गौरी लंकेश की हत्या के राज भविष्य में छुपे हैं

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The News Minute

चन्दन पाण्डेय/

गौरी लंकेश की हत्या पंसारे, दाभोलकर और कलबुर्गी की हत्याओं के अटूट सिलसिले का हिस्सा है. इस हत्या की कुंजी अतीत में कम भविष्य में ज्यादा छुपी है. यह सही है कि धार्मिकों और साम्प्रदायिक ‘निर्दोषों’ ने जिन बहानों के लिए लंकेश की हत्या की है वो अतीत में किये गए उनके साहसिक लेखन से जुड़ते हैं. लेकिन जो समय इन हत्यारों में चुना है, उस समय का चयन ही एक विकराल रैली के संबोधन की तरह है.

पहले अतीत की बात:

कहना न होगा कि ब्राह्मणवादी और धार्मिक ताकतों का जोर इन इलाकों में है. जाति इनका परचम है और धर्म इनका रथ, जिससे वो सबको रौंदते हुए जाहिलाना किसी सभ्यता की तरफ बढ़ रहे हैं. किसी दिन कलबुर्गी की हत्या कर देते हैं, किसी दिन के एस भगवान, हुचंगी प्रसाद की हत्या करने की धमकी दे देते हैं, किसी दिन योगेश के चेहरे पर कालिख पोत देते हैं.

और इन करतूतों को अंजाम देते हुए ये हत्यारे, निर्दोष किन्तु आहत भक्त सा दिखते हैं.  इनकी सारी शक्ति यहीं इसी समाज में है. इन हत्यारों के लिए गोली बारूद, इन हत्यारों के लिए छुपने की जगह, इनके लिए अदालत, कचहरी, वकील और न्याय सब कुछ यही समाज मुहैया कराता है. न्याय के बड़े से बड़े पैरोकार ऐसे ख्याल पालते हुए पाए जाते हैं कि किस धर्म में बुराई नहीं होती’ या हत्या तो गलत है लेकिन उन्हें भी ऐसा नहीं लिखना चाहिए था जिससे लोग आहत होते हों. हत्यारों की ऐसी कद्र अनोखी है.

भविष्य:

कर्नाटक में विधान सभा चुनाव होने हैं. पार्टी के नाम लेने का कोई औचित्य नहीं क्योंकि वो तो यहाँ मुख्यतः दो ही हैं. चुनाव को द्विध्रुवीय बनाने के चौतरफा यत्न हो रहे हैं. धार्मिक बदमाश इसे द्विधर्मी बनाना चाहते हैं और दूसरे किस्म के बदमाश इसे भाषा के बहाने क्षेत्रवाद का रंग देकर चुनाव की नदी पार करना चाहते हैं.

यह तो तय है कि दोनो ही तरफ से खून बहने हैं. बकौल उदय प्रकाश, दो हाथियों की लड़ाई में सर्वाधिक नुकसान घास का ही होता है. यहाँ आगामी चुनाव के पहले तक घास का किरदार जनता को दिया गया है.

जो धार्मिक और साम्प्रदायिक शक्तियाँ का जमावड़ा है उन्हें, अपनी करतूतों और ‘बेचारे-धार्मिक-धर्मनिरपेक्षों’ की बहुलता के कारण स्पष्ट बढ़त दिख रही थी. धर्म की मशाल से बस्तियाँ जलाकर, लोग मारकर, दंगे भड़काकर चुनाव जीतने की तैयारियाँ पूरी रही होंगी. लेकिन दूसरी शक्तियों ने मेट्रो स्टेशन पर नाम लिखने के बहाने हिंदी बनाम कन्नड़ का जो दैत्य खड़ा किया, वह धार्मिक पागलपन के समकक्ष एक नए पागलपन को जीवन दिया गया है.

हिन्दी भाषा बनाम कन्नड़ भाषा का यह द्वैत चुनाव से ठीक पहले कन्नड़ जनता  बनाम दूसरी भाषाई जनता  की लड़ाई में बदल दिया जाएगा. कहने वाले कहते हैं कि चुनाव के ठीक पहले भाषा की कृत्रिम लड़ाई कुछ हिंदी भाषी मारे-पीटे जा सकते हैं. हत्याएँ भी हो सकती हैं.आगे के प्रपोगेंडा का काम मीडिया संभाल लेगी, उसे तो ब्राह्मणवादी किस्म के अभियान चलाने का विशद अनुभव है.

वर्तमान:

इस नए किस्म के भाषाई फर्जीवाड़े में धार्मिक पागलपन वाली शक्तियाँ पिछड़ती हुई दिख रही थीं. और यह जैसे कम था कि लिंगायत को अलग धर्म मानने के लिए चलाया जा रहा आंदोलन तेज कर दिया गया. लाखों लोग सम्मेलन में जमा होने लगे. इस नई चाल से पहली पार्टी स्पष्टतः चुनावी बिसात पर पिछड़ती हुई दिखी. इसके बाद तो पहली पार्टी और उसके आकाओं को हत्याएँ करनी करानी ही थी. वह इस लड़ाई का दूसरा सबसे खतरनाक हथियार है. सामूहिक हत्याओं का दौर अगला पड़ाव है.

बहुत संभव है कि गौरी लंकेश की हत्या इसी क्रम में की गई हत्या है. यह हत्या फिर से मुद्दों को धर्म के इर्द गिर्द लेकर आ जायेगी. पुरानी किसी आहत किन्तु नीच भावना के बहाने से की गई यह हत्या भविष्य के चुनावी बिसात पर चली गई एक चाल है. हमारी जान उनके लिए मोहरें हैं. देखना यह है कि कौन सा मोहरा पहले खर्च होता है और कौन सा थोड़े इंतजार के बाद. गौरी लंकेश की तरह साहसी लोगों को बारम्बार घास की तरह उग आना होगा. हत्यारों को पराजित करने का एकमात्र तरीका यही है.

 

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