बिहार के राजनीति में मचा घमासान;कैसे समझे पूरा खेल..

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सौतुक डेस्क/
आज जब बिहार में  जनता दल यूनाईटेड (जद यू) का सम्मेलन चल रहा था, तो कुछ लोग ख्याली पुलाव पकाने में व्यस्त थे. इस पुलाव की रेसिपी कुछ ऐसी थी कि नितीश कुमार बाहर निकलेंगे और राष्ट्रीय जनता दल से अपनी पार्टी का गठबंधन तोड़ लेंगे.  कुछ ने तो अपने फेसबुक वाल पर लिख भी दिया ‘बिहार में एनडीए+जदयू = 129. बहुमत से सात अधिक. और साथ में सवाल भी कि ‘बूझे की नहीं?’
इस बूझने बुझाने पर आगे चर्चा होगी, लेकिन पहले तो थोड़ी भूमिका. बिहार में दो धूर-विरोधी दलों ने भाजपा को हराने के लिए एक गठबंधन बनाया और विपक्षी दल को जबरदस्त पटखनी देने में सफल रहे.
लेकिन असली शुरुआत हुई  लालू प्रसाद यादव से जुड़े लोगों पर सीबीआई के दनादन छापों से. यह वही साल है जब केंद्र सरकार अपने तीन साल पूरे कर चुकी है. एक तरफ रेडियो पर इस सरकार के कामों का बखान करते प्रचार प्रसारित होने लगे हैं और दूसरी तरफ लालू यादव के कुनबे पर छापा पड़ना शुरू हुआ है.
लालू प्रसाद यादव के बेटी मीसा भारती के घर पर भी छापे पड़े. आखिरी छापा पड़ा शुक्रवार को. यह छापा लालू यादव पर उस आरोप के सिलसिले में पड़ा जिसमे कहा गया है कि उन्होंने रेल मंत्री रहते हुए अपने कार्यालय का इस्तेमाल कर के पटना में बहुत खास जगह पर सस्ते में तीन एकड़ जमीन खरीदी. यह जमीन  फिलवक्त राज्य के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के नाम पर है और उनके  खिलाफ एफआईआर दर्ज़ हो चुका है.
अगले कदम के तौर पर उनसे इस्तीफ़ा मांगा गया है.  जहां भाजपा ने इस इस्तीफे को मांगने में फुर्ती दिखाई है वहीँ राजद ने भी उसी फुर्ती से ऐसे किसी इस्तीफे से इनकार किया है. यहाँ यह बताने की  जरुरत नहीं होगी कि किस दल के क्या तर्क हैं.  जैसे भाजपा का तर्क है कि  बिहार को जंगलराज बना देने वाला दल फिर से सत्ता में हैं और अपने  पुराने चरित्र को दिखा रहा है, मतलब भ्रस्टाचार में लिप्त है. वहीं राजद का कहना है कि वह भाजपा-शासित  देश में   चल रहे है फसादी माहौल का विरोध करने वाला दल है और इसलिए केंद्र सरकार सीबीआई का इस्तेमाल कर इस दल को परेशान कर रही है. आगे यह कि जब तक आरोप सिद्ध नहीं हो जाता इस्तीफे का सवाल नहीं उठता.  इसमें सबसे बड़ा पेंच फंसा है नितीश कुमार का जिन्हें अगर खुद को बचाना है तो  भाजपा और राजद, दोनों से लागातार राजनितिक नूरा-कुश्ती करते रहना है. याद रहे कि उनके दल का राज्य स्तर पर सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी वही दल है जिसके साथ उन्होंने सरकार बनाई है. और दूसरी तरफ उनको भाजपा से लड़ते रहना है अगर उनके मन में केंद्र स्तर पर कोई राजनितिक महत्वकांक्षा है. जो कि है.
खबर यह है कि आज की मुलाक़ात के बाद जदयू ने राजद को चार दिन का समय दिया जिसमे उसे तेजस्वी से जुड़े मामले को स्पष्ट करना है और तेजस्वी को इस्तीफ़ा देना है. नितीश कुमार ने स्पष्ट किया है कि भ्रष्टाचार के मामले में उनका रुख स्पष्ट है.
