोड़ रुपये है जिसे बढ़ाकर 325 करोड़ रुपये किया गया है। क्या 25 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी से 14 करोड़ किसानों को जीरो बजट खेती सिखाई जा सकती है?

जीरो बजट खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने जीरो बजट रखा है। बही-खाते में इसके लिए अलग से कोई प्रावधान नहीं है। जबकि खेती के किसी नए तौर-तरीके को करोड़ों किसानों तक पहुंचाना, उन्हें समझाना बड़ा काम है। परंपरागत खेती को बढ़ावा देने वाली केंद्र सरकार की एकमात्र योजना का बजट महज 300 करोड़ रुपये है जिसे बढ़ाकर 325 करोड़ रुपये किया गया है। क्या 25 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी से 14 करोड़ किसानों को जीरो बजट खेती सिखाई जा सकती है?

देश की समूची अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी घटती जा रही है। साल 2004 से 2011 के बीच करीब 2 करोड़ किसान खेती छोड़ चुके हैं। नीति आयोग का अनुमान है कि 2022 तक करीब 13.4 फीसदी किसान खेती से बाहर हो जाएंगे। साल 2014-18 के बीच देश की एग्रीकल्चर जीडीपी सिर्फ 2.9 फीसदी और किसानों की आमदनी महज 2 फीसदी सालाना की दर से बढ़ी है। जबकि 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने के लिए इनकी असल आमदनी में 10.4 फीसदी सालाना की बढ़ोतरी होनी चाहिए। ये कृषि क्षेत्र की जग-जाहिर चुनौतियां हैं जिनसे निपटने का कोई रोड मैप यह बजट नहीं दिखाता।

इस सरकार ने पशुपालन को कृषि से अलग कर नया मंत्रालय जरूर बनाया लेकिन आवारा पशुओं से खेती को बचाने के लिए कोई उपाय इस बार भी नहीं किया है। इसी तरह जल संसाधन और गंगा मंत्रालय का नाम बदलकर जल शक्ति मंत्रालय किया है जिसका बजट करीब 10 फीसदी घटा है। ग्रामीण क्षेत्रों के लिए गेमचेंजर मानी जाने वाली मनरेगा के बजट में भी इस बार करीब एक हजार करोड़ रुपये की कटौती की गई है। हाल के वर्षों तक मनरेगा का बजट लगातार बढ़ रहा था। इस पर अब ब्रेक लग चुका है।

किसानों को बाजार से जोड़ने के लिए भंडारण और फूड-प्रोसिसिंग की सुविधाएं बढ़ाने की बातें कई बरसों से कही जा रही हैं। इस साल निजी निवेश और उद्यमियों को बढ़ावा देने की बात भी कही गई है। लेकिन इसका कोई रोड मैप बजट में नहीं दिखा। इसी तरह कृषि शिक्षा और अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए इस बजट में कुछ खास नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सरकार 6 हजार रुपये सालाना की मदद देकर खेती-किसानी के लिए जरूरी बाकी उपायों से हाथ खींच रही है?

कुल मिलाकर इस बजट में किसानों को निराश किया और कृषि संकट से उबरने का एक और मौका देश ने गंवा दिया है।

(अजीत सिंह कृषि पोर्टल असलीभारत.कॉम के संपादक हैं)

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