मोदी राज में बच्चों के साथ पुरस्कारबाज़ी और पत्थरबाज़ी दोनों एक साथ

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शिखा कौशिक/

यह सिर्फ भारत में हो सकता है. एक तरफ देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कुछ बच्चों को बहादुरी दिखाने के लिए पुरस्कार दे रहे थे तो दूसरी तरफ एक फिल्म का विरोध कर रहे कुछ अराजक तत्वों ने स्कूल बस पर ही पत्थरबाजी कर दी.

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दुखद पहले यह है कि जहां बच्चों के स्कूलबस पर पत्थरबाजी हुई वह दिल्ली से दूर नहीं. पुरस्कारबाज़ी दिल्ली में हो रही थी और पत्थरबाजी गुरुग्राम में, जो राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का ही हिस्सा है.

दूसरे फिल्म पद्मावत के विरोध के नाम पर समाज में आराजकता फैलाने वाले सारे राज्यों में भारतीय जनता पार्टी ही सत्ता में हैं. इन राज्यों को कुछ निर्देश देना तो दूर, प्रधानमंत्री ने इस मामले में अब तक एक शब्द नहीं बोला है. जबकि दूर देश के घटनाक्रम पर भी मोदी ट्वीट करना नहीं भूलते हैं.

इस फिल्म का विरोध कर रहे लोग न केवल प्रशासन को चुनौती दे रहे हैं बल्कि सीधे सीधे देश के सर्वोच्च न्यायलय की अवमानना भी कर रहे हैं. इस न्यायालय ने साफ़ शब्दों में इस फिल्म पर बैन लगाने से मना कर दिया है और राज्य सरकारों से इस फिल्म को रिलीज़ करने को कहा है. न्यायालय के सामने कानून-व्यवस्था की बात भी आई थी और न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि कानून व्यस्था सही रखने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है.

इसके बावजूद भी गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, बिहार जैसे जगहों से तोड़-फोड़ की खबरें आ रही हैं. गाड़ियां जला दी जा रही हैं. लेकिन सरकारें मौन धारण किये हुए हैं. देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह की तरफ से भी अभी तक कोई बयान नहीं आया है.

ऐसे में एक तरफ बच्चों के बस पर हमला और दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी का बहादुरी दिखाने वाले बच्चों को पुरस्कृत करना महज दिखावा लगता है. प्रधानमंत्री का यह कहना कि बहादुरी के कारनामों पर विस्तार से चर्चा की जाती है और मीडिया इसे प्रकाशित-प्रसारित करता है, इसलिए इससे अन्य बच्चों को प्रेरणा मिलती है, एक फरेब जैसा लगता है क्योंकि वे खुद चाहते तो उन बच्चों के लिए प्रेरणा के स्रोत हो सकते थे जो उस स्कूल बस में फंसे थे.

सनद रहे कि प्रधानमंत्री ने 18 बच्चों को राष्ट्रीय बहादुरी पुरस्कार प्रदान करते हुए कहा, “इनके बहादुरी के कारनामें अन्य बच्चों को प्रेरित करेंगे और इससे हमेशा बच्चों के अंदर आत्मविश्वास की भावना पैदा होगी.” इनमें से तीन बच्चों को मरणोपरांत यह पुरस्कार प्रदान किया गया है.

 

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