धर्म की काई पर फिसलता हुआ राष्ट्र: सेक्रेड गेम्स

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चन्दन पांडेय/

गणेश एकनाथ गायतोंडे अपनी पत्नी, सुभद्रा, से पूछता है, कितनी जलेबी खा गई? सुभद्रा: बारह। गणेश: आज तो गोपालमठ के मच्छरों को भी डायबिटीज हो जाएगा। लेकिन ये बताओ, अगर तुम्हें मीठा इतना पसंद है तो उस दिन खरवास ( खरवास: भैंस के पहले दूध से बनी मिठाई ) क्यों नहीं खाया था? सुभद्रा: बचपन में जब भी घर पर खरवास आता था तो माँ उसे खाने से बरजती थी। इसलिए मैं सपने में खरवास खा लिया करती थी। उसका स्वाद मुझे अद्भुत लगता था और वो अब तक याद है। उस दिन अगर मैंने सच का खरवास खा लिया होता तो स्मृतियों में बसा वह स्वाद नष्ट हो जाता। इसलिए नहीं खाया।

सेक्रेड गेम्स, नेटफ्लिक्स पर रिलीज इस शो, के सर्वश्रेष्ठ दृश्यों में से एक यह दृश्य चलती हुई एक कार में घटता है। गणेश गायतोंडे, जो माफिया डॉन है, जिसकी मुम्बई में तूती बोलती है, की पत्नी गरीबी वाले बचपन को खुद से दूर नहीं करने देना चाहती। गरीबों के लिए जो वाजिब तर्क सुभद्रा (राजश्री देशपांडे) ज़बान से उठते हैं वो पर्दे के भीतर पात्रों को और बाहर दर्शकों को एक चुप सौ चुप करा देते हैं। ऐसे ही एक दृश्य में, जब परले दर्जे का नास्तिक गणेश धर्म को दुनिया का सबसे बड़ा व्यवसाय बता रहा होता है, सुभद्रा अपने पक्ष को स्पष्ट करते हुए धर्म को जब गरीबों की आजादी, इकलौती आजादी, से जोड़ती है तो ‘सेक्रेड गेम्स’ का यह अवन्तरण सुफल होता दिखता है।

क्योंकि सेक्रेड गेम्स अपने मूल में धर्म के व्यवसाय और उसके हथकंडों की कहानी है। धर्म ने भारत के भूगोल और अवाम के साथ जो खिलवाड़ किया है, उसकी कहानी है।

सेक्रेड गेम्स अपने मूल में धर्म के व्यवसाय और उसके हथकंडों की कहानी है

नेटफ्लिक्स पर आये इस सीरीज ‘सेक्रेड गेम्स’ को नए बनाम पुराने और मौलिक बनाम प्रेरित से पहले जरूरी के दर्जे में रखना चाहिए। आठ एपिसोड का पहला खंड, जो अमूमन साढ़े छः घंटे का विस्तार लिए हुए है, हर लहजा बतौर राष्ट्र भारत का विकास क्रम है। यह शिल्प, जिसमें राष्ट्र का इतिहास और व्यक्ति का इतिहास समानान्तर चलते हैं और जिस शिल्प को गुंटर ग्रास, सलमान रुश्दी ने बखूबी बरता, सेक्रेड गेम्स नामक उपन्यास और वेब सीरीज में अपने उरूज पर है। धर्म इस सीरीज का प्रतिनायक है और वक्त सहनायक। नायक कोई नहीं है। मतलब इस कदर नायक कोई नहीं है कि पर्दे के भीतर भी सबमें धर्म जैसा बड़ा खलनायक होने की होड़ मची है।

जो घोषित खलपात्र है, गणेश एकनाथ गायतोंडे (नवाजुद्दीन सिद्दकी) वह हर मर्तबा धर्म से दूर जाना चाहता है, उसने धर्म नाम की (अ)व्यवस्था को और उसके परिणाम को इतने करीब से देख चुका होता है कि बचपन में ही अपनी माँ (विभावरी देशपांडे) और उसके एक ग्राहक की हत्या कर देता है, जिसके जुर्म में भिखारी ब्राह्मण (संदीप कुलकर्णी) उसका बाप हत्यारा साबित होता है। गणेश अपनी माँ से कम अपने भिखारी पिता, जो सिर्फ ब्राह्मण होने के कारण भिक्षा को बतौर टूल इस्तेमाल करता है, अधिक नफरत करता है। अपनी माँ से तो वो प्रेम करता है। यहाँ तक कि वर्षों बाद जब उसे लगता है कि धर्म के नाम पर एकजुट हुए पर्लुकर (नीरज कबी), विपिन भोंसले (गिरीश कुलकर्णी)  और त्रिवेदी (चितरंजन त्रिपाठी) उसकी हत्या जेल में करा देंगे तो भी बस एक ही स्मृति पर गणेश रोता है, कहता है, माँ की हत्या करना पाप था। सैकड़ों हत्याएँ कर और करा चुका इंसान ऐसा कहता है। पिता की हत्या के बाद वह अपने आप को हर बंधन से, यहाँ तक कि धर्म से भी, आजाद मानता है। पर क्या भारत में यह संभव है?

