तीन तलाक पर कानून: समस्या से निजात या खुद समस्या!

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मुस्लिम महिलायें, स्रोत आईएनएस

अभिजीत दूबे/

अभिजीत दूबे

तीन तलाक पर सरकार द्वारा लाया गया कानून समस्या से निजात दिलाने की जगह समस्या को बढ़ाने वाला प्रतीत होता है। अगर इस कानून की गहन पड़ताल की जाए तो स्पष्ट होगा कि इसके ढेर सारे प्रावधान अस्पष्ट और विरोधाभासी हैं। आईये देखते हैं कैसे!

‘शायरा बानो’ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने 22 अगस्त 2017 को 3:2 के बहुमत के साथ मुसलमानों में ‘तलाक ए बिद्दत’ को गैर कानूनी घोषित कर दिया गया। यह मुस्लिम समुदाय में तलाक लेने की एक प्रक्रिया है।

अब बारी आई केंद्र सरकार की। केन्द्र सरकार का यह मानना है कि न्यायालय द्वारा ‘तलाक ए बिद्दत’ को गैर-कानूनी घोषित कर देने के बाद एवं मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के आश्वासन के बाद भी मुस्लिम समाज के कुछ तबकों में इसका इस्तेमाल हो रहा है।  वर्तमान सरकार मानती है कि अब भी कई पुरुष ‘तलाक ए बिद्दत’ का इस्तेमाल करते हुए महिलाओं के साथ नाइंसाफी कर रहे हैं।

अपनी इस परिकल्पना को सही मानते हुए सरकार आगे बढ़ कर कानून लेकर आई है। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को प्रभावपूर्ण तरीके से लागू करवाने के लिये और इस ‘तलाक ए बिद्दत’ से पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलावाने के लिये केन्द्र सरकार ‘द मुस्लिम वूमन (प्रोटेक्शन ऑफ़ राइट्स ओन मैरिज) बिल’ 2018 लेकर आई है जो अभी संसद के पटल पर रखा गया है। लोकसभा ने बृहस्पतिवार को यह बिल पारित कर दिया। अब राज्यसभा को इसपर निर्णय लेना है।

सनद रहे कि इस्लाम में निकाह दो पक्षों के बीच एक सिविल करार होता है तथा उक्त करार में निकाह के खत्म होने की स्थिति (तलाक की दशा) से जुड़ी शर्तों का उल्लेख रहता है। इसका पालन तलाक होने की दशा में किया जाता है। मुस्लिम समाज में ‘तलाक ए बिद्दत’ ही तलाक लेने का एक मात्र तौर-तरीका नहीं है। इसके अलावा भी तरीके मौजूद है। जिससे स्पष्ट होता है कि मौजूदा बिल विवाहित मुस्लिम महिलाओं के वैवाहिक हितों को पूर्ण रूप से नहीं बचाता है।

इस बिल की एक अच्छी बात है कि यह मुस्लिम समुदाय की पीड़ित महिला को उसके गुजर-बसर की रकम भी उसके पति से पाने का अधिकार दिलाती है। गुजर-बसर की रकम तय करने की जिम्मेदारी मजिस्ट्रेट की है।  यह रकम कब तक और कैसे दिया जाये यह भी मजिस्ट्रेट साहब को ही तय करना है। पीड़ित मुस्लिम महिलाओं के लिये यह एक अच्छी खबर हो सकती है।

पर गौर करने की बात यह है कि ऐसा ही एक प्रावधान दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 में भी है।  ऐसा ही एक प्रावधान ‘घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005’ में भी है। महिला चाहे किसी भी समुदाय की हो वह इन दोनों कानून से अन्याय होने की स्थिति में न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकती है।

जब दिया गया तीन तलाक ही मान्य नहीं तो तलाक देने वाले को सजा किस गुनाह के लिए देना चाहती है सरकार?

अब सवाल आता है कि जब पहले से दो कानून मौजूद थे तो उसी उद्देश्य से नया कानून लाने से क्या कोई अलग फायदा होने की उम्मीद बनती है? जवाब होगा नहीं. बल्कि इससे मुकदमेबाजी बढ़ेगी।

संभवतः देश में पहली दफा ऐसे कानून का निर्माण हो रहा है जो एक सिविल करार की अवैधानिक रूप से खण्डित होने पर भी करावास से दण्डित करने का प्रावधान रखता है। यह कानून यह भी सुनिश्चित करता है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होने मात्र से आरोपी को जेल जाना पड़ेगा।

इसी प्रकार इस कानून से एक और गंभीर सवाल उत्पन्न होता है। यदि ‘तलाक ए बिद्दत’ को कानूनन रूप से अवैध घोषित कर दिया गया है तो फिर इसके द्वारा लिया गया तलाक शून्य है। अगर ऐसा है तो संभवतः यह एक मात्र ऐसा कानून है जो शून्य करणीय कार्य के लिये भी सजा का प्रवाधान रखता है।

संभवतः देश में पहली दफा ऐसा कानून बना है जिसमें पत्नी पति को जमानत का लाभ लेने के लिये उस पर दबाव बना सकती है। इसलिए इसके दुरूपयोग होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।

मई 2016 तक के सरकार के आंकड़ो के अनुसार पूरे देश में साढ़े छः लाख से ज़्यादा मामले परिवार न्यायालयों में लंबित थे। इसमें सभी धर्मों के पीड़ित व्यक्ति शामिल है। सबसे ज्यादा प्रकरण उत्तर प्रदेश  के न्यायालयों में लंबित है। यह कोई स्वस्थ आंकड़ा नहीं है।

ऐसी परिस्थितियों में सरकार को एवं समाज को वैवाहिक संस्थाओं को बचाने के प्रयास के लिये मसौदा लाना चाहिय। यह मसौदा सभी धर्म के लोगो के लिये होना चाहिये। हमें ऐसी परिस्थितियाँ/कानून की आवश्यकता है जो परिवार को बचाने की बात करे। जब परिवार बचेंगें तो ही सशक्त समाज का निर्माण हो पायेगा।

(अभिजीत दूबे मध्य प्रदेश के उच्च न्यायालय में अधिवक्ता हैं. समसामयिक मुद्दों पर राय रखने वाला अधिवक्ता हैं और लेख भी उनके निजी विचार का हिस्सा है) 

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