राजस्थान विधानसभा चुनाव: क्या भाजपा के पास बस ‘फूट डालो’ का ही रास्ता बचा है?

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उमंग कुमार/

राजस्थान उन राज्यों में से एक है जो हर पांच साल पर सत्तारूढ़ दल को विपक्ष में बैठा देता है. यह एक ऐसा सत्य है जो सब जानते हैं वह चाहे कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी (भाजपा). ये दोनों दल सत्ता में रहते हुए तमाम प्रयास करते हैं जिससे इनकी पुनः वापसी हो सके, पर ऐसा हो नहीं पाता.

पिछली सरकार में मुख्यमंत्री रहे अशोक गहलोत ने सत्ता में वापसी के लिए कई सारे लोकलुभावन कार्यक्रम शुरू किये. लेकिन वापसी संभव नहीं हो सकी.

अब बारी वसुंधरा राजे के नेतृत्व में भाजपा सरकार की है. और राजे के खाते में तो लोकलुभावन कार्यक्रम भी नहीं हैं जिनके बूते ये जनता के बीच जाकर वोट मांगेंगी. बल्कि इनके लिए अन्य मुद्दे भी कठिन भविष्य की तरफ इशारा कर रहे हैं. अभी हाल ही में किसानों ने जमीन के अन्दर बैठकर सत्ता का विरोध किया. इसके अतिरिक्त इन्हीं की पार्टी द्वारा शासित केंद्र सरकार के कुछ ऐसे फैसले है जिसको जनता अब तक पचा नहीं पाई है. जैसे नोटबंदी, जीएसटी इत्यादि.  यह सब भी इनके खिलाफ जाने वाला है.

यह सब देखते हुए सत्तारूढ़ दल इस निर्णय पर पहुँचता दिखता है कि अगर सबकुछ ऐसा ही रहा तो सत्ता में इनकी वापसी संभव नहीं है. इसलिए बहुत पहले से ही यह दल चुनाव की तैयारियों में लग गया है.

इस साल जुलाई में ही भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने राजस्थान में चुनाव की तैयारी के नाम पर मीटिंग ले ली और ‘मिशन 180’ की घोषणा भी कर दी

इस साल (2017) के जुलाई में ही भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने राजस्थान में चुनाव की तैयारी के नाम पर मीटिंग ले ली और ‘मिशन 180’ की घोषणा भी कर दी. मतलब कुल 200 विधानसभा सीट में से 180 जीतने की तैयारी करने को कहा.

क्या राजस्थान में हुए हालिया हादसे चुनावी रणनीति का हिस्सा हैं?

अगर आप थोड़ी सी नजर खोलें तो आपको पता चल जाएगा कि राज्य में चुनाव की तैयारियाँ शुरू हो गयीं हैं. ज़ाहिर सी बात है नीतियों से भी यह दल लोकलुभावन फैसले के विरोध में है. यानि ऐसा कोई फैसला तो नहीं ही लेंगे जिसके बूते इन्हें वोट मिल सके. वैसे भी अब ऐसी चीजों के लिए समय नहीं बचा है.

ऐसे में अब इनके पास बस एक ही रास्ता बचता है. वही जो चुनावी जंग में सबसे सटीक और कारगर हथियार के तौर पर काम करता है. लोगों को धर्म के नाम पर बांटना.

ऐसा लगता है इसकी शुरुआत हो चुकी है. पिछले कुछ महीनों से राजस्थान सिर्फ और सिर्फ बुरी खबरों के साथ ही चर्चा में आ रहा है.

पहले सारे जरुरी मुद्दों को छोड़कर पद्मावती का मुद्दा उछला जिसे वहाँ के राजपूत समुदाय के आन, बान और शान से जोड़ा गया. फिल्म बनाने वाले और यहाँ तक कि उस फिल्म के किरदार (रणवीर सिंह जो खुद एक राजपूत हैं) बार-बार यह कहते रहे कि फिल्म में पद्मावती चरित्र के गरिमा का पूरा ख्याल रखा गया है. ये लोग अपील करते रहे कि एक बार फिल्म देखकर लोग निर्णय लें और अगर विरोध करना है तो फिल्म देखने के बाद करें. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. विरोध इतना बढ़ा कि फिल्म के रिलीज़ का दिन पीछे खिसकाना पड़ा. भाजपा शासित कई राज्यों ने आनन-फानन में बिना फिल्म देखे ही इसे अपने राज्यों में प्रतिबंधित भी कर दिया. जाहिर है कि इन सरकारों ने सही के साथ खड़े होने के बजाय आधी-अधूरी जानकारी के साथ एक ख़ास समुदाय के अस्मिता के मुद्दे को हवा देना अधिक जरुरी समझा.

अब जो नया आया है वह है अजमेर शरीफ की मज़ार का राजनीतिकरण. शिवसेना के कोई लखन सिंह हैं जिन्होंने हिन्दू समुदाय से अपील की है कि वे इस मज़ार को ध्वस्त करने का कैंपेन चलायें

इसके बाद फिर दिसंबर के पहले सप्ताह में एक विडियो वायरल हुआ जिसमें एक शम्भूलाल नाम के व्यक्ति ने अफ्राजुल नाम के एक मजदूर की ना केवल काटकर हत्या की बल्कि उसे जलाया भी और और अपनी जानकारी में इस पूरी घटना की फिल्म भी बनवाई. इस घटना ने भी धर्म के आधार पर लोगों बांटने का काम किया. लव जिहाद के नाम पर अंजाम दी गयी इस घटना ने बाद में और तूल पकड़ा. कुछ लोग इस घिनौने अपराध करने वाले के समर्थन में भी आये. यहाँ तक कि इस शख्स के लिए लोग चंदा इकट्ठा करते दिखे. यही नहीं लोगों ने विरोध प्रदर्शन करते हुए न्यायालय के ऊपर भगवा झंडा भी लगा दिया. राजस्थान सरकार और सत्तारूढ़ दल यह सब मौन होकर देखता रहा. कानूनी दिखावे होते रहे.

अब जो नया आया है वह है अजमेर शरीफ की मज़ार का राजनीतिकरण. शिवसेना के कोई लखन सिंह हैं जिन्होंने हिन्दू समुदाय से अपील की है कि वे इस मज़ार को ध्वस्त करने का कैंपेन चलायें. इनके खिलाफ 22 दिसम्बर को एक एफआईआर भी दर्ज हो चुका है.

लेकिन सवाल यह है कि आखिर ऐसे लोगों का मनोबल इतना क्यों बढ़ा हुआ है. क्या इन सब घटनाओं के लिए शासन कर रही पार्टी को जिम्मेदार न माना जाये! रोज लोगों को बांटने के नाम पर कुछ न कुछ हो रहा है और पूरा का पूरा सरकारी अमला खाना-पूर्ति में लगा हुआ है.

राज्य की मुख्यमंत्री तो इन गंभीर मुद्दों पर लगभग चुप ही हैं. तो क्या ऐसे में यह नहीं लगता कि सत्तारूढ़ दल अभी से यह मान चुका है कि उसके तमाम गुड गवर्नेंस के हथियार अब काम नहीं आने वाले. कुछ विशेष नहीं किया गया तो हार तय है.

 

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