धारा 497 पर न्यायालय का फैसला: नए भारत में कैसी होगी वैवाहिक संस्था!

1

अभिजीत दुबे/

वैवाहिक संस्था से परे जाकर लिव-इन-रिलेशनशिप और अप्राकृतिक सेक्स (भारतीय दण्ड संहिता की धारा 377) तथा शादी से बाहर संबंध बनाना (भारतीय दण्ड संहिता की धारा 497) अब अपराध की श्रेणी में नहीं रहे. सर्वोच्च न्यायालय के दो निर्णय वैवाहिक संस्था के सांस्कृतिक विरासत से अपने नये भारत को बहुत दूर लेकर जाता है.

हमारे समाज में विवाह, सेक्स संबंधों को एक सम्मानित दृष्टि से देखता है. सफल वैवाहिक संबंधो में पुरूष और महिलाओं के बीच विश्वसनीयता एक वृहत पैमाना है. इसके मद्देनज़र माननीय उच्चतम न्यायालय के प्रति पूरे सम्मान के साथ होते हुए हालिया कुछ निर्णय से अलग मत रखना चाहता हूँ.

मेरे कुछ सवाल है. जैसे यदि कोई व्यक्ति विवाह उपरांत अन्य व्यक्ति के साथ लिव-इन-रिलेशन में रहने लगे तो क्या वह अपराध की श्रेणी में नहीं आयेगा? चूंकि वह व्यक्ति दुसरा विवाह नहीं करेगा लेकिन लिव-इन में रहेगा इसलिए वह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 494 में अपराधी भी नहीं होगा. वह व्यक्ति अपने जीवन साथी को लगातार धोखा दे रहा होगा पर वह अपराधी नहीं कहलायेगा.

ऐसे में क्या जो नई स्थिति उत्पन्न होगी उसमें हमारा नया भारत अपने सामाजिक ताने बाने को बचा कर रख पायेगा? यह एक विचारणिय प्रश्न है.

जब तीन तलाक पर तीन वर्ष तक की सजा का प्रावधान भारत सरकार लेकर आ सकती तो विवाह के बाहर सेक्स संबंधों पर को रोक क्यों नहीं होना चाहिये! क्या तलाक देना अपराध है और व्याभिचार अपराध नहीं है? हम समाज को कैसा सन्देश देना चाहते हैं?

क्या हम महिला की गरिमा और पुरूष की गरिमा में भेदभाव रख रहे है, जब की संवैधानिक स्थिति यह है कि कानून सब के लिये एक समान होना चाहिये.

अगर हम यह माने की तीन तलाक एक सामाजिक अपराध है तो क्या व्याभिचार मात्र एक सामाजिक मुद्दा है? क्या तलाक दो पक्षों के मध्य निजी मामला ना होकर पूरे समाज में बात करने का विषय है? वैसे भी जो कृत्य समाज को दूषित करते है उनके विरूद्ध दण्डात्मक कार्यवाही के प्रावधान होते है. तो क्या व्याभिचार समाज में वैवाहिक संस्था को भ्रष्ट नहीं करता है और यदि हां तो क्या उसे मात्र तलाक लेकर या देकर ही ठीक किया जा सकता है?

अगर हम यह माने की तीन तलाक एक सामाजिक अपराध है तो क्या व्याभिचार मात्र एक सामाजिक मुद्दा है?

ऐसे बहुतेरे सवाल है जो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद पूछे जाने चाहिए. जैसे क्या दण्डात्मक कार्यवाही के आधार पर व्याभिचार ठीक नहीं किया जा सकता? क्या व्याभिचार की स्थिति में, पति या पत्नी, तलाक ना लेने की स्थिति में  जीवन भर अपने आप को प्रताड़ना से ग्रसित रखे? क्या उससे उपजी स्थिति जैसे आत्महत्या की स्थिति में ही कोई दण्डात्मक कार्यवाही होना चाहिये? क्या हम ऐसा भारत चाहते है जहाँ वैवाहिक संस्था सबसे ज्यादा कमजोर हो? क्या हम ऐसा भारत चाहते है जहाँ मनुष्य और जानवरों के सेक्स संबंध बनाने के विषय पर एक समानता हो? क्या व्याभिचार से उत्पन्न होने वाली संतान को उसी प्रकार से वैध मानी जायेगी जैसे की विवाह से उत्पन्न होने वाली?

यह सब कुछ सवाल है जिसका सर्वोच्च न्यायालय के हालिया फैसले से नाता है और उम्मीद है कि न्यायधीशों ने इन सवालों पर जरुर विचार किया होगा!

(अभिजीत दूबे मध्य प्रदेश के उच्च न्यायालय में अधिवक्ता हैं. यह लेखक के निजी विचार हैं)

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here