जवाब में एक हृदय विदारक ‘नहीं’ है और उसकी बढ़ती हुई गूँज है। धर्म और उसकी चेरी राजनीतिक सत्ता ने नैतिकता का, धार्मिकता का, अच्छाईयों के नाम पर प्रचलित भय का ऐसा चक्करदार खंडहर बना दिया है कि अगर एक जरा ऊपर उठ कर राहत की साँस लेनी है तो प्रचलित नैतिकता के बरक्स अनैतिक, अधार्मिक होना ही होगा। रास्ता दूसरा कुछ है भी नहीं। गणेश एकनाथ गायतोंडे या उस जैसे हर पात्र की नियति भी यही है।

सत्ता के अनुषंग पुलिस व्यवस्था का चरित्र भी इसी ढर्रे पर विकसित हुआ है। पुलिस व्यवस्था कैसे काम करती है और हम क्या समझते हैं, इसका बेहतरीन चित्रण इस वेब सीरीज में हुआ है। ‘हम जैसा पुलिस के बारे में सोचते हैं’, उसका प्रतिनिधि चरित्र है इंस्पेक्टर सरताज सिंह (सैफ अली खान), और पुलिस जिस अंदाज में काम करती है उसे बखूबी दर्शाया है डीसीपी पर्लुकर और इंस्पेक्टर माजिद (आमिर बशीर) ने। लेकिन इसके द्वंद में सरताज सिहं मजाक बन कर रह जाता है। उसके साथ ही ट्रेनिंग लिए माजिद उससे पूछता है, ट्रिगर खींचना आता है या बताऊँ?

सरताज ने गलती बस इतनी की है कि अपनी आँखों के सामने हुए जुनैद के फेक इंकॉउंटर के बारे में झूठी कहानी वो बर्दाश्त नहीं कर पाता। वह टेस्टिमनी देने के लिए तैयार हो जाता है। तब उसे सिस्टम की ताकत का एहसास कराया जाता है। बताया जाता है, इंक्वायरी कमीशन पार्लिकर के जेब में है। उसके अच्छे काम का श्रेय रातोरात छीन कर उसे निलम्बित कर दिया जाता है। वह पुलिस जाति से बाहर हो जाता है और जाति-वापसी तभी संभव हो पाता है जब वो फेक इंकॉउंटर के बारे में झूठी कहानी को इन्क्वायरी कमीशन के सामने दुहराने के लिए तैयार हो जाता है। जब वो अपनी बनावटी टेस्टिमोनी देकर निकलता है तो बाहर पाँच छः कमजोर लोगों का शांत मजमा हाथ से लिखा एक पोस्टर लिए बैठा है: व्हेर इज जुनैद?

भारत में पुलिस का जो विकास क्रम है उसे भी खूबसूरत अंदाज़ में दर्शाया गया है। सरताज बेहद ईमानदार अफसर है लेकिन उसकी नींद गायब है, उसकी माँ कहती है कि सरताज के पिता, दिलबाग सिंह, को नींद अच्छी आती थी क्योंकि उनका अंतर्मन साफ था। ऐसा वो तब कहती है जब लगभग सभी लोग यह बातें करने लगे हैं कि दिलबाग सिंह जैसे सिपाही पर गणेश गायतोंडे जैसा खूंखार अपराधी मेहरबान क्यों है/था? खुद सरताज को भी पिता की एकनिष्ठा पर शक है। माँ से पूछता है, पिता को 8000 रुपए का यह इम्पोर्टेड बैट किसने दिया था? यह प्रश्न आखिरी और आखिरी से पहले एपिसोड में सुलझता है और इसे वहीं से देखिए लेकिन बताना यह है कि पुलिस के चारित्रिक विकासक्रम में मनुष्यता के ह्रास को दिलबाग और सरताज के माध्यम से बेहतरीन दिखाया गया है।

इसी क्रम में गणेश एकनाथ गायतोंडे का जो किरदार है, वह महत्वपूर्ण होकर उभरा है। सीरीज में एक तरफ धार्मिक और व्यस्था में यकीन करने वाले पात्र हैं जो हर उस व्यक्ति को नुकसान पहुँचा रहे हैं जिसने कभी इनकी मदद की हो या जिनसे इन्होंने मदद ली हो, दूसरी तरफ एकनाथ है, नास्तिक, माफिया, हत्यारा, लेकिन हर उस व्यक्ति की खोज खोज कर मदद करता है जो उसके दुर्बल दिनों में काम आए। एक अनाम वैश्या को जोया मिर्जा का नाम देता है और उसे अतिसफल अभिनेत्री बना देता है। ये अलग बात है कि मदद पाने वाला आस्तिक निकलता है तो मजबूरन धोखे कर बैठता है।

और प्रेम?

