बेरोजगारों की धरती पर बयानों का रोजगार

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उमंग कुमार/

कहते हैं अगला विश्व युद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा. क्यों? आईये भारतीय परिदृश्य से समझते हैं. नीति आयोग के हालिया रिपोर्ट के अनुसार देश में साठ करोड़ लोग पानी की भारी किल्लत झेल रहे हैं. आयोग की मानें तो अभी और बुरे दिन आने वाले हैं. इसके अनुसार 2020 तक करीब 21 शहरों का भूजल समाप्ति की कगार पर होगा. कृषि सबसे अधिक प्रभावित होगा क्योंकि 80 प्रतिशत पानी कृषि के लिए ही इस्तेमाल होता है. नतीजा? देश के 12 राज्य जल बंटवारे को लेकर आपस में लड़ रहे हैं. अगर आप हाल में हुए कावेरी विवाद और तमिलनाडु के किसानों के आन्दोलन को याद करेंगे तो आपको अंदाजा लगेगा कि यह लड़ाई जमीन पर, न्यायालय और संसद हर जगह लड़ी जा रही है.

यद्यपि पानी को लेकर चल रहे इस विवाद का कोई सीधा वास्ता कमलनाथ के बयान से नहीं है पर देश में नौकरियों की जो विकराल समस्या आ खडी हुई, उसके नतीजे समझने के लिए यह उदाहरण जरुर मदद करेगा. कमलनाथ जैसों के बयान भी समझने में भी मदद होगी.

कमलनाथ की पार्टी सत्ता के लिए मध्य प्रदेश में पंद्रह सालों से संघर्ष कर रही थी. ढेरों लोकलुभावन वादे किये जिसमें युवाओं को रोजगार देने की बात भी की गई. उन्होंने सत्ता की बागडोर संभालते ही कुछ कदम उठाये. इनमें राज्य की उद्योग संवर्धन नीति 2018 और मध्यम-लघु उद्योग विकास नीति-2017 में संशोधन का भी निर्णय था. इस संशोधन के अनुरूप अब शासन से वित्तीय एवं अन्य सुविधाएं लेने वाली औद्योगिक इकाईयों को 70 प्रतिशत रोजगार मध्यप्रदेश के स्थायी निवासियों को देना अनिवार्य होगा.

हो-हल्ला होना स्वाभाविक था. कुछ लोगों ने भाजपा के पार्टी लाइन पर जाते हुए कमल नाथ की भर्त्सना की तो कुछ लोगों ने सामान्य तौर पर नेक नियत से थोपे जा रहे क्षेत्रवाद की खिलाफत की. यहाँ बेहतर समझ के लिए यह बताना जरुरी है कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब राज्य का मुखिया या कोई अन्य नेता स्थानीय लोगों की नौकरी के लिए अधिक से अधिक जगह आरक्षित करने की बात कर रहा है. इस खबर की मुख्य तस्वीर में आप देख सकते हैं कि पिछले कुछ सालों में राज्य के युवाओं के लिए रोजगार सुरक्षित करने के प्रयास बढ़े हैं.

देश में रोजगार की समस्या और चुनावी वादे

ऐसे में असली मुद्दा यह है कि नेताओं को आखिर ऐसा क्यों करना पड़ रहा है! भारत में युवाओं के लिए रोजगार एक बड़ी समस्या बनकर उभरा है. आप देखेंगे कि हर चुनाव में रोजगार एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन रहा है. वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी युवाओं को बड़ी संख्या में रोजगार का वादा करके ही सत्ता के गलियारे में अपने लिए जगह बनाई थी.

भारतीय जनता पार्टी के शपथपत्र में वादा किया गया था कि पार्टी आने वाले दस साल में 25 करोड़ युवाओं को रोजगार देगी.  यानी प्रति वर्ष ढाई करोड़ रोजगार. अगर 2014 के चुनावी परिणाम को देखें तो यह भी स्पष्ट होता है कि युवाओं ने इसी उम्मीद में नरेन्द्र मोदी को भारी बहुमत दिलाया था.

निर्वाचन आयोग के अनुसार 2014 में पहली बार वोट देने वालों की संख्या करीब 15 करोड़ थी. आने वाले लोकसभा चुनाव में इनकी संख्या करीब 13 करोड़ होगी. इसका मतलब ये हुआ कि 2019 के लोकसभा चुनाव में 18 से 25 साल के युवा वोटर की संख्या करीब 28 करोड़ होगी. इनमे से अधिकतर की मुख्य चिंता का केंद्र रोजगार ही होगा.

