ऐसे ही श्रीलंका में भी आया था नागरिकता का कानून, सत्तर साल बाद भी झेल रहा इसका दंश  

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जीतेन्द्र राजाराम/
जीतेन्द्र राजाराम

भारत में अभी सिटिज़नशिप (अमेंडमेंट) एक्ट (सीएबी) या कहें नागरिकता (संसोधन) अधिनियम चर्चा में है. इसको लेकर पूरा देश उबल रहा है. विश्वविद्यालयों में प्रदर्शन हो रहे हैं. पुलिस लाठियां बरसा रही है. इसको लेकर ढेर सारे कयास लगाए जा रहे हैं. जैसे यह कि इस कानून से भारत का सेक्युलर आत्मा खतरे में पड़ जाएगी.

भारत के भविष्य पर इसका क्या असर होगा ये तो अभी कहना जल्दीबाजी होगी, लेकिन पडोसी देश श्रीलंका के अनुभवों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है. श्रीलंका ने 1948 में एक ऐसा कानून लाया जिसमें ग्यारह प्रतिशत लोग अचानक से नागरिकता से बेदखल कर दिए गए. उसका परिणाम श्रीलंका आजतक झेल रहा है.

अंग्रेजों से आजादी के तुरंत बाद, श्रीलंका में सिलौन नागरिकता अधिनियम संख्या-18 लाया गया. इस कानून के तहत महज 5,000 भारतीय तमिलों को ही नागरिकता दी गई. करीब सात लाख लोगों को बताया गया कि आप देश के नागरिक नहीं हैं. फिर शुरू हुआ संघर्ष का सिलसिला जो आज भी चल रहा है. करीब पचास साल बाद श्रीलंका सरकार को इन्हें नागरिकता देनी भी पड़ी फिर भी यह देश विश्वस्तर पर एक पूरे समुदाय के साथ हिंसा करने का आरोप झेल रहा है.

भारत की ही तरह, इस पूरे मामले की शुरुआत श्रीलंका में 1948 में वहाँ की संसद ने की थी.

संसद में दिए गए बयान और अधिनियम में लिखी गयी भाषा बिलकुल ऐसी थी मानो वो बहुत से भारतीय मूल के तमिल लोगों को अपना प्रिय नागरिक मानते हैं.

पर छोटी छोटी ऐसी शर्ते थीं जिससे श्रीलंका की 11 प्रतिशत आबादी देश विहीन हो गयी थी. विरोध और उपद्रव के बाद 1949 में फिर से संसद में नया क़ानून बना कि वो भारतीय मूल के तमिल जो दस वर्षों से लगातार सीलोन में रह रहें हैं और इंकम टैक्स देने के काबिल हैं वो लोग नागरिकता के पात्र हैं.  इस अधिनियम ने तमिलों की मुश्किलें और बढ़ा दी क्योंकि तमिल अपने बच्चों को जन्म पैतृक या मातृ गाँव में ही देते हैं और इस लिए वो अक्सर तमिलनाडु आते जाते रहते थे.

इसके बाद 1954 में नेहरू-कोटेलवाला संधि हुई जिसमें कुछ तमिलों को फ़ायदा हुआ लेकिन ग़रीब फिर नागरिकता से वंचित रह गए. 1964 में शास्त्री-सिरिमा संधि हुई और इसने मुश्किलों को और भी बढ़ा दिया.  सन 1974 में इंदिरा गांधी-सिरिमावो बंदरनैके संधि ने तमिलों को बहुत राहत दी और लगभग सभी तमिलों को भारतीय नागरिकता मिल गयी लेकिन 1982 में ये करार टूट गया और जो तमिल रोज़गार की वजह से भारतीय नागरिकता होने के बावजूद भी लंका में ही रह गए थे उनपर क़हर टूट गया.

दोनों देशों के इस अमानवीय रुख का नतीजा था कि प्रभाकरण के नेतृत्व में लिबरेशन टाइगर्ज़ ओफ़ तमिल एलम या कहें लिट्टे के नाम से एक  संगठन अस्तित्व में आया. इसने श्रीलंका और भारत, दोनों सरकारों के खिलाफ युद्ध का एलान कर दिया. भूतपूर्व भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या तक कर डाली.

वर्ष 2003 में लंका सरकार ने बिना शर्त सभी तमिलों को नागरिकता दे दी. लेकिन आग लगाने वाले यह तय नहीं कर सकते कि वह आग कब बुझेगी. तमिलों को नागरिकता तो मिल गई लेकिन  तक तक वो श्रीलंका की मुख्यधारा के समाज से काफी पिछड़ चुके थे. राज्य के द्वारा किये गए अन्याय का उन्हें शिद्दत से दुःख था. ग़रीबी और बेचारगी का दंश झेल रहे तमिलों का यह संगठन उग्र और निरंकुश भी हो चुका था.

इसका खामियाजा श्रीलंका और सारे तमिल समुदाय को उठाना पड़ा जब वर्ष 2009 में श्रीलंका सरकार को पूरे तमिल क्षेत्र पर हमला करना पड़ा. आज भी श्रीलंका अपनी एक गलती की कीमत चुका रहा है.

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(जितेन्द्र राजाराम आजकल मध्य प्रदेश के शहर इंदौर में रहते हैं और सामाजिक राजनितिक बहस में खासा दिलचस्पी रखते हैं. इन विषयों को समझने -समझाने के लिए वे इतिहास और आंकड़ो  को अपना हथियार बनाते हैं.)

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