झारखण्ड का पत्थलगड़ी: लोक सभा न विधान सभा सबसे ऊँची ग्राम सभा

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जेरोम जेराल्ड कुजूर/

भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी और पेसा कानून के प्रणेता दिवंगत डा बी डी शर्मा कहा करते थे, लोक सभा न विधान सभा! सबसे ऊँची ग्राम सभा। अपने जीवन के अन्तिम दिनों में वे झारखण्ड के 5वीं अनुसूचित इलाकों में घूमते हुए गांव गणराज्य की मिटिंग करते थे और पत्थलगड़ी करते थे। एसटी/एससी आयोग के पूर्व अध्यक्ष बन्दी उराँव ने भी कई दफा डा0 बी0 डी0 शर्मा के साथ खूँटी जिले के कई खूँट कटी गांवों में साथ-साथ भ्रमण कर पेसा कानून के महत्व को समझाया है। तब से लेकर खूँटी और आस-पास के स्वशासी इलाकों के ग्राम प्रधानों ने अपने इलाकों में 5वीं अनुसूचित क्षेत्रों के तहत् मिले अधिकारों विशेषकर पेसा कानून के अन्तर्गत ग्राम सभा के अधिकारों को पै्रक्टिस करना शुरू कर दिया है।

खूँटी इलाकों के आदिवासियों और जिला प्रशासन के बीच नासमझी का मुख्य वजह है पुलिस प्रशासन द्वारा भारतीय संविधान में उल्लेखित 5वीं अनुसूचि के तहत् आदिवासियों के अधिकारों को न समझना। अनुच्छेद 244 (1) और (2) में पूर्ण स्वशासन व नियंत्रण की शक्ति दी गई है। झारखण्ड के 13 अनुसूचित जिलों में राज्यपाल को शासन करना है। लेकिन आजादी के सात दशक बाद भी किसी राज्यपाल ने इन क्षेत्रों के लिए अलग से कोई कानून नहीं बनाया। परिणातः गैर अनुसूचित (अर्थात् सामान्य) जिले के नियम कानून ही आज तक आदिवासियों के ऊपर लादे जाते रहे हैं। इस व्यवस्था के अन्तर्गत एक आदिवासी सलाकार परिषद् का गठन तो किया जाता रहा है, लेकिन इस परिषद् को ही अपने कर्त्तव्यों की जानकारी नहीं है। अगर उसे अपने जिम्मेवारी का तनिक भी एहसास होता तो आज झारखण्ड में जितनी भी आदिवासी विरोधी नीतियाँ यथा उद्योग नीति, खनन नीति, विस्थापन नीति, भूमि अधिग्रहण नीति, स्थानीय नीति, वगैरह विनासकारी नीतियाँ नहीं बनती।

अनुच्छेद 19 (5) और (6) में जनजातियों के स्वशासन व नियंत्रण क्षेत्र (अनुसूचित क्षेत्र) में गैर लोगों के मौलिक अधिकार लागू नहीं होते। इसका तात्पर्य यह है कि कोई भी गैर लोग अनुसूचित क्षेत्र के अन्तर्गत निर्बाध गति से वास, व्यवसाय, जमीन की खरीद आदि नहीं कर सकते। यहाँ तक कि गैर लोगों को इन इलाकों में प्रवेेश के लिए वहाँ के परम्परागत प्रधानोें से अनुमति लेनी पड़ेगी। लेकिन ऐसा कोई काम पिछले 60-70 सालों से चलन में नही रहने की वजह से यहाँ और गैर लोगों को इसकी जानकारी नहीं है।

अनुच्छेद 244 (1) कण्डिका (5) (क) में विधान सभा या राज्य सभा द्वारा बनाया गया कोई भी सामान्य कानून अनुसूचित क्षेत्रों में लागू नहीं हो सकते। जैसे आईपीसी एक्ट, सीआरपीसी एक्ट, लोक प्रतिनिधित्व कानून 1951, भूमि अधिग्रहण कानून, आबकारी अधिनियम, भू-राजस्व अधिनियम, पंचायत अधिनियम 1993, नगर पंचायत अधिनियम, नगरपालिका अधिनियम, मोटरयान अधिनियम, परिवहन अधिनियम, भारतीय चिकित्सा अधिनियम 1956 आदि। अनुच्छेद 141 में उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित आदेशों को किसी भी विधान मण्डल या व्यवहार न्यायालय को अनुशरण करने की बात कही गई है। उच्चतम न्यायालय का फैसला वेदान्ता के अनुसार लोक सभा न विधान सभा, सबसे ऊँची ग्राम सभा।

झाखण्ड राज्य कई तरह के खनिज सम्पदाओं से भरा पड़ा है, जिसका उत्खनन सदियों से गैर आदिवासियों/कम्पनियों/सरकारों द्वारा किया जा रहा है। जबकि इन खनिजों का दोहन करने का अधिकार आदिवासियों को प्राप्त है। उच्चतम न्यायालय का फैसला केरल बनाम 08.07.2013 के अनुसार जिसकी जमीन उसका खनिज। लेकिन उच्चतम न्यायालय के फैसले का उल्लंघन करे हुए यहाँ की सरकारों के द्वारा दर्जनों एमओयू सालों साल किया जाता है। ऐसे लाखों एकड़ जमीन आदिवासियों की अधिगृहीत कर ली गई है और लाखों लोगों को अपने पैतृक भूमि से बेदखल होना पड़ा है। उच्चतम न्यायालय के समता जजमेन्ट (फैसला) 1997 के अनुसार अनुसूचित क्षेत्रों में केन्द्र और राज्य सरकार का एक ईंच भी जमीन नहीं है। यह बात धीरे-धीरे आदिवासियों के मन में घर कर रही है। उनके इस विचार को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश मार्कडेंय काटजू ने 05.01.2011 को एक रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय को सौंपी है जिसमें यह कहा गया है कि भारत देश के 8 फीसदी आदिवासी ही इस देश असली मालिक हैं।

संविधान के उपरोक्त उपबंधों को अनुसूचित जिलों के उपायुक्त, पुलिस अधीक्षक, उप विकास आयुक्त, अनुमण्डल अधिकारी, प्रखण्ड विकास पदाधिकारी, अंचलाधिकारी और थानेदार नहीं जानते हैं। इसलिए उन्हें ऐसा लगता है कि ये आदिवासी आईपीसी और सीआरपीसी जैसे कानूनों का खुलम खुल्ला उल्लंघन कर रहे हैं। दरअसल यह गलती खूँटी क्षेत्र के आदिवासियों का नहीं बल्कि संविधान के इन रक्षकों का ही है। बहरहाल इस विवाद पर लंबी बहस चलाया जाना चाहिए। ताकि दोनों पक्षांे को संविधान की जानकारी हो सके।

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता  हैं )

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