गणेश जब गणेश एकनाथ गायतोंडे बनने की प्रक्रिया में होता है तो उसकी भेंट कूकू ( कुब्रा सैत ) से होती है। यह एक बेमिशाल चरित्र है जिसका उपन्यास में चलताऊ किरदार है लेकिन इस वेब सीरीज की टीम ने कूकू के इस चरित्र को बेहतरीन जगह दी है। कूकू है क्या? जासूस है, प्रेम है, गद्दार है, कूकू है क्या, धारा 377 के युग यह जानना समझना इस वेब सीरीज की उपलब्धि है।

प्रेम के दुख से उबरने वाला गणेश मित्र शोक से नहीं उबर पाता। परितोष की हत्या के बाद लंबे वक्फे के लिए गणेश नपुंसक हो जाता है। जब मित्र वध का बदला ले लेता है और गद्दारी के शक में अपने खास लोगों की हत्या कर नए दुःख में डूब रहा होता है तो पत्नी, सुभद्रा, उसे प्रेम में उबारती है। सुभद्रा ( राजश्री देशपांडे) के किरदार ने प्रभावित किया है।

कूकू है क्या? जासूस है, प्रेम है, गद्दार है, कूकू है क्या, धारा 377 के युग यह जानना समझना इस वेब सीरीज की उपलब्धि है

गणेश सिर्फ धर्म में ही नहीं, हर अंदाज में निरपेक्ष है। सुभद्रा उसकी नौकरानी है लेकिन उसकी बुद्धिमत्ता उसे भाती है। जिस अंदाज में वह नौकरानी से विवाह करने का निर्णय लेता है वह गौरे-काबिल है।

लेकिन धर्म उसका पीछा नहीं छोड़ता और आख़िरश: गणेश को निगल जाता है। शुरु से ही हर तरह के धार्मिक चालों को काटते हुए शख्स के पत्नी की हत्या मुस्लिम गैंग के लोग कर देते हैं तो हर तरह के शक्तिशाली लोगों की तरह उसे भी अपना झूठा गुस्सा निकालने का मौका मिलता है। पत्नी की हत्या का बदला लेने के लिए वह 80 निर्दोष मुसलमानों को मारता है, जिसमें भिखारी भी शामिल हैं। इस तरह वो खुद ब खुद अपना हिन्दुकरण करता है। और उसे उसका तीसरा गुरु मिलता है।

यह अच्छा था कि मेघना (राधिका आप्टे) अलग से अच्छी नहीं लगी, उनका चार्म लुढ़कते हुए चला वरना उनका व्यक्तित्व इस कदर सिर चढ़ जाता है कि बाकी बातें दरकिनार हो जाती हैं। खुफिया विभाग के अधिकारी या रॉ एजेंट का उनका अभिनय अच्छा है। जोया मिर्जा (एलनाज नौरोजी) और कॉन्स्टेबल केतकर (जितेंद्र जोशी) ने बहेतरीन अभिनय किया है। मैल्कम मुराद की किरदार में ल्यूक केनी भी जमे हैं। अभिनय लगभग सबका ही अच्छा है। यहाँ तक कि सैफ अली खान का भी।

टाइटिल स्कोर बेहतरीन है। निर्देशन (अनुराग कश्यप और विक्रमादित्य मोटवाने) और लिखाई अच्छी है। ध्यान देने वाली बात यह भी लगी कि हर एपिसोड का लेखन तीन लोगों की टीम (वरुण ग्रोवर, वसंत नाथ, स्मिता सिंह) में से किसी एक ने किया है।

सब अच्छा है लेकिन कई एक दृश्यों को देखते हुए पिछली फिल्मों के दृश्य याद आ जाते हैं। उन्हें एक माशा या तोला अधिक रचनात्मक होकर फ़िल्माया जा सकता था। पिछली फिल्मों की वो स्मृतियाँ स्वादिष्ट खीर में कंकर की तरह आती हैं। जैसे हत्या का एक दृश्य है जिसमें कार में बैठे आदमी को पीछे बैठे आदमी का गोली मारना ‘कंपनी’ की याद दिलाता है। घर पर आए हत्यारों से डरने का अंदाज गैंग्स ऑव वासेपुर की याद दिलाता है। एकनाथ की पर्लुकर द्वारा बैट से पिटाई  ‘हेली’ की याद दिलाता है। यह संयोग भी हो सकते हैं या हमारी इस टीम से अतिअपेक्षाएँ भी।

लेकिन जैसा शुरू में कहा, यह जरूरी सीरीज है। भारत जिस रास्ते जा रहा है उसे तो सब देखेंगे लेकिन जिस रास्ते आया है उसे भी इस नई पीढ़ी को देखना चाहिए। पुरानी पीढ़ी तो देख चुकी है, उसकी चुप्पी के अपने मायने हैं।

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