राजनीति में उर्मिला मतोंडकर!

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 रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन

कोई भी अभिनेता हमेशा दो छवियों के सहारे अपना जीवन बिताने को बाध्य होता है। पहली उसकी सिनेमाई छवि और दूसरी, परदे से इतर व्यक्तिगत छवि। चूँकि अधिकांश लोग सिर्फ उसके स्क्रीन अवतार से ही परिचित होते हैं तो वे उस छवि को ही वास्तविक छवि मान बैठते हैं और उसी आधार पर अपनी राय बनाते हैं। फिल्मों से राजनीति में आए अधिकांश अभिनेता इसी त्रासदी का शिकार रहे हैं। सिल्वर स्क्रीन पर उनके चमत्कारी और सम्मोहक अभिनय से यह धारणा बन जाती है कि वे सार्वजनिक जीवन में भी कमाल कर जाएंगे। अक्सर ऐसा कम ही होता है।

राजनैतिक दल इन सितारों की लोकप्रियता को भुनाने के लिए हर संभव प्रयास करते रहे हैं। पलक पांवड़े बिछाकर उनकी मनुहार की जाती है। इससे उलट दक्षिण के फ़िल्मी सितारे अपनी लोकप्रियता के सहारे इतना विशाल आभा मंडल खड़ा कर लेते हैं कि वहां राष्ट्रीय पार्टियां हाशिये पर चली जाती हैं। विगत तीन चार दशकों से तो ऐसा ही हो रहा है। धार्मिक तमिल फिल्मों की रस्सी थाम कर एम जी रामचंद्रन तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने और उनके बाद उनकी ही फिल्मों की नायिका जयललिता ने उनके उत्तराधिकारी के रूप में सफलता पूर्वक शासन किया। जयललिता की अधिकांश फिल्मों की पटकथा लिखने वाले करूणानिधि भी सत्ता पर काबिज हुए और कई वर्षों तक तमिलनाडु की राजनीति इन्हीं दो ध्रुवों के आसपास घूमती रही। तेलुगु फिल्मों के महानायक एन टी रामाराव ने भी अपनी धार्मिक फिल्मों की मदद से राजनीति में सफल पहचान बनाई। आज उनके वंशज उसी लोकप्रियता को भुना रहे है। हाल ही में उनके जीवन पर रामगोपाल वर्मा ने बायोपिक ‘लक्ष्मी के एन टी आर ‘ बनाकर विवाद खड़ा कर दिया है।

अनहोनी को होनी बना देने की इमेज लिए रजनीकांत और बहु-प्रतिभाशाली कमल हासन लगभग राजनीति की दहलीज पर कदम रख चुके हैं। इन दोनों सितारों का बड़ा प्रशंसक वर्ग देर-सबेर इन्हें सत्ता की चाबी सौंप ही देगा।

अपने फ़िल्मी करियर में उन्हें इस बात के लिए भी जाना जाता था कि बंधी बधाई लीक पर चलने के बजाए उन्होंने चुनौती पूर्ण भूमिकाओं में उतरने से परहेज नहीं किया है। सुपरहिट ‘रंगीला’ के बाद ‘सत्या’ जैसी ऑफ बीट फिल्म हो या ‘जुदाई’ ‘कौन’ और  ‘एक हसीना थी’ जैसी नकारात्मक भूमिकाएँ करना दुस्साहस ही माना  जाएगा

