आधार से निजता का उल्लंघन हो रहा है या नहीं, अगले हफ्ते सर्वोच्च न्यायलय करेगा तय

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30 जून 2017 को देश के कई हिस्से में लोगों ने आधार के जबरन थोपे जाने पर प्रदर्शन किया. यह तस्वीर बंगलौर की है.
सौतुक डेस्क/
भारत सरकार ने न्यायलय के मना करने के बावजूद भी आधार को लगभग हर  ज़रुरत के लिए अनिवार्य कर दिया है. वही आधार जिसकी शुरुआत वर्ष 2005 में यह कर कर की गई थी कि इसका मकसद सरकारी योजनाओं  का लाभ सही लोगों तक पहुँचाना है. इसके पीछे सरकार का तथाकथित मकसद, सभी गलत लाभार्थीयों को रास्ते से हटाना और इस तरह सरकारी खजाने पर बोझ कम करना था. इस दरम्यान सरकार बारम्बार यह बताती रही कि आधार को नागरिकों पर थोपा नहीं जाएगा. वर्तमान सरकार के एक मंत्री,  पी पी चौधरी जो आईटी और इलेक्ट्रॉनिक्स के राज्य मंत्री हैं, इन्होने लोकसभा को दिसंबर में बताया कि आधार किसी पर थोपा नहीं जाएगा. पर छः महीने बीतते-बीतते स्थिति एकदम बदल गई है. आज खाद्य वितरण से लेकर, मनरेगा, वृद्धावस्था पेंशन, मीड डे मील, टीबी का इलाज, एम्बुलेंस बुलाना,  बैंक में अकाउंट, इनकम टैक्स सारी प्रक्रियाओं में सरकार ने आधार थोप दिया है.
आज के इंडियन एक्सप्रेस अखबार में यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अजय भूषण पाण्डेय बताते हैं कि अब तक देश में कुल 115 करोड़ लोगों को आधार नंबर दिया जा चूका हैं. उनके अनुसार 18 वर्ष से ऊपर के करीब 99 प्रतिशत लोगों को आधार मुहैया कराया जा चूका है. ऐसा तब हुआ है जब सरकार यह कहती रही है कि आधार किसी के ऊपर थोपा नहीं जाएगा.
जब से आधार के बारे चर्चा शुरू हुई तब से लोगों को अपनी निजता या कहें प्राइवेसी की चिंता बनी रही है . वर्ष 2011 में तो राज्यसभा की एक कमिटी ने इस बिल को इसी निजता के नाम पर लौटा दिया कि पहले इस देश में इस निजता की सुरक्षा करने वाला कोई कानून बनाना होगा तब जाकर आधार को लागू किया जा सकता है.
लोगों को डर है कि उनसे से जुड़े सारे ब्योरे, आंकड़े सरकार एक जगह ला रही है. इस आधार के बूते सरकार या जिसके पास भी यह डाटा होगा तो साड़ी जानकारी एक क्लिक करने पर  आसानी से पता कर सकता है कि फलां व्यक्ति के पास कितने का कर्ज है, उन्होंने हाल फिलहाल कहाँ की यात्रा की है. ऐसे में लोगों पर निगरानी करना आसान हो जाएगा. इसको लेकर लोग न्यायलय का दरवाजा खटखटाते रहे हैं पर अभी तक बात उलझी रही है.
इसको लेकर देश भर में कई जगह प्रदर्शन भी हुआ है. न्यायलय में भी 20 के करीब तो केस चल रहे हैं हैं.
मामला फंसता है इस पर कि भारत जैसे देश के एक नागरिक के पास निजता का अधिकार है या नहीं? पिछले महीने अटॉर्नी जनरल ऑफ़ इंडिया के पद से सेवा निवृत मुकुल रोहतगी ने तो न्यायलय को यह कहा भी था कि अपने देश में निजता के अधिकार की कोई संकल्पना नहीं है.
इस यक्ष प्रश्न के जवाब में सर्वोच्च न्यायलय ने पहली बार 15 अक्टूबर 2015 को संविधान पीठ के गठन की बात की. पर न संविधान पीठ बना और न ही सरकार ने आधार को जरुरी बनाना बंद किया. इसको पुनः 9 जून, 2017 के आदेश में भी दुहराया गया. अब सरकारी आंकड़ा बताता है कि बहुमत ने सरकार के दबाव और प्रचार प्रसार में आकर अपना आधार बनवा भी लिया है.
आज उच्चतम न्यायलय ने आदेश दिया है कि  जल्दी से जल्दी इस पर फैसला हो कि आधार निजता के अधिकार (राइट टू प्राइवेसी ) का उल्लंघन करता है या नहीं. या ऐसा कोई अधिकार है भी कि नहीं?
इस आदेश के अनुसार सर्वोच्च न्यायलय के पांच न्यायधीशों की संविधान पीठ इस मसले पर दो दिन तक सुनवाई करेगी. यह सुनवाई 18 और 19 जुलाई को होगी. यह देखना दिलचस्प होगा कि इस सुनवाई के बाद सरकार द्वारा आधार के बढ़ते उपयोगों पर रोक लगती है या नहीं.

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