सर्वोच्च न्यायालय में निजता के अधिकार पर बहस जारी

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सौतुक डेस्क/
बुधवार को  नौ न्यायधीशों की संवैधानिक पीठ ने आधार से जुड़े मुद्दे पर सुनवाई की जिसमे निजता के अधिकार पर लम्बी बहस चली. आधार के मामले में आखिरी बहस इस पर आकर टिक गई है कि भारतीय नागरिकों के पास निजता का अधिकार है भी कि नहीं. कुछ न्यायधीशों ने कहा कि भारत में पूर्ण रूप से निजता का अधिकार नहीं है और इसके लिए निजता क्या है पहले यह तय करना होगा. इस पर सुनवाई कल भी जारी रहेगी.
सुनवाई के दौरान यह भी बात उठी कि अगर निजता को परिभाषित किया जाए तो इससे निजता पर और प्रतिबन्ध लग जाएगा.
 सुप्रीम कोर्ट की पीठ और कई वकीलों के बीच इस गोपनीयता और निजता के मुद्दे पर काफी लम्बी चर्चा हुई. जिसमे इस पर बहस हुई कि क्या सचमुच आधार कार्ड का उपयोग ऐसी किसी निजता का हनन कर रहा है और यह कि यदि जनता के पास संविधान द्वारा निजता का अधिकार प्रदान किया गया है तो क्या सरकार उस निजता का उल्लंघन कर रही है. कहा गया कि इसके प्रावधानों का उल्लंघन केवल एक केस-टू-केस आधार पर तय किया जा सकता था.
न्यायालय में उठाये गए सवाल कुछ इस प्रकार थे; निजता क्या है, यदि देश के नागरिकों को निजता का अधिकार प्राप्त है , तो इसकी सीमा क्या है और इसके हनन का अंदाजा कैसे लगाया जा सकता है?

इससे पहले याचिकाकर्ता – सोली सोराबजी, श्याम दिवान, गोपाल सुब्रह्मण्यम और अरविंद दातार के लिए उपस्थित वकीलों ने तर्क दिया कि गोपनीयता का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग था. याचिकाकर्ताओं ने कहा कि यह अनुच्छेद जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा की गारंटी देता है. गोपनीयता एक व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.

आधार नंबर से जुड़े विवाद में सर्वोच्च न्यायालय  में चल रहे सुनवाई के दौरान  मंगलवार को  पांच न्यायधीशों की पीठ ने बुधवार को निजता के अधिकार तय करने के लिए नौ न्यायधीशों की पीठ में सुनवाई करने का आदेश दिया था.  इस सुनवाई में, यह संवैधानिक पीठ तय करेगा कि भारतीय नागरिकों के पास  निजता का मौलिक अधिकार है या नहीं.

 सनद रहे कि वेणुगोपाल के पहले रहे अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने 22 जुलाई 2015 को न्यायधीश केएस पुतुस्वामी बनाम केंद्र सरकार के मामले में यह दलील दी थी कि देश के नागरिकों को निजता का मौलिक अधिकार नहीं मिला हुआ है.
जब से आधार के बारे चर्चा शुरू हुई तब से लोगों को अपनी निजता या कहें प्राइवेसी की चिंता से परेशान रहे हैं. वर्ष 2011 में तो राज्यसभा की एक कमिटी ने इस बिल को इसी निजता के नाम पर लौटा दिया कि पहले इस देश में इस निजता की सुरक्षा करने वाला कोई कानून बनाना होगा तब जाकर आधार को लागू किया जा सकता है.
लोगों को डर है कि उनसे से जुड़े सारे ब्योरे, आंकड़े सरकार एक जगह ला रही है. इस आधार के बूते सरकार या जिसके पास भी यह डाटा होगा वह बड़ी आसानी से सारी जानकारी प्राप्त कर सकता है. लोगों का कहना है कि कोई एक क्लिक करने पर  आसानी से पता कर सकता है कि फलां व्यक्ति के पास कितने का कर्ज है, उन्होंने हाल फिलहाल कहाँ की यात्रा की है. ऐसे में लोगों पर निगरानी करना आसान हो जाएगा. इसको लेकर लोग न्यायलय का दरवाजा खटखटाते रहे हैं पर अभी तक बात उलझी रही है.
इसको लेकर देश भर में कई जगह प्रदर्शन भी होता रहा है. न्यायालय में भी 20 के करीब तो केस चल रहे हैं थे. इन सारे केस की सुनवाई बुधवार को होगी.
अब तक देश में कुल 115 करोड़ लोगों को आधार नंबर दिया जा चूका हैं.  सरकार के अनुसार 18 वर्ष से ऊपर के करीब 99 प्रतिशत लोगों को आधार मुहैया कराया जा चूका है. ऐसा तब हुआ है जब सरकार यह कहती रही है कि आधार किसी के ऊपर थोपा नहीं जाएगा.
यह भी याद रहे कि एक तरफ न्यायालय  आदेश देता रहा है कि आधार को देश की किसी सुविधा के लिए अनिवार्य नहीं किया जाए और दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने लगभग सभी सरकारी सुविधाओं में इस अनिवार्य कर दिया  है.

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  1. Not even privacy, Adhaar vouches our liberty to the government. Political regime of India is not a owner of India and Indians. None of the institutions of India have a right to tag the humans living in Indian boundaries. UID is an institution to keep the records of people as livestock.

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