क्या पाकिस्तान कभी भारत से बेहतर था?

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शिखा कौशिक/

इसे महज संयोग कहा जाएगा या कुछ और! जिस दिन इमरान खान अपने देश की संसद में भारतीय विंग कमांडर अभिनन्दन वर्थमान को रिहा करने की घोषणा के पहले कह रहे थे कि उनकी प्राथमिकता है, देश से गरीबी दूर करना. इसके लिए रोजगार पैदा करना होगा, रोजगार के लिए उद्योग को आना होगा. और उद्योग के लिए देश में शांति बनाना होगा. ठीक इसी समय, भारत में लोकसभा चुनाव जो कि गरीबी, बेरोगजारी, कृषि संकट इत्यादि जैसे मुद्दों पर हो रहा था, एक आतंकी घटना के होने से सभी मुद्दों को दरकिनार कर राष्ट्रवाद और धर्म की राजनीति की तरफ घूम गया है.

इन दोनों बातों को एक ख़ास सन्दर्भ में समझना जरुरी है. भारत और पाकिस्तान की उम्र एक ही है. लेकिन दोनों देशों में अभी बहुत फासला है. भारत को जहां दुनिया में निवेश की दृष्टि से देखा जाता है वहीँ पाकिस्तान को एक आतंकी देश के तौर पर देखा जाता है. पर हमेशा ऐसा नहीं था.

1960 के दशक के अंत तक पकिस्तान कई तरीकों से भारत से बेहतर था. जब भारत के आर्थिक विकास की दर 2.5 से 3 प्रतिशत के बीच झूलरही थी, उस समय पाकिस्तान की आर्थिक विकास की दर 5 प्रतिशत के करीब थी.

यही नहीं, पकिस्तान को अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का समर्थन भी प्राप्त था.  पाकिस्तान एसईएटीओ (दक्षिण पूर्व एशियाई संधिसंगठन) और सीईएनटीओ (केंद्रीय संधि संगठन) जैसे विभिन्न समझौतों पर हस्ताक्षर करने में सक्षम था जो कि शीत युद्धों के लिए रणनीतिकऔर रक्षा संधि थीं. इन संधियों ने पाकिस्तान को पश्चिम से सबसे आधुनिक गोला बारूद तक पहुँच प्रदान की थी.

1960 के दशक के अंत तक किस्तान कई तरीकों से भारत से बेहतर था. जब भारत के आर्थिक विका की दर 2.5 से 3 प्रतिशत के बी झूल रही थीउस समय पाकिस्तान की आर्थिक विकास की दर 5 प्रतिशत के करीब थी

इस काल में पकिस्तान की सीमाओं के भीतर अथवा बाहर कोई समस्या नहीं थी, क्योंकि सन् 1963 तक लोग बिना किसी बाध्यता के पकिस्तानमें यात्रा करते थे, यहाँ तक कि भारत-पाकिस्तान सीमाओं को पारकर ट्रेन से यात्रा करना भी मुफ्त था.

पर यहीं से कहानी बदली.  सन् 1965 में भारत-पकिस्तान में युद्ध हुआ.  इसके बाद सन्1970 में जिया उल हक के नेतृत्व में पाकिस्तानी सैनिकजॉर्डन की सेना में शामिल हो गए और कुख्यात ब्लैक सितम्बर ऑपरेशन के तहत उन्होंने 25,000 फ़िलिस्तिनियों को मौत के घाट उतार दिया.इसी कारण अरब देश पाकिस्तान से काफी खफा हो गए.

यह पकिस्तान के पतन की शुरुआत थी. इसके बाद, एक से एक विनाशकारी घटनाओं ने पकिस्तान को हिलाकर रख दिया. इसमें सबसे प्रमुख था पकिस्तान और बांग्लादेश का अलग होना.  पकिस्तान में आम  चुनाव हुए और पकिस्तान ने बैलेट बॉक्स की प्रक्रिया का सम्मान नहींकिया.  उन्होंने विजेता आवामी लीग (शेख मुजीबुर रहमान) को सत्ता हस्तांतरित नहीं की. रहमान वर्तमान बंगलादेशी प्रधानमंत्री शेख हसीनाके पिता थे.

मार्च 1971 में पाक सेना ने ऑपरेशन सर्चलाइट चलाया, जिसमें पूर्वी पाकिस्तान में रहने वाले 3 मिलियन बंगाली लोगों की मौत हो गयी थी. इसकी परिणिति यह हुई कि पाकिस्तान से अलग होकर एक नया देश बना जो आज बांग्लादेश कहा जाता है.

बाद में  जुल्फिकार भुट्टो को जिया उल हक द्वारा हत्याओं के आरोप में गिरफ्तार किया गया तथा फांसी पर चढ़ा दिया गया. जिया ने सैन्य विद्रोहद्वारा सत्ता हासिल की और तानाशाह बन गया, जो कि आगे चलकर पकिस्तान का राष्ट्रपति भी बना. उसकी सत्ता में रहने की भूख पकिस्तान कोविनाश की ओर ले गई. वह इस्लामीकरण के रूप में पाकिस्तान में एक बड़ा परिवर्तन लेकर आया और देश को काफी पीछे धकेल दिया,जिसके प्रभाव आज भी देखे जा सकते हैं.

इसी क्रम में पकिस्तान एक नए खेल में शामिल हुआ. यह था अमेरिका और सोवियत संघ के बीच हो रहे शीत युद्ध में शामिल होना. जबसोवियत सेना ने अफगनिस्तान में प्रवेश किया, तब सीआईए की सहायता से आईएसआई ने एक ऐसा राक्षस बनाया जो आज नियंत्रण के बाहरहै- तालिबान. यहीं से पाकिस्तान के कट्टरपंथ के कहानी शुरू होती है जिसकी वजह से आज कई आतंकवादी समूह तैयार हो गए हैं.

ये वही आतंकी थे जो शीत युद्ध से खाली हुए थे और उन्हें कोई निशाना चाहिए था. पाकिस्तान ने उन्हें भारत के खिलाफ जिहादियों के रूप मेंइस्तेमाल करना शुरू कर दिया. लश्करे तय्यबा, जैश मोहम्मद, अफगान ए तालिबान, सिपाह ए सहबा, जुनदुल्ला, टीटीपी और हक्कानीनेटवर्क जैसे आतंकवादी संगठन निकल कर बाहर आये.

इन समूहों ने न केवल भारत, बल्कि अफ़ग़ानिस्तान, ईरान और पकिस्तान में भी तबाही मचाई. आलम यह है कि इन आतंकवादियों के डर से कोई देश पकिस्तान में क्रिकेट तक खेलने नहीं जाता.

जिस अमेरिका की शह से पकिस्तान ऐसे लोगों को समर्थन दे रहा था, वही अमेरिका 2001 में पेंटागन पर हुए हमले के बाद इन आतंकियों के खिलाफ हो गया.

पकिस्तान को यह समझने में करीब पचास साल लग गए कि धर्म की राजनीति करने से तत्कालीन कुछ फायदा हो सकता है लेकिन वृहत्तर तौर पर नुकसान ही है. इसलिए शायद इमरान खान बार-बार शांति की अपील करते दिख रहे हैं.

इस बीच भारत जो ढेरों थपेड़े झेलने के बाद भी सहिष्णुता की राजनीति करता रहा, वहाँ उद्योग लगते गए और चीन जैसे देशों से इसकी अर्थव्यस्था की तुलना होने लगी. लेकिन पिछले कुछ सालों से यहाँ भी धर्म की राजनीति शुरू हुई है. देखना यह है कि क्या यह तात्कालिक विचलन है या एशिया के दोनों देश पचास साल की यात्रा करने के बाद आने वाले कुछ सालों के लिए अपना रास्ता बदल रहे हैं!

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