तीन तलाक़ के खिलाफ जीत का जश्न इन पांच महिलाओं के नाम

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शिखा कौशिक/

सर्वोच्च न्यायलय द्वारा तीन तलाक के बेजा इस्तेमाल पर रोक लगाने के ऐतिहासिक फैसले के पीछे भी कुछ महिलायें ही है. अलबत्ता कुछ राजनितिक दलों के उत्साह और बयानबाज़ी को देखते हुए यह साफ़ प्रतीत हो रहा है  कि ये दल इसके लिए खुद को श्रेय देना चाहते हैं. भारतीय जनता पार्टी ने तीन तलाक़ को एक चुनावी मुद्दा बनाया था और इससे निजात दिलाने के लिए कदम उठाने के आश्वासन भी देती रही थी. पर तीन तलाक़ से जुड़ी बुराईयों के खिलाफ लड़ाई पांच महिलायें लड़ रही थी न कि कोई राजनितिक दल. आईये जानते हैं कौन है ये महिलाएं:

 

शायरा बानो

उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली 36 वर्षीय शायरा बानो का निकाह रिजवान अहमद से वर्ष 2002 में हुआ था. पेशे से प्रॉपर्टी डीलर रिजवान ने शुरूआती दिनों से ही शायरा को परेशान करना शुरू कर दिया था. दहेज़ की मांग से शुरू हुई समस्या धीरे धीरे रोजमर्रा के जीवन में होने लगी. शायरा के अनुसार रिज़वान उन्हें मारता-पीटता भी था. खैर उनके पति ने अक्टूबर 2015 में उन्हें इस तीन तलाक का इस्तेमाल करते हुए दूरी बना ली. इलाहाबाद में रहने वाले रिज़वान ने अपने दो बच्चों को भी साथ ले लिया. पिछले एक साल से शायरा कहती हैं कि उन्हें अपने दोनों बच्चों से बात तक नहीं करने दिया गया है. उनका बेटा 13 साल का है और बेटी 11 साल की.

इसके खिलाफ शायरा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. शायरा की अन्य मांगों में बहु-पत्नी पर रोक भी शामिल है.  यह उस कुप्रथा पर भी रोक चाहती है जिसमे तलाकशुदा पत्नी को वापस अगर अपने पति से शादी करनी है तो उसके लिए पहले किसी और से शादी अनिवार्य है.

शायरा ने यह भी आरोप लगाया है कि उनके ससुराल वालों ने उन्हें  छः बार गर्भपात कराने के लिए मजबूर किया जिससे उन्हें काफी शारीरिक और मानसिक तनाव झेलना पड़ा.

 

इशरत जहां

पश्चिम बंगाल के हावड़ा की इशरत जहां को उनके उनके पति ने दुबई से फ़ोन पर तलाक दे दिया था.  उनके अनुसार अप्रैल 2015 में, दुबई से 15 साल की शादी के बाद पति मुर्तजा ने फ़ोन पर ही सम्बन्ध-विच्छेद कर लिया. उनके पति ने कथित तौर पर दूसरी औरत से शादी कर ली. इतना ही नहीं उसने इशरत से अपने चार बच्चों को भी अपने पास रख लिया. इशरत अब अपने बच्चों को वापस पाने और मुर्तजा से उनके रखरखाव का खर्च के लिए लड़ाई लड़ रहीं हैं. .

इशरत ने न्यायलय को बताया था कि उनका निकाह वर्ष 2001 में हुआ था.  इन्होने खुद के लिए पुलिस सुरक्षा की भी मांग की थी. इनका कहना था कि यह न्याय चाहती हैं और तब तक लड़ेंगी जब तक न्याय नहीं मिल जाता.

 

गुलशन परवीन

उत्तर प्रदेश के रामपुर की रहने वाली गुलशन परवीन को तलाक़नामा नोटिस एक 10 रुपये  के स्टाम्प वाले चिठ्ठी से मिली. उस वक्त वह अपने मायके गई हुईं थी. इनके अनुसार इनका निकाह वर्ष 2013 में हुआ था और इनको एक दो साल का बेटा भी है. इनको इस बात की शिकायत है कि एक दिन अचानक इनके पति को इनसे दूरी बनाने का ख़याल आया और उसने इन्हें तलाक दे दिया. इस तरह ये और इनका बेटा अचानक से बेघरबार के हो गए.

 

आफ़रीन रहमान

आफ़रीन का निकाह  2014 में मैट्रिमोनियल साइट्स की मदद से हुई थी. इसके दो-तीन महीने बाद ही ससुराल वाले उन्हें दहेज़ के लिए परेशान करने लगे. टोका-टोकी से शुरू यह उत्पीडन धीरे धीरे मार-पीट में तब्दील होती गई. एक दिन अचानक इनके ससुराल वालों ने इन्हें घर से जाने को कह दिया.

कोई रास्ता न पा, आफरीन मायके चली गईं जहां उनको तलाक के लिए एक ख़त मिला. “यह सरासर गलत है”, आफरीन कहती हैं और न्यायलय से न्याय की उम्मीद रखती हैं.

 

अतिया साबरी

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर की ही रहने वाली अतिया का निकाह 2012 में हुआ था और इनको भी तलाक़ की खबर एक खत से मिली. इनकी तीन और चार साल की दो बेटियाँ हैं. इनके अनुसार इनके पति और ससुर को यह पसंद नहीं था. उन्हें बेटा चाहिए था.

इनका पति लक्सर के जसोद्दरपुर गांव निवासी का रहने वाला है. उसका नाम वाजिद हसन है जिसने 2015 में कागज पर तीन बार तलाक लिखकर अपनी पत्नी अतिया से संबंध-विच्छेद कर लिया था. इसी साल जनवरी में अतिया ने तीन तलाक की प्रथा को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी.

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