पद्मावती कोई पहली फिल्म नहीं है जिसे बिना देखे बैन कर दिया गया है

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रजनीश जे जैन/

प्रदर्शन से पहले ही रोक लगने वाली ‘पद्मावती’ पहली फिल्म नहीं है। दुनिया भर में अलग-अलग कारणों से फिल्मों और किताबों को उनकी आखरी मंजिल, जनता के पास जाने से रोका जाता रहा है। प्रतिबंधित फिल्मों और किताबों की सूची बहुत लम्बी है। कोई सरकार किसी फिल्म या किताब पर क्यों ‘बैन’ लगाती है, इसका कोई रेडीमेड जवाब उपलब्ध नहीं है। हर दौर की सरकार को अचानक से महसूस होता है कि  फलां फिल्म या फलां किताब समाज के ताने-बाने को बिगाड़ सकती है या किसी वर्ग विशेष की भावना आहत हो सकती है। इस तरह उसे दरी के नीचे सरका दिया जाता है या सरकारी दराज में डाल दिया जाता है। ये फैसले जनहित के नाम पर लिए जाते है।

भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक सलमान रुश्दी का मामला दिलचस्प है। वर्ष 1988 में उनका लिखा काल्पनिक उपन्यास ‘ द सैटेनिक वर्सेज ‘ पूरी दुनिया में चर्चित होने से पहले ही भारत में प्रतिबंधित कर दिया गया था। उसके बाद ईरान के अयातुलहा खोमेनी ने रुश्दी के खिलाफ ‘फतवा’  किया था। पच्चीस बरस तक रुश्दी ब्रिटेन की सरकार के संरक्षण में रहे।  प्रतीकात्मक शैली  में लिखे इस उपन्यास ने रुश्दी को अंतराष्ट्रीय लेखक बना दिया।  वे छुपते-छुपाते करोड़ो बना गए। कहने को ‘द सेटेनिक वर्सेज’आज भी प्रतिबंधित है परन्तु इंटरनेट पर इतनी सुगमता से उपलब्ध है कि पांचवी क्लास का बच्चा भी उसे डाउनलोड कर पढ़ सकता है।

दुनिया को लोकतंत्र की वास्तविक तस्वीर बताने वाले अमेरिका में भी फिल्मों पर प्रतिबन्ध लगता रहा है। यद्यपि लिखने-बोलने की आजादी के मामले में यह देश मिसाल है। यहां पर फिल्में या किताबें सरकारी नजरिये से प्रतिबंधित नहीं होतीं बल्कि मानवीय कारणों से होती रही है। जादू टोना, रंगभेद , किसी पंथ या वाद को बढ़ावा देना वगैरह रोक लगाने के महत्वपूर्ण कारण बनते रहे है।

1936 में देविका रानी और अशोक कुमार अभिनीत ‘अछूत कन्या’ न सिर्फ अपने गीतों बल्कि दलित सवर्ण प्रेम और देविका रानी अशोक कुमार के ‘लिप लॉक किस’  के लिए आज भी याद की जाती है। 21वीं  सदी में हम आज इतनी उदारता की उम्मीद न तो जनता से और न ही सेंसर बोर्ड से कर सकते हैं

प्रतिबंधों को लेकर सभी सरकारें  एक जैसा ही व्यवहार करती रही हैं। चाहे फिर वे मध्य मार्गी हों या दक्षिण पंथी या वाम पंथी। भारत में फिल्मों को ‘सेंसर’ करने की शुरुआत ब्रिटिश काल में ही हो गई थी। गुलाम देश बगावत की चिंगारी को मशाल न बना ले इस लिहाज से गीतों और संवादों को काट दिया जाता था। अंग्रेजों को सिर्फ अपने साम्राज्यवादी मंसूबों की चिंता थी। चुम्बन से उन्हें कोई परहेज नहीं था। 1936 में देविका रानी और अशोक कुमार अभिनीत ‘अछूत कन्या’ न सिर्फ अपने गीतों बल्कि दलित सवर्ण प्रेम और देविका रानी अशोक कुमार के ‘लिप लॉक किस’  के लिए आज भी याद की जाती है। इक्कीसवीं  सदी में हम आज इतनी उदारता की उम्मीद न तो जनता से और न ही सेंसर बोर्ड से कर सकते हैं ।

नेहरू युग से लेकर मुख्यमंत्री मोदी और फिर प्रधान सेवक मोदी के कार्यकाल तक में दर्जनों उदहारण मौजूद है जब किताबों और फिल्मों को रोका गया। फिल्मों के प्रतिबंधों को लेकर मजेदार तथ्य यह है कि वे हमेशा प्रतिबंधित नहीं रह पाते।  दर्शक उन्हें ढूंढ कर देख ही लेते है। शेखर कपूर की ‘बेंडिट क्वीन’, दीपा मेहता की शबाना आजमी और नंदिता दास अभिनीत ‘फायर’, मीरा नायर की ‘कामसूत्र’ अनुराग कश्यप की ‘पांच’ और ‘ब्लैक फ्राइडे’, गुजरात दंगों पर आधारित राष्ट्रीय पुरुस्कार विजेता सारिका की ‘परजानिया’, नंदिता दास की ‘फिराक’, दीपा मेहता की ही ‘वाटर’ ऐसी कुछ फिल्में हैं जिनके बारे में दलील दी गई थी कि इनके प्रदर्शित होते ही आसमान टूट पड़ेगा। जाहिर तौर पर कुछ भी नहीं हुआ।

कुछ प्रमुख किताबें भी सिर्फ इस वजह से रोक दी गयीं कि उनके प्रकाशित होते ही ‘कुछ विशेष’ लोगों की भावनाएं भावनाए आहत हो जायेंगी। इसमें धीरूभाई अंबानी पर लिखी ‘द पलिएस्टर प्रिंस’, गांधीजी की हत्या पर काल्पनिक कहानी ‘नाइन ऑवर टू रामा’, शिवाजी  पर लिखी ‘हिन्दू किंग इन मुस्लिम इंडिया’, भाजपा के जसवंत सिंह द्वारा लिखित ‘ जिन्ना’ आदि इत्यादि हैं।

फिल्में, किताबें समय के प्रवाह के साथ आती रहेंगी और समय-समय पर प्रतिबंधित होकर लोकप्रिय भी होती रहेंगी। पद्मावती के साथ जो हो रहा है वह आखरी मामला नहीं है।

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल  वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और  पत्र -पत्रिकाओं में  विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

 

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