खैर यह सब तो सतह पर चल रहा है और सबको दिख भी रहा है. जो बूझने वाली बात ऊपर कही गई है वो वाकई जटिल है पर कुछ अनुमान के सहारे  यह समझने की कोशिश करेंगे कि आखिर बिहार में हो क्या रहा है और किसने अभी अपना पासा फेंका है.
1- पहला है भाजपा का पक्ष. इसके अनुसार सब कुछ वैसा ही है जैसा दिख रहा है. राजद के लोगों ने भ्रष्टाचार किया है. सीबाआई अपना काम कर रही है और न्यायलय में जाकर दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा. वैसे यह एक सर्वे का विषय हो सकता है कि देश में कितने लोग है जो यह मानते है कि सीबीआई अपना काम ईमानदारी से करती है. इस जांच करने वाली संस्था पर हमेशा सत्तारूढ़ दल के इशारे पर काम करने का आरोप लगता रहा है. पहले ऐसे आरोप भाजपा लगाती थी अब कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल लगाते हैं.
2- राजद के तर्क के अनुसार सीबीआई लालू और उनसे जुड़े लोगों को निशाना बना रही है. इसकी वजह यह है कि लालू यादव ‘सेक्युलर’ राजनीति करते हैं और भाजपा के ‘कम्युनल’ राजनीति को कभी सफल नहीं होने देने की कसम खा रखी है. अगर यह सही होता तो राजद को कोई राजनितिक फायदा होता दिखता जो नहीं दिख रहा है. सारे राजनितिक फायदे अभी भाजपा के झोली में ही जा रहे हैं और लालू बिहार के अलावा कुछ करने में सक्षम नहीं दिखते.
3- राजनितिक फायदे का गणित- भाजपा की राजनीति कहती है कि अपना प्रचार-प्रसार तो करते रहो पर विपक्ष को खड़ा न होने दो. विपक्ष का कोई चेहरा नहीं रहे. अगर वर्ष 2019 में होने वाले चुनाव के मद्देनजर देखें तो विपक्ष के तौर पर  बस एक चेहरा दिखता है जिसपर सबकी सहमति बन सकती है. वो है नितीश कुमार. अब नितीश कुमार को घेरने के क्या तरीके हो सकते हैं? पहला तो उनपर ही सीधा आरोप. ऐसा करना मतलब  भाजपा का बिहार में अपने लिए किसी भी सम्भावना को ख़त्म करना. फिर तो ऐसा तरीका खोजना होगा कि नितीश केंद्र में रास्ते से हटे पर बिहार में भाजपा के लिए वैशाखी बने रहे.
मतलब नितीश के लिए यह सारा चक्रव्यूह रचा जा रहा है. कैसे, आईये देखते हैं. पहला तो नितीश की जो खूबी है वह है स्वच्छ सरकार. उनके शासन पर भ्रस्टाचार का आरोप मतलब वह खूबी ख़त्म. फिर नितीश वह नितीश नहीं रहेंगे जिसपर सहमति बन पाएगी और जिसके जीतने की कोई सम्भावना होगी. अब इससे बचने के लिए अगर नितीश अपने उप-मुख्यमंत्री से इस्तीफा मांगते हैं तो दोनों दलों में मनमुटाव होगा और फिर सरकार ख़त्म. ऐसे में भाजपा नितीश को समर्थन देकर अगर सरकार बनवा भी दे तो भी नितीश की हार होगी. क्योंकि वह फिर वर्ष 2019 में नरेन्द्र मोदी के  विपक्ष का चेहरा नहीं बन पायेंगे.
और लालू के पास भी बहुत कम विकल्प है. बहुत सालों के बाद उनका दल किसी तरह से सत्ता में आया है और अपने कार्यकर्ताओं में जोश भरे रहने के लिए उनके दल का सरकार में बने रहना जरुरी है.
ऐसे में यह देखने काफी दिलचस्प होगा कि इस बार अभिमन्यु चक्रव्यूह कैसे तोड़ता है. एक तरीका है कि दोनों दल इसपर सहमत हो कि तेजस्वी इस्तीफ़ा देंगे और फिर भी यह गठबंधन आबाद रहेगा.

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