बिरसा की शहादत और विकास की रेखा

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संजय कृष्ण /
 
'मैं एक बार फिर आऊंगा। मैं बुंडू, तमाड़, सिंहभूम, क्योंझर, गंगपुर और बसिया में होलिकाग्नि की जोत जलाऊंगा। मैं सोनपुर में पांवों से जमीन की धूल उड़ाते चलूंगा। बानों में करकोटा गांव में सिल्क के एक कीड़े ने अंडे दिए हैं (यानी सुदूरस्थ गांवों में कई गुना वेग से नए विचारों का प्रसार हो रहा है)
-बिरसा मुंडा
 
लगभग 117 साल पहले बिरसा मुंडा का यह उद्घोष खूंटी के पहाड़ों-जंगलों में आज भी सुनाई देता है। वह बिरसा, जिसे मात्र 25 साल ही जीने का मौका मिला और जिसे लोगों ने श्रद्धा के साथ धरती आबा कहा। यानी धरती का पिता। 20 से 25 साल के बीच उसने छोटानागपुर के पठारों पर क्रांति की जो लड़ाई लड़ी, अपने पारंपरिक तीर-धनुष से, वह अंग्रेजों के आधुनिक हथियारों पर भारी पड़े।
 
बिरसा, जो अपनों के धोखों के शिकार हुए और जेल गए, जहां उन्होंने 9 जून, 1900 को अंतिम सांस ली और अंग्रेज अधिकारियों ने विद्रोह के भय से रातों रात उनके शव का दाह-संस्कार कर दिया। पर, बिरसा की इस महान उपलब्धि, उसके संघर्ष और परिणामों को लेकर हम कुछ नहीं जानते। भगत सिंह के बारे में सब जानते हैं, लेकिन भगत सिंह से पहले जिसने उलगुलान किया, उसके बारे में बहुत हुआ तो बस नाम जानकर रह गए। जबकि अंग्रेजों के अंदर बिरसा के मरने के बाद भी डर इतना समा गया कि उसने छोटानागपुर टीनेंसी एक्ट बनाया और आदिवासियों को उनका अधिकार दिया।
 
हालांकि उस दौर में कुछ अंग्रेजों-पत्रकारों ने बिरसा के कर्म-संघर्ष को याद किया या कहें, वे मुंह मोड़ नहीं सके। इसलिए, जब बिरसा महज बीस साल के थे तब 1895 में द क्वार्टली पेपर्स, एसपीजी मिशन के अक्टूबर अंक में बिरसा पर एक लेख प्रकाशित हुआ, 'ए लोकल प्रोफेट'। बिरसा पर यह संभवत: पहला लेख था। यानी, बीस की उम्र में बिरसा ने अपने काम से एक पुख्ता पहचान बना ली थी। उनके जीवन में प्रकाशित यह पहला लेख था।
 
लेखक अश्विनी कुमार पंकज ने कुछ और चीजें खोजी हैं। गोस्सनर मिशन से बिहार-झारखंड की संभवत: पहली ङ्क्षहदी पत्रिका 'घरबंधु', 15 जून, 1900 के अंक में बिरसा उलगुलान पर हिंदी में लेख प्रकाशित हुआ। यह अंक अब उपलब्ध नहीं है। 'द मॉडर्न रिव्यू', कोलकाता के जून 1911 के अंक में बिरसा मुंडा के जीवन, धर्म और आंदोलन पर हीरालाल हालदार का 'द क्यूरियस हिस्ट्री ऑफ ए मुंडा फेनेटिक' नामक लेख अंग्रेजी में छपा। 'द मॉडर्न रिव्यू', कोलकाता के अप्रैल 1913 के अंक में हैम्बर्ग, जर्मनी में ओरिएंटल लैंग्वेज के प्रोफेसर होमेरसन कॉक्स का 'जीसस क्राइस्ट एंड बिरसा' नामक लेख अंग्रेजी में छपा। फा. हौफमैन ने 'बिरसा भगवान', इनसाइक्लोपीडिया मुंडारिका लिखा, जो 1930 में प्रकाशित हुआ। जब 1940 में रामगढ़ में कांग्रेस का महाधिवेशन हुआ तो उसकी स्मारिका में 1940 में जीसी.सोंधी का अंग्रेजी में लिखा लेख 'बिरसा भगवान' प्रकाशित हुआ था। इसी साल बिरसा पर जयपाल सिंह मुंडा का लेख 'बिरसा की जय या क्षय', बिहार हेरेल्ड, पटना अंग्रेजी दैनिक में निकला। इन लेखों से पता चलता है कि बिरसा का आंदोलन उस समय कितना प्रभावी रहा था। उनके आंदोलन की धमक खूंटी की पहाडिय़ों से दूर-दूर तक पहुंच गई थी।
 
लोगों ने बिरसा को सूर्य कहा-ओ बिरसा, तुम चलकद में सूर्य की नाई उगे। तुम बढ़े और पूरे नागपुर को आलोकित कर दिया। बिरसा ने राजनीतिक क्रांति को ही आगे नहीं बढ़ाया बल्कि एक धार्मिक-सामाजिक आंदोलन भी चलाया, जिसकी चर्चा बहुत कम होती है-वह है बिरसाइत धर्म। उसके कुछ अनुयायी खूंटी व बंदगांव के आस-पास आज भी हैं। इसके साथ उन्होंने हडिय़ा-शराब से दूर रहने को कहा-बिरसा का आदेश है कि हडिय़ा और शराब न पियो, इससे हमारी जमीन हमसे छीन जाती है। अधिक मद्यपान और नींद ठीक नहीं। दुश्मन इस कारण हम पर हंसते हैं। जल, जंगल, जमीन की लड़ाई आज भी जारी है और हडिय़ा-दारू का प्रचलन भी। बिरसा के इस संदेश को हम अनसुना किए दे रहे हैं।
 
बिरसा की धरती आज धधक रही है। अब आपराधिक संगठनों का कब्ज हो गया है। विकास के नाम पर सरकार बिरसा के गांव उलिहातू गांव तक फोरलेन सड़क बना रही है, लेकिन गांवों की हालत वही है। वनोपज से संबंधित उद्योग के बजाय सरकार का पूरा ध्यान यहां धरती के नीचे जो कुछ है, उसे निजी हाथों में सौंप देना है। गांव-गिराव के बच्चे अपने पैसों से हाकी स्टीक खरीद नंगे पांव प्रैक्टिस करते हैं, पर खेल विभाग मुर्दा बना हुआ है। इसलिए, विकास क्यों, किसके लिए का प्रश्न आज भी मौजूं बना हुआ है?
 
संजय कृष्ण

(वरिष्ठ पत्रकार संजय कृष्ण रांची में कार्यरत हैं. संजय पत्रकारिता को नौकरी से अतिरिक्त जिम्मेदारी की तरह निभाते हैं. रांची में रहते हुए उन्होंने झारखण्ड के कई ऐतिहासिक तथ्यों को सामने लाया है. झारखण्ड के आदिवासी समाज  के मेलों, परम्पराओं, अंग्रेजो के शासन काल में झारखण्ड में हुई उठा-पटक को लोगों के  नज़र  में  लाने  का इनका काम सराहनीय है.)
 
 
 

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