किसानों के प्रति सरकार का रुख: छल और प्रपंच

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उमंग कुमार/

सात-आठ दिन की यात्रा करने के बाद जब किसान दिल्ली पहुंचे तो उनका स्वागत सरकार ने लाठीयों से किया. आंसू-गैस के गोले छोड़े. गांधी-जयंती के दिन सरकार की किसानों के साथ हिंसा की तस्वीरें वायरल हुईं और जब सोशल मीडिया पर भर्त्सना शुरू हुई तो दिल्ली पुलिस ने वही किया जो इस सरकार का चरित्र है. छल.

पुलिस ने बयान जारी कर बताना चाहा कि आन्दोलनकारी किसानों ने लाख समझाने पर भी दिल्ली में प्रवेश करने की कोशिश की. उनसे कहा जा रहा था कि वो तब तक सब्र रखें जबतक नेताओं से बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकलता. वे दिल्ली की सीमा में ना घुसें. किसान हिंसा पर उतर आये और पुलिस के बैरिकेड को जबरन तोड़ने की कोशिश की. इसको देखते हुए पुलिस को बल का प्रयोग करना पड़ा.

अब बताईये किसानों की यह यात्रा हरिद्वार के टिकैत घाट से 23 सितम्बर को शुरू हुई थी. एक हफ्ता से अधिक गुजर गया. सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया. कोई बातचीत नहीं की. अब, जब थके हारे किसान दिल्ली पहुंचे तो उन्हें बातचीत के नतीजे का इंतज़ार करने को कहा जाने लगा. और तो और पुलिस ने धारा 144 लगा दिया जिसके तहत पांच से अधिक लोग एक जगह इकठ्ठा नहीं हो सकते.

क्या 23 सितम्बर से अब तक सरकार सो रही थी. क्या इतने दिन काफी नहीं थे किसानों से बात कर उनकी मांग सुनने के लिए? दूसरी तरफ सरकार बहादुर झूठी खबर फैलाती रही कि किसानों की मांगे मान ली गई हैं. लेकिन वो कौन सी मांगें थीं जिन्हें इस सरकार ने माना. ये भोजन के साथ आचार और चटनी वाला मामला था. सरकार ने कह दिया कि भोजन में अचार और चटनी दी जायेगी बस भोजन नहीं दिया जाएगा. उदाहरण के लिए कोर्ट के आदेश जिसमें दस साल से पुराने ट्रेक्टर को बंद करना इत्यादि. इस पर सरकार ने कहा कि वो अपील करेगी.

मूल मांगो पर सरकार वही करती रही जो इसने पिछले चार साल में किया है. ये मांगे हैं, किसानों की फसल की लागत का डेढ़ गुना दाम और कर्ज माफ़ी

पर मूल मांगो पर सरकार वही करती रही जो इसने पिछले चार साल में किया है. ये मांगे हैं किसानों की फसल की लागत का डेढ़ गुना दाम और कर्ज माफ़ी. देखिये फसल की दाम पर सरकार ने चार साल में क्या क्या कहा है.

इसका ब्यौरा देते हैं, जाने-माने पत्रकार पी साईंनाथ. हाल ही में वर्धा में बोलते हुए इन्होंने कहा था कि वर्तमान सरकार जब विपक्ष में थी तो इसने वादा किया था कि किसानों को फसल का डेढ़ गुना दाम दिया जाएगा. ये 2014 चुनाव से पहले कहा गया. जब यह दल सत्ता में आया तो बारह महीने के अन्दर इसने दो बार कहा कि डेढ़ गुना दाम देना संभव ही नहीं है. एक आरटीआई के जवाब में और एक कोर्ट में याचिका के जवाब में सरकार ने इसे असंभव बताया और कहा कि अगर किसानों की फसल का डेढ़ गुना दिया जाने लगा तो फसलों की बाज़ार कीमत पर बुरा असर होगा. यह रही 2015 की बात. 2016 में कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने यह कहा कि हमने ऐसा वादा कभी किया ही नहीं. माने कि भारतीय जनता पार्टी और नरेन्द्र मोदी ने कभी ऐसा वादा ही नहीं किया कि वे किसानों की फसल का डेढ़-गुना दाम देंगे.

इसके एक साल बाद 2017 में सरकार और उनके बुद्धिजीवी यह कहने लगे कि स्वामीनाथन रिपोर्ट को मारो गोली और मध्य प्रदेश जाकर देखो. वहाँ की सरकार स्वामीनाथन रिपोर्ट से भी आगे निकल गई है और किसानों की भरपूर मदद हो रही है. मध्य प्रदेश के भावान्तर योजना पर एक पुस्तक भी निकल गई. उस पुस्तक का विमोचन दिल्ली में उसी रोज हुआ जब मध्य प्रदेश के आन्दोलनरत पांच किसानों को पुलिस ने गोली मार दी.

यह सब चल रहा था और तब आया साल 2018. इस साल जनवरी में बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने दावा कर दिया कि उनकी सरकार पहले से ही किसानों की फसल का डेढ़ गुना दाम दे रही है. लोग और किसान चक्कर में आ गए कि ये कब हुआ. फिर वही सरकार जुलाई में कहती है कि हम डेढ़ गुना दाम वाले वादे को पूरे करने वाले हैं.

किसानों के फसल का डेढ़ गुना दाम देने पर सरकार ने 2014 से 2018 तक में इतने बयान बदले हैं कि बड़े-बड़े लोग भी इसे समझ ना पायें. भला किसान बेचारे कैसे समझे कि सरकार सच में कह क्या रही है और कर क्या रही है.

ऐसे में बेहाल किसानों से इस सरकार का एक मंत्री गजेन्द्र शेखावत बस आश्वासन देकर कहता है कि वे अपना प्रदर्शन बंद करें. सोचने की बात है कि ऐसी सरकार जिसने अबतक किसानों की अनदेखी की है क्या उसके किसी आश्वासन पर भरोसा हो पायेगा.

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