धर्म और राजनीति का घालमेल कौन कर रहा है, मोदी या राहुल?

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उमंग कुमार/

गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार करते हुए देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस और देशवासियों से कहा कि चुनाव के साथ राम मंदिर मामले को क्यों जोड़ना. जब चारों तरफ धार्मिक उन्माद चरम पर हो तो प्रधानमंत्री के मुंह से यह सुनना कितना सुकून भरा होता है यह बताना मुश्किल है.

मुद्दा यह है कि बाबरी मस्जिद के गिराए जाने के बाद उस विवादित भूमि के स्वामित्व को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई चल रही है. उस सुनवाई में बतौर वकील भाग लेते हुए कपिल सिब्बल ने न्यायालय से मांग की कि इस विवादित भूमि पर न्यायालय को कोई भी फैसला 2019 तक के लिए स्थगित कर देना चाहिए. उन्होंने चुनाव के समय होने वाले ध्रुवीकरण को इस के तर्क के तौर पर रखा. कपिल सिब्बल कांग्रेस के नेता भी हैं.

अलबत्ता न्यायालय ने सिब्बल की बात नहीं मानी और अगली सुनवाई की तारीख फ़रवरी महीने में तय कर दी. इसके तुरंत बाद गुजरात चुनाव में पिछड़ते भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके आरोप लगाया कि एक तरफ राहुल गाँधी गुजरात में मंदिर-मंदिर भटक रहे हैं तो दूसरी तरफ उन्हीं के दल के नेता कपिल सिब्बल न्यायालय में गुहार लगा रहे हैं कि राम मंदिर पर आने वाला फैसला कुछ दिन और टाला जाए. सनद रहे कि शाह चुनाव प्रचार में अभी ज़ोर- शोर से लगे हुए हैं.

क्या गुजरात में अमित शाह के द्वारा इस प्रेस कांफ्रेंस को धर्म और राजनीति को जोड़ना नहीं माना जायेगा? दूसरे क्या देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को नहीं मालूम कि अयोध्या में मंदिर का राजनीतिकरण किस दल ने किया है? देश का कौन राजनितिक दल है जो मंदिर को सीढ़ी बनाकर सत्ता तक पहुंचा है?

क्या मोदी को यह नहीं मालूम कि उनका राजनितिक समूह हमेशा से अयोध्या में मंदिर को चुनाव में इस्तेमाल करता आया है? क्या वह यह भी भूल गए हैं कि उनके 2014 के लोकसभा चुनाव के मैनिफेस्टो में भी अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण एक प्रमुख मुद्दा था? हाल ही में संपन्न उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव में भी अयोध्या में राम मंदिर एक प्रमुख मुद्दा था और भाजपा के मैनिफेस्टो का हिस्सा भी. या देश के प्रधानमंत्री इसे अयोध्या मुद्दे का राजनीतिकरण नहीं मानते?

सवाल तो पांच दिसम्बर को सुनवाई रखने पर भी है. सर्वोच्च न्यायालय ने अगस्त 11, 2017 को सभी पक्ष को अपने गवाह, कागजात इत्यादि तैयार करने के लिए तीन महीने दिए थे. तीन महीना 11 नवम्बर को पूरा हो गया. लेकिन सुनवाई की तारीख बाबरी विध्वंस के पच्चीस साल पूरा होने के ठीक एक दिन पहले रखी गयी. ऐसे में, क्या यह माना जाए कि सर्वोच्च न्यायालय इस मुद्दे की संवेदनशीलता से वाकिफ ही नहीं है? या सर्वोच्च न्यायालय इससे बात से वाकिफ नहीं है कि इस मुद्दे पर पिछले कई सालों से देश की राजनीति तय हो रही है.

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