भारतीय राजनीति की कहानी के किरदार कैसे बदल रहे हैं!

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उमंग कुमार/

लोक सभा का चुनाव आखिरी चरण की ओर बढ़ चला है. ढेर सारे वादे, आरोप-प्रत्यारोप के बाद लोग थकने भी लगे थे. लोगों के अनुभव में बहुत कुछ कसैला है जो आगे कई सालों तक याद भी रहेगा. लेकिन इन सबके बीच इस लोकसभा चुनाव को इसलिए भी याद किया जाएगा कि इसने भारत के आने वाले राजनितिक खिलाड़ियों के लिए रास्ता खोला. बल्कि यूँ कहें कि धीरे-धीरे भारतीय राजनीति के मुख्य खिलाड़ी नई पीढ़ी के लिए रास्ता बना रहे हैं. वह बिहार हो, उत्तर प्रदेश या तमिल नाडू  हो, यह राष्ट्रीय फलक लेकिन यह तय है कि भारत की राजनीति को नए सितारे मिल गए हैं जो आने वाले कम से कम पच्चीस सालों तक भारतीय राजनीति की दशा और दिशा तय करेंगे.

अभी तक भारतीय राजनीति में लालकृष्ण आडवाणी, शरद पवार, सोनिया गाँधी, लालू प्रसाद यादव, मायावाती, मुलायम सिंह यादव, करुणानिधि, ममता बनर्जी जैसे सितारे चमक रहे थे. भारतीय जनता पार्टी में यह परिवर्तन पिछले लोकसभा चुनाव में शुरू हुआ जब आडवाणी जैसे दिग्गजों को हटाकर मोदी ने खुद को पार्टी का सर्वेसर्वा बना दिया. लेकिन इस विवादास्पद परिवर्तन को अगर दरकिनार कर अन्य पार्टियों की तरफ रुख किया जाए तो पता चलेगा कि बड़े स्तर पर पुराने खिलाड़ी धीरे-धीरे नए सितारों के लिए जगह बना रहे हैं.

नए नेताओं में कन्हैया कुमार, जिग्नेश मेवाणी, हार्दिक पटेल  उभर कर सामने आये हैं तो उधर लालू प्रसाद यादव की अनुपस्थिति में उनके पुत्र तेजस्वी यादव भी मुखर हुए हैं

बिहार का उदाहरण लें. उधर लालू प्रसाद यादव ने मशाल तेजस्वी यादव को थमाई तो दूसरी तरफ कन्हैया कुमार जैसे नेता को, समय ने जन्म दिया. अगर कन्हैया कुमार बेगुसराय से चुनाव जीतकर संसद में पहुँच जाते हैं तो बिहार की राजनीति पहले जैसी कभी नहीं रहेगी. अब नितीश और लालू की बजाय, बातचीत का दायरा तेजस्वी और कन्हैया होंगे.

पिछले कुछ सालों से इस परिवर्तन की बयार बहनी शुरू हुई थी जो इस लोकसभा चुनाव में जाकर स्पष्ट हुई है. भारत की सबसे पुरानी राजनितिक पार्टी कांग्रेस को ही लें, तो सोनिया गाँधी ने धीरे से राहुल गाँधी के लिए जगह बना दी है तो वहीँ प्रियंका को लाकर राहुल गांधी ने भी आने वाले भविष्य में पार्टी की रणनीति पर प्रकाश डाला है.

इसके साथ ही कांग्रेस ने हार्दिक पटेल का पार्टी में स्वागत करते हुए, जिग्नेश मेवाणी के साथ तालमेल बिठाते हुए और उर्मिला मातोंडकर को लेते हुए संकेत दिया है कि पार्टी की राजनीति पिछले कुछ सालों को भुलाकर नए सिरे से राजनीति के व्याकरण पर काम कर रही है.

राहुल और प्रियंका की तरह समाजवादी पार्टी में अखिलेश यादव का आना इतना आसानी से तो नहीं हुआ लेकिन अखिलेश ने पार्टी की कमान संभालते ही कुछ ऐसे निर्णय लिए कि उनसे लोगों की उम्मीद बढ़ी है. मायावती के उत्तराधिकार की कहानी अभी सपष्ट नहीं हुई है पर अखिलेश यादव के नेतृत्व को स्वीकार कर, उन्होंने नई पीढी के महत्व का समर्थन दे दिया है. वैसे भी दलित राजनीति में अब मायावाती अकेले नहीं रही हैं. अब नए और अधिक मुखर नेता जैसे चन्द्र शेखर आजाद, मेवानी इत्यादि भी हैं.

इन बदलते हुए समीकरणों को देखकर लगता है कि भारतीय राजनीति की कहानी के किरदार वाकई बदल रहे हैं.

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