विवेक तिवारी एनकाउंटर: एक्सपोज़ होता हुआ वैकल्पिक मीडिया

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उमंग कुमार/

लखनऊ में एक सिपाही ने एप्पल के एरिया मैनेजर को सरेराह गोली मार दी. भगवा-वस्त्रधारी आदित्यनाथ के सत्ता में आने के बाद से उत्तर प्रदेश में, एनकाउंटर मानो एक उत्सव बना दिया गया है. इस भाजपा सरकार ने पूरा एक नैरेटिव तैयार किया है कि यह सब, अपराध कम करने के लिए किया जा रहा है. इस नैरेटिव के खरीददार भी अच्छी खासी संख्या में हैं और यही वजह है कि सरकार को अपने किये पर भरोसा बढ़ता जा रहा है. पत्रकारों को बुलाकर, और उनके सामने तथाकथित अपराधियों को गोली मारी जा रही है.

अब, जब 38-साल के विवेक तिवारी को उस सिपाही ने सिर्फ इसलिए गोली मार दी क्योंकि उसने अपनी गाड़ी नहीं रोकी. गाड़ी नहीं रोकने की बात भी पुलिस की बताई हुई है, जिसकी सत्यता अभी प्रमाणित होनी है.

ऐसे में हत्या के समर्थकों का सामने आना स्वाभाविक था. वो आये और इस हत्या के पक्ष में तर्क गढ़ने लगे. उनके तर्कों में यह तक शुमार था कि अगर वो सिपाही गोली नहीं चलाता तो हो सकता है तिवारी अपनी गाड़ी उस पर चढ़ा देता.

इस पक्ष की संवेदनहीनता पर सिर्फ शर्मसार हुआ जा सकता है और इंतज़ार किया जा सकता है कि वे भी राहत इन्दौरी के ‘यहाँ पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है’ का मतलब समझें.

लेकिन विवेक तिवारी की हत्या के बाद के विमर्श का सबसे अस्वाभाविक और चुभने वाला रहा तथाकथित सेक्युलर और बुद्धिजीवी लोगों का पक्ष. यह तबका खुद को मानवाधिकार का पैरोकार बताता है और हत्या, एनकाउंटर इत्यादि का विरोधी रहा है.

आश्चर्य यह था कि इस तबके ने भी तिवारी की मृत्यु पर शोक नहीं मनाया. बल्कि इस मौके को अपनी महफ़िल लूटने वाली राजनीति के लिए इस्तेमाल किया. अभी हत्या के स्थान पर तिवारी का खून सूखा भी था या नहीं जब इस तबके ने कहना शुरू कर दिया कि एप्पल के “ब्राह्मण” एरिया मैनेजर की मृत्यु पर जो हो-हल्ला हो रहा है, काश! अन्य मामलों में भी ऐसी ही बेचैनी दिखती. इनके लिए दो बच्चियों का मरने वाला बाप विवेक तिवारी, ब्राहमणवाद का प्रतीक बन गया.

इससे कई और सवाल उभरते हैं. पहला तो यह कि यह ‘बुद्धिजीवी’ तबका संबोधित किसको कर रहा है! कौन हैं वो लोग जो इस मामले में शोकाकुल हैं और अन्य मामलों में नहीं होते! क्या ये आदित्यनाथ के समर्थक या कहें मृत्यु को न्यायोचित ठहराने वाले लोग हैं जो सोशल मीडिया पर अपना पाला बदल कर मृत्यु का शोक मनाने में लगे हुए हैं. क्या इन्हीं लोगों से कहा जा रहा है कि काश हर मामले में आप इतने ही संवेदनशील होते? या बस एक आभासी थर्ड फ्रंट बनाकर अपनी बात की जा रही है! क्या इस आभासी समाज को निशाने पर रखकर ‘संवेदनशील’ लेखकों-बुद्धिजीवियों के द्वारा संवेदनहीन पोस्ट लिखे जा रहे हैं.

इसका नतीजा यह हुआ है कि आवारा पुलिस की गोली के शिकार मृतक के लिए जो संवेदना व्यक्त होनी चाहिए वो भी नहीं हुई. इस समूह से भी नहीं हुई जो हर हत्या पर आभासी दुनिया में ही सही शोक तो व्यक्त कर रहा था.

यद्यपि इसके बचाव में यह भी कहा जा सकता है कि हाशिये के लोगों के संघर्ष को लेकर चिंतित लोग इस मौके पर समाज के बड़े तबके को यह बताना चाह रहे हैं कि ऐसा ही विरोध हर मामले में होना चाहिए. यह जरुरी है. लेकिन लेखक जो इस मुद्दे पर कलम चला रहे हैं उनसे इतनी उम्मीद तो की जा सकती है कि वो अपने पोस्ट से इन दोनों बातों के साथ न्याय कर सकें. एक तो मृतक के परिवार के साथ संवेदना और दूसरा, वृहत्तर राजनीति को दिशा देना.

अगर आप की लेखनी इतनी सक्षम नहीं है तो मानवता के नाते ही सही किसी की लाश पर खड़े होकर शिक्षा न दें

अगर आप की लेखनी इतनी सक्षम नहीं है तो मानवता के नाते ही सही किसी की लाश पर खड़े होकर शिक्षा न दें. कम से कम उसके अंतिम संस्कार होने तक चुप रहें.

इस तथाकथित ‘बुद्धिजीवी वर्ग’ की संवेदनहीनता का एक और नायाब नमूना इस केस में देखने को मिल रहा है. उत्तर प्रदेश के ‘विवेक’ की हत्या हुई है. किन्तु कुछ लोगों के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह रहा कि ‘उत्तर प्रदेश विवेक की विधवा’ ने क्या बयान दिया है. उन कुछ लोगों की बाँछे खिली हुई है. उस स्त्री का दुःख सोचते ही मन घबरा जा रहा है, कलेजा हलक तक आ जा रहा है, लेकिन टुटपुँजियों को उससे क्या? उन्हें तो बयान लेकर उड़ना था, उड़ गए. बाद में पता चला कि यह उस महिला के नहीं बल्कि उसके भाई के बयान थे.

फिर भी हम यही माने कि वह बयान उस मृतक की पत्नी के ही थे. तो इस चरम दुःख में विलाप करते हुए कहे गए कुछ वाक्य को इनलोगों ने पकड़ लिया. उसने कुछ ऐसा कहा कि यह कश्मीर थोड़ी है कि जिसको चाहो मार दो. इन बुद्धिजीवियों ने शायद यह मान लिया है कि यही सबसे बड़े ज्ञानी हैं और वह महिला अनपढ़, गंवार है. इस वाक्य के कई मायने निकल सकते हैं जिसमें सबसे अहम् यह है कि वह महिला कश्मीर की वस्तुस्थिति से अवगत है. वह जानती है कि कश्मीर में सुरक्षाकर्मी किस हद तक जा चुके हैं और वह इस चरम स्थिति से तुलना कर बता रही है कि काऊ-बेल्ट में भी सुरक्षाकर्मी उसी दिशा में जा रहे हैं.

यह भी स्पष्ट करना जरुरी है कि वर्तमान में उस महिला के साथ संवेदना दिखाने की जगह उसके बयान का यह मतलब निकलना भी अतिरेक ही होगा. फिर भी.

लेकिन किसी मामले के तह तक नहीं जाने वाला यह ‘पढ़ा-लिखा’ तबका अगर इस अर्थ को लेता तो शायद फेसबुक पर अधिक लाइक नहीं बटोर पाता.

एक और प्रमुख बात जो सामने आ रही है वह यह कि उत्तर प्रदेश में बड़ी मात्रा में एनकाउंटर हो रहे थे, यह सबको मालूम था. मेनस्ट्रीम मीडिया ने इस पर ख़ामोशी बना रखी थी. खुशकिस्मती या बदकिस्मती कह लें कि एक ऐसी हत्या हुई कि यह मीडिया जागा और मामले की तह में जाने कि कोशिश कर रहा है. आप जो कभी किसी मामले की तह में नहीं जाते और फेसबुक से ही क्रांति करते हैं क्या आप नहीं चाहते कि किसी बहाने से इस मुद्दे की पड़ताल हो और आदित्यनाथ को कटघरे में खड़ा किया जाए.

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