दुनिया की सबसे ऊँची मूर्ति बनाने में एक आनुवंशिक गड़बड़ी है

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पटेल की मूर्ति

जितेन्द्र राजाराम/

राजा रवि वर्मा ने पौराणिक साहित्य कथाओं को अक्स दिया था. कहा जाता है कि शंकर, रुद्र काली और लक्ष्मी, सरस्वती का मौजूदा रूप सब रवि वर्मा की कल्पना थी जो आज घरों में लटके कैलेंडरों में, चिपके पोस्टरों में और सजी मूर्तियों में हमारे सामने विराजमान है.

आज रवि वर्मा शायद ही किसी को याद हैं. लेकिन उनके बनाए चित्र लोगों के जीवन का स्थायी हिस्सा हो चुके हैं.

इसमें कोई दो राय नहीं कि मूर्तियों और पोस्टरों का समाज को दिशा देने में काफी महत्व रहा है. शायद इसीलिए पहले के राजा महाराजा इन सब बातों पर खासा ध्यान देते थे. लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है. वह है उस मूर्ति के पीछे की कहानी. जैसे “स्टेच्यु ऑफ लिबर्टी” को ही लें. कौन जानता है कि लिबर्टी के पुतले में वो औरत कौन है? उसका इतिहास क्या है? वो न्यूयॉर्क में ही क्यों लगी हुई है? लेकिन अमेरिका उस बूते दावा करता है कि वहाँ लोगों को अधिक स्वतंत्रता मिली हुई है.

व्हाट्सअप और फ़ेसबुकिया ज्ञान बताता है कि फ्राँस ने अमेरिका को ये मूर्ति गिफ्ट में दी थी. लेकिन यह भी भरोसे का दावा नहीं लगता. सन् 1776 में और उससे पहले अमेरिका महाद्वीप को हड़पने के लिए यूरोपीय देशों की सेनाओं और आयातित नागरिकों के बीच अमेरिकी जमीन में जो खूनी युद्ध हुए उसमें लाखों फ्रांसीसी, डच, पुर्तगाली और फ्रांसीसी मारे गए. उन खूनी संघर्षों से तो नहीं लगता कि स्टेच्यु ऑफ लिबर्टी किसी लिबर्टी, गिफ्ट या दोस्ती का प्रतीक है.

भारत के इतिहास में दो सम्राट बेहद याद किये जाते हैं. अशोक और अकबर. अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ धम्म चक्र, नरसिंह, लोह खम्भ और बुद्ध की ढेरों मूर्तियां स्थापित की. बल्कि बुद्ध धर्म के प्रचार में इन मूर्तियों और अन्य निर्माण की महती भूमिका रही. इन मूर्तियों के निर्माण और स्थापना में गज़ब की कारीगरी, व्यवहारिक विज्ञान और कल्पना का परिचय मिलता है.

लाल किला, टोडरमल के दस्तावेज, जमीनों का लेखा जोखा, धार्मिक सौहार्द और देशज संरचना के मूल ढाँचे के निर्माता अकबर को भी इसी चश्मे से देखें. यह कहना गलत न होगा कि इन दोनों इतिहास के दिग्गजों की आज के मौजूदगी में इन सरंचना की वृहत भूमिका रही.

पिछले दशक में जब मायावती सरकार ने अम्बेडकर, कांशीराम और खुद अपनी मूर्तियों को हर चौक चौराहे पर लगाना शुरू किया, तो लोगों ने तात्कालिक यूपी सरकार पर काफी सवाल उठाये थे. लोग लागातार ये सवाल दागते रहे कि मायावती ने इन मूर्तियों की स्थापना के सिवा दलितों के लिए और क्या किया. लेकिन जिनलोगों ने भी बामसेफ या दलित क्रांति के कैडरों में शिरकत की होगी वो इन पुतलों की राजनीति समझते होंगे. दलित राजनीति के झंडाबरदार ये मानते हैं कि हिंदुओं के प्रतीकों के समकक्ष दलित प्रतीकों को खड़ा करना पड़ेगा. तभी शूद्रों में राजनीतिक एकता संभव हो पाएगी. इसलिए ये लोग जय राम को जय भीम से बदलना चाहते हैं. ज्योतिबा फुले, अहिल्या बाई होलकर, सावित्री फूले और अम्बेडकर की मूर्तियां लगवाते हैं.