उत्तर भारतीय सितारे दक्षिण की तरह इतने भाग्यशाली नहीं रहे। केंद्रीय या प्रादेशिक राजनीति में उनकी हैसियत डेकोरेशन आइटम से ज्यादा नहीं रही। अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, गोविंदा, आदि ने खुद को फिजूलखर्च किया। सुनील दत्त ने अवश्य अपनी जगह बनाई और सम्मान पाया। समाज में सहभागिता और सक्रियता के लिए उन्हें श्रेष्ठ सांसद भी घोषित किया गया। वैजयंती माला दो बार सांसद बनी और एक बार राज्यसभा के लिए भी चुनी गईं। हेमा मालिनी सिर्फ एक डायलॉग बोलकर सांसद बन गईं। स्व चंद्रशेखर की पहल पर राजनीति में आए शत्रुघ्न सिन्हा ने कई वर्षों से खुद को प्रासंगिक बनाए रखा है, वे अपने आतिशी बयानों के लिए खबरों में ज्यादा रहे। कभी बेहद ताकतवर रहे अमर सिंह ने दक्षिण की जयाप्रदा को यूपी से एम पी बना दिया। कभी समाजवादी रहे राजबब्बर अब कांग्रेस के प्रमुख नेता हैं। विनोद खन्ना ने गुरदासपुर संसदीय सीट से शुरुआत की। उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी के दावे को नकारते हुए धर्मेंद्र पुत्र सनी देओल को लाया गया है। धर्मेंद्र खुद बीकानेर से चुनकर सांसद बन चुके हैं। किरण खेर चंडीगढ़ से सांसद हैं।चरित्र अभिनेता परेश रावल ने नरेंद्र मोदी को भाषण बाजी के गुर सिखाये और पुरूस्कार स्वरुप अहमदाबाद से सांसद बन दिल्ली पहुंचे। राज्यसभा के रास्ते संसद पहुँचने वाले सितारों में रेखा, जया बच्चन, मिथुन चक्रवर्ती, शबाना आजमी, जावेद अख्तर, चिरंजीवी जैसे बड़े नाम हैं।

स्टूडियो की चकाचौंध से सत्ता के गलियारे में आए अधिकांश लोग वैसा प्रदर्शन नहीं कर पाए जैसी उनसे अपेक्षा थी। लिखी पटकथा के संवाद बोलना और संसद की बहस में हिस्सा लेना दो अलग चीज़ें हैं। आमजन से कटे रहने की वजह से वे आम आदमी की समस्याओं पर भी आँख मूंदे रहे। लिहाजा अधिकांश की चमक समय के साथ मंद होती गई।

अब फिल्मों से राजनीति में आने वाले सितारों की फेहरिस्त में एक नया नाम जुड़ा है उर्मिला मतोंडकर का। अस्सी के दशक में बाल कलाकार के रूप में पहचान बना चुकी और बाद में शीर्ष अभिनेत्री के रूप में छा जाने वाली उर्मिला मतोंडकर मुंबई नार्थ लोकसभा सीट पर अपनी किस्मत आजमा रही हैं। अपनी ग्लैमरस स्क्रीन इमेज से उलट उर्मिला एक गंभीर राजनेता के रूप में पहचान बना रही हैं। उनके साक्षात्कारों से ही अंदाजा हो जाता है कि उन्हें अपने क्षेत्र की समस्याओ की भरपूर समझ है। इस समय यूट्यूब पर उनके दर्जनों वीडियो मौजूद हैं जो उनकी संजीदगी , सुसंस्कृति और गहरी समझ को दर्शाते है।अपने फ़िल्मी करियर में उन्हें इस बात के लिए भी जाना जाता था कि बंधी बधाई लीक पर चलने के बजाए उन्होंने चुनौती पूर्ण भूमिकाओं में उतरने से परहेज नहीं किया है। सुपरहिट ‘रंगीला’ के बाद ‘सत्या’ जैसी ऑफ बीट फिल्म हो या ‘जुदाई’ ‘कौन’ और ‘एक हसीना थी’ जैसी नकारात्मक भूमिकाएँ करना दुस्साहस ही माना जाएगा। भारत पाकिस्तान बंटवारे पर आधारित अमृता प्रीतम की साहित्यिक कथा ‘पिंजर’ पर इसी नाम से बनी फिल्म और अनुपम खेर निर्मित ‘ मैंने गाँधी को नहीं मारा’ उर्मिला की सराहनीय फिल्में हैं। राजनीति में उनके आगमन को उनकी उसी जोखिम लेने की प्रवृति के परिपेक्ष में देखा जाना चाहिए। अगर वे सफल होती हैं तो मान लिया जाना चाहिए कि संसद को एक प्रतिभाशाली, वाचाल सांसद मिलने वाला है।

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और पत्र -पत्रिकाओं में विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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