झूठ का बाज़ार -हम जैसे लोगों की वजह से ही है

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शिवम शुक्ला/

झूठ कोई नया विषय नहीं है। जो नया है वह ये कि झूठ अब बाज़ार में एक नए प्रोडक्ट की तरह मौजूद है और बड़े पैमाने पर इसका प्रयोग जनमत तैयार करने के लिए हो रहा है।

हमारे लोकतंत्र में शुरुआत से ही झूठ, नेताओं के भाषण का अभिन्न हिस्सा रहा है। झूठ का उपयोग चुनावी भूमिका बनाने में सदियों से किया जाता रहा है। बेहतर होता कि यह उनकी ज़ुबान तक ही सीमित रहता।

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लेकिन नए दौर में नई तकनिकी के आने के बाद झूठ फैलाने वाली ताकतों का विस्तार हुआ है। यहाँ नेताओं के साथ सुर मिलाकर कुछ ट्रोल्स झूठ फ़ैला रहे हैं। ये ट्रोल्स कुछ और नहीं बल्कि खरीदे हुए लोग हैं। जो मशीन की तरह काम करते हैं। हज़ार बार बोला गया झूठ सच लगने लगता है। ये मशीनें इसी सिद्धांत पर कार्य करती हैं। एक झूठ को इतनी बार बोलती हैं कि यह सच प्रतीत होने लगता है। इन मशीनों का टारगेट वो लोग है जिनको उनके मनमाफिक तथ्य चाहिए। अपने मनमाफिक ‘तथ्य के रूप में गल्प’ पाते ही ये लोग उसे आगे फॉरवर्ड कर देते हैं।

हाल ही में एक अजीबोगरीब स्थिति से मेरा सामना हुआ। पिछले दिनों 2G घोटाले के आरोपियों को रिहा कर दिया गया था। सीबीआई कोई सबूत पेश नहीं कर पायी। अदालत के इस फैसले के बाद सत्ताधीन पार्टी को घेरा जाने लगा। वैसे 2G घोटाले को यदि प्रारंभ से जानने की कोशिश की जाए तो इसकी जड़ें 2003 में तत्कालीन टेलिकॉम मिनिस्टर प्रमोद महाजन से जुडी हैं। प्रमोद जी ने सोचा नहीं था कि 2004 में सरकार बदल जाएगी। काँग्रेस आयी और सबकुछ बना बनाया मिला और इस तरह इतिहास का ‘तथाकथित’ ये सबसे बड़ा घोटाला हो गया। काँग्रेस की ही सरकार में इस ‘घोटाले’ का पर्दाफाश हुआ। साल 2014 में फिर सरकार बदली। सीबीआई की जाँच जारी रही और इस ‘घोटाले’ का आधार बनाने वाली पार्टी के ही राज में ‘घोटाला’ करने वाली विपक्षी पार्टी के आरोपियों को रिहा कर दिया गया।

तस्वीर-ऑल्ट न्यूज़

रिहाई के बाद सोशल मीडिया पर एक अफवाह चली। “2G घोटाले के आरोपियों को बाइज्ज़त बरी करने वाले जज ओ.पी. सैनी, पंजाब के एक युवा काँग्रेस विधायक अंगद सैनी के पिता हैं।” इस बात को इतना अधिक प्रचारित किया गया कि पढ़े लिखे लोग भी इसे सच मानने लगे।

मुझ तक जब ये खबर पहुँची तो मैंने थोड़ी बहुत जांच पडताल की. मैंने पाया कि ये सब कोरी अफवाह भर है । जो इस झूठ को फैला रहे हैं उनमें से कुछ लोगों से निवेदन किया कि कृपया उसे हटा लें। कुछ ने हटाया और कुछ बेशर्मो की तरह अड़े रहे। ये पहला मौका नहीं है जब झूठी अफवाहों को सच मानकर लोग उन्हें आगे बढ़ाते रहे और नफरत का चरस बोते रहे। अखलाक़ से लेकर रोहित वेमुला और कन्हैया कुमार के बारे में कई तरह की अफवाहें फैलाकर इन्हें बदनाम किया गया है।

बात यहाँ तक तो ठीक है। मेरी चिंता का विषय वे लोग हैं जिन्होंने मेरे कहने पर भी कि ये झूठ है,उस पोस्ट को नहीं हटाया। जबकि दोबारा मेरे निवेदन करने पर मुझसे बिना सर पैर की बातें करके उलझने लगे। ये लोग मुझे इस एजेंडे के एजेंट की तरह लगते हैं। सच और झूठ से इनका कोई सरोकार नहीं है।

तस्वीर-ऑल्ट न्यूज़

इस तरह की खबरों को आगे बढाने में भारी मात्रा में युवा शामिल हैं। फेसबुक और WhatsApp का प्रभाव इन युवाओं पर गहरा है। प्रौढ़वर्ग के वह लोग जिन्होंने अभी अभी यह तकनीक सीखी है या सीख रहे हैं, यहाँ कुछ भी पढ़कर उसे सच मान लेते हैं। फोटोशोप की हुई तस्वीरें और एडिट किये हुए विडियो को ये समझ नहीं पाते और इसे आगे बढाते जाते हैं। कुछ समझदार प्रौढ़ भी इस बात को बढ़ावा देते हैं। कई न्यूज़ पेपर और टीवी मीडिया भी इनमें शामिल हैं। इनको बढ़ावा देने के पीछे एक एजेंडा काम करता है। हरिशंकर परसाई जी ने अपने व्यंग “निठल्ले की डायरी” में लिखा है कि: “सोए हुए को जगाना आसान है, मगर उसको जगाना नामुमकिन है जो सोने का नाटक कर रहा है।” ये कुछ प्रौढ़ सोने का नाटक कर रहे हैं।

एजेंडा हमेशा किसी ख़ास लक्ष्य को हासिल करने के लिए बनाया जाता है। एजेंडा कोई गलत शब्द या विचार नहीं है। एजेंडे की बुनियाद सच या झूठ दोनों हो सकती है। एजेंडे की नींव में झूठ का इस्तेमाल इतनी बार किया जा चुका है कि यह एक नकारात्मक शब्द बन पड़ा है।

हालाँकि वो सोने का नाटक करने वाले लोग हैं। उन्हें जगाया नहीं जा सकता। मगर उनके प्रभाव में रहने वाले लोग इस झूठ को बिना जांच-पड़ताल किये सच मानने लगे और जज तथा काँग्रेस को कोसने लगे। यहाँ काँग्रेस का बचाव करना कतई मेरा उद्देश्य नहीं है। लेकिन इस बात को समझने की ज़रुरत है कि हम किसी भी अफवाह को आगे न बढ़ाते हुए पहले उसकी जांच-पड़ताल करें। कोई और अगर ऐसी अफवाह फैला रहा हो तो उसे रोकें। आपका झुकाव उस झूठ का सहारा लेने वाली पार्टी की तरफ हो सकता है। सच के साथ उनका साथ देंगे तो कुछ अच्छा होगा। झूठ के साथ उनका साथ देंगे तो बुरा होना तय है। यह एजेंडा मानवता के पक्ष में कतई नहीं है।

(शिवम शुक्ला इंदौर से इंजिनियरिंग और मैनेजमेंट की पढाई-लिखाई पूरी कर खुद के व्यवसाय में हैं. इंदौर में ही इनकी रहनवारी है. सामाजिक उतार-चढ़ाव पर ये बारीक नज़र रखते हैं.) 

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