इन युवाओं का दुर्भाग्य यह है कि राजनितिक दल इनसे रोजगार देने का वादा करते हैं लेकिन इन नेताओं के पास ऐसा कोई मॉडल नहीं है जिससे बड़ी संख्या में रोजगार पैदा कर सके. नरेन्द्र मोदी का उदाहरण ही लें. उन्होंने प्रति वर्ष ढाई करोड़ रोजगार देने का वादा किया. साढ़े चार साल गुजर भी गए और देश में रोजगार की स्थिति बाद से बदतर ही हुई है.

2017 में आर्गेनाईजेशन फॉर इकनोमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट ने अनुमान लगाया था कि देश में 18 से 29 साल के युवाओं की करीब तीस प्रतिशत आबादी नौकरी की तलाश में है. इसी साल मार्च में (2018), भारतीय रेल के 90 हज़ार पोस्ट के लिए ढाई करोड़ युवाओं ने आवेदन किया था. फरवरी में तमिलनाडू टाइपिस्ट, स्टेनोग्राफर इत्यादि के लिए 9,500 सीट के लिए आवेदन मंगाए गए थे और आवेदन करने वालों में 992 के पास पीएचडी और 23,000 एमफिल की डिग्री थी.

दुखद यह है कि वर्तमान केंद्र सरकार जिसने रोजगार देने का वादा करके सत्ता पाई थी उसने सत्ता में आने के बाद कुछ ऐसे कदम उठाये जिससे लोगों को रोजगार मिलना तो दूर बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार भी हो गए. नोटबंदी एक उदाहरण है. नवम्बर 2016 में सरकार द्वारा पांच सौ और हज़ार के नोट बंद करने के अचानक लिए गए फैसले से मध्यम और लघु उद्योगों को भारी झटका लगा. नतीजन लाखों लोग बेरोजगार हो गए. अब समस्या विकराल हो चुकी है.

बाद में नरेन्द्र मोदी और उनके सरकार के कई मंत्रियों ने तो कह दिया कि बेरोजगारी के सारे आंकड़े फर्जी है और इस तरह बेरोजगार छले गए.

विकास के जीडीपी मॉडल में नहीं पैदा हो रहे हैं युवाओं के लिए रोजगार

वैसे देश के कई सारे विद्वान् विकास के जीडीपी मॉडल पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाते रहे हैं. विकास के इस मॉडल का कोई फायदा बहुसंख्यक को नहीं मिल रहा है. एक तरफ कॉर्पोरेट के मुनाफे कई गुना बढ़ रहे हैं तो दूसरी तरफ गरीबी, बेरोजगारी भी बढती जा रही है.

पर विश्व बैंक, आईएमऍफ़ जैसी संस्थाएं पुरजोर तरीके से इस मॉडल का समर्थन करती रही हैं. इनसे जुड़े अर्थशास्त्री भी इसके समर्थन में ढेरों तर्क देते रहे हैं. लेकिन इन्हीं में से एक और भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी हाल में माना कि भारत का विकास मॉडल समुचित रोजगार पैदा करने में विफल रहा है.

देश में करीब पच्चीस सालों तक लगभग साढ़े सात प्रतिशत का विकास होते हुए भी कई करोड़ लोग रोजगार की तलाश में दर दर भटक रहे हैं. फ़रवरी महीने में आये सेंटर फॉर मोनिटरिंग इंडियन इकॉनमी के रिपोर्ट के अनुसार तीन करोड़ से अधिक युवा फ़रवरी महीने में नौकरी खोज रहे थे.

बेरोजगारी की इस जटिल स्थिति से रोजगार की इस भारी समस्या से समय रहते नहीं निपटा गया तो स्थिति तनाव वाली ही बनेगी. पहले राज्यवार, फिर जिलेवार. इसलिए बजाए कि किसी एक कमलनाथ को घेरने की युवाओं और समाज के अन्य लोगों को चाहिए कि जैसे किसानों ने सरकार की घेराबंदी की है वैसे ही घेराबंदी की जाए और सरकार को बाध्य किया जाए कि जल्द से जल्द इस मुद्दे का समाधान खोजने को मजबूर करें.

 

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