पुतलों की राजनीति ने ही क्रिश्चन मिशनरी को विश्व में और हिन्दू धर्म प्रचारकों को भारत मे सफल बनाया है

पुतलों की राजनीति ने ही क्रिश्चन मिशनरी को विश्व में और हिन्दू धर्म प्रचारकों को भारत मे सफल बनाया है. सिकंदर भी अपने विश्वविजय के अभियान में अपनी मूर्तियां बनवाने को एक अहम रणनीति मानता था. उसके पतन और इस्लाम के उत्थान के दौरान सिकंदर की मूर्तियां अरब में शैतान मानकर तोड़ी गईं थीं. इस्लाम ने धर्म की बेल को सियासत की डाल पे चढ़ाया और जहाँ भी शासन में आये वहाँ पहले से बनी मूर्तियों को नष्ट करना आवश्यक समझा.

ये सबकुछ और बहुत कुछ जो इंडोनेशिया, चीन, जापान और कई पूर्वी देशों के इतिहास में मिलता है कि पुतलों की स्थापना उस भूखंड के राजनीतिक चरित्र संचयन, विघटन या निर्माण करते आए हैं.

अब आते हैं हाल की घटना पर. हाल ही में भारत के पश्चिमी तट की ओर एक दूर गांव में दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति स्थापित की गई. सबको मालूम है कि यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में शामिल और कांग्रेस के नेता सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति है. गज़ब देखिये कि मायावाती से दलितों के लिए कुछ नहीं करने की शिकायत करने वाले इस मूर्ति बनाने वाले से यह सब नहीं पूछ रहे हैं कि इस शासक ने और क्या किया! लोगों के लिए रोजगार उपलब्ध कराया, किसानों को तनावमुक्त किया, महिलाओं को सुरक्षा मुहैया करायी, भ्रष्टाचार ख़त्म किया. इन सारे मुद्दों का जिक्र इसलिए किया गया है कि इस शासक ने इन्हीं सब का वादा किया था. पटेल की मूर्ति बनाने का तो जिक्र ही नहीं था. फिर भी सबसे अधिक प्राथमिकता इसी को दी गई.

यहाँ सबसे गौर करनेवाली की बात है कि पटेल के इस मूर्ति की स्थापना में एक अनुवांशिक गड़बड़ी है. यह प्रतिक्रिया की राजनीति से प्रेरित और तमाम विरोधभास लिए हुए है. जैसा कि सत्तानशीन हलकों से ट्वीट भी हो रहा है कि अमुक परिवार की हजारों मूर्तियां है तो फिर अखण्डता के प्रतीक की एक मूर्ति क्यों नहीं. दूसरा ये कि दुनिया की सबसे ऊँची मूर्ति बनाकर हम सबसे बड़े हो जायेंगे. ‘विश्वगुरु’ और ‘सर्वशक्तिमान’ जैसे शब्द इस समूह के प्रोपगैंडा का बड़ा हिस्सा रहे हैं, जिन्होंने इस मूर्ति की में अहम् भूमिका निभाई है. तीसरा ये कि इस मूर्ति को बनाने वाले वहीँ हैं जो भारत जैसे विविधता से भरे देश में सबपर एक जीवनशैली, एक भाषा और एक धर्म को थोपने की इच्छा रखते हैं. पर यही लोग दुनिया को चिल्लाकर बताना भी चाहते हैं कि हम सब एक हैं.

यह कौतुहल का विषय है  कि इस सरकार और इससे जुड़े समूह की गलत नीतियों के विरोध में निकली आवाज़ अधिक प्रभावशाली होगी या दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति से जो सन्देश दिया जाएगा वह अधिक तेज होगा! इसका जवाब आने वाले वक्त में कैद है.

(जितेन्द्र राजाराम  आजकल भोपाल में रहते हैं और सामाजिक राजनितिक बहस में खासा दिलचस्पी रखते हैं. इन विषयों को समझने -समझाने के लिए वे इतिहास और आंकड़ो  को अपना हथियार बनाते हैं. जितेन्द्र इन दिनों भारतीय राजनीति की बारीकियों को समझने के लिए दिल्ली, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक होते हुए मध्य प्रदेश पहुंचे हुए हैं.)

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