क्या नोटबंदी का सच छिपाने के लिए सरकार ने बुद्धिजीवियों की गिराफ्तरी की?

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उमंग कुमार/

अभी देश एक ख़ास मुद्दे के चौहद्दी में घूम रहा है. मंगलवार को पुणे पुलिस ने कई शहरों में दबिश देकर आनन-फानन में कई बुद्धिजीवियों को गिरफ्तार कर लिया. इसमें सुधा भारद्वाज, वरवर राव, गौतम नवलखा, अरुण फरेरा और आनंद तेलतुंबड़े जैसे लोग शामिल थे. गिरफ्तारी के तरीके और जिनको गिरफ्तार किया गया उनके सामाजिक व्यक्तितव की वजह से स्वाभाविक था कि इतिहासविद रामचंद्र गुहा, लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधती रॉय और अन्य दिग्गज लोगों ने बयान जारी किये, हस्ताक्षर कैंपेन चलाये गए, कुछ विश्वविद्यालयों में छात्र-छात्राओं ने जुलुस भी निकाला. पुलिस की तरफ से तैयारी इतनी कमजोर रही कि सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रांजिट रिमांड देने से मना कर दिया और अब गिरफ्तार किये हुए बुद्दिजीवी उसी शहर में नज़रबंद रहेंगे जहां इनकी गिरफ्तारी हुई है.

जिस तरीके से गिरफ्तारी की गई उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि ये लोग किसी बड़े षड़यंत्र में शामिल हैं. सोशल नेटवर्किंग साइट्स और कुछ मीडिया संस्थानों ने तो इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हत्या की साजिश से जोड़कर भी देखा. अलबत्ता स्क्रॉल वेबसाइट की मानें तो तीन पंचनामे में मोदी की हत्या का कोई उल्लेख ही नहीं है. उसमें सिर्फ भीमा कोरेगाँव मामले का ही उल्लेख है.

पुलिस की तैयारी और तरीके से तो संदेह होना लाजिमी है कि सरकार तीर के निशाने को कहीं और दिखा रही है और निशाना कहीं और लगा रही है. कहने वाले कह रहे हैं कि सरकार अपनी तमाम विफलताओं से ध्यान हटाने के लिए इस तरह के ‘अर्बननक्सल’ जैसे मुद्दे उछाल रही है. कुछ महीनों में देश अगले लोकसभा चुनाव में उतरने वाला भी है.

सरकार अपनी तमाम विफलताओं से ध्यान हटाने के लिए इस तरह के ‘अर्बननक्सल’ जैसे मुद्दे उछाल रही है

खैर जो सबसे तत्कालीन हुआ वह यह कि एक दिन पहले इनलोगों की गिरफ्तारियां हुई और उसके अगले दिन भारतीय रिज़र्व बैंक ने अपने सालाना रिपोर्ट में नोटबंदी के आधिकारिक तौर पर पोल खोल दी. इस रिपोर्ट की मानें तो नोटबंदी अपना लक्ष्य पाने में बुरी तरह से फेल हो चुकी है.

बृहस्पतिवार को जारी बैंक की रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि नोटबंदी के दौरान बंद पांच सौ और हज़ार के सभी नोट वापस बैंक में वापस आ चुके हैं. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 99.3 फीसदी से भी ज्यादा पुराने नोट रिजर्व बैंक के पास लौट आए हैं.

फेसबुक पर सक्रिय गिरीश मालवीय इसका ब्यौरा देते हुए लिखते हैं कि 8 नवंबर, 2016 को 15,417.93 अरब रुपये की वैल्यू के 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट सर्कुलेशन में थे. इसके बाद इनमें से जितने नोट वापस आए हैं, उनकी कुल वैल्यू 15,310.73 अरब रुपये है. यानि सिर्फ 0.7 फीसदी ही नोट वापस नही आये हैं. तो क्या सिर्फ 0.7 फीसदी ही काला धन था?

उनके अनुसार यह तो ऐसा ही है जैसे चूहे मारने के लिए खड़ी फसल आग लगा दी जाए.

अब सरकार को जनता को मुंह तो दिखाना था. नरेन्द्र मोदी बड़े-बड़े वादे करते हुए नोटबंदी की घोषणा की थी. जैसे आतंकवाद की कमर टूटेगी, जाली नोट का आना बंद हो जाएगा, भ्रष्टाचार रुकेगा इत्यादि. लेकिन हुआ तो कुछ भी नहीं. इसके विपरीत जो हुआ वह यह कि सौ से अधिक लोगों की कतार में खड़े होने की वजह से मौत हो गई. बड़े पैमाने पर बेरोजगारी बढ़ी, अर्थव्यवस्था बुरी  तरीके से प्रभावित हुई.

इन सब बातों पर गौर करने वाले लोग जब नोटबंदी की आलोचना करते थे तो सरकार और रिज़र्व बैंक बताते थे कि अभी यह सब कहना उचित नहीं है क्योंकि अभी नोटों की गिनती चल रही है. जबकि सत्य सबको मालूम था.

ऐसे में क्या सरकार ऐसे मौके की तलाश में थी कि यह रिपोर्ट जारी हो और लोगों का ध्यान इस पर न जाए या सरकार ऐसे मौके का इंतज़ार कर रही थी कि नोटबंदी से जुड़ी बात बाहर भी आ जाये और सरकार की आगे किरकिरी भी न